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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

सदा के लिये त्याग दो, तभी तुम्हें परमार्थ साध्य होगा और निजबोध से निजस्वार्थ प्राप्त होगा। उद्धव! समस्त
प्राणिमात्र में भगद्भाव रखना यही ब्रह्मस्वरूप होने का मार्ग है। इसमें कोई धोखा नहीं है। वह भाव अब सुनो।
जहाँ से खतरे की सम्भावना हो, यदि वहीं भगवद्भावना दृढ़ता से बढ़ायी जाय, तो जो खतरा है वहीं उपाय हो
जायगा और विद्या को स्थान नहीं बचेगा। इस स्थिति को छोड़ जो 'मैं ज्ञाता हूँ' ऐसा अहंकार करेगा और निन्दा
स्तुति का आश्रय लेगा, वह अनर्थ में पड़ेगा।
परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति ।
स आशु भ्रश्यते स्वार्थादसत्यभिनिवेशतः ॥ २ ॥
मैं ही एक सर्वज्ञ हूँ, ऐसा ज्ञानाभिमान कर जो संसार के गुणदोष देखता रहता है; और मुख्यरूप से ब्राह्मण
की निन्दा करता है, दूसरे के स्वाभाविक कर्म की निन्दा करना अधर्म है। मारुति इतना बड़ा ज्ञाता था लेकिन वह
भी वानरचेष्टा से नहीं बच पाया। नारद भी बहुत बड़ा ज्ञानसम्पन्न और बड़ों के लिये भी पूज्य, लेकिन वह कलह
कराने में उद्भट था। इसलिये स्वभावधर्म अनिवार्य है, ऐसा मानना चाहिये। गरुड़ देवता का वाहन, सदा हाथ
जोड़कर भगवान के सामने खड़ा रहने वाला; लेकिन वह भी सर्प खाता है। ऐसा यह स्वाभाविक कर्म है। विकार
करने पर यह संसार त्रिगुणात्मक होने के कारण गुणों के अनुसार कर्मों का आचरण होता है। इसलिये उसमें
गुणदोष देखने पर देखने वाला ही दोषी होता है। संसार में एकात्मता ही देखी जाय यही सच्ची ब्रह्मस्थिति है। इसे
देखना छोड़ जो गुणदोष देखता रहता है, वह आत्मघात की ही ओर प्रवृत्त होता है। सहज ही किसी के मिलने
पर वह जानबूझकर उसके गुणदोष देखने लगता है और इस प्रकार ज्ञानाभिमान निन्दा और स्तुति उत्पन्न करता है।
अभिमान का स्वभाव ही ऐसा है कि वह ज्ञाता के पास अधिक उत्तेजित होता है; और वही गुणदोषों को दिखाकर
निन्दा स्तुति उत्पन्न करता है। अपने स्वभाव के साथ जिसका मेल खाता है, उसकी वह थोड़ी तारीफ करता है
और जिसके गुण उसे अच्छे नहीं लगते उसकी पर्याप्त निन्दा करता है। निन्दा और स्तुति जहाँ उत्पन्न होती है,
वहाँ भेद क्षुब्ध हो उठता है और वह परमार्थ को चकनाचूर कर देता है। इस प्रकार उसका बहुत बड़ा अनर्थ होता
है। निंदा के पीछे अनर्थ खड़ा ही रहता है, उसमें उधार की बात नहीं होती। निजस्वार्थ का घात करने वाला वह
सीधे शरीर पर गिर पड़ता है। भेद का अर्थ दूजापन यह बात ही यहाँ मिथ्या है। दृढ़ परमार्थ साधने के लिये भेद
के मिथ्यत्व के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण स्वप्न का दृष्टांत सुनाते हैं।
तैजसे निद्रयाऽऽपन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतनः ।
मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्न्नानार्थदृक् पुमान् ॥ ३ ॥
रजोगुण से इन्द्रियों की उत्पत्ति हुई है। तमोगुण से तन्मात्रा विषय उत्पन्न हुए हैं। वे इन्द्रिय जागृति में विषय
सेवन कर निद्रा में निश्चल होकर रहते हैं। जागृति अवस्था का अभिमानी 'विश्व' और जागृति इन दोनों का जब
अस्त होता है, उस समय स्वप्न में 'तैजस' अभिमानी 'मिथ्या' प्रपंच की सृष्टि करता है। उस समय स्थूल देह
निश्चल रहता है; स्वप्न में केवल मन का विचरण होता है और वह भवजाल उत्पन्न कर त्रैलोक्य की सृष्टि करता
है। उस स्वप्न की सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय हम स्वयं देखते रहते हैं, फिर भी वह जन्म-मरण (उत्पत्ति
और विनाश) मिथ्या ही है। उसी प्रकार अविद्या भी एक प्रदीर्घ स्वप्न ही है। वह केवल अभिमान को बढ़ाता है।
उसका जन्म-मरण मिथ्या ही है और तुम पूर्णत्व से परिपूर्ण ब्रह्म ही हो। तुम्हारे निजस्वरूप में दूजेपन की गन्ध
भी नहीं है। इसलिये उसका शुभाशुभ तुम्हें बिलकुल स्पर्श नहीं करता।

किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत्।
वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ ४॥
जिसने जन्म ही नहीं लिया, वह काला है या गोरा है यह कैसा कहा जाय ? बिना ग्रहण के खग्रास नहीं
दिखाई देता। यदि ऊसर भूमि पर मृगजल का आभास हो तो वह गहरा है या छिछला है, मीठा या खारा है, यह
बताने में विचार कुंठित होगा। उसी प्रकार जब प्रपंच का भान ही मिथ्या है, तब उसमें के गुण और दोष खोजने
वाले ज्ञाता अज्ञान में डूबे ऐसा समझना चाहिये। यदि अमावस्या की रात्रि को अँधेरे का वजन करने अन्धे आये
तो वे दोनों हाथ से तौलें तो भी वजन एक रत्ती भी नहीं होगा। उसी प्रकार प्रपंच मिथ्या होने के कारण उसमें
कान का सुनना, या आँखों से देखना, जीभ से चखना अथवा शरीर से स्पर्श करना, उसी प्रकार हाथ से लेना-
देना, पैरों का चलना, वाचा का बोलना अथवा मन से कल्पना करना यह सब मिथ्या है। उसी प्रकार अहंकार का
जोश, चित्त का चिंतन, बुद्धि का विवेक-विचार यह विचार समूल मिथ्या है। दीवार पर बने चित्र का पानी और
अग्नि, अंत्यज और ब्राह्मण, बाघ और हिरन यह दिखाई देने पर भी दीवार पर दिखाई देने वाला आभास ही है।
उसी प्रकार यह द्वैतमय प्रपंच दिखाई देते हुए भी उसमें अद्वैत वस्तु का ही भास होता है। उसमें शुभ-अशुभ
कैसा ? सर्वत्र ब्रह्म ही परिपूर्ण है। केले के खोल खोलते समय प्रत्येक परदा रीता दिखाई देता है, उसी प्रकार
देहादि प्रपंच का विचार करने पर वह भी सचमुच मायिक अर्थात् मिथ्या है। उस मिथ्या प्रपंच में शुभाशुभ भी
मिथ्या है। परब्रह्म जो सत्य है, वह अपने स्थान पर स्थिर है। उसमें रत्तीभर भी शुभाशुभ नहीं है। जो इसे
शुभाशुभ कहता है, उसकी कल्पना ही उसके सामने खड़ी रहती है और वह अपनी ही कल्पना के महाभय से
मिथ्या जन्म-मरण भोगता रहता है।
छायाप्रत्याह्वयाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिणः ।
एवं देहादयो भावायच्छन्त्या मृत्युतो भयम् ॥ ५ ॥
वास्तव में पानी में प्रतिबिम्ब रहता ही नहीं है, जो देखता है वही उसमें प्रतिबिम्बित रहता है, उसी प्रकार
प्रपंच का स्वरूप भी मिथ्या है। वह हमारी कल्पना के कारण ही भासित होता है। उस प्रतिबिम्ब को आँखों से
देखकर, वह मैं ही हूँ कह कर कपाल पर टीका लगाये उसी प्रकार देहाभिमान में फँस कर जीव का सर फूटता
है। अपना अपने ही शब्दों की प्रतिध्वनि के प्रत्युत्तर आते हैं, जो मिथ्या होते हैं। लेकिन कान को वे शब्द सच्चे
ही लगते हैं। रस्सी का मूल स्वरूप वैसा ही रहता है किन्तु भ्रमवश बड़े सर्प का आभास होता है। वह रहता
मिथ्या ही है, फिर भी भय से शरीर काँपने लगता है और अफरातफरी कर देता है। इस प्रकार देहादिक मिथ्या
होते हुए भी देहाभिमान के कारण जीव को जन्म-मरण के अनेक भँवरों में उलझा कर आकल्प दुःख भोगने को
बाध्य करता है। आत्मा से ही देहादि भेद उत्पन्न हुए हैं ऐसा वेद कहते हैं; और वेद तुम्हारा ही रूप है यह प्रसिद्ध
है, अतः वेदवाद मिथ्या कैसे होगा? उद्धव को वेदवाद की शंका हुई। श्रीकृष्ण ने उसे पूरी तरह जान लिया
इसलिये वह उत्तर दे रहा है।
आत्मैव तदिदं विश्वं सृज्यते सृजति प्रभुः ।
त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वरः ॥ ६ ॥
तस्मान्न ह्यात्मनोऽन्यस्मादन्यो भावो निरूपितः ।
निरूपितेयं त्रिविधा निर्मूला भातिरात्मनि ॥ ७॥

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७३९
प्रपंच प्रत्यक्ष दिखायी देता है, जिससे मन में दुविधा हो जाती है। इसलिये मेरा वेदवचन प्रपंच आत्मरूप से
अभिन्न है, ऐसा उपदेश करता है। ईख बीज में ही विद्यमान रहता है और वही ऊपर एक कांड से दूसरे कांड में
चढ़ता है, उसी प्रकार प्रपंच भी ब्रह्मा के कारण ही तद्रूप बढ़ता है। जिस प्रकार सुवर्ण के अलंकार बनाने पर वे
सुवर्ण के ही रूप में रहते हैं, उन्हें तोड़ने पर भी वे सुवर्ण के रूप में ही रहते हैं, तिल की पुतली बनाने पर भी
वह तिल के अवयवों से शोभा प्रदान करती है और तोड़ने पर भी वह तिल के ही रूप में रहती है, उसी प्रकार
प्रपंच को भी उत्पत्ति, स्थिति और लय प्राप्त होने पर भी आदि, मध्य और अन्त में यह परब्रह्म से परिपूर्ण रहता
है। यहाँ जिस चराचर का आभास होता है, वह सचमुच मैं आत्मा ही हूँ। मेरे बिना इस संसार में अणुमात्र का भी
स्थान नहीं है क्या ? इस प्रकार सृज्य और सृजित पाल्य और प्रतिपालक, संहार और संहारकर्त्ता एकात्मरूप से मैं
भगवंत ही हूँ। यहाँ उत्पत्ति, स्थिति और लय इन तीन विविध स्वरूपों से प्रपंच भले ही भिन्न दिखायी देता हो
लेकिन इन सबका आधार मैं ही हूँ। मेरे सिवा अन्य कुछ भी नहीं है। जिस प्रकार मृगजल के उदक से सूर्य कभी
नहीं भींगता, उसी प्रकार मुझ पर प्रपंच का आभास होता है, लेकिन मैं प्रपंच में नहीं रहता। त्रिविध प्रपंचों का
जाल मुझ पर अवश्य ही दिखायी देता है, लेकिन वह मिथ्या है। जिस प्रकार आकाश सुन्दर नीलवर्ण का दिखाई
देता है, लेकिन वहाँ अणुमात्र के लिये भी नील वर्ण नहीं रहता। संसार जो आँखों को साक्षात् दिखाई देता है, उसे
तुम समूल मिथ्या कैसे कहते हो ? यदि मन में ऐसी शंका आ रही हो तो उसका प्रकार भी सुनो।
इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम् ॥ ७॥
एतद् विद्वान् मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणम् ।
न निन्दति न च स्तौति लोके चरित सूर्यवत् ॥ ८॥
अध्यस्थ, अधिदैव तथा अधिभूत यह तीन प्रकार का संसार माया द्वारा निर्मित है। न होते हुए भी वह मुझ
में भासित होता है। लेकिन वह निश्चित रूप से त्रिगुणात्मक है, यह जान लो। उद्धव ! यह संसार मिथ्या है,
इसलिये शायद तुम उसका त्याग करोगे। लेकिन मेरे इसी भाषण से साधु-संतों को ज्ञान और विज्ञान प्राप्त हुआ
है। प्रपंच का आभास मिथ्या है यह ज्ञान का मुख्य ज्ञान है। इस ज्ञान से जो सम्पन्न होता है वही समस्त प्राणियों
के प्रति समान भाव रखता है। इसीलिये वह प्राणिमात्र के गुण-अवगुण अथवा निन्दा स्तुति की बात नहीं करता।
सूर्य की ही तरह सबसे समान भाव से व्यवहार करता है। बद्रिकाश्रम उत्तर दिशा में है और सेतुबंध-रामेश्वर
दक्षिण में है, फिर भी सूर्य सबके सामने ही है। वह उनसे कभी विन्मुख नहीं होता। पूर्व के लोगों को सूर्य
सन्मुख और पश्चिम के लोगों को विन्मुख कभी नहीं होता। उसी प्रकार मैं सर्वत्र सबके सन्मुख ही हूँ। किसी से
विन्मुख नहीं होता। अपने सामर्थ्य से अन्धकार को दूर कर प्राणिमात्र से सूर्य स्वयं होकर मिलता है, उसी प्रकार
संसार के गुणदोषों के एक ओर रखकर साधुगण संचार में विचरण करते रहते हैं। मैंने बताया हुआ यह ज्ञान का
लक्षण ही सिद्धों की पूर्णता है ताकि मुमुक्षु इस अनुसंधान को सामने रखकर सावधान होकर यह स्थिति साध
सकें। जिससे यह निजज्ञान प्राप्त हो ऐसे विषयों का साधन श्रीकृष्ण उद्धव को अपने मुख से बता रहे हैं।
प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा।
आद्यान्तवदसज्ज्ञात्वा निस्सङ्गो विचरेदिह ॥ ९॥
जो उत्पन्न होकर नष्ट होता है, वह सब मिथ्या है यह जान लें और उस पर आसक्ति त्याग कर उदास और
विरक्त होकर रहें। वंध्या के पुत्र का नामकरण कोई आनन्दपूर्वक नहीं करता; उसी प्रकार नाशवान देह के बढ़ने

