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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७४५
हूँ। इसीलिये 'वेदवचन' प्रमाण है। श्रुति का शब्दज्ञान पठन करने वाले को पावन करता है। उद्धव ! आत्मस्वरूप
जानने के लिये देहादि विषयों का जो अनुताप है, जिससे साधक निष्पाप होते हैं, उसका नाम 'तप' है। अनुताप
से मन का दमन करने से पातकों का क्षालन होता है। तब वह श्रुति के अर्थ के अनुरोध से परब्रह्म का 'अनुमान'
करने में समर्थ होता है। देह जड़, मूढ़ और अचेतन है, उसमें चैतन्यस्वरूप नारायण है और देह मिथ्या है इस
बात का निश्चय होकर मन अद्वैत में रंग जाता है। उस अद्वैत प्राप्ति का मार्ग यही है कि हम अभिमानरहित
होकर भक्तिभाव से सद्गुरु की अनन्य भाव से शरण जायें। उसे गुरु की कृपा होती है। शरणागत का अधिकार
और लक्षण देखकर गुरु भी उसे गुरुज्ञान का उपदेश करते हैं। 'सब में निर्मल परब्रह्म ही है' यही श्रुति का उत्तम
गुह्य है। जो परम सौभाग्यशाली होता है उसके मन में ही यह सुगम रीति से अंकित होता है। गुरु के वचन कान
में पड़ते ही आत्मसमाधान से वृत्ति चित्स्वरूप में तल्लीन होकर स्वानंद में समरस हो जाती है। अब उसके लिये
आगे साधन अथवा कर्म का आचरण रह गया है, ऐसा कौन कहेगा ? वेद भी वहाँ मौन रह गये हैं। जहाँ द्वंद्व की
स्फूर्ति नहीं रह जाती सारे दुःखों की समाप्ति हो जाती है, देह में ही विदेह परब्रह्म की प्राप्ति होती है; उसे ही
'प्रत्यक्ष' कहते हैं। विस्मृति की ठौर पूछकर, स्मरण के बिना ही नित्य स्मरण होना और अखण्ड स्वस्वरूप का
अनुभव प्राप्त होना, इसी का नाम है 'प्रत्यक्षता'। मैं स्वानंदकंद आत्मा हूँ, इस प्रकार का परमानन्द का अनुभव,
यही 'प्रत्यक्ष' पद का वास्तविक अर्थ है, ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा। भाग्यशाली साधक को यह बोध श्रवण
होते ही प्राप्त होता है, किसी को मनन से प्राप्त होता है और किसी को अनवरत चिन्तन से प्राप्त होता है। कइयों
को स्वरूपाकार वृत्ति के अभ्यास से यह बोध प्राप्त होता है और कइयों को मेरी अद्वैत भक्ति के योग से यह बोध
अर्थात् मैं श्रीकृष्ण पूरी तरह प्राप्त होता हूँ। उद्धव ! पूर्ण रूप से आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने के लिये यह साधन
प्रमुख है। इस प्रकार आत्मज्ञान प्राप्त होने पर उसका क्या 'फल' मिलता है वह भी बताता हूँ। मैं अनंत सृष्टि का
मूल कारण हूँ, किन्तु नित्यमुक्त होने के कारण अहेतुक, वही मैं श्रीकृष्ण लीला से सारी सृष्टि की उत्पत्ति का
मूल कारण हूँ उसी प्रकार रजोगुण की सहायता से मैं उत्पन्नकर्ता के रूप में अद्वैत में ही अनेक व्यक्ति दिखाता हूँ।
जिस प्रकार जड़ के बिना फलदार वृक्ष बढ़ता है, उसी प्रकार सृष्टि के संरक्षण का मुझ निष्काम को शौक है।
एक लकड़ी से शतरंज की गोटियाँ बनती हैं। उनमें राजा, प्रधान पशु और प्यादे बनते हैं। उनके अपने पूर्वकर्म
नहीं होते, उसी प्रकार निष्कर्म से सृष्टि को प्रकाशित करने वाला मैं हूँ। निष्कर्म करके ही सृष्टिकर्त्ता ने इस
संसार का निर्माण किया यह देखकर मीमांसकों का मन कुंठित हो गया। सारांश यह संसार सदा से ही निष्कर्म
ब्रह्मस्वरूप ही है। जिस प्रकार शतरंज के खेल में अचेतन को भी शुद्ध करना पड़ता है, उसी प्रकार लोकरक्षण
की आत्मीयता से मैं सृष्टि का प्रतिपाल करता हूँ। प्रकृति की सारी गोटियाँ जड़मूढ़ ही होती हैं, उसे पुरुष के
हाथ से सचेतन कर, हाथ में काल के पासे लेकर चराचर का खेल खेलाने वाला मैं एक विष्णु हूँ। निर्जीवों के
इस झगड़े में न मरने वाले को भी मृत्यु आती है। एक की जीत और एक की हार ऐसे दो पक्षों को खेल खेलाने
वाला मैं ही हूँ। गोटी मरने पर कौन पुण्यवान वैकुण्ठ में जाता है और कौन पापी नरक में जाता है ? इस सृष्टि के
बंध-मोक्ष इस प्रकार के हैं। उसी प्रकार अपना 'एकपन' छोड़े बिना, उस खेल की ही तरह मैं संसार का पालन
'दूजे 'पन का स्पर्श किये बिना करता हूँ। रस्सी का सर्पाकार अपने सामर्थ्य से वीर पुरुष मार कर नष्ट करता है,
उसी प्रकार मैं प्रलयरुद्र इस सृष्टि का संहार करता हूँ। स्वप्न में देखे हुए संसार को जागने पर नष्ट करने में कष्ट
कैसा? उसी प्रकार मैं प्रलयकर्त्ता हूँ, ऐसा समझ लो। उत्पत्ति, स्थिति और लय केवल सृष्टि पर ही लागू होती है,
आत्मा आत्मस्वरूप में अखण्ड परिपूर्ण है। वही स्वरूप ज्ञानसम्पन्न लोग स्वानुभव से स्वयं होकर रह रहे हैं।

