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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 792, कुल 869 में से

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पृष्ठ 792

७७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकार यह उनतीसवाँ अध्याय भजन से समर्थ होने के कारण उसमें सुख के कल्लोल सुनाई देते हैं। एकादश
स्कंध के अन्त में सुगम रीति से ब्रह्मप्राप्ति हो इसलिये श्रीकृष्ण स्वमुख से भक्ति के उत्तम से उत्तम प्रकार बता
रहे हैं।
कुर्यात् सर्वाणि कर्माणि मदर्थं शनकैःस्मरन् ।
मय्यर्पितमनश्चित्तो मद्धर्मात्ममनोरतिः ॥ ९॥
देशाचार, कुलाचार अथवा वृद्धाचार आदि के अनुसार प्राप्त हुए वेदोक्त नित्यनैमित्तिकादि कर्तव्यों को
'कर्म' कहते हैं। इसी में मेरे सन्दर्भ में किये हुए कर्म को 'साधारण' मदर्पण कहते हैं और कर्म के अन्दर बाहर
मैं ही हूँ यह जानकर किये हुए कर्म को 'मुख्य-मदर्पण' कहते हैं और यह बिना प्रयास किये होता है। सारा कर्म
मेरे ही कारण प्रकाशित होता है; कर्म क्रिया मेरे ही कारण भासित होती है; इस दृष्टि से जहाँ समूल कर्म को
देखा जाता है वह अनायास होने वाला मदर्पण है। कर्म का आदि मैं; कर्मकर्ता मैं; कर्म में कर्मसिद्धि का दाता मैं;
कर्म में कर्म का फलभोक्ता भी मैं, इसी को कर्म का 'कृष्णार्पण' कहते हैं। परन्तु सहसा मन ऐसा नहीं करता।
इसके लिये धीरे-धीरे अनुसंधान अखण्ड चालू रखने से मन स्वस्वरूप में प्रवीण अर्थात् तल्लीन होता रहता है।
लेकिन जब मन को यह अनुसंधान अच्छा न लगने लगे, उस समय मेरा नामस्मरण करें। मेरे स्मरण से मन मेरे
भजन में अनुसंधान करने लगता है। भजन का इस प्रकार अभ्यास बढ़ने पर, मन को आत्मस्वरूप से प्रीति होने
लगती है और फिर बुद्धि भी वहीं डुबकी लगाती है और अभिमान भी देह की अहंता छोड़ देता है। मन को मेरे
स्वरूप से अलग कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार मन मेरे प्रति रहने से उसे 'मदर्पण' कहते हैं। इस प्रकार
मत्स्वरूप में मन निमग्न हो जाय तभी उसे मेरा भजन अच्छा लगा ऐसा समझना चाहिये। मेरी भक्ति से ही मेरे
भक्त परम पावन होते हैं। तुम कहोगे कि विषयनिष्ठ मन भजन का अनुसंधान कभी नहीं करेगा। उसके लिये भी
श्रीकृष्ण उत्तम उपाय बता रहे हैं।
देशान् पुण्यानाश्रयेत मद्‌भक्तैः साधुभिः श्रितान् ।
देवासुरमनुष्येषु मद्भक्ताचरितानि च ॥ १० ॥
कुरुक्षेत्र यह पवित्र देश है; अयोध्या भी पवित्र देश है। गंगायमुना के दोनों किनारों पर के प्रदेश और
अर्बुदाचल भी अत्यन्त पवित्र है। कलापग्राम, नंदिग्राम, बद्रिकाश्रम देश भी अत्यन्त पवित्र हैं। पंचवटी का श्रीराम
का आश्रम और गोदावरी तट भी अत्यन्त पवित्र है। जहाँ श्रीराम ने अपने चरण रखे थे वह दण्डकारण्य भी
अत्यन्त पवित्र देश है। मथुरा, गोकुल, वृन्दावन और ब्रह्मगिरी भी अत्यन्त पावन हैं। पांडुरंग क्षेत्र भी अत्यन्त
पावन है, उसी को दक्षिण द्वारावती भी कहते हैं। वहाँ विठ्ठल की मूर्ति है जहाँ पंढरी का जयघोष होता है।
पंचक्रोशी काशी तो सभी पातकों का संहार करती है। वाराणसी यह देश पुण्यकारक होते हुए साधकों के लिये
अत्यन्त सहायक है। जहाँ पवित्र नदियाँ बहती हैं, वह प्रदेश भी साधकों के लिये पवित्र है। गंगा, यमुना,
सरस्वती, साबरमती, वैतरणी, गंडकी, नर्मदा, तापी, गोदावरी, भीमा, कृष्णा, वेण्या, तुंगभद्रा, गोमती ये नदियाँ
तथा श्रीशैलस्थान भी पावन है। कावेरी के दोनों तट तथा चिदम्बर क्षेत्र भी पवित्र है। प्रतीची नदी भी उसी प्रकार
पवित्र है। उसके जल से मनुष्य पावन होते हैं। कृतमाला, पयस्विनी, अत्यन्त पवित्र ताम्रपर्णी, उसी प्रकार
नैमिषार अरण्य के पवित्र प्रदेश ये सब साधकों के सेवन के लिये सुयोग्य स्थल हैं। इस पवित्रता की महिमा
छोड़िये। पवित्रता की अपेक्षा भी एक और बात है। जहाँ सज्जन भक्त रहते हैं, वह देश भी सभी दृष्टियों से