७४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
से मूर्खों का ही मन आनन्दित होता है। उत्पत्ति और विनाश का लक्षण भगवान उदाहरण देकर बताते हैं।
प्राणिमात्र का जन्ममरण हम नित्य आपकी आँखों से देखते हैं। अनुमान करके देखें तो भी गेरू पर्वत, पृथ्वी
आदि जो भी साकार दिखाई देता है वह सब प्रलय के अंत में नष्ट होने ही वाला है। वेदोक्ति भी यही बताती है
कि अष्टधा पृथ्वी भी नाशवान है। जीवभावना भी अन्त में विनष्ट होती है, ऐसा श्रुति भी जोर-शोर से कहती है।
साथ ही जो भी जड़ और विकारी है वह सब नष्ट होता है यह अनुभव हमें भी है। इससे यह भी अपने आप ही
मालूम होता है कि संसार 'नश्वर' ही है। पिता को मरा हुआ देखते हैं और पुत्र-पौत्र उनके सारे संस्कार करते
हैं। फिर भी अपनी मृत्यु की चिन्ता नहीं करते। देह की आसक्ति के कारण ऐसा भ्रम हो जाता है। पुत्र पितरों को
पिण्डदान देते हैं और उन्हें सद्गति प्राप्त हो, ऐसा कामना करते हैं किन्तु अपनी गति का विचार नहीं करते। देह
के लोभ के कारण नश्वर की इतनी आसक्ति रहती है। आत्मा केवल प्रकाशमय है और प्रपंच जड़, मूढ़ और
अज्ञान है। यह सुनकर उद्धव भगवान से प्रश्न करता है।
उद्धव उवाच
नैवात्मानो न देहस्य संसृतिर्द्रष्टृदृश्ययोः ।
अनात्मस्वदृशोरीश कस्य स्यादुपलभ्यते ॥ १०॥
आत्मा नित्यमुक्त है तथा ज्ञानस्वरूप है। उसे संसार का बन्धन आवश्यक नहीं है। देह जड़, मूढ़ और
अज्ञान है। उसे भी संसार की आवश्यकता नहीं होती। अतः हे श्रीकृष्ण! फिर संसार का बन्धन किसे बाधक
होता है? तुम कहते हो संसार है ही नहीं, लेकिन वह तो प्रत्यक्ष दिखायी देता है। आत्मा का विचार करने पर
संसार बन्धन को कोई स्थान ही नहीं है, इसी अर्थ का निरूपण उद्धव स्वयं ही करते हैं।
आत्मव्यायोऽगुणः शुद्धः स्वयंज्योतिरनावृतः ।
अग्निवद् दारुवच्चिद् देहः कस्येह संसृतिः ॥ ११॥
आत्मा नित्यमुक्त होते हुए चित्स्वरूप है। उसे गुण अथवा निर्गुण बिलकुल स्पर्श नहीं करते। उसके पास
कर्माकर्म अथवा पाप पुण्य के लिये कोई स्थान नहीं है। परादि वाणी से उसका उच्चार नहीं होता, इसलिये उसे
'परात्पर' कहते हैं। प्रकृति गुणों से उस पर विकार का प्रभाव नहीं होता क्योंकि परमात्मा प्रकृति से परे है।
जिसके प्रकाश की दीप्ति से सूर्य, चन्द्र आदि प्रकाशित होते हैं, जिसके प्रकाश से त्रिभुवन प्रकाशित होता है,
ऐसा वह परमात्मा तेजोमूर्ति है। ऐसे आत्मा को संसार बन्धन नहीं हो सकता। यदि मृगजल के कुण्ड में सूर्य डूबे
तभी आत्मा को बन्धन होगा। जुगनू के प्रकाश से यदि सूर्य जले, बगुले के भय से यदि काल पलायित हो, चींटी
के पर से यदि सारा आकाश उड़ जाय, वायु यदि लड़खड़ा कर कुएँ में गिर पड़े, गड्ढे के पानी में यदि मेरू डूब
जाय तो भी हे गोविन्द! आत्मा को संसार बन्धन कभी नहीं होगा। उसी प्रकार देह के लिये संसार बन्धन है ऐसा
कोई मूर्ख भी नहीं कहेगा क्योंकि देह जड़, मूढ़ और अज्ञान होने के कारण उसे संसार बन्धन की बाधा कभी
नहीं होगी। हाँ, यदि पत्थर के पेट में दर्द होने लगे, सूखी लकड़ी भूख के मारे तड़पना शुरू करे तो अवश्य ही
देह को संसारबन्धन होगा। पर्वत अगर हिलने लगे, मृत्तिका यदि स्नान करने के लिये व्याकुल हो जाय, कोयले
से यदि अन्धकार काला हो जाय, तो संसारबन्धन की बाधा देह को होगी। अब आप यह कहेंगे कि देह और
आत्मा की संगति से संसार बन्धन होता है, तो विचार करने से मालूम होता है कि बात ऐसी नहीं है। क्यों नहीं
है, वह भी सुनो कृष्ण! आत्मा यह स्वयंप्रकाश बड़ा अग्नि ही है और देह जड़ और मूढ़ होने के कारण काष्ठ की

जगह है। वह यदि आत्मा से मिलता है तो आत्मा उसे तत्काल जला कर भस्म कर देगा। कर्पूर यदि अग्नि में
एकरूप आठों पहर रह सके तो देह और आत्मा एकरूप होकर देह भी संसार बन्धन में रह सकता था। काष्ठ में
अग्नि रहता है लेकिन वह काष्ठ बनकर नहीं रहता। उसका घर्षण कर मूलतेज से बाहर निकालने पर वह
लकड़ी को जलाकर भस्म कर देता है। उसी प्रकार आत्मा देह में रहता है लेकिन वह देहरूप नहीं रहता। वह
चिद्रूप से ज्ञानस्वरूप से देह का प्रकाशक है, उसे संसार बन्धन की बाधा नहीं होती। आप कहेंगे कि यदि आत्मा
की संगति से देह जल जायेंगे, तो फिर प्राणी जीवित कैसे रहते हैं? वह भी सुनो। रूपहले परदे पर दीपक के
प्रकाश की सहायता से कागज की पुतलियाँ नाचती रहती हैं लेकिन यदि उन्हें दीपक से लगा दिया जाय तो वह
उन्हें जला देगा। उसी प्रकार आत्मा की सत्ता शक्ति से प्राणि अपने प्रारब्ध के अनुसार व्यवहार करते रहते हैं;
लेकिन वही आत्मा स्वयंभू स्वस्वरूप में स्थिर हो जाने पर आत्मा का अनुसंधान करने पर संसार का भान नहीं
रहता फिर भिन्न-भिन्न आकार के बद्ध जीव कैसे रहेंगे? इस प्रकार देखने पर संसार बन्धन मुझे मिथ्या ही लगता
है। संसार बन्धन के लिये निश्चित स्थान कोई नहीं है। आत्मा में और देह दोनों में कोई भवबंध नहीं है, इसलिये
वह मिथ्या है, उसे कहीं कोई ठिकाना नहीं है। श्रीकृष्ण ! तुम नाराज न हो। मेरा निश्चय है कि संसारबन्धन
सचमुच ही मिथ्या है। उद्धव का यह भाषण सुनकर श्रीकृष्ण के आनन्द में उफान आ गया। उन्होंने मन ही मन
कहा, मेरा उद्धव अब ज्ञानी हो गया, उसे निजात्म की पहचान हो गयी। भवबन्धन सचमुच मिथ्या है, यह उद्धव
का भाषण सुनकर श्रीकृष्ण परमानंद से डोलने लगे और उद्धव पर प्राण न्योछावर करने की उन्हें इच्छा हुई।
आत्मा को भवबन्धन नहीं है, देह में भी वह नहीं दिखायी देता, यह विचार जिनकी समझ में नहीं आता उन्हीं
को भवबन्धन है, ऐसा श्रीकृष्ण बताते हैं।
श्रीभगवानुवाच
यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मनः संनिकर्षणम्।
संसारः फलवास्तावदपार्थोऽप्यविवेकिनः ॥१२॥
जो वर्णाश्रम से परे है, जो बंधमोक्ष से अलिप्त है, जो देहद्वंद्व को स्पर्श न करने वाला है, वह श्रीहरि उद्धव
के हित की बात करने लगा। मैं स्थूल, मैं कृश, मैं गोरा, मैं काला, ये देह के 'देहधर्म' हैं और मैं काना, मैं गूँगा,
मैं बहरा, ये इन्द्रियों के इन्द्रियधर्म हैं। क्षुधा, तृषा आदि 'प्राणधर्म' हैं। काम, क्रोध, लोभ आदि जो संभ्रम हैं वह
मन का 'मनोधर्म' है। सत्वगुण से जागृति, रजोगुण से स्वप्नस्फूर्ति और तमोगुण से जड़ता और सुषुप्ति, ये
वास्तव में देह के योग से होते हैं। देह को मारण आने पर 'मैं मेरा' कहता है और देह का जन्म होने पर 'मैं
जनमा' समझता है। इन्द्रिय विषय सेवन करते रहते हैं फिर भी मैं स्वयं उसका सेवन कर रहा हूँ, ऐसा मानता है;
स्वर्ग-नरक के भोग देहात्मता के कारण ही सच मालूम होते हैं। प्राण अन्न की इच्छा करता है, उसे खाता है
अग्नि; लेकिन वह स्वयं चिदात्मा उसका साक्षी होते हुए, वह अन्न मैंने ही खाया ऐसा समझता है। ये सारे धर्म
'मेरे ही हैं' ऐसा जब तक आत्मा को पक्का भ्रम है, तब तक वह मिथ्या ही रहने वाला अत्यन्त दुर्गम और विषम
संसार का भ्रमवश भोग करता रहता है। उस भोग का फल अत्यन्त कठिन है अविराम जन्म-मरण, स्वर्ग-नरक,
पाप-पुण्य, यह सब वह भ्रम के कारण सच ही मानता है। संसार तो वास्तव में निर्मूल है; लेकिन वह भ्रम के
फल से सदा फलता-फूलता है। अविवेकी लोग उसे अत्यन्त प्रबल समझते हैं और वह निरन्तर फलता-फूलता
है। जिसका सचमुच कोई अर्थ नहीं है, उसे 'अनर्थ' कहते हैं। उस अनर्थ का फलभोग भी वही भोगते हैं जो