७४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
'वह आत्मस्वरूप मैं बना' यह कहना भी लज्जा स्पद है क्योंकि वह आत्मरूप ब्रह्मत्व से स्वयंभू होने के कारण
होना या न होना यह कहना केवल भ्रम है। रस्सी के मिथ्या सर्पाकार का आभास होने पर भी वह रस्सी ही रहती
है और सर्प का आभास समाप्त होने पर भी रस्सी ही रहती है। उसी प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति के समय आत्मा
जन्म नहीं लेता; अथवा सृष्टि का पालन-पोषण होते समय उसमें वृद्धि नहीं होती। सृष्टि का प्रलय होने पर
आत्मा को उसकी खबर भी नहीं होती। उत्पत्ति, स्थिति और लय इन तीनों स्थितियों में आत्मा वास्तव में
अविकारी ही रहता है। इसी साधन से ज्ञान साध्य कर साधक संज्ञान होते हैं और वे स्वयं अबाधित होकर पूर्ण
ब्रह्म होकर रहते हैं। साधक अज, अव्यय और आनन्दपूर्ण ब्रह्म हो जाते हैं। उद्धव ! यही सब ज्ञान का फल है,
यह जान लो। ज्ञान का यह फल प्राप्त होते ही उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होने पर भी आत्मस्वरूप अखण्ड और
परिपूर्ण ही रहता है। यही बात श्रीकृष्ण दृष्टांत के साथ बताते हैं।
यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य ।
तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥ १९॥
मुकुट, कुण्डल, कंकण आदि न बनाने पर भी सुवर्ण सोने के ही रूप में रहता है और बनाने पर भी उसमें
किसी प्रकार की कमी नहीं आती। उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और लय इनके योग से मेरा चित्त अविनाशी ही
रहता है। मेरा स्वरूप शुद्ध परब्रह्म है उसमें नाना प्रकार के रूप और नामों का आभास होने से संसार विषम
दिखाई देने पर भी ब्रह्म सर्वत्र सम ही है। सूर्य के किरण जिस प्रकार सूर्य से अलग नहीं होते, उसी प्रकार यह
संसार भी मुझसे भिन्न नहीं है। वही निरूपण श्रीकृष्ण बताते हैं।
विज्ञानमेतत्त्रियवस्थमङ्ग गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ ।
समन्वयेन व्यतिरेकतश्च येनैव तुर्येण तदेव सत्यम् ॥ २० ॥
सत्त्वगुण से जागृति, रजोगुण से स्वप्न और तमोगुण से गहरी, मूढ सुषुप्ति होती है। इस प्रकार मन तीन
अवस्थायुक्त है। कार्य, कर्त्तृत्व और कारण इन तीन से तीन प्रकार के संसार का भास होता है किन्तु ब्रह्म सदा से
सम ही है। मिट्टी के बिना घट नहीं होता, तन्तु के बिना वस्त्र नहीं बनता; उसी प्रकार मुझसे संसार भिन्न नहीं
है। जो-जो दिखायी देता है, वह मेरा ही स्वरूप है। मैं जो तीनों गुणों को स्पर्श नहीं करता, तीनों अवस्थाओं में
दिखायी नहीं देता और तीनों अवस्थाओं को प्रकाशित करता हूँ, वह मैं चौथा 'तुरीय' हूँ यह जान लो। तीनों
अवस्थाएँ, तीनों गुण, दृश्य, द्रष्टा और दर्शन यह त्रिपुटी पूर्ण रूप से प्रकाशित करने वाला मैं चौथा 'तुरीय' हूँ।
ऐसा तुरीय सच्चिद्घन मैं, अवस्था गुण न होते हुए भी जिस प्रकार आकाश में नीलेपन का भास होता है, उसी
प्रकार मुझमें अवस्थाओं का आभास होता है। (आशंका) तीनों अवस्थाओं का ज्ञान सबमें दिखायी पड़ता है
किन्तु हे श्रीकृष्ण ! चौथा 'तुरीय' ज्ञान के बारे में कुछ ज्ञात नहीं है। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं, चौथा ज्ञान अर्थात्
तुरीयावस्था का विचार न कर, वह मिथ्या ही है ऐसा सोचोगे तो उसका स्पष्टीकरण सुनो। (व्यतिरेकतथ्य)
देहादिक प्रपंच का व्यतिरेक, अर्थात् भूतों में ही होने वाले भूतों के लय को देखने पर गुणावस्था भी उसी में लीन
होकर, मैं चौथा 'तुरीय' शेष रहता हूँ। इस सम्बन्ध में कुछ बोलते समय वेदों को तो मौन ही रहना पड़ता है। यह
वास्तव में अनुभव से ही जानने की पीड़ा है, यहाँ शब्द पांडित्य काम नहीं आता। यहाँ युक्ति-प्रयुक्ति नहीं
चलती, ज्ञान की व्युत्पत्ति अथवा लक्ष्य-लक्षण स्थिति नहीं चलती, केवल गुरुकृपा से ही 'तुरीय' की प्राप्ति होती
है। जागृत्यादि सारी सत्ता; अथवा सुषुप्ति में साक्षी रूप में रहने वाला वह चौथा 'तुरीय' मैं हूँ यह जान लो। वही

रूप जानना

Line 9:
चाहिये। प्रपंच का आडम्बर नामरूप का समुदाय तैयार करता है जो आकाश में दिखाई देने वाले गन्धर्व नगर की

Line 10:
तरह नश्वर प्रत्यक्ष ही दिखाई देता है। पिता के सामने पुत्र मरता है, पुत्र के सामने पिता घुलता है, काल के प्रवाह में

Line 11:
सब कुछ नष्ट हो जाता है, क्रिया करने के लिये भी कोई नहीं बचता। समुद्र में लहर उठती है और देखते-देखते

Line 12:
गायब हो जाती है, उसी प्रकार नामरूप जो भी दिखायी देता है, वह सहज ही नष्ट हो जाता है। यह प्रपंच केवल

Line 13:
नाममात्र का है। लेकिन मैं ही स्वतंत्र परमात्मा हूँ। संसार की ऐसी जन्मपत्रिका है लेकिन उसे न जानकर जीव उसे

Line 14:
'असाध्य' कहते हैं। जिससे यह प्रपंच उत्पन्न हुआ है, उसने उसे प्रकाशित किया है और अन्त में वह जिसमें

Line 15:
विलीन होता है वह सस्वरूप आत्मा तद्रूप से भरा हुआ है। सीप पर चाँदी का आभास होता है लेकिन वह सीप ही

Line 16:
रहती है। इस दृष्टि से प्रपंच ब्रह्म से अभिन्न रहता है। उद्धव ! प्रपंच का जो स्फुरण होता है वह भी ब्रह्मरूप ही है।
(Wait, space before exclamation mark: "उद्धव! प्रपंच")

