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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 784, कुल 869 में से

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पृष्ठ 784

७६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ब्रह्मस्थिति अत्यन्त कठिन है यह मर्म उद्धव के ध्यान में आया; इसलिये साधकों का काम हो जाय इसलिये वह
सरल उपाय पूछ रहा है। कृष्ण अब निजधाम जायेंगे और तब ब्रह्मप्राप्ति हाथ नहीं लगेगी; साधक संकट में पड़
जायेंगे फिर सही उपाय कौन बतायेगा ? इस प्रकार साधकों के हितों के प्रति विह्वल होकर, सुगम रीति से
ब्रह्मप्राप्ति हो सके ऐसा उपाय वह श्रीकृष्ण से पूछ रहा है। उन्नीसवें अध्याय में, ब्रह्मप्राप्ति का सुगम साधन,
अर्थात् जो सप्रेम भगवद्भजन है उसका लक्षण श्रीहरि बताने वाले हैं। जिससे दुर्बल अज्ञानियों को ब्रह्मप्राप्ति
सुलभ हो, वह रीति बतलाने के लिये उद्धव छः श्लोकों में भगवान से विनती कर रहा है।
उद्धव उवाच
सुदुश्चरामिमां मन्ये योगचर्यामनात्मनः ।
यथाञ्जसा पुमान् सिद्ध्येत् तन्मेब्रूह्यब्जसाच्युत ॥ १ ॥
पूर्वाध्याय में जिस ब्रह्मस्थिति का वर्णन किया उसे साध्य करना अत्यन्त कठिन है। दुर्बल, भोले भाले भक्त
इसे नहीं साध्य कर पायेंगे। ब्रह्म वस्तु व्यक्त भी नहीं है और अव्यक्त भी नहीं है; प्रकट भी नहीं है और गुप्त भी
नहीं है। वह मूर्त है वा अमूर्त है इसका पता नहीं चलता। वहाँ साधकों का प्रवेश कैसे होगा ? वह स्थूल भी नहीं
है और सूक्ष्म भी नहीं है; वह है यह कहना भी कठिन है और नहीं है यह कहना भी सम्भव नहीं है। जहाँ देखना
और देखने की वस्तु ये दोनों ही समाप्त हो जाते हैं वह साधकों को कैसे साध्य होगा ? जो दिखायी देता है उसी
को ब्रह्म कहें तो वह नाम और रूप से माया होगी; वह नहीं है यह मानकर छोड़ दें तो उससे साधकों का
नुकसान होगा। जो आकार वाला भी नहीं है और शून्य भी नहीं है; जिसमें ध्येय और ध्यान प्रवेश नहीं करता;
जिससे ज्ञेय और ज्ञान भी शरमाता है और साधन जिसे स्पर्श भी नहीं करता; जो शब्दों के हाथ नहीं लगता; जो
मौन में भी नहीं मिलता; जहाँ भीतर और बाहर नहीं है, वहाँ साधक बेचारा क्या करे ? जो विचारों के अन्दर भी
नहीं है और बाहर भी नहीं है; जिसका पूरी तरह निश्चय करने में बुद्धिमान को भी साहस नहीं होता; वहाँ
साधक किस तरह निश्चय करें ? जहाँ साधकों को अपना मन स्थिर करने के लिये कोई आधार ही नहीं दिखायी
देता; वहाँ अनात्मनिष्ट अज्ञानी लोगों के लिये क्या यह योग अत्यन्त कठिन नहीं है। तुम यदि निजधाम जाने की
जल्दी कर रहे हो तो अज्ञान लोगों के लिये तरने का सुलभ साधन बताओ। यह कह कर उसने साष्टांग दण्डवत
किया, दौड़कर श्रीकृष्ण के चरण पकड़ लिये और सुलभ साधन बताने की विनती की। नदी को तैरकर पार करने
की अपेक्षा उसे चलकर पार करना स्त्रियों और बच्चों को आसान रहता है। इसलिये हे श्रीकृष्ण ! कुछ ऐसा ही
उपाय बताइये। तुम्हारे प्रति सद्भाव तो पूरा है लेकिन शब्दज्ञान समझ में नहीं आता; ऐसे अज्ञानी लोगों को समझ
में आ सके ऐसा तैर कर पार जाने का सुगम साधन बताइये। मनोनिग्रह करना अत्यन्त कठिन है; वह साधकों को
पूरी तरह साध्य नहीं होता। इसी अर्थ का निरूपण अब उद्धव कर रहे हैं।
प्रायशः पुण्डरीकाक्ष युञ्जन्तो योगिनो मनः ।
विषीदन्त्यसमाधानान्मनोनिग्रहंकर्शिताः ॥ २ ॥
हे कमलनयन कृष्ण ! सुनो ! साधक साधना करके कितना भी थक जाये लेकिन वह मन का आकलन नहीं
कर पाता। साधक लोग मन का निग्रह करने के लिये प्राणापान साध्य करते हैं लेकिन मन उन्हें भी मूर्ख बनाकर
तत्काल चला जाता है। कुछ लोग एकांत में आसन लगाकर मनोनिग्रह के सम्बन्ध में बड़ी सावधानी दिखलाते हैं,
लेकिन उन्हें भी ठग कर मन अत्यन्त चपलता से वहाँ से निकल जाता है। मनोनिग्रह करने में हम बड़े निश्चयी