७४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बच्चों के हौवे से भय खाते हैं। (आशंका) आकाशपुष्पों की माला यदि बाँझ का लड़का पहने तभी संसार भोग
का मेला आत्मा के पास दिखायी देगा। ऐसी न होने वाली बात कैसे होगी? इसी अर्थ का निरूपण बड़े चाव से
श्रीकृष्ण उद्धव को सुनाते हैं।
अर्थे ह्यविद्यमानेपि संसृतिर्न निवर्तते।
ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ १३ ॥
सत्य का अंश न होते हुए भी यह संसार अत्यन्त असाध्य है और छूटता नहीं है, इसी अर्थ का निर्णयात्मक
विचार सुनाता हूँ। बाँझ स्त्री के बच्चे की ही तरह संसार की कोई वास्तविकता नहीं है। उसे सच माना जाय तो
उसका कालांतर में ही विनाश होने वाला है। संसार यदि वास्तविक होता तो उसका ब्रह्मज्ञान से भी विनाश नहीं
हुआ होता। इसलिये वह सत्य है या मिथ्या है इसका निर्णय ही नहीं लिया जा सकता। उसी प्रकार इसकी बात
अनिर्वचनीय है। अविचार के कारण इसकी चाह उत्पन्न होती है, अविवेक के कारण यह अतिमधुर लगता है;
विषय के ध्यान से यह बढ़ता है और संकल्प ही इसका सशक्त मूल है। न रहते हुए भी इसका आभास होता है।
सोये हुए को स्वप्न में अनर्थ का आभास होता है उसी प्रकार यह संसार माया के योग से भ्रान्ति से विषय भोगने
को बाध्य करता है। विषयों का जैसे-जैसे सेवन किया जाता है वैसे-वैसे विषयों का ध्यान बढ़ता जाता है और हे
उद्धव ! विषय की लगन से सुदृढ़ संसार बन्धन प्राप्त होता है। विषय सेवन के कारण ही जीव का भवबन्धन दृढ़
हो गया है। उन्हीं विषयों का भान जीवन्मुक्तों को दैवयोग से दिखायी देता है। जीवन्मुक्तों को विषयप्राप्ति होने से
उनकी मुक्ति का विलय हो जायेगा, ऐसी शंका मन में न लाओ। इसी का स्पष्टीकरण श्रीकृष्ण करते हैं।
यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापे बह्वनर्थभृत्।
स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ १४ ॥
सज्ञान और अज्ञान का जो विषय सेवन होता है, उनका अनुभव भिन्न-भिन्न होता है। इसका भी लक्षण
सुनो। उसका भी लक्षण सुनो। स्वप्न में मिले हुए विषयों को स्वप्नस्थ लोग किस प्रकार सच मान लेते हैं,
लेकिन नींद खुलने पर उसकी सत्यता में विश्वास नहीं होता उसी प्रकार अज्ञानी जब विषयों का सेवन करते हैं
तो उनका मन विषयासक्त होता है; लेकिन वही विषय जीवन्मुक्तों को दिखाई देने पर वे उसे मिथ्या मानते हैं।
नाटक में जिस प्रकार अभिनेता लोकदृष्टि के अनुसार स्त्री-पुरुष के रूप में विचरण करते हैं, उसी प्रकार
मुक्तपुरुष के घर में स्त्री बच्चों के साथ व्यवहार करते हैं अथवा जिस प्रकार बालक खेल-खेल में तुलसी-पत्र
लेकर उससे विविध वस्तुओं की कल्पना करते हैं, उसी प्रकार जीवन्मुक्तों के लिये संसार में एक ही विषय रहता
है। लेकिन जीवन्मुक्त लोग इन विषयों को अनेकत्व से नहीं देखते। देहाभिमान दृढ़ रहने पर 'मैं' और 'मेरा' इस
विषय का स्फुरण ही संसारबन्धन का कारण है। इसी का स्पष्टीकरण श्रीकृष्ण करते हैं।
शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः ।
अहंकारस्य दृश्यन्ते जन्म मृत्युश्च नात्मनः ॥ १५ ॥
देहाभिमान के उदर में सहस्रों दुःख भरे रहते हैं। उनके गुणकार्य सारांश रूप में श्रीकृष्ण जगसेठी बता रहे
हैं। देहाभिमान का कार्य ऐसा है कि वह अद्वैत में भेद उत्पन्न करता है। इससे यह सारा संसार इष्ट और अनिष्ट
बातों से भर गया है। अपने नाशवान इष्ट वस्तुओं का नाश होते ही उससे देह का अहंकार दुःख करने लगता है।
इसी को सब लोग शोक कहते हैं। नश्वर विषयों की प्राप्ति होने पर मन को बड़ा संतोष होता है। उद्धव ! इसी

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७४३
को लोग 'हर्ष' कहते हैं। सारे बलवान सम्बन्धी मिलकर अपनी पसन्द की वस्तु के लिये मारपीट करने आते हैं,
जिससे मन व्याकुल होता है। इसी को 'भय' कहते हैं। अपने इष्ट काम में किसी के व्यवधान करने पर उसका
विनाश करने के लिये दौड़ना, इसे 'क्रोध' कहते हैं। करोड़ों की सम्पत्ति संग्रह में होने पर कौड़ी खर्च करने के
लिये प्राण छोड़ना यह 'कंजूस' व्यक्ति की रीति है। इसी का नाम है 'लोभ का बंधन'। कर्म क्या है और अकर्म
क्या है, हित किसमें हैं और अहित किससे है, इष्ट क्या है और अनिष्ट क्या है, इसका विचार न होना और समझ
में न आना, इसी का नाम 'मोह' है। नित्य विषय सेवन करते हुए भी मन में बार-बार विषय की प्रबल इच्छा
उत्पन्न होना, अखण्ड विषयों का ही ध्यान करना, इसका नाम 'स्पृहा' है। ये जो नानाप्रकार के गुण अथवा जन्म-
मरण हैं उनका आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह सारा भोग देहाभिमान ही भोगता है। जागृति और स्वप्न
देखने में देहाभिमान होता है। इसलिये वहाँ ये गुण दिखायी देते हैं। लेकिन सुषुप्ति में ये गुण नहीं होते। वृत्ति
जब निरभिमान रहती है उस समय जन्म-मरणादि गुण नहीं उभरते। गुणों का कारण केवल अभिमान है। वायु
पानी पर बहता है और जमीन पर भी बहा है लेकिन जल पर लहरें उठती हैं, वे जमीन पर नहीं उठतीं। अतः
लहरों का उठना यह धर्म पानी में रहता है। उसी प्रकार शोक आदि करोड़ों धर्म अहंता में होते हैं। इससे अहंकार
को ही बन्धन है। अतः उसी को मुक्ति मिले ऐसा यदि तुम कहो, तो वह अहंता जीव के साथ लगी हुई है। जिसे
अंत्यज से छूत लगती है, उसे गंगास्नान से शुद्धि मिलती है, लेकिन वही गंगा स्नान अंत्यज की शुद्धि के लिये
व्यर्थ है। उसी प्रकार अहंता जीव के साथ जुड़ी हुई है, उसे छोड़ देने पर उसे मुक्ति है। लेकिन अहंकार को
मुक्ति कल्पांत में भी सम्भव नहीं है।
देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्तिः।
सूत्रं महानित्युरुधेव गीतः संसार आधावति कालतन्त्रः॥ १६॥
आत्मा अनंत, अपार, ज्ञानमय, मायातीत और सम्पूर्ण है। वही माया का अधिष्ठान बनता है, इसीलिये उसे
'अंतरात्मा' कहते हैं। माया को व्याप कर भी वह अपार है। इसीलिये उसे परमेश्वर कहते हैं। वही माया का
नियंता है इसलिये उसे 'ईश्वर' कहते हैं। 'अविद्या' में प्रतिबिम्बित हुआ है इसलिये उसे 'जीव' कहते हैं और
वही देह की लगन से प्रबल होकर 'अहंकार' बन गया। वही 'संकल्प', 'विकल्प' इन विकारों के संसर्ग से
'मन' बन कर विद्यमान है और उस मन के गमन के लिये वह इन्द्रिय भी वही बन गया है। उन इन्द्रियों को
आधार, सुख-दुःख भोगों का समुदाय, पाप-पुण्य का चमत्कार इस प्रकार 'देह' का आकार भी वही बन गया है
और उस देह का कारण जो सत्त्व, रज और तम गुण हैं, वे भी वह स्वयं ही हो गया है। गुणक्षोभ का मुख्य मर्म
'पंचविषय', विषय भोग आदि क्रिया कर्म और 'स्वधर्म' भी वह स्वयं ही बन गया है। तीनों गुणों के जन्म का
कारण जो यह 'महत्तत्त्व' अथवा 'प्रधान सूत्र' है वह भी वह स्वयं ही हो गया है। इस प्रकार सारा संसार ईश्वर
स्वयं ही बन गया है। उसी संसार को आश्रयभूत ऐसी गुणसाम्यरूप प्रकृति वही बना हुआ है। उसी प्रकार
उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने वाली क्षोभक शक्ति तो 'काल' है वह भी वह स्वयं ही बन गया है। वह काल
अपने सत्ता सामर्थ्य से जीव की अथवा संसार की उत्पत्ति करता है, पालन करता है और अन्त में संहार करता
है। ऐसी आवृत्ति वह कितनी बार करता है, इसका पता नहीं है। इससे ज्ञात होता है कि परब्रह्म की स्फूर्ति ही
संसार है। उसी को लीला शक्ति से साकार स्थिति प्राप्त हुई है। मैं विश्वेश्वर होते हुए विश्वस्वरूप हूँ। नानापदार्थ
मैं ही हूँ। इसलिये जो भी पदार्थ दिखाई देता है वह आत्मा का ही स्वरूप है। मुझसे अलग कोई पदार्थ नहीं है,