Line 17:
जिस मेरे कारण श्रुति और स्मृति सत्यत्त्व में आयीं उस सत्यप्रतिज्ञ, मैं

७४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नाना प्रकार के उपायों से ब्रह्मज्ञान कैसे प्राप्त किया जाय, उसे पहले बता चुका हूँ और उसे अनुभव के
साथ स्पष्ट भी कर चुका हूँ। श्रुति-युक्ति-अनुभव के साथ ब्रह्मोपदेश का लक्षण बताकर ज्ञान और अज्ञान का
फल भी तुम्हें बता दिया है। उसी में देहेन्द्रियों का मिथ्यत्त्व, देहात्मभाव का निराकरण और ब्रह्म अद्वितीय तथा
परिपूर्ण है यह गुरुज्ञान भी प्रकट कर दिया। अत्यन्त दुर्लभ, दुर्गम तथा प्राप्त होने में कठिन पूर्ण ज्ञान मैंने प्रकट
कर दिया। यह सिद्धों का समाधान भी है और साधकों का साधन भी। मैंने अभी जो ब्रह्मज्ञान बताया उसी
उपदेशरूपी तेज शस्त्र को पूरी तरह साध्य कर साधक संशय का उच्छेद कर देते हैं। मैंने बताये हुए ब्रह्मज्ञान में
मन सन्देह करने लगता है, जिसमें देहाभिमान बढ़ता है, ऐसे सन्देह के साथ देहाभिमान को साधक इस शस्त्र से
छेद देते हैं। इस प्रकार संशय को काट कर द्वैत को दूर भगाते हैं और 'मैं' 'तू' का भाव नष्ट कर साधक स्वानंद
में निमग्न हो जाते हैं। उद्धव ! वर्णाश्रम, कुल, जाति, जीव-शिव स्थिति आदि के प्रति अहंकार उत्पन्न न होना,
इसी का नाम 'उपरति' (विराग) है। ऐसी उपरति प्राप्त हो जाने पर ऐहिक और पारलौकिक फलों की कामना
कौन करेगा? क्योंकि यहाँ विषय, विषयी और विषयोपभोग का अस्तित्व ही नहीं होता। इस प्रकार नित्य
निष्काम रहने वाले साधक आत्माराम स्वरूप होकर परमानन्द स्वरूप में निमग्न होने के कारण परम उपशम प्राप्त
करते हैं। अब, देहेन्द्रियों में प्राण रहते हुए देहाभिमान कैसे जाता है ऐसा तुम सोच रहे हो, उद्धव ! तो उसका
निरूपण श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
नात्मा बपुः पार्थिवमिन्द्रियाणि देवा ह्यसुर्धायुजलं हुताशः ।
मनोऽन्नमात्रं धिषणा चहंसत्त्वमं कृतिः खं क्षितिरर्थसाम्यम् ॥ २४ ॥
देह यह पृथ्वी का अंश अर्थात् जड़ होने के कारण वह कोई आत्मा नहीं है, उसी गुणों के कारण इन्द्रियाँ
भी आत्मा नहीं हैं, वे तो देह की उपकरण हैं, उनका व्यवहार भी एकपक्षीय होता है। इन्द्रियों के अधिष्ठाता देव
भी आत्मा नहीं होते, उन्हें इन्द्रियों का अभिमान होता है। इसलिये उन्हें आत्मपद में कहाँ स्थान मिल सकता है ?
देह को चलाने वाला जो प्राण है, वह भी आत्मा नहीं है। प्राण तो केवल अज्ञान है जो देह को वश होते समय,
उसके साथ आता-जाता रहता है, बस इतना ही। प्राण ही अगर आत्मा होता तो वह देह के साथ न चला जाता।
इसीलिये प्राण में भी आत्मत्व नहीं होता। पृथ्वी जड़ होने के कारण आत्मा नहीं होती। जल भी आत्मा नहीं है
क्योंकि उसमें द्रवत्त्व होता है। अग्नि दाहक होने के कारण वह भी आत्मा नहीं है। चंचलता के कारण वायु भी
आत्मा नहीं है। आकाश शून्य होने के कारण आत्मा भी आकाश नहीं है। संकल्प गुणों के कारण मन भी आत्मा
नहीं है। नश्वर होने के कारण आत्मा अंतःकरण नहीं है। चित्त चिन्तन करता रहता है इसलिये वह भी आत्मा
नहीं है। अभिमान भी आत्मा नहीं है क्योंकि उसे सुख-दुःख का बन्धन होता है। बुद्धि आत्मा नहीं है क्योंकि
उसमें बोधकता है। तीन गुण भी आत्मा नहीं है क्योंकि गुण तो विकारों से भरे होते हैं। महत्तत्त्व गुणों का कारण
हैं। इसलिये वे तो कभी भी आत्मा नहीं हो सकते। प्रकृति अर्थात् गुण साम्यावस्था भी सचमुच आत्मा नहीं है,
क्योंकि आत्मदृष्टि से प्रकृति की ओर देखने पर वह भी मिथ्या ही लगती है। मूल प्रकृति ही जहाँ मिथ्या सिद्ध
होती है, वहाँ उसके कार्यों में सत्यत्व कहाँ से आयेगा ? इस प्रकार साधक निश्चित होकर आत्मा का अनुभव
लेते हैं। इस प्रकार ज्ञान को साध्य कर साधक देहाभिमान को नष्ट कर देते हैं, और निरभिमान होकर सदा सुखी
रहते हैं। सारांश, जो साधक इस प्रकार निरभिमान रहते हैं, वह यदि प्रारब्ध के अनुसार विषम सेवन करें तो भी
उन्हें गुणदोषों की बाधा नहीं होती, यही बात श्रीकृष्ण निरूपित करते हैं।

Anushtubh!
Wait, is this meter:
यथा नभो वाय्वनलाम्बुभृद्गुणैर्गतागतैर्वर्तुगुणैर्न सज्जते ।
Let's count:
य (u) था (–) न (u) भो (–)
वा (–) य्व (u) न (u) ला (–) म्बु (–) भृद् (–) गु (u) णैर् (–)
ग (u) ता (–) ग (u) तैर् (–)
र्तु (–) गु (u) णैर् (–)
न (u) स (–) ज्ज (u) ते (–)
Wait, what meter is this?
Let's look at the line:
यथा नभो वाय्वनलाम्बुभृद्गुणैर्गतागतैर्वर्तुगुणैर्न सज्जते ।
Wait, let's look at Bhagavata 11.28.26:
The verse is in Šārdūlavikrīḍita or Sragdharā or Vasantatilakā or what?
Wait!
"तथाक्षरं सत्त्वरजस्तमोमलैरहं मतेः संसृतिहेतुभिः परम् ॥"
Let's count:
तथाक्षरं (4)
सत्त्वरजस्तमोमलै- (8) = 12
-रहंमतेः (4) =