७४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ऐसा जिसका विश्वास है, वह धन्य है। मैं स्वयं ही नाना रूपों में व्यक्त हुआ हूँ। वेद भी इसके साक्षी हैं।
'विश्वतश्चक्षुः' इस वेदश्रुति द्वारा मेरा सर्वकाल गान हो रहा है और आश्चर्य तो देखो। जीव कल्पना में ही भूला
हुआ है। वह देह की लगन से अहंता बढ़ाता है और कहता है कि देव त्रैलोक्य में भी नहीं दिखायी देता। द्वैत का
भाव सच है यह मानकर जीव अत्यन्त अज्ञानी बन गया है। वह अपने आप को ही भूल गया, इतना देहाभिमान
दृढ़ हो गया है। देहाभिमान की दृढ़ता ही 'बद्धता' का लक्षण है और देहाभिमान का निराकरण ही 'मुक्तता' है।
देहाभिमान समूल 'मिथ्या' है। भेद का भवमान भी मिथ्या है। उसका समूल निर्दलन कैसे किया जाय इसका
उपाय श्रीकृष्ण बताते हैं।
अमूलमेतद् बहुरूपरूपितं मनोवचःप्राणशरीरकर्म।
ज्ञानासिनोपासनया शितेनच्छित्त्वा मुनिर्गां विचरत्यतृष्णः ॥ १७॥
द्वैत भावना से ही संसार का भान उत्पन्न होता है; और उद्धव ! मन, वाणी, कर्म, प्राण यह देहद्वय का जो
स्फुरण है, वह निर्मूल है, यह तुम जान लो। भेद के ही कारण बहुरूप दिखायी देने वाले भवजाल का विचार
करने पर वह बिलकुल निर्मूल है। यह संसार का जाल विचित्र आभासित करने के लिये आत्मा के सिवा कोई
स्थान नहीं है। जो आत्मा को संसार से भिन्न मानते हैं, वह उनका अज्ञान है। उनका देहाभिमान ही नाना प्रकार
का भेदभाव बढ़ाता रहता है। उस देहाभिमान के उदर में ही कर्माकर्म की झंझट, कोटि-कोटि जन्म-मरण तथा
दुःख और संकटों को जीव भोगता रहता है। ऐसा यह देहाभिमान पूर्ण रूप से दुःख देने वाला है यह ध्यान में
रखकर जो उसके नाश के लिये पूर्णरूप से पश्चाताप करता है, उसे गुरु की सेवा कर ज्ञानरूप खड्ग प्राप्त करना
चाहिये और गुरुपदेश रूप पत्थर पर उस खड्ग को घिस-घिस कर धारदार बनाना चाहिये। उसे संसारवृक्ष का
मूल जो देहाभिमान है उसे समूल काट देना चाहिये। इस प्रकार देहाभिमान को काट कर सज्जन लोग शेष जीवन
अभिमानरहित जीते हैं तथा आत्मनिष्ठा से पृथ्वी पर संचार करते हैं। उन्हें इच्छा, निन्दा, द्वेष अथवा तृष्णा
बिलकुल स्पर्श नहीं करते। मन ही जहाँ मनोभाव से वंचित रहता है वहाँ इच्छा और तृष्णा को कहाँ स्थान
मिलेगा ? (आशंका) इस प्रकार जो सारे संसार का निर्दलन कर सके वह ज्ञान क्या है ? उसे प्राप्त करने का
साधन क्या है ? और वह ज्ञान प्राप्त करने से क्या लाभ है ? इन बातों का साद्यंत श्रवण करने की उद्धव की इच्छा
हुई यह जान कर श्रीकृष्ण स्वयं उसका निरूपण करते हैं।
ज्ञानं विवेको निगमस्तपश्च प्रत्यक्षमैतिह्यमथानुमानम्।
आद्यान्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्च तदेव मध्ये ॥ १८ ॥
नित्य क्या है और अनित्य क्या है, इसका जो विवेक है, उसी का नाम 'ज्ञान' है। ऐसा ज्ञान रखनेवाले दाता
दोनों देहों का प्रकाशक आत्मा है, यह बात जानते हैं। रस की मिठास जाँचने के लिये, पहले गन्ने के छिलके
साफ कर लिये जाते हैं; गन्ने को कोल्हू में डाल कर उसका रस निकालते हैं। फिर उस रस को औटाते हैं तभी
चीनी प्राप्त होती है। उस चीनी का सीरा बनाकर उस चीनी के ही केले, नारियल आदि फल उसी मिठास के
तैयार करते हैं। उसी प्रकार स्थूल देह का निराकरण कर, लिंगदेह का मर्दन कर, अहंकार का संहार कर ज्ञाता
पूर्व ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। वह ब्रह्म निर्गुण-निराकार है, उसी रूप में वह पूरे चराचर को देखते हैं। इस रीति से
ज्ञानी परब्रह्म का निश्चय करते हैं। उद्धव ! इसी का नाम है निश्चित 'विवेकज्ञान'। ब्रह्म निःशब्द और निर्गुण है।
उसमें जो श्रुति का स्फुरण-अद्यतन शब्दज्ञान है, वही मेरा निगम वेद है, यह जान लो। वही मैं वेदरूप नारायण

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७४५
हूँ। इसीलिये 'वेदवचन' प्रमाण है। श्रुति का शब्दज्ञान पठन करने वाले को पावन करता है। उद्धव ! आत्मस्वरूप
जानने के लिये देहादि विषयों का जो अनुताप है, जिससे साधक निष्पाप होते हैं, उसका नाम 'तप' है। अनुताप
से मन का दमन करने से पातकों का क्षालन होता है। तब वह श्रुति के अर्थ के अनुरोध से परब्रह्म का 'अनुमान'
करने में समर्थ होता है। देह जड़, मूढ़ और अचेतन है, उसमें चैतन्यस्वरूप नारायण है और देह मिथ्या है इस
बात का निश्चय होकर मन अद्वैत में रंग जाता है। उस अद्वैत प्राप्ति का मार्ग यही है कि हम अभिमानरहित
होकर भक्तिभाव से सद्गुरु की अनन्य भाव से शरण जायें। उसे गुरु की कृपा होती है। शरणागत का अधिकार
और लक्षण देखकर गुरु भी उसे गुरुज्ञान का उपदेश करते हैं। 'सब में निर्मल परब्रह्म ही है' यही श्रुति का उत्तम
गुह्य है। जो परम सौभाग्यशाली होता है उसके मन में ही यह सुगम रीति से अंकित होता है। गुरु के वचन कान
में पड़ते ही आत्मसमाधान से वृत्ति चित्स्वरूप में तल्लीन होकर स्वानंद में समरस हो जाती है। अब उसके लिये
आगे साधन अथवा कर्म का आचरण रह गया है, ऐसा कौन कहेगा ? वेद भी वहाँ मौन रह गये हैं। जहाँ द्वंद्व की
स्फूर्ति नहीं रह जाती सारे दुःखों की समाप्ति हो जाती है, देह में ही विदेह परब्रह्म की प्राप्ति होती है; उसे ही
'प्रत्यक्ष' कहते हैं। विस्मृति की ठौर पूछकर, स्मरण के बिना ही नित्य स्मरण होना और अखण्ड स्वस्वरूप का
अनुभव प्राप्त होना, इसी का नाम है 'प्रत्यक्षता'। मैं स्वानंदकंद आत्मा हूँ, इस प्रकार का परमानन्द का अनुभव,
यही 'प्रत्यक्ष' पद का वास्तविक अर्थ है, ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा। भाग्यशाली साधक को यह बोध श्रवण
होते ही प्राप्त होता है, किसी को मनन से प्राप्त होता है और किसी को अनवरत चिन्तन से प्राप्त होता है। कइयों
को स्वरूपाकार वृत्ति के अभ्यास से यह बोध प्राप्त होता है और कइयों को मेरी अद्वैत भक्ति के योग से यह बोध
अर्थात् मैं श्रीकृष्ण पूरी तरह प्राप्त होता हूँ। उद्धव ! पूर्ण रूप से आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने के लिये यह साधन
प्रमुख है। इस प्रकार आत्मज्ञान प्राप्त होने पर उसका क्या 'फल' मिलता है वह भी बताता हूँ। मैं अनंत सृष्टि का
मूल कारण हूँ, किन्तु नित्यमुक्त होने के कारण अहेतुक, वही मैं श्रीकृष्ण लीला से सारी सृष्टि की उत्पत्ति का
मूल कारण हूँ उसी प्रकार रजोगुण की सहायता से मैं उत्पन्नकर्ता के रूप में अद्वैत में ही अनेक व्यक्ति दिखाता हूँ।
जिस प्रकार जड़ के बिना फलदार वृक्ष बढ़ता है, उसी प्रकार सृष्टि के संरक्षण का मुझ निष्काम को शौक है।
एक लकड़ी से शतरंज की गोटियाँ बनती हैं। उनमें राजा, प्रधान पशु और प्यादे बनते हैं। उनके अपने पूर्वकर्म
नहीं होते, उसी प्रकार निष्कर्म से सृष्टि को प्रकाशित करने वाला मैं हूँ। निष्कर्म करके ही सृष्टिकर्त्ता ने इस
संसार का निर्माण किया यह देखकर मीमांसकों का मन कुंठित हो गया। सारांश यह संसार सदा से ही निष्कर्म
ब्रह्मस्वरूप ही है। जिस प्रकार शतरंज के खेल में अचेतन को भी शुद्ध करना पड़ता है, उसी प्रकार लोकरक्षण
की आत्मीयता से मैं सृष्टि का प्रतिपाल करता हूँ। प्रकृति की सारी गोटियाँ जड़मूढ़ ही होती हैं, उसे पुरुष के
हाथ से सचेतन कर, हाथ में काल के पासे लेकर चराचर का खेल खेलाने वाला मैं एक विष्णु हूँ। निर्जीवों के
इस झगड़े में न मरने वाले को भी मृत्यु आती है। एक की जीत और एक की हार ऐसे दो पक्षों को खेल खेलाने
वाला मैं ही हूँ। गोटी मरने पर कौन पुण्यवान वैकुण्ठ में जाता है और कौन पापी नरक में जाता है ? इस सृष्टि के
बंध-मोक्ष इस प्रकार के हैं। उसी प्रकार अपना 'एकपन' छोड़े बिना, उस खेल की ही तरह मैं संसार का पालन
'दूजे 'पन का स्पर्श किये बिना करता हूँ। रस्सी का सर्पाकार अपने सामर्थ्य से वीर पुरुष मार कर नष्ट करता है,
उसी प्रकार मैं प्रलयरुद्र इस सृष्टि का संहार करता हूँ। स्वप्न में देखे हुए संसार को जागने पर नष्ट करने में कष्ट
कैसा? उसी प्रकार मैं प्रलयकर्त्ता हूँ, ऐसा समझ लो। उत्पत्ति, स्थिति और लय केवल सृष्टि पर ही लागू होती है,
आत्मा आत्मस्वरूप में अखण्ड परिपूर्ण है। वही स्वरूप ज्ञानसम्पन्न लोग स्वानुभव से स्वयं होकर रह रहे हैं।

७४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
'वह आत्मस्वरूप मैं बना' यह कहना भी लज्जा स्पद है क्योंकि वह आत्मरूप ब्रह्मत्व से स्वयंभू होने के कारण
होना या न होना यह कहना केवल भ्रम है। रस्सी के मिथ्या सर्पाकार का आभास होने पर भी वह रस्सी ही रहती
है और सर्प का आभास समाप्त होने पर भी रस्सी ही रहती है। उसी प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति के समय आत्मा
जन्म नहीं लेता; अथवा सृष्टि का पालन-पोषण होते समय उसमें वृद्धि नहीं होती। सृष्टि का प्रलय होने पर
आत्मा को उसकी खबर भी नहीं होती। उत्पत्ति, स्थिति और लय इन तीनों स्थितियों में आत्मा वास्तव में
अविकारी ही रहता है। इसी साधन से ज्ञान साध्य कर साधक संज्ञान होते हैं और वे स्वयं अबाधित होकर पूर्ण
ब्रह्म होकर रहते हैं। साधक अज, अव्यय और आनन्दपूर्ण ब्रह्म हो जाते हैं। उद्धव ! यही सब ज्ञान का फल है,
यह जान लो। ज्ञान का यह फल प्राप्त होते ही उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होने पर भी आत्मस्वरूप अखण्ड और
परिपूर्ण ही रहता है। यही बात श्रीकृष्ण दृष्टांत के साथ बताते हैं।
यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य ।
तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥ १९॥
मुकुट, कुण्डल, कंकण आदि न बनाने पर भी सुवर्ण सोने के ही रूप में रहता है और बनाने पर भी उसमें
किसी प्रकार की कमी नहीं आती। उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और लय इनके योग से मेरा चित्त अविनाशी ही
रहता है। मेरा स्वरूप शुद्ध परब्रह्म है उसमें नाना प्रकार के रूप और नामों का आभास होने से संसार विषम
दिखाई देने पर भी ब्रह्म सर्वत्र सम ही है। सूर्य के किरण जिस प्रकार सूर्य से अलग नहीं होते, उसी प्रकार यह
संसार भी मुझसे भिन्न नहीं है। वही निरूपण श्रीकृष्ण बताते हैं।
विज्ञानमेतत्त्रियवस्थमङ्ग गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ ।
समन्वयेन व्यतिरेकतश्च येनैव तुर्येण तदेव सत्यम् ॥ २० ॥
सत्त्वगुण से जागृति, रजोगुण से स्वप्न और तमोगुण से गहरी, मूढ सुषुप्ति होती है। इस प्रकार मन तीन
अवस्थायुक्त है। कार्य, कर्त्तृत्व और कारण इन तीन से तीन प्रकार के संसार का भास होता है किन्तु ब्रह्म सदा से
सम ही है। मिट्टी के बिना घट नहीं होता, तन्तु के बिना वस्त्र नहीं बनता; उसी प्रकार मुझसे संसार भिन्न नहीं
है। जो-जो दिखायी देता है, वह मेरा ही स्वरूप है। मैं जो तीनों गुणों को स्पर्श नहीं करता, तीनों अवस्थाओं में
दिखायी नहीं देता और तीनों अवस्थाओं को प्रकाशित करता हूँ, वह मैं चौथा 'तुरीय' हूँ यह जान लो। तीनों
अवस्थाएँ, तीनों गुण, दृश्य, द्रष्टा और दर्शन यह त्रिपुटी पूर्ण रूप से प्रकाशित करने वाला मैं चौथा 'तुरीय' हूँ।
ऐसा तुरीय सच्चिद्घन मैं, अवस्था गुण न होते हुए भी जिस प्रकार आकाश में नीलेपन का भास होता है, उसी
प्रकार मुझमें अवस्थाओं का आभास होता है। (आशंका) तीनों अवस्थाओं का ज्ञान सबमें दिखायी पड़ता है
किन्तु हे श्रीकृष्ण ! चौथा 'तुरीय' ज्ञान के बारे में कुछ ज्ञात नहीं है। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं, चौथा ज्ञान अर्थात्
तुरीयावस्था का विचार न कर, वह मिथ्या ही है ऐसा सोचोगे तो उसका स्पष्टीकरण सुनो। (व्यतिरेकतथ्य)
देहादिक प्रपंच का व्यतिरेक, अर्थात् भूतों में ही होने वाले भूतों के लय को देखने पर गुणावस्था भी उसी में लीन
होकर, मैं चौथा 'तुरीय' शेष रहता हूँ। इस सम्बन्ध में कुछ बोलते समय वेदों को तो मौन ही रहना पड़ता है। यह
वास्तव में अनुभव से ही जानने की पीड़ा है, यहाँ शब्द पांडित्य काम नहीं आता। यहाँ युक्ति-प्रयुक्ति नहीं
चलती, ज्ञान की व्युत्पत्ति अथवा लक्ष्य-लक्षण स्थिति नहीं चलती, केवल गुरुकृपा से ही 'तुरीय' की प्राप्ति होती
है। जागृत्यादि सारी सत्ता; अथवा सुषुप्ति में साक्षी रूप में रहने वाला वह चौथा 'तुरीय' मैं हूँ यह जान लो। वही

रूप जानना

Line 9:
चाहिये। प्रपंच का आडम्बर नामरूप का समुदाय तैयार करता है जो आकाश में दिखाई देने वाले गन्धर्व नगर की

Line 10:
तरह नश्वर प्रत्यक्ष ही दिखाई देता है। पिता के सामने पुत्र मरता है, पुत्र के सामने पिता घुलता है, काल के प्रवाह में

Line 11:
सब कुछ नष्ट हो जाता है, क्रिया करने के लिये भी कोई नहीं बचता। समुद्र में लहर उठती है और देखते-देखते

Line 12:
गायब हो जाती है, उसी प्रकार नामरूप जो भी दिखायी देता है, वह सहज ही नष्ट हो जाता है। यह प्रपंच केवल

Line 13:
नाममात्र का है। लेकिन मैं ही स्वतंत्र परमात्मा हूँ। संसार की ऐसी जन्मपत्रिका है लेकिन उसे न जानकर जीव उसे

Line 14:
'असाध्य' कहते हैं। जिससे यह प्रपंच उत्पन्न हुआ है, उसने उसे प्रकाशित किया है और अन्त में वह जिसमें

Line 15:
विलीन होता है वह सस्वरूप आत्मा तद्रूप से भरा हुआ है। सीप पर चाँदी का आभास होता है लेकिन वह सीप ही

Line 16:
रहती है। इस दृष्टि से प्रपंच ब्रह्म से अभिन्न रहता है। उद्धव ! प्रपंच का जो स्फुरण होता है वह भी ब्रह्मरूप ही है।
(Wait, space before exclamation mark: "उद्धव! प्रपंच")

Line 17:
जिस मेरे कारण श्रुति और स्मृति सत्यत्त्व में आयीं उस सत्यप्रतिज्ञ, मैं

७४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नाना प्रकार के उपायों से ब्रह्मज्ञान कैसे प्राप्त किया जाय, उसे पहले बता चुका हूँ और उसे अनुभव के
साथ स्पष्ट भी कर चुका हूँ। श्रुति-युक्ति-अनुभव के साथ ब्रह्मोपदेश का लक्षण बताकर ज्ञान और अज्ञान का
फल भी तुम्हें बता दिया है। उसी में देहेन्द्रियों का मिथ्यत्त्व, देहात्मभाव का निराकरण और ब्रह्म अद्वितीय तथा
परिपूर्ण है यह गुरुज्ञान भी प्रकट कर दिया। अत्यन्त दुर्लभ, दुर्गम तथा प्राप्त होने में कठिन पूर्ण ज्ञान मैंने प्रकट
कर दिया। यह सिद्धों का समाधान भी है और साधकों का साधन भी। मैंने अभी जो ब्रह्मज्ञान बताया उसी
उपदेशरूपी तेज शस्त्र को पूरी तरह साध्य कर साधक संशय का उच्छेद कर देते हैं। मैंने बताये हुए ब्रह्मज्ञान में
मन सन्देह करने लगता है, जिसमें देहाभिमान बढ़ता है, ऐसे सन्देह के साथ देहाभिमान को साधक इस शस्त्र से
छेद देते हैं। इस प्रकार संशय को काट कर द्वैत को दूर भगाते हैं और 'मैं' 'तू' का भाव नष्ट कर साधक स्वानंद
में निमग्न हो जाते हैं। उद्धव ! वर्णाश्रम, कुल, जाति, जीव-शिव स्थिति आदि के प्रति अहंकार उत्पन्न न होना,
इसी का नाम 'उपरति' (विराग) है। ऐसी उपरति प्राप्त हो जाने पर ऐहिक और पारलौकिक फलों की कामना
कौन करेगा? क्योंकि यहाँ विषय, विषयी और विषयोपभोग का अस्तित्व ही नहीं होता। इस प्रकार नित्य
निष्काम रहने वाले साधक आत्माराम स्वरूप होकर परमानन्द स्वरूप में निमग्न होने के कारण परम उपशम प्राप्त
करते हैं। अब, देहेन्द्रियों में प्राण रहते हुए देहाभिमान कैसे जाता है ऐसा तुम सोच रहे हो, उद्धव ! तो उसका
निरूपण श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
नात्मा बपुः पार्थिवमिन्द्रियाणि देवा ह्यसुर्धायुजलं हुताशः ।
मनोऽन्नमात्रं धिषणा चहंसत्त्वमं कृतिः खं क्षितिरर्थसाम्यम् ॥ २४ ॥
देह यह पृथ्वी का अंश अर्थात् जड़ होने के कारण वह कोई आत्मा नहीं है, उसी गुणों के कारण इन्द्रियाँ
भी आत्मा नहीं हैं, वे तो देह की उपकरण हैं, उनका व्यवहार भी एकपक्षीय होता है। इन्द्रियों के अधिष्ठाता देव
भी आत्मा नहीं होते, उन्हें इन्द्रियों का अभिमान होता है। इसलिये उन्हें आत्मपद में कहाँ स्थान मिल सकता है ?
देह को चलाने वाला जो प्राण है, वह भी आत्मा नहीं है। प्राण तो केवल अज्ञान है जो देह को वश होते समय,
उसके साथ आता-जाता रहता है, बस इतना ही। प्राण ही अगर आत्मा होता तो वह देह के साथ न चला जाता।
इसीलिये प्राण में भी आत्मत्व नहीं होता। पृथ्वी जड़ होने के कारण आत्मा नहीं होती। जल भी आत्मा नहीं है
क्योंकि उसमें द्रवत्त्व होता है। अग्नि दाहक होने के कारण वह भी आत्मा नहीं है। चंचलता के कारण वायु भी
आत्मा नहीं है। आकाश शून्य होने के कारण आत्मा भी आकाश नहीं है। संकल्प गुणों के कारण मन भी आत्मा
नहीं है। नश्वर होने के कारण आत्मा अंतःकरण नहीं है। चित्त चिन्तन करता रहता है इसलिये वह भी आत्मा
नहीं है। अभिमान भी आत्मा नहीं है क्योंकि उसे सुख-दुःख का बन्धन होता है। बुद्धि आत्मा नहीं है क्योंकि
उसमें बोधकता है। तीन गुण भी आत्मा नहीं है क्योंकि गुण तो विकारों से भरे होते हैं। महत्तत्त्व गुणों का कारण
हैं। इसलिये वे तो कभी भी आत्मा नहीं हो सकते। प्रकृति अर्थात् गुण साम्यावस्था भी सचमुच आत्मा नहीं है,
क्योंकि आत्मदृष्टि से प्रकृति की ओर देखने पर वह भी मिथ्या ही लगती है। मूल प्रकृति ही जहाँ मिथ्या सिद्ध
होती है, वहाँ उसके कार्यों में सत्यत्व कहाँ से आयेगा ? इस प्रकार साधक निश्चित होकर आत्मा का अनुभव
लेते हैं। इस प्रकार ज्ञान को साध्य कर साधक देहाभिमान को नष्ट कर देते हैं, और निरभिमान होकर सदा सुखी
रहते हैं। सारांश, जो साधक इस प्रकार निरभिमान रहते हैं, वह यदि प्रारब्ध के अनुसार विषम सेवन करें तो भी
उन्हें गुणदोषों की बाधा नहीं होती, यही बात श्रीकृष्ण निरूपित करते हैं।

Anushtubh!
Wait, is this meter:
यथा नभो वाय्वनलाम्बुभृद्गुणैर्गतागतैर्वर्तुगुणैर्न सज्जते ।
Let's count:
य (u) था (–) न (u) भो (–)
वा (–) य्व (u) न (u) ला (–) म्बु (–) भृद् (–) गु (u) णैर् (–)
ग (u) ता (–) ग (u) तैर् (–)
र्तु (–) गु (u) णैर् (–)
न (u) स (–) ज्ज (u) ते (–)
Wait, what meter is this?
Let's look at the line:
यथा नभो वाय्वनलाम्बुभृद्गुणैर्गतागतैर्वर्तुगुणैर्न सज्जते ।
Wait, let's look at Bhagavata 11.28.26:
The verse is in Šārdūlavikrīḍita or Sragdharā or Vasantatilakā or what?
Wait!
"तथाक्षरं सत्त्वरजस्तमोमलैरहं मतेः संसृतिहेतुभिः परम् ॥"
Let's count:
तथाक्षरं (4)
सत्त्वरजस्तमोमलै- (8) = 12
-रहंमतेः (4) =