७५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
आये लेकिन आकाश जरा भी गीला नहीं होता। इस प्रकार आकाश निर्मल है। उसे मैल लगाने पर भी नहीं
लगता। जो आकाश से भी अलिप्त, जो क्षर-अक्षर से भी अतीत है, वह अक्षर परब्रह्म सदा तीन गुणों से अतीत
और चिन्मात्रस्वरूप है। जो अजरामर, अविनाशी और स्वयं प्रकाश से प्रकाशमान है, ऐसे परब्रह्म की जिसे
अद्वयत्व से प्रतीती हुई, उसी प्रकार जैसे सोने का सिक्का सर्वांग से सोना ही रहता है, उसी प्रकार जो बिना
किसी कर्म के ऊपरी साधनों से परब्रह्म होते हैं उनके शरीर में गुणों की त्रिकुटी नहीं लगती, विषयों का भोग
भोगते हुए भी, वे उससे अलिप्त ही रहते हैं। मेघों में चन्द्रमा का बिम्ब दिखायी देता है लेकिन वह घटाओं को
स्पर्श नहीं करता अथवा उसके जल से वह गीला नहीं होता। उसी प्रकार देह में जीव अलिप्त ही रहता है। उन
घटाओं में यदि गोबर मिलायें या कस्तूरी मिलायें तो भी वह जिस प्रकार उस प्रतिबिम्ब से नहीं चिपकता, उसी
प्रकार देह के पाप पुण्य का प्रभाव जीव शिव पर नहीं होता। आकाश को जलाने के लिये यदि घृत को जलाकर
अग्नि प्रज्वलित की जाय तो उस समय आकाश अग्नि के बिलकुल निकट रहता है लेकिन इससे आकाश को
उसकी आँच नहीं लगती। उसी प्रकार ज्ञाता भी विषय की भीड़ में कभी विषयी नहीं होता। गुणों के और देह की
संगति में योगी भले ही विचरण करते हों तो भी विषयों का भोग करते हुए भी वे सदा सर्वांग से अलिप्त ही रहते
हैं। भोग का यह मर्म जिसने जान लिया वह देह में होते हुए भी परब्रह्मस्वरूप ही है। वे स्वयं ही शुद्ध अक्षर होने
के कारण उन्हें भोगभ्रम की बाधा नहीं होती। 'वे अब अक्षर हो गये' यह कहना भी कम ही है क्योंकि संसार
भले ही ज्ञान अथवा अज्ञान में विचरण करता हो लेकिन अक्षरता कायम ही रहती है। उस ब्रह्मस्वरूपता को
भूलकर, देहअहंता 'मैं देही' कहती है, उस समय विषयावस्था बढ़ कर दृढ़ बन्धन प्राप्त होता है। उस बन्धन को
दूर करने के लिये विषयलोलुपता का त्याग करना होगा क्योंकि विषयत्याग किये बिना नित्यमुक्तता कभी नहीं हो
पायेगी। नित्यमुक्तता यदि साध्य न हुई हो तो साधक कितना भी बड़ा ज्ञानी क्यों न हो जाय लेकिन उसे उस
ज्ञातृत्व के लिये विषयासक्ति कभी नहीं करनी चाहिये।
तथापि सङ्गः परिवर्तनीयो गुणेषु मायारचितेषु तावत्।
मद्भक्तियोगे न दृढेन यावद् रजो निरस्येत मनःकषायः॥ २७॥
सम्पूर्ण स्वरवर्णों से युक्त चारों वेदों में कोई भले ही निपुण हो जाय लेकिन उसके बल पर यदि वह
विषयाचरण करता है तो वह उसे अत्यन्त बाधक होता है। केवल शब्दज्ञान के लिये विषयाचरण बाधक ही है।
प्राणापान को सम कर मृत्यु को टालने का भले ही सामर्थ्य आ जाय लेकिन विषयाचरण उसके लिये भी बाधक
है। शाप अथवा वरदान देने का सामर्थ्य रखने वाले पुरुष भले ही अपने को महान समझें लेकिन यदि वे
विषयाचरण करने लगेंगे तो उन्हें वह घातक होगा। कोई योग सामर्थ्य से अंतरिक्ष में आसन उड़ाते हैं और सिद्धि
के अनेक प्रकार दिखाते हैं। उन्हें भी विषय भोग की चाह निश्चित रूप से बाधक होती है। मंत्रानुष्ठान के योग
से प्रत्यक्ष मंत्रदेवता भले ही प्रसन्न हो जाय, लेकिन उनके लिये भी विषय वासना घातक ही है। किसी की
किंचित् स्वस्वरूप का अनुभव होकर 'मैं मुक्त हूँ' ऐसा स्फुरण होने लगता है, उनके लिये भी विषय की संगति
निश्चित रूप से बाधक है। स्वयं अभिमान का निर्दलन कर जब तक नित्यमुक्त नहीं हुआ तब तक विषयाचरण
बाधक ही है। जिस प्रकार चकमक की आग खम्भे को नहीं जला सकती, उसी प्रकार ब्रह्म प्राप्ति प्रथम रंग प्रपंच
की संगति से नष्ट हो जाता है। ये विषय मिथ्या और मायिक हैं फिर भी उनका भोग करते समय जब तक हर्ष
होता है, तब तक हे उद्धव ! विषय सचमुच ही बाधक हैं, यह जान लो। उन विषय भोगों से छूटने के लिये

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५१
देहाभिमान को नष्ट करना चाहिये और इसके लिये निष्ठापूर्वक मेरा भजन करना चाहिये। व्रत, तप, तीर्थ, दान
आदि करने से; या योग, त्याग और यजन आदि करने से; वेदशास्त्र अथवा पुराणश्रवण करने से भी देहाभिमान
नहीं ढलता। किन्तु भक्तिभाव से मेरा भजन करने से देहाभिमान का समूल लय हो जाता है। उसके लिये भक्ति
ही उत्तम साधन है। परब्रह्म भक्ति के अधीन रहता है। उद्धव! ज्ञान, वैराग्य, निवृत्ति, धृति, शान्ति और ब्रह्मस्थिति
आदि की जननी मेरी भक्ति है यह स्मरण रखो। मेरी भक्ति चारों मुक्तियों से अधिक श्रेष्ठ है। उनकी शक्ति अपार
है। सचमुच, मैं उससे बँध गया हूँ। मेरा स्वरूप अनंत और अपार होते हुए भी, मैं सचमुच भक्ति में उलझ गया
हूँ। इसीलिये मैं निरन्तर मेरे भक्तों के द्वार में उपस्थित रहता हूँ। मैं भक्ति से बंध गया हूँ, इसीलिये मैं भक्तों के
अधीन रहता हूँ। मेरी भक्ति की महिमा स्वयं मैं भी नहीं जानता। अनेक लोग मेरी भक्ति कर मुझसे मोक्ष की ही
माँग करते हैं किन्तु चारों मुक्तियों की उपेक्षा कर जो मेरी भक्ति करता है, वह धन्य है। मेरे प्रति ऐसी भक्ति जहाँ
होती है, वहाँ चारों मुक्तियाँ पैरों पर आकर गिरती हैं। उसके भावार्थ पर मैं श्रीकृष्ण पूर्णरूप से न्योछावर हूँ।
उसके लिये वह भक्ति ही प्रमुख साधन रहती है, इसलिये मैं भी भक्तों के अधीन रहता हूँ। उसके वचन का मैं
कभी भी उल्लंघन नहीं करता। वह मुझे सगुण होने के लिये कहते हैं तो मैं तत्काल सिंह, बराह आदि बन जाता
हूँ; उनके लिये मैं विदेही होते हुए भी पूर्ण देहधारी बनता हूँ। अम्बरीष के लिये मैंने दस जन्म भोगे। अजन्मता
का व्रत भी मैं तोड़ देता हूँ लेकिन भक्त को किसी बात की कमी नहीं होने देता। कौरव द्रौपदी को विवस्त्र कर
रहे थे यह देखकर मैं उसकी सहायता के लिये दौड़ पड़ा और उसे एक क्षण के लिये अनावृत्त नहीं रहने दिया।
उसे करोड़ों वस्त्र पहनाये। इस प्रकार मैं भक्तों का सहायक हूँ। अजन्मा होते हुए उनके लिये जन्म लेता हूँ।
अरिमित्रों से सम होते हुए मैं अपने भक्तों का पक्षधर बन जाता हूँ। जो मेरे भक्तों का हित करता है, वह संसार में
मेरा बहुत बड़ा मित्र होता है और जो मेरे भक्तों से बैर करता है, उसका मैं अनेक प्रकार से विनाश करता हूँ। इस
प्रकार मैं भक्तों का सहायक होते हुए, भी वे अभागे लोग मुझ श्रीकृष्ण का भजन न कर अधःपतन की ओर
अग्रसर होते हैं। तुम कहोगे कि जब शरीर में पाप है तो तुम्हारा भजन कैसे सम्भव होगा? तो सुनो। मेरा नाम
क्षणभर में सारे पापों का विनाश कर देता है और उन्हें भस्म कर देता है। नाम का घोष सुनकर महापापों का
समुदाय सरपट भागने लगता है, नाम के पास पापों का ठौर नहीं मिल पाता। सूर्य अन्धकार में डूब सकता है
लेकिन पाप भक्त के पास नहीं आयेगा। जहाँ भक्तों के चरणों की धूलि पड़ती है वहाँ पापों का मूल ही नष्ट हो
जाता है। मेरा नाम समझ लो संसार का एक ब्रह्मास्त्र है और महापातक बेचारी चींटी है। नाम के सामने उसका
अस्तित्व टिक नहीं सकता। जब मेरे नाम का ऐसा प्रताप है, तो फिर मेरे भक्तों की दशा का क्या वर्णन करें? मेरी
भक्ति की मुहर लगते ही वह सहसा कलिकाल की भी परवाह नहीं करता। इसलिये भजन देहाभिमान का नाश
करता है, मेरे निजभजन के बिना देहाभिमान नहीं जाता। जिससे देहाभिमान टूटता है वह तुम्हारी भक्ति कैसी है?
इसका उत्तर यही है कि अभेदभाव से पूर्णभक्ति करनी चाहिये, इससे देहाभिमान नष्ट होता है। समस्त प्राणिमात्र
के प्रति भगवद्भावना रखना इसी का नाम है 'अभेद भक्ति'; यह भजन साध्य होते ही अहंकार शेष नहीं रहता।
उसके मुख में मेरा नाम, उसके कान में मेरी कीर्ति, उसके मन में मेरी भक्ति और उसके हाथ पैर आदि अवयवों
में मेरी क्रिया अर्थात् सेवा रहती है। वह जागृति में मुझे ही देखता है, वह स्वप्न में मुझ अकेले को ही देखता है,
सारांश वह अपनी निष्ठा से मेरे सिवा चित्त को खाली नहीं रखता। इस प्रकार के भजन से तीनों गुणों का विलय
हो जाता है। जिससे अहंकार से निवृत्ति होकर विषयासक्ति भी नष्ट होती है। ऐसे भक्तों को विषयों का सेवन
कभी भी बाधक नहीं होता। सारे विषय वह मुझे ही अर्पण करता रहता है इसलिये उसे उनकी बाधा नहीं होती।