७५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
आये लेकिन आकाश जरा भी गीला नहीं होता। इस प्रकार आकाश निर्मल है। उसे मैल लगाने पर भी नहीं
लगता। जो आकाश से भी अलिप्त, जो क्षर-अक्षर से भी अतीत है, वह अक्षर परब्रह्म सदा तीन गुणों से अतीत
और चिन्मात्रस्वरूप है। जो अजरामर, अविनाशी और स्वयं प्रकाश से प्रकाशमान है, ऐसे परब्रह्म की जिसे
अद्वयत्व से प्रतीती हुई, उसी प्रकार जैसे सोने का सिक्का सर्वांग से सोना ही रहता है, उसी प्रकार जो बिना
किसी कर्म के ऊपरी साधनों से परब्रह्म होते हैं उनके शरीर में गुणों की त्रिकुटी नहीं लगती, विषयों का भोग
भोगते हुए भी, वे उससे अलिप्त ही रहते हैं। मेघों में चन्द्रमा का बिम्ब दिखायी देता है लेकिन वह घटाओं को
स्पर्श नहीं करता अथवा उसके जल से वह गीला नहीं होता। उसी प्रकार देह में जीव अलिप्त ही रहता है। उन
घटाओं में यदि गोबर मिलायें या कस्तूरी मिलायें तो भी वह जिस प्रकार उस प्रतिबिम्ब से नहीं चिपकता, उसी
प्रकार देह के पाप पुण्य का प्रभाव जीव शिव पर नहीं होता। आकाश को जलाने के लिये यदि घृत को जलाकर
अग्नि प्रज्वलित की जाय तो उस समय आकाश अग्नि के बिलकुल निकट रहता है लेकिन इससे आकाश को
उसकी आँच नहीं लगती। उसी प्रकार ज्ञाता भी विषय की भीड़ में कभी विषयी नहीं होता। गुणों के और देह की
संगति में योगी भले ही विचरण करते हों तो भी विषयों का भोग करते हुए भी वे सदा सर्वांग से अलिप्त ही रहते
हैं। भोग का यह मर्म जिसने जान लिया वह देह में होते हुए भी परब्रह्मस्वरूप ही है। वे स्वयं ही शुद्ध अक्षर होने
के कारण उन्हें भोगभ्रम की बाधा नहीं होती। 'वे अब अक्षर हो गये' यह कहना भी कम ही है क्योंकि संसार
भले ही ज्ञान अथवा अज्ञान में विचरण करता हो लेकिन अक्षरता कायम ही रहती है। उस ब्रह्मस्वरूपता को
भूलकर, देहअहंता 'मैं देही' कहती है, उस समय विषयावस्था बढ़ कर दृढ़ बन्धन प्राप्त होता है। उस बन्धन को
दूर करने के लिये विषयलोलुपता का त्याग करना होगा क्योंकि विषयत्याग किये बिना नित्यमुक्तता कभी नहीं हो
पायेगी। नित्यमुक्तता यदि साध्य न हुई हो तो साधक कितना भी बड़ा ज्ञानी क्यों न हो जाय लेकिन उसे उस
ज्ञातृत्व के लिये विषयासक्ति कभी नहीं करनी चाहिये।
तथापि सङ्गः परिवर्तनीयो गुणेषु मायारचितेषु तावत्।
मद्भक्तियोगे न दृढेन यावद् रजो निरस्येत मनःकषायः॥ २७॥
सम्पूर्ण स्वरवर्णों से युक्त चारों वेदों में कोई भले ही निपुण हो जाय लेकिन उसके बल पर यदि वह
विषयाचरण करता है तो वह उसे अत्यन्त बाधक होता है। केवल शब्दज्ञान के लिये विषयाचरण बाधक ही है।
प्राणापान को सम कर मृत्यु को टालने का भले ही सामर्थ्य आ जाय लेकिन विषयाचरण उसके लिये भी बाधक
है। शाप अथवा वरदान देने का सामर्थ्य रखने वाले पुरुष भले ही अपने को महान समझें लेकिन यदि वे
विषयाचरण करने लगेंगे तो उन्हें वह घातक होगा। कोई योग सामर्थ्य से अंतरिक्ष में आसन उड़ाते हैं और सिद्धि
के अनेक प्रकार दिखाते हैं। उन्हें भी विषय भोग की चाह निश्चित रूप से बाधक होती है। मंत्रानुष्ठान के योग
से प्रत्यक्ष मंत्रदेवता भले ही प्रसन्न हो जाय, लेकिन उनके लिये भी विषय वासना घातक ही है। किसी की
किंचित् स्वस्वरूप का अनुभव होकर 'मैं मुक्त हूँ' ऐसा स्फुरण होने लगता है, उनके लिये भी विषय की संगति
निश्चित रूप से बाधक है। स्वयं अभिमान का निर्दलन कर जब तक नित्यमुक्त नहीं हुआ तब तक विषयाचरण
बाधक ही है। जिस प्रकार चकमक की आग खम्भे को नहीं जला सकती, उसी प्रकार ब्रह्म प्राप्ति प्रथम रंग प्रपंच
की संगति से नष्ट हो जाता है। ये विषय मिथ्या और मायिक हैं फिर भी उनका भोग करते समय जब तक हर्ष
होता है, तब तक हे उद्धव ! विषय सचमुच ही बाधक हैं, यह जान लो। उन विषय भोगों से छूटने के लिये

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५१
देहाभिमान को नष्ट करना चाहिये और इसके लिये निष्ठापूर्वक मेरा भजन करना चाहिये। व्रत, तप, तीर्थ, दान
आदि करने से; या योग, त्याग और यजन आदि करने से; वेदशास्त्र अथवा पुराणश्रवण करने से भी देहाभिमान
नहीं ढलता। किन्तु भक्तिभाव से मेरा भजन करने से देहाभिमान का समूल लय हो जाता है। उसके लिये भक्ति
ही उत्तम साधन है। परब्रह्म भक्ति के अधीन रहता है। उद्धव! ज्ञान, वैराग्य, निवृत्ति, धृति, शान्ति और ब्रह्मस्थिति
आदि की जननी मेरी भक्ति है यह स्मरण रखो। मेरी भक्ति चारों मुक्तियों से अधिक श्रेष्ठ है। उनकी शक्ति अपार
है। सचमुच, मैं उससे बँध गया हूँ। मेरा स्वरूप अनंत और अपार होते हुए भी, मैं सचमुच भक्ति में उलझ गया
हूँ। इसीलिये मैं निरन्तर मेरे भक्तों के द्वार में उपस्थित रहता हूँ। मैं भक्ति से बंध गया हूँ, इसीलिये मैं भक्तों के
अधीन रहता हूँ। मेरी भक्ति की महिमा स्वयं मैं भी नहीं जानता। अनेक लोग मेरी भक्ति कर मुझसे मोक्ष की ही
माँग करते हैं किन्तु चारों मुक्तियों की उपेक्षा कर जो मेरी भक्ति करता है, वह धन्य है। मेरे प्रति ऐसी भक्ति जहाँ
होती है, वहाँ चारों मुक्तियाँ पैरों पर आकर गिरती हैं। उसके भावार्थ पर मैं श्रीकृष्ण पूर्णरूप से न्योछावर हूँ।
उसके लिये वह भक्ति ही प्रमुख साधन रहती है, इसलिये मैं भी भक्तों के अधीन रहता हूँ। उसके वचन का मैं
कभी भी उल्लंघन नहीं करता। वह मुझे सगुण होने के लिये कहते हैं तो मैं तत्काल सिंह, बराह आदि बन जाता
हूँ; उनके लिये मैं विदेही होते हुए भी पूर्ण देहधारी बनता हूँ। अम्बरीष के लिये मैंने दस जन्म भोगे। अजन्मता
का व्रत भी मैं तोड़ देता हूँ लेकिन भक्त को किसी बात की कमी नहीं होने देता। कौरव द्रौपदी को विवस्त्र कर
रहे थे यह देखकर मैं उसकी सहायता के लिये दौड़ पड़ा और उसे एक क्षण के लिये अनावृत्त नहीं रहने दिया।
उसे करोड़ों वस्त्र पहनाये। इस प्रकार मैं भक्तों का सहायक हूँ। अजन्मा होते हुए उनके लिये जन्म लेता हूँ।
अरिमित्रों से सम होते हुए मैं अपने भक्तों का पक्षधर बन जाता हूँ। जो मेरे भक्तों का हित करता है, वह संसार में
मेरा बहुत बड़ा मित्र होता है और जो मेरे भक्तों से बैर करता है, उसका मैं अनेक प्रकार से विनाश करता हूँ। इस
प्रकार मैं भक्तों का सहायक होते हुए, भी वे अभागे लोग मुझ श्रीकृष्ण का भजन न कर अधःपतन की ओर
अग्रसर होते हैं। तुम कहोगे कि जब शरीर में पाप है तो तुम्हारा भजन कैसे सम्भव होगा? तो सुनो। मेरा नाम
क्षणभर में सारे पापों का विनाश कर देता है और उन्हें भस्म कर देता है। नाम का घोष सुनकर महापापों का
समुदाय सरपट भागने लगता है, नाम के पास पापों का ठौर नहीं मिल पाता। सूर्य अन्धकार में डूब सकता है
लेकिन पाप भक्त के पास नहीं आयेगा। जहाँ भक्तों के चरणों की धूलि पड़ती है वहाँ पापों का मूल ही नष्ट हो
जाता है। मेरा नाम समझ लो संसार का एक ब्रह्मास्त्र है और महापातक बेचारी चींटी है। नाम के सामने उसका
अस्तित्व टिक नहीं सकता। जब मेरे नाम का ऐसा प्रताप है, तो फिर मेरे भक्तों की दशा का क्या वर्णन करें? मेरी
भक्ति की मुहर लगते ही वह सहसा कलिकाल की भी परवाह नहीं करता। इसलिये भजन देहाभिमान का नाश
करता है, मेरे निजभजन के बिना देहाभिमान नहीं जाता। जिससे देहाभिमान टूटता है वह तुम्हारी भक्ति कैसी है?
इसका उत्तर यही है कि अभेदभाव से पूर्णभक्ति करनी चाहिये, इससे देहाभिमान नष्ट होता है। समस्त प्राणिमात्र
के प्रति भगवद्भावना रखना इसी का नाम है 'अभेद भक्ति'; यह भजन साध्य होते ही अहंकार शेष नहीं रहता।
उसके मुख में मेरा नाम, उसके कान में मेरी कीर्ति, उसके मन में मेरी भक्ति और उसके हाथ पैर आदि अवयवों
में मेरी क्रिया अर्थात् सेवा रहती है। वह जागृति में मुझे ही देखता है, वह स्वप्न में मुझ अकेले को ही देखता है,
सारांश वह अपनी निष्ठा से मेरे सिवा चित्त को खाली नहीं रखता। इस प्रकार के भजन से तीनों गुणों का विलय
हो जाता है। जिससे अहंकार से निवृत्ति होकर विषयासक्ति भी नष्ट होती है। ऐसे भक्तों को विषयों का सेवन
कभी भी बाधक नहीं होता। सारे विषय वह मुझे ही अर्पण करता रहता है इसलिये उसे उनकी बाधा नहीं होती।