७५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अनेक प्रकार के साधनों का प्रयोग कर जो विषय का त्याग करते हैं उन्हें ऐसा करने में अत्यन्त दुःख होता है
लेकिन मेरे भक्त अपने विषय भगवान को ही अर्पण करते हैं इसलिये वे नित्यमुक्त होते हैं। हर ग्रास पर हरि का
स्मरण करने से वह अन्न पूर्णरूप से परब्रह्म हो जाता है। उसकी बाधकता नष्ट होकर वह अपने ही आप ब्रह्मार्पण
होता रहता है। भक्तों की भजन करने की रीति कुछ ऐसी होती है कि वे विषय में भी मेरे ही स्वरूप की भावना
रखते हैं, जिससे विषय की स्फूर्ति मुरझा जाती है और वह बाधक नहीं होते। इस रीति से मेरा भजन करने से
मन का मैल साफ हो जाता है और विकार सहित तीनों गुण और देहाभिमान नष्ट हो जाता है। इस प्रकार जो मेरी
भक्ति नहीं करते, अहंकार नहीं छोड़ते, विषय की आसक्ति करते हैं वही वास्तव में बाधक होती है।
अकर्तात्मबोध पूरी तरह अंकित हुए बिना विषय का सम्बन्ध नहीं करना चाहिये क्योंकि विषयों की विषयरूप में
निहित जागरूकता अत्यन्त अमंगल और बाधक है। विषय यद्यपि मिथ्या और मायिक हैं फिर भी साधकों को वे
बाधक होते हैं। इसी विषय को श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
यथाऽऽमयोऽसाधुचिकित्सितो नृणां पुनः पुनः संतुदति प्ररोहन्।
एवं मनोऽपक्वषायकर्म कुयोगिनं विध्यति सर्वसङ्गम्॥२८॥
जिस वैद्य को रोग का निदान नहीं है, धातु पुष्ट है या क्षीण है यह समझ में नहीं आता, पथ्य और अनुपान
का भी ज्ञान नहीं है और नाड़ी ज्ञान भी नहीं है, ऐसे वैद्य से दवा लेने से रोग और भी अधिक बढ़ जाएगा। उसी
प्रकार वैराग्य हुए बिना विषय का त्याग करने से साधक को वह अपार बाधक सिद्ध होता है। अंतःकरण में
विषय के प्रति घृणा नहीं है और ऊपरी त्याग से विरक्ति का भाव प्रदर्शित करता है, ऐसी पाखण्डी वृत्ति को
'कुयोग' समझना चाहिये। भगवद्भजन छोड़ तथा वेदविधि का मार्ग छोड़कर त्याग करना इसी का नाम है
'कुयोग'। कनककांता विषयों की आसक्ति और मन में दृढ़तर वासना के कायम रहते हुए बाह्य तौर पर झूठी
विरक्ति दिखाने का नाम है 'कुयोग'। स्वयं को बहुत बड़ा राजयोगी समझना और पर्याप्त विषय सेवन करना इसी
का नाम उत्तम 'कुयोग' है। अपनी विषयासक्ति को छिपाकर बाहर से विरक्ति का प्रदर्शन करना, यही 'कुयोग'
का लक्षण है, उद्धव! ऐसे कुयोगी बार-बार जन्म लेकर और पुनः-पुनः मर कर दुःख के भँवर में गोते लगाते
रहते हैं। उन्हें कौन छुड़ाएगा? न इहलोक का विषयभोग ही पूर्ण हुआ और न परमार्थ के लिये आवश्यक त्याग
ही हुआ है। दोनों से वंचित होने के कारण कुयोगी के भाग्य में दुःख ही आता है। परमार्थ के लिये विषय त्याग
का साधन करते हुए उन्हें भले ही रुकावट या विघ्न आयें, फिर भी जिन्हें पूर्ण अनुताप हुआ रहताहै उन्हें दुर्गति
नहीं प्राप्त होती, यह ध्यान में रखो।
कुयोगिनो ये विहतान्तरायैर्मनुष्यभूतैस्त्रिदशोपसृष्टैः।
ते प्राक्तनाभ्यासबलेन भूयो युञ्जन्ति योगं न तुकर्मतन्त्रम्॥२९॥
साधक ब्रह्मज्ञान के लिये विषय का त्याग करे और ठीक से अभ्यास करने लगे तो बीच में ही कोई विघ्न
उपस्थित हो जाता है; साधकों के मार्ग में अनेक विघ्न आते हैं। काम की ही इच्छा प्रबल हो उठती है; संताप
बढ़कर खलबली मचा देता है; शिष्य और सगे-सम्बन्धियों का उपसर्ग होता है और मन में स्वहित के प्रति ही
ऊब उत्पन्न होती है। स्त्री के रूप में देवता भी अनेक प्रकार के उपसर्ग देने लगते हैं। ऐसे विघ्नों से योग का भंग
होता है। वहाँ अनुराग अथवा अनुताप उसका उद्धार करता है। एकनिष्ठा से अभ्यास शुरू करने पर भी दैवयोग
से विघ्न आते हैं। उस समय मन में वैराग्य उत्पन्न होने से वह योगी नियमित रूप से अभ्यास करने लगता है और

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५३
अपने योगाभ्यास के सामर्थ्य से विघ्नादि दोषों को समूल जला देता है। किन्तु कर्म के कर्मठ जाल को योगी स्पर्श
भी नहीं करता। योग में विघ्न आकर उसमें योगी यदि मर भी जाता है तो भी अगले जन्म में वह कर्माधीन नहीं
होता। यही बात श्रीकृष्ण ने स्वयं श्लोकार्ध में बतायी। योगसाधना करते प्रारब्ध से उसमें विघ्न आकर योगी यदि
मर जाए तो उसमें क्या हानि है ? विघ्न आने के कारण उसे पुनः जन्म लेना पड़ता है, बस इतना ही। लेकिन इस
जन्म में भी वह कर्म के जाल में नहीं फँसता। पूर्वाभ्यास के योग से वह योगी पुनः नये सिरे से पहले के अभ्यास
में लग जाता है। प्रवासी को यदि मार्ग में कोई संकट आता है तो वह बीच में ही कहीं मुकाम कर लेता है और
दूसरे दिन पुनः उसी मार्ग पर लग जाता है। इस प्रकार योगी स्वयं ही प्रारब्ध के पूर्व संसार के योग से अपना
योगाभ्यास पूरा करने लगता है किन्तु कभी भी कर्म के अधीन नहीं होता। साधनों में यदि मेरी भक्ति है तो
अणुमात्र भी विघ्न नहीं आयेगा क्योंकि मैं भक्तों का पक्षधर श्रीपति दिन-रात अपने भक्तों का संरक्षण करता रहता
हूँ। जहाँ मेरी भक्ति की चाह है, वहाँ बेचारे विघ्न क्या करेंगे ? उद्धव ! मेरा केवल नाम ही करोड़ों महा विघ्नों का
नाश कर सकता है। भजन न करने वाले महायोगी, अभ्यास में विघ्न आने पर दूसरा जन्म लेते हैं, लेकिन वे भी
पूर्व संस्कार से कर्म में उलझे नहीं रहते। जो जीवन्मुक्त हो जाते हैं, वे भी प्रारब्ध के ही अनुसार व्यवहार करते
हैं; फिर योगभ्रष्ट पुरुष कर्मों का त्याग कैसे कर सकते हैं ? उसका कारण भी सुनो। मुक्त का जो मोक्ष का लक्षण
है वही साधक का मुख्य साधन रहता है, इसलिये उन दोनों को ही कर्मों का बन्धन बाधक नहीं होता। मैं कर्म
कर्त्ता हूँ ऐसा अहंकार जिसे नहीं होता, उसे भी कभी कर्मबन्धन का स्पर्श नहीं होता।
करोति कर्म क्रियते च जन्तुः केनाप्यसौ चोदित आनिपातात् ।
न तत्र विद्वान् प्रकृतौ स्थितोऽपि निवृत्ततृष्णः स्वसुखानुभूत्या ॥ ३० ॥
जन्म से मृत्यु तक प्राणी जो भी कर्म करता है, वह सब 'प्रारब्ध कर्म' के रूप में कोई अपनी सत्ता से
कराता है। उनमें सज्ञान और अज्ञान दोनों ही प्रारब्ध कर्म के अनुसार कर्म के ही अधीन रहते हैं; परन्तु अज्ञानी
को 'मैं कर्त्ता' इस बात का अहंकार रहता है और ज्ञाता कर्म में निरभिमान होकर रहते हैं। अब तुम कहोगे कि
देह में प्राण होते हुए देहाभिमान हुए बिना कैसे रहेगा ? तो ज्ञाता आत्मसुखानुभव से पूर्ण होने के कारण उसे
अहंकार का स्फुरण ही नहीं होता। रस्सी के साँप का भय रस्सी है यह देखकर जब बाधा समाप्त हो जाती है,
उसी प्रकार ब्रह्मसुख का अनुभव प्राप्त होने के बाद बाधा करनेवाली अहंता का स्फुरण नहीं होता। अब योगकष्ट
का लक्षण सुनो। उसका प्राचीन संस्कार, उसका योग पूरी तरह सिद्ध हो इसलिये उसमें देहाभिमान उत्पन्न ही
नहीं होने देता। जो देह में नित्य अभिमानरहित रहते हैं, वही ब्रह्मसुख से सदा सम्पन्न रहते हैं, उन्हें देह का
कर्माचरण कभी बाधक नहीं होता। ज्ञाता देहकर्म से अलिप्त रहता है, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। वह देहातीत
ही रहता है। यही बात श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
तिष्ठन्तमासीनमुत व्रजन्तं शयानमुक्षन्तमदन्तमन्नम् ।
स्वभावमन्यत् किमपीहमानमात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद ॥ ३१ ॥
देह खड़ा रहता है लेकिन ज्ञाता को खड़े रहने का अनुभव नहीं होता; फिर देह के बैठने पर उसके बैठने
को कौन स्वीकार करेगा ? परिपूर्ण ब्रह्म में उठना और बैठना ये दोनों ही नहीं है और ज्ञाता तो ब्रह्म ही हुआ रहता
है, इसलिये उठने या बैठने का उसे अनुभव नहीं होता। देह यह दैवयोग के अनुसार एकदेशी होता है किन्तु
अपने को सर्वत्र देखता है। देह परदेश जाने लगता है तो ज्ञाता उसमें अपने गमन का विचार नहीं करता क्योंकि