७५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अनेक प्रकार के साधनों का प्रयोग कर जो विषय का त्याग करते हैं उन्हें ऐसा करने में अत्यन्त दुःख होता है
लेकिन मेरे भक्त अपने विषय भगवान को ही अर्पण करते हैं इसलिये वे नित्यमुक्त होते हैं। हर ग्रास पर हरि का
स्मरण करने से वह अन्न पूर्णरूप से परब्रह्म हो जाता है। उसकी बाधकता नष्ट होकर वह अपने ही आप ब्रह्मार्पण
होता रहता है। भक्तों की भजन करने की रीति कुछ ऐसी होती है कि वे विषय में भी मेरे ही स्वरूप की भावना
रखते हैं, जिससे विषय की स्फूर्ति मुरझा जाती है और वह बाधक नहीं होते। इस रीति से मेरा भजन करने से
मन का मैल साफ हो जाता है और विकार सहित तीनों गुण और देहाभिमान नष्ट हो जाता है। इस प्रकार जो मेरी
भक्ति नहीं करते, अहंकार नहीं छोड़ते, विषय की आसक्ति करते हैं वही वास्तव में बाधक होती है।
अकर्तात्मबोध पूरी तरह अंकित हुए बिना विषय का सम्बन्ध नहीं करना चाहिये क्योंकि विषयों की विषयरूप में
निहित जागरूकता अत्यन्त अमंगल और बाधक है। विषय यद्यपि मिथ्या और मायिक हैं फिर भी साधकों को वे
बाधक होते हैं। इसी विषय को श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
यथाऽऽमयोऽसाधुचिकित्सितो नृणां पुनः पुनः संतुदति प्ररोहन्।
एवं मनोऽपक्वषायकर्म कुयोगिनं विध्यति सर्वसङ्गम्॥२८॥
जिस वैद्य को रोग का निदान नहीं है, धातु पुष्ट है या क्षीण है यह समझ में नहीं आता, पथ्य और अनुपान
का भी ज्ञान नहीं है और नाड़ी ज्ञान भी नहीं है, ऐसे वैद्य से दवा लेने से रोग और भी अधिक बढ़ जाएगा। उसी
प्रकार वैराग्य हुए बिना विषय का त्याग करने से साधक को वह अपार बाधक सिद्ध होता है। अंतःकरण में
विषय के प्रति घृणा नहीं है और ऊपरी त्याग से विरक्ति का भाव प्रदर्शित करता है, ऐसी पाखण्डी वृत्ति को
'कुयोग' समझना चाहिये। भगवद्भजन छोड़ तथा वेदविधि का मार्ग छोड़कर त्याग करना इसी का नाम है
'कुयोग'। कनककांता विषयों की आसक्ति और मन में दृढ़तर वासना के कायम रहते हुए बाह्य तौर पर झूठी
विरक्ति दिखाने का नाम है 'कुयोग'। स्वयं को बहुत बड़ा राजयोगी समझना और पर्याप्त विषय सेवन करना इसी
का नाम उत्तम 'कुयोग' है। अपनी विषयासक्ति को छिपाकर बाहर से विरक्ति का प्रदर्शन करना, यही 'कुयोग'
का लक्षण है, उद्धव! ऐसे कुयोगी बार-बार जन्म लेकर और पुनः-पुनः मर कर दुःख के भँवर में गोते लगाते
रहते हैं। उन्हें कौन छुड़ाएगा? न इहलोक का विषयभोग ही पूर्ण हुआ और न परमार्थ के लिये आवश्यक त्याग
ही हुआ है। दोनों से वंचित होने के कारण कुयोगी के भाग्य में दुःख ही आता है। परमार्थ के लिये विषय त्याग
का साधन करते हुए उन्हें भले ही रुकावट या विघ्न आयें, फिर भी जिन्हें पूर्ण अनुताप हुआ रहताहै उन्हें दुर्गति
नहीं प्राप्त होती, यह ध्यान में रखो।
कुयोगिनो ये विहतान्तरायैर्मनुष्यभूतैस्त्रिदशोपसृष्टैः।
ते प्राक्तनाभ्यासबलेन भूयो युञ्जन्ति योगं न तुकर्मतन्त्रम्॥२९॥
साधक ब्रह्मज्ञान के लिये विषय का त्याग करे और ठीक से अभ्यास करने लगे तो बीच में ही कोई विघ्न
उपस्थित हो जाता है; साधकों के मार्ग में अनेक विघ्न आते हैं। काम की ही इच्छा प्रबल हो उठती है; संताप
बढ़कर खलबली मचा देता है; शिष्य और सगे-सम्बन्धियों का उपसर्ग होता है और मन में स्वहित के प्रति ही
ऊब उत्पन्न होती है। स्त्री के रूप में देवता भी अनेक प्रकार के उपसर्ग देने लगते हैं। ऐसे विघ्नों से योग का भंग
होता है। वहाँ अनुराग अथवा अनुताप उसका उद्धार करता है। एकनिष्ठा से अभ्यास शुरू करने पर भी दैवयोग
से विघ्न आते हैं। उस समय मन में वैराग्य उत्पन्न होने से वह योगी नियमित रूप से अभ्यास करने लगता है और

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५३
अपने योगाभ्यास के सामर्थ्य से विघ्नादि दोषों को समूल जला देता है। किन्तु कर्म के कर्मठ जाल को योगी स्पर्श
भी नहीं करता। योग में विघ्न आकर उसमें योगी यदि मर भी जाता है तो भी अगले जन्म में वह कर्माधीन नहीं
होता। यही बात श्रीकृष्ण ने स्वयं श्लोकार्ध में बतायी। योगसाधना करते प्रारब्ध से उसमें विघ्न आकर योगी यदि
मर जाए तो उसमें क्या हानि है ? विघ्न आने के कारण उसे पुनः जन्म लेना पड़ता है, बस इतना ही। लेकिन इस
जन्म में भी वह कर्म के जाल में नहीं फँसता। पूर्वाभ्यास के योग से वह योगी पुनः नये सिरे से पहले के अभ्यास
में लग जाता है। प्रवासी को यदि मार्ग में कोई संकट आता है तो वह बीच में ही कहीं मुकाम कर लेता है और
दूसरे दिन पुनः उसी मार्ग पर लग जाता है। इस प्रकार योगी स्वयं ही प्रारब्ध के पूर्व संसार के योग से अपना
योगाभ्यास पूरा करने लगता है किन्तु कभी भी कर्म के अधीन नहीं होता। साधनों में यदि मेरी भक्ति है तो
अणुमात्र भी विघ्न नहीं आयेगा क्योंकि मैं भक्तों का पक्षधर श्रीपति दिन-रात अपने भक्तों का संरक्षण करता रहता
हूँ। जहाँ मेरी भक्ति की चाह है, वहाँ बेचारे विघ्न क्या करेंगे ? उद्धव ! मेरा केवल नाम ही करोड़ों महा विघ्नों का
नाश कर सकता है। भजन न करने वाले महायोगी, अभ्यास में विघ्न आने पर दूसरा जन्म लेते हैं, लेकिन वे भी
पूर्व संस्कार से कर्म में उलझे नहीं रहते। जो जीवन्मुक्त हो जाते हैं, वे भी प्रारब्ध के ही अनुसार व्यवहार करते
हैं; फिर योगभ्रष्ट पुरुष कर्मों का त्याग कैसे कर सकते हैं ? उसका कारण भी सुनो। मुक्त का जो मोक्ष का लक्षण
है वही साधक का मुख्य साधन रहता है, इसलिये उन दोनों को ही कर्मों का बन्धन बाधक नहीं होता। मैं कर्म
कर्त्ता हूँ ऐसा अहंकार जिसे नहीं होता, उसे भी कभी कर्मबन्धन का स्पर्श नहीं होता।
करोति कर्म क्रियते च जन्तुः केनाप्यसौ चोदित आनिपातात् ।
न तत्र विद्वान् प्रकृतौ स्थितोऽपि निवृत्ततृष्णः स्वसुखानुभूत्या ॥ ३० ॥
जन्म से मृत्यु तक प्राणी जो भी कर्म करता है, वह सब 'प्रारब्ध कर्म' के रूप में कोई अपनी सत्ता से
कराता है। उनमें सज्ञान और अज्ञान दोनों ही प्रारब्ध कर्म के अनुसार कर्म के ही अधीन रहते हैं; परन्तु अज्ञानी
को 'मैं कर्त्ता' इस बात का अहंकार रहता है और ज्ञाता कर्म में निरभिमान होकर रहते हैं। अब तुम कहोगे कि
देह में प्राण होते हुए देहाभिमान हुए बिना कैसे रहेगा ? तो ज्ञाता आत्मसुखानुभव से पूर्ण होने के कारण उसे
अहंकार का स्फुरण ही नहीं होता। रस्सी के साँप का भय रस्सी है यह देखकर जब बाधा समाप्त हो जाती है,
उसी प्रकार ब्रह्मसुख का अनुभव प्राप्त होने के बाद बाधा करनेवाली अहंता का स्फुरण नहीं होता। अब योगकष्ट
का लक्षण सुनो। उसका प्राचीन संस्कार, उसका योग पूरी तरह सिद्ध हो इसलिये उसमें देहाभिमान उत्पन्न ही
नहीं होने देता। जो देह में नित्य अभिमानरहित रहते हैं, वही ब्रह्मसुख से सदा सम्पन्न रहते हैं, उन्हें देह का
कर्माचरण कभी बाधक नहीं होता। ज्ञाता देहकर्म से अलिप्त रहता है, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। वह देहातीत
ही रहता है। यही बात श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
तिष्ठन्तमासीनमुत व्रजन्तं शयानमुक्षन्तमदन्तमन्नम् ।
स्वभावमन्यत् किमपीहमानमात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद ॥ ३१ ॥
देह खड़ा रहता है लेकिन ज्ञाता को खड़े रहने का अनुभव नहीं होता; फिर देह के बैठने पर उसके बैठने
को कौन स्वीकार करेगा ? परिपूर्ण ब्रह्म में उठना और बैठना ये दोनों ही नहीं है और ज्ञाता तो ब्रह्म ही हुआ रहता
है, इसलिये उठने या बैठने का उसे अनुभव नहीं होता। देह यह दैवयोग के अनुसार एकदेशी होता है किन्तु
अपने को सर्वत्र देखता है। देह परदेश जाने लगता है तो ज्ञाता उसमें अपने गमन का विचार नहीं करता क्योंकि

७५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
परब्रह्म स्वरूप से परिपूर्ण है; उसका आना-जाना कैसा? ज्ञाता सदा तद्रूप ही रहने के कारण उसे रहने या जाने
का भाव स्पर्श नहीं करता। ज्ञाता स्वयं शयन करने जाता है लेकिन वह भूमि पर की शैय्या नहीं देखता। इतना ही
नहीं, अपितु मैं सोया हूं यह भी वह नहीं मानता। वह सदासर्वदा स्वरूप में ही निमग्न रहता है। ज्ञाता
प्रसन्नतापूर्वक भोजन करने बैठता है; लेकिन मैं भूखा हूँ इसका भी उसे स्मरण नहीं रहता। रसना के जाने बिना
वह सारे रस चखता है। ऐसी आत्मसुख की मधुरता में ही वह भोजन करता है। वह पर्याप्त भोजन कर चुका है
ऐसा लगता है लेकिन न वह तृप्त ही रहता है और न क्षुधित ही रहता है, वह खाना झूठा भी नहीं करता और भरे
संसार से उठ जाता है। वह भले ही सहज बात करता है लेकिन उसकी बातों में अनकही ही अधिक रहती है।
उस बातचीत में भले ही रसमय माधुर्य उत्पन्न होता हो लेकिन उसकी मौन की गाँठ ढीली नहीं होती। मैं एक
बहुत अच्छा और चतुर वार्ताकार हूँ, इसका अभिमान भी उसमें उत्पन्न नहीं होता। निरर्थक बात करना तो उसे
आता ही नहीं। ठीक तरह बात करने पर भी वह न बोलने की तरह की रहता है। ज्ञाता सृष्टि की ओर आत्मसुख
से देखता है; 'मेरा' और 'तुम्हारा' यह भी समझता है लेकिन वह आँखों से देखता ही नहीं है। सारे त्रैलोक्य को
वह अपनी ही तरह समझता है। वह जिस दृश्य को देखने जाता है उस दृश्य का ठिकाना ही अदृश्य हो जाता है।
वह जो कुछ भी देखता है वह सब उसे अपने जैसा ही दिखायी देता है क्योंकि वह सारी सृष्टि को स्वयं
ऐक्यरूप से ही देखता है। आँखों का अंत कर ही ज्ञाता दर्शन रूप से देखता है, लेकिन उस देखने का सच्चा अर्थ
वेदशास्त्र भी नहीं समझ सकेंगे। वह शब्दों का शब्दज्ञान जानता है, किन्तु 'मैं श्रोता' हूँ इस बात का उसे स्मरण
ही नहीं होता। वह देह के कान की उपेक्षा कर सर्वांग से श्रवण करता रहता है। इस प्रकार वह स्वयं संज्ञान
होकर जागृत रहता है। शब्दज्ञान को छील कर उसमें का स्वाभाविक अर्थ वह ग्रहण करता रहता है। वह घ्राण से
सुगन्ध और दुर्गन्ध पहचानता है लेकिन उसका भोग करते समय वह नाक की अपेक्षा नहीं करता। पुष्प के
अंतर्बाह्य सुगन्ध का आस्वाद वह सदा लेता रहता है। त्वचा से वह मृदु-कठोर आदि स्पर्श को जानता है; किन्तु
'मैं जानता हूँ' इस बात का उसे स्फुरण नहीं होता। जिसका अंग से स्पर्श हो उसे निजांगरुप करना, इस प्रकार
का स्पर्श ज्ञाता अनुभव करते रहते हैं, ज्ञाता चरणों से चलता रहता है, लेकिन चलते समय भी वह अचरणीय
होता है। वह भले ही स्वेच्छा से पृथ्वी पर विचरण कर रहा हो लेकिन वह अपने स्थान से हिलता भी नहीं है।
वह अपने हाथ से दान देता है लेकिन तब भी 'मैं दाता हूँ' इस बात का उसे स्मरण नहीं होता। दिया हुआ और
लिया हुआ दान वह स्वयं ही हो जाता है। उसी प्रकार ज्ञाता हाथों की हलचल करता है। कायिक, वाचिक और
मानसिक कर्म स्वाभाविक रूप से ही होता रहता है किन्तु ज्ञाता ब्रह्मरूप से निर्दोष ही रहता है। वह देह का स्पर्श
ही नहीं करता। ज्ञाता अकर्ता होता है तथा आत्मसत्ता से सारे कर्मों में विचरण करता रहता है। निरन्तर आत्मबोध
में स्वस्वरूप में ही रहने के कारण वह कर्म, क्रिया अथवा कर्तव्यता को नहीं देखता। ज्ञाता नित्य आत्मसुख में
ही रहने के कारण वह देह में होते हुए भी देह की ओर नहीं देखता। परमात्मसुख में ही सन्तुष्ट रहने के कारण
वह देहकर्म में कैसे फँसेगा ? सारे संसार को कर्मबन्धन लगा हुआ है। ऐसा होते हुए खाने-पीने वाले ज्ञाता को
कर्मबन्धन क्यों नहीं होता। उसी का निरूपण श्रीहरि करते हैं।
यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं नानानुमानेन विरुद्धमन्यत्।
न मन्यते वस्तुतया मनीषी स्वप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम्॥ ३२॥
लोकरीति के अनुसार ज्ञाता भी लोकाचार से चलता रहता है। वह भी प्रपंच के लौकिक कर्म करता ही

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५५
रहता है। किन्तु कार्य, कर्म और कर्तव्यता यह अहंता ज्ञाता को नहीं होती क्योंकि वह प्रपंच में ही निजात्मस्वरूप
निश्चित रूप से वश में कर लेता है। विषयादि प्रपंचों का भान अज्ञानी सत्य मानते हैं; किन्तु ज्ञाता उसी प्रपंच को
परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप मानते हैं। शर्करा से बनाया करेला मीठा ही लगेगा, उसी प्रकार प्रपंच की कथा है। लाभ और
हानि यह ज्ञान और अज्ञान पर निर्भर करता है। सुवर्ण की गुल्ली देखकर मूर्ख लोग उसे ईंट या पत्थर समझते हैं,
किन्तु ज्ञाता उसकी कद्र करते हैं और ज्ञानदृष्टि से अच्छा मोल देकर खरीदते हैं। उसी प्रकार सांसारिक क्रिया
कर्म मूर्ख को मूर्खता के कारण विषम लगता है; किन्तु ज्ञाता को वही परब्रह्म लगता है और वह सर्वकाल उसमें
स्वानंद से सन्तुष्ट रहता है। पहले प्रपंच को खन कर हटा देना और फिर ब्रह्मभाव धारण करना इस बात की भी
उस भाग्यवान को आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि वह सब कुछ ब्रह्मरूप देखता रहता है किन्तु अनाड़ी लोग
मिलकर उससे भीषण अनुमान निकालते हैं और उन्हें सच समझते हैं। उसी प्रकार प्रपंच का मिथ्या भान अज्ञानी
लोग बाधक मानते हैं किन्तु ज्ञाता लोग उसे ही परिपूर्ण ब्रह्म समझते हैं। सोये हुए व्यक्ति को स्वप्न सच ही
मालूम होता है, उसी प्रकार अपने भ्रम के कारण प्रपंच सच ही मालूम होता है, लेकिन जिसका आत्मज्ञान जागृत
होता है, उसे वही प्रपंच स्वस्वरूपज्ञान के बोध से निश्चित ही मिथ्या मालूम होता है। प्रपंच का भास मिथ्या है
यह जानकर जो ज्ञानसम्पन्न होते हैं, उन्हें किसी भी कर्म में विचरण करते समय कभी भी देहाभिमान उत्पन्न नहीं
होता। साधकों का स्वार्थ साधने के लिये पहले 'स्वस्वरूप से भगवान हो गया' यह कहने से वह सचमुच
विचारवश हो गया है ऐसा कहोगे तो उचित नहीं होगा क्योंकि परब्रह्म और आत्मतत्त्व कभी विकारवश नहीं
होते। वह सदा सर्वदा समसाम्य अर्थात् निर्विकार ही रहता है। इसी सम्बन्ध में श्रीकृष्ण आत्मज्ञान से बता रहे हैं।
पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्रमज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग।
निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा॥ ३३॥
यह संसार साधकों की पूर्वावस्था में मायावशता के कारण अत्यन्त अतर्क्य मालूम पड़ता है, किन्तु शुद्ध
परब्रह्म गुणकर्मों के प्रकारों से अनेक रूपों में भासित होता है। नाम, रूप, व्यक्ति, वर्ण, कुल, गोत्र, क्रियाचरण
इस प्रकार प्रपंच को अज्ञानी भिन्न और सत्य मानते है। लेकिन यह प्रपंच ब्रह्म के स्थान पर आरोपित है, इसलिये
ब्रह्म भी तद्रूप ही मालूम होता है। स्फटिक किसी भी रंग से अलिप्त रहता है, लेकिन जिसके साथ उसका
सम्बन्ध होता है, उसी की तरह वह भी लगता है। इस प्रकार अज्ञान के कारण संसार भिन्न मालूम होता है,
इसीलिए आत्मा को भी विकारी कहते हैं। लोग अज्ञान के कारण इतने अविचारी हो जाते हैं। उस अज्ञान की
निवृत्ति हो जाए तो साधकों को मेरी प्राप्ति सुलभ हो जाएगी। इसलिये मेरी सच्ची भक्ति मैंने यथार्थ रूप में
प्रकाशित की। साधकों का सच्चा स्वार्थ शीघ्र पूर्ण हो सके इसीलिये 'समस्त प्राणिमात्र में भगवान है' यह गुह्यार्थ
मैंने बता दिया। इस अनुसंधान को धारण कर मेरा मनोभाव के साथ भजन करने से 'मैं' 'तू' वाली भावना नष्ट
होकर, अविद्या के साथ अज्ञान भी समूल नष्ट हो जाता है। फिर दृश्य, द्रष्टा, दर्शन, त्रिगुणों के साथ कार्य,
कारण और प्रपंच का भान भी नहीं रहेगा। परिपूर्ण ब्रह्म ही पूर्णत्व से भर जायेगा। वहाँ नाम, रूप, गुण, जाति,
महाभूत तथा भूतव्यक्ति इनमें से कुछ भी नहीं रह जाता। सहज स्थिति में परिपूर्ण चैतन्य ही रहता है। ब्रह्म के
ब्रह्म की स्फूर्ति भी उत्पन्न नहीं होती। वह ऊँचा भी नहीं है और नाटा भी नहीं है। मोटा भी नहीं है और कृष भी
नहीं है, सरल भी नहीं है और वक्र भी नहीं है। उसे किसी भी प्रकार का विकार नहीं है। वहाँ न ठंडक है, न
उष्णता है। वह मृदु भी नहीं है और कठोर भी नहीं है। वह मीठा भी नहीं है और कडुआ भी नहीं है। सुख-

७५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
दुःख रहित वह केवल निर्द्वंद्व ही है। चिद्रूप होने के कारण वह न आँखवाला है न अन्धा है। वह यहाँ भी नही है,
वहाँ भी नहीं है, वह न आता है न जाता है, वह न निकट है न पास में है, वह सदा सर्वसिद्ध ही है। वह खाता
भी नहीं है और भूखा भी नहीं है; वह न देता है, न लेता है; वह न जीता है न मरता है, वह परादि वाचा के परे
होने के कारण परात्पर है। वह बद्ध भी नहीं है और मुक्त भी नहीं है; वह नित्य भी नहीं है और अनित्य भी नहीं
है; वह नाराज भी नहीं होता और प्रसन्न भी नहीं होता। परब्रह्म सदा सत्वस्वरूप में ही रहता है। वहाँ पाप भी
नहीं है और पुण्य भी नहीं है; वह साकार भी नहीं है और शून्य भी नहीं है। वह सगुण भी नहीं है और निर्गुण
भी नहीं है; वह स्वानंद से पूर्ण सुखस्वरूप है। समस्त प्राणिमात्र भगवान के ही रूप हैं, इस दृष्टि से मेरे भक्त
मेरा भजन कर स्वयं मेरा परिपूर्ण स्वरूप बनकर रहते हैं। संत के रूप में कुछ लेना अथवा असंत के रूप में कुछ
त्यागना ऐसा अलग कुछ उनमें रह ही नहीं जाता क्योंकि वे ब्रह्मस्वरूप में परिपूर्ण हुए रहते हैं। बद्धकाल की
बद्धता आत्मा स्वीकार नहीं करता अथवा मुक्तकाल की मुक्तता को भी आत्मा स्पर्श नहीं करता। आत्मा
अविकारी है, वह इस निरूपण से तुम्हारी समझ में आ जायेगा। इतने पर भी न समझ में आये तो पुनः बताता हूँ,
सुनो। आत्मा सर्वदा नित्य है, इसलिये उसे उत्पत्ति नहीं है। जिसे उत्पत्ति ही नहीं है वह कभी गर्भ को स्पर्श नहीं
करेगा और जिसे गर्भ और जन्म नहीं है, उसे देह भी नहीं है और देह के बिना वृद्धि भी सम्भव नहीं है। जो सदा
विदेही है, उसे कर्म सम्भव नहीं होता और बिना कर्म के आत्मा को बन्धन भी नहीं होता। जिसे कोई अवयव ही
नहीं है, उसका कोई संस्कार ही नहीं होगा और जिसका आकार ही नहीं है, उसे विकार भी स्पर्श नहीं करेगा।
जो गर्भ और जन्म से विरहित है, उसके पास मृत्यु भी नहीं आ सकती। काल भी उस पर आघात नहीं कर
सकता। इस प्रकार परमात्मा क्षयातीत है। जिसे जन्म, कर्म और मरण नहीं है उसे विकारी कौन कहेगा? इस
प्रकार उद्धव ! परब्रह्म पूर्ण अविकारी है यह जान लो। प्रगाढ़ अज्ञान फैलने पर भी आत्मा को नष्ट नहीं किया जा
सकता; अथवा ज्ञान कितना ही प्रखर हो तो आत्मा नया नहीं हो सकता। आत्मा ज्ञान, अज्ञान से अलिप्त नित्य
तथा निर्विकार है। यही बात श्रीकृष्ण दृष्टांत देकर बताते हैं।
यथा हि भानोरुदयो नृचक्षुषां तमो निहन्यान्न तु सद् विधत्ते ।
एवं समीक्षा निपुणा सतो मे हन्यात्तमिस्रं पुरुषस्य बुद्धेः ॥ ३४॥
आँखों की दृष्टि पर अन्धकार प्रतिबन्ध करता है। सूर्य का उदय होने पर वह उस अन्धकार को दूर करता
है लेकिन नयी दृष्टि उत्पन्न नहीं करता। उसी प्रकार अविद्या क्षुब्ध होकर कितनी भी उग्र हो जाय लेकिन वह
आत्मा को नष्ट नहीं कर सकती। वह पुरुष की बुद्धि पर परदा डाल कर झूठा द्वंद्व दिखाती है। शुद्ध ज्ञान प्राप्त
होने पर वह अविद्या का मल निकाल देती है लेकिन नया आत्मा उत्पन्न करने का सामर्थ्य ज्ञान में नहीं है। आत्मा
अपने प्रकाश से ज्ञान को तथा अज्ञान को भी प्रकाशित करती है अर्थात् वह ज्ञान अथवा अज्ञान परमात्मा को
कभी भी स्पर्श नहीं करता। ज्ञानाज्ञान विकार सचमुच अविद्याजन्य है और आत्मा अविद्या से परे है। इसीलिये वह
नित्य और निर्विकार है। सूर्य को यदि रात्रि नहीं है तो उसके लिये दिन भी कौन-सा है? उसी प्रकार आत्मा को
भी ज्ञान और अज्ञान दोनों ही स्पर्श नहीं करते। आत्मा निर्विकार एवं स्वयंप्रकाश है। वह ज्ञान की और अज्ञान की
स्थिति से अलिप्त है। ऐसी उस स्वरूप की सुलभ प्राप्ति का उपाय श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेया महानुभूतिः सकलानुभूतिः ।
एकोऽद्वितीयो वचसां विरामे येनेषिता वागसवश्चरन्ति ॥ ३५॥