७५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
परब्रह्म स्वरूप से परिपूर्ण है; उसका आना-जाना कैसा? ज्ञाता सदा तद्रूप ही रहने के कारण उसे रहने या जाने
का भाव स्पर्श नहीं करता। ज्ञाता स्वयं शयन करने जाता है लेकिन वह भूमि पर की शैय्या नहीं देखता। इतना ही
नहीं, अपितु मैं सोया हूं यह भी वह नहीं मानता। वह सदासर्वदा स्वरूप में ही निमग्न रहता है। ज्ञाता
प्रसन्नतापूर्वक भोजन करने बैठता है; लेकिन मैं भूखा हूँ इसका भी उसे स्मरण नहीं रहता। रसना के जाने बिना
वह सारे रस चखता है। ऐसी आत्मसुख की मधुरता में ही वह भोजन करता है। वह पर्याप्त भोजन कर चुका है
ऐसा लगता है लेकिन न वह तृप्त ही रहता है और न क्षुधित ही रहता है, वह खाना झूठा भी नहीं करता और भरे
संसार से उठ जाता है। वह भले ही सहज बात करता है लेकिन उसकी बातों में अनकही ही अधिक रहती है।
उस बातचीत में भले ही रसमय माधुर्य उत्पन्न होता हो लेकिन उसकी मौन की गाँठ ढीली नहीं होती। मैं एक
बहुत अच्छा और चतुर वार्ताकार हूँ, इसका अभिमान भी उसमें उत्पन्न नहीं होता। निरर्थक बात करना तो उसे
आता ही नहीं। ठीक तरह बात करने पर भी वह न बोलने की तरह की रहता है। ज्ञाता सृष्टि की ओर आत्मसुख
से देखता है; 'मेरा' और 'तुम्हारा' यह भी समझता है लेकिन वह आँखों से देखता ही नहीं है। सारे त्रैलोक्य को
वह अपनी ही तरह समझता है। वह जिस दृश्य को देखने जाता है उस दृश्य का ठिकाना ही अदृश्य हो जाता है।
वह जो कुछ भी देखता है वह सब उसे अपने जैसा ही दिखायी देता है क्योंकि वह सारी सृष्टि को स्वयं
ऐक्यरूप से ही देखता है। आँखों का अंत कर ही ज्ञाता दर्शन रूप से देखता है, लेकिन उस देखने का सच्चा अर्थ
वेदशास्त्र भी नहीं समझ सकेंगे। वह शब्दों का शब्दज्ञान जानता है, किन्तु 'मैं श्रोता' हूँ इस बात का उसे स्मरण
ही नहीं होता। वह देह के कान की उपेक्षा कर सर्वांग से श्रवण करता रहता है। इस प्रकार वह स्वयं संज्ञान
होकर जागृत रहता है। शब्दज्ञान को छील कर उसमें का स्वाभाविक अर्थ वह ग्रहण करता रहता है। वह घ्राण से
सुगन्ध और दुर्गन्ध पहचानता है लेकिन उसका भोग करते समय वह नाक की अपेक्षा नहीं करता। पुष्प के
अंतर्बाह्य सुगन्ध का आस्वाद वह सदा लेता रहता है। त्वचा से वह मृदु-कठोर आदि स्पर्श को जानता है; किन्तु
'मैं जानता हूँ' इस बात का उसे स्फुरण नहीं होता। जिसका अंग से स्पर्श हो उसे निजांगरुप करना, इस प्रकार
का स्पर्श ज्ञाता अनुभव करते रहते हैं, ज्ञाता चरणों से चलता रहता है, लेकिन चलते समय भी वह अचरणीय
होता है। वह भले ही स्वेच्छा से पृथ्वी पर विचरण कर रहा हो लेकिन वह अपने स्थान से हिलता भी नहीं है।
वह अपने हाथ से दान देता है लेकिन तब भी 'मैं दाता हूँ' इस बात का उसे स्मरण नहीं होता। दिया हुआ और
लिया हुआ दान वह स्वयं ही हो जाता है। उसी प्रकार ज्ञाता हाथों की हलचल करता है। कायिक, वाचिक और
मानसिक कर्म स्वाभाविक रूप से ही होता रहता है किन्तु ज्ञाता ब्रह्मरूप से निर्दोष ही रहता है। वह देह का स्पर्श
ही नहीं करता। ज्ञाता अकर्ता होता है तथा आत्मसत्ता से सारे कर्मों में विचरण करता रहता है। निरन्तर आत्मबोध
में स्वस्वरूप में ही रहने के कारण वह कर्म, क्रिया अथवा कर्तव्यता को नहीं देखता। ज्ञाता नित्य आत्मसुख में
ही रहने के कारण वह देह में होते हुए भी देह की ओर नहीं देखता। परमात्मसुख में ही सन्तुष्ट रहने के कारण
वह देहकर्म में कैसे फँसेगा ? सारे संसार को कर्मबन्धन लगा हुआ है। ऐसा होते हुए खाने-पीने वाले ज्ञाता को
कर्मबन्धन क्यों नहीं होता। उसी का निरूपण श्रीहरि करते हैं।
यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं नानानुमानेन विरुद्धमन्यत्।
न मन्यते वस्तुतया मनीषी स्वप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम्॥ ३२॥
लोकरीति के अनुसार ज्ञाता भी लोकाचार से चलता रहता है। वह भी प्रपंच के लौकिक कर्म करता ही

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५५
रहता है। किन्तु कार्य, कर्म और कर्तव्यता यह अहंता ज्ञाता को नहीं होती क्योंकि वह प्रपंच में ही निजात्मस्वरूप
निश्चित रूप से वश में कर लेता है। विषयादि प्रपंचों का भान अज्ञानी सत्य मानते हैं; किन्तु ज्ञाता उसी प्रपंच को
परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप मानते हैं। शर्करा से बनाया करेला मीठा ही लगेगा, उसी प्रकार प्रपंच की कथा है। लाभ और
हानि यह ज्ञान और अज्ञान पर निर्भर करता है। सुवर्ण की गुल्ली देखकर मूर्ख लोग उसे ईंट या पत्थर समझते हैं,
किन्तु ज्ञाता उसकी कद्र करते हैं और ज्ञानदृष्टि से अच्छा मोल देकर खरीदते हैं। उसी प्रकार सांसारिक क्रिया
कर्म मूर्ख को मूर्खता के कारण विषम लगता है; किन्तु ज्ञाता को वही परब्रह्म लगता है और वह सर्वकाल उसमें
स्वानंद से सन्तुष्ट रहता है। पहले प्रपंच को खन कर हटा देना और फिर ब्रह्मभाव धारण करना इस बात की भी
उस भाग्यवान को आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि वह सब कुछ ब्रह्मरूप देखता रहता है किन्तु अनाड़ी लोग
मिलकर उससे भीषण अनुमान निकालते हैं और उन्हें सच समझते हैं। उसी प्रकार प्रपंच का मिथ्या भान अज्ञानी
लोग बाधक मानते हैं किन्तु ज्ञाता लोग उसे ही परिपूर्ण ब्रह्म समझते हैं। सोये हुए व्यक्ति को स्वप्न सच ही
मालूम होता है, उसी प्रकार अपने भ्रम के कारण प्रपंच सच ही मालूम होता है, लेकिन जिसका आत्मज्ञान जागृत
होता है, उसे वही प्रपंच स्वस्वरूपज्ञान के बोध से निश्चित ही मिथ्या मालूम होता है। प्रपंच का भास मिथ्या है
यह जानकर जो ज्ञानसम्पन्न होते हैं, उन्हें किसी भी कर्म में विचरण करते समय कभी भी देहाभिमान उत्पन्न नहीं
होता। साधकों का स्वार्थ साधने के लिये पहले 'स्वस्वरूप से भगवान हो गया' यह कहने से वह सचमुच
विचारवश हो गया है ऐसा कहोगे तो उचित नहीं होगा क्योंकि परब्रह्म और आत्मतत्त्व कभी विकारवश नहीं
होते। वह सदा सर्वदा समसाम्य अर्थात् निर्विकार ही रहता है। इसी सम्बन्ध में श्रीकृष्ण आत्मज्ञान से बता रहे हैं।
पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्रमज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग।
निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा॥ ३३॥
यह संसार साधकों की पूर्वावस्था में मायावशता के कारण अत्यन्त अतर्क्य मालूम पड़ता है, किन्तु शुद्ध
परब्रह्म गुणकर्मों के प्रकारों से अनेक रूपों में भासित होता है। नाम, रूप, व्यक्ति, वर्ण, कुल, गोत्र, क्रियाचरण
इस प्रकार प्रपंच को अज्ञानी भिन्न और सत्य मानते है। लेकिन यह प्रपंच ब्रह्म के स्थान पर आरोपित है, इसलिये
ब्रह्म भी तद्रूप ही मालूम होता है। स्फटिक किसी भी रंग से अलिप्त रहता है, लेकिन जिसके साथ उसका
सम्बन्ध होता है, उसी की तरह वह भी लगता है। इस प्रकार अज्ञान के कारण संसार भिन्न मालूम होता है,
इसीलिए आत्मा को भी विकारी कहते हैं। लोग अज्ञान के कारण इतने अविचारी हो जाते हैं। उस अज्ञान की
निवृत्ति हो जाए तो साधकों को मेरी प्राप्ति सुलभ हो जाएगी। इसलिये मेरी सच्ची भक्ति मैंने यथार्थ रूप में
प्रकाशित की। साधकों का सच्चा स्वार्थ शीघ्र पूर्ण हो सके इसीलिये 'समस्त प्राणिमात्र में भगवान है' यह गुह्यार्थ
मैंने बता दिया। इस अनुसंधान को धारण कर मेरा मनोभाव के साथ भजन करने से 'मैं' 'तू' वाली भावना नष्ट
होकर, अविद्या के साथ अज्ञान भी समूल नष्ट हो जाता है। फिर दृश्य, द्रष्टा, दर्शन, त्रिगुणों के साथ कार्य,
कारण और प्रपंच का भान भी नहीं रहेगा। परिपूर्ण ब्रह्म ही पूर्णत्व से भर जायेगा। वहाँ नाम, रूप, गुण, जाति,
महाभूत तथा भूतव्यक्ति इनमें से कुछ भी नहीं रह जाता। सहज स्थिति में परिपूर्ण चैतन्य ही रहता है। ब्रह्म के
ब्रह्म की स्फूर्ति भी उत्पन्न नहीं होती। वह ऊँचा भी नहीं है और नाटा भी नहीं है। मोटा भी नहीं है और कृष भी
नहीं है, सरल भी नहीं है और वक्र भी नहीं है। उसे किसी भी प्रकार का विकार नहीं है। वहाँ न ठंडक है, न
उष्णता है। वह मृदु भी नहीं है और कठोर भी नहीं है। वह मीठा भी नहीं है और कडुआ भी नहीं है। सुख-

७५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
दुःख रहित वह केवल निर्द्वंद्व ही है। चिद्रूप होने के कारण वह न आँखवाला है न अन्धा है। वह यहाँ भी नही है,
वहाँ भी नहीं है, वह न आता है न जाता है, वह न निकट है न पास में है, वह सदा सर्वसिद्ध ही है। वह खाता
भी नहीं है और भूखा भी नहीं है; वह न देता है, न लेता है; वह न जीता है न मरता है, वह परादि वाचा के परे
होने के कारण परात्पर है। वह बद्ध भी नहीं है और मुक्त भी नहीं है; वह नित्य भी नहीं है और अनित्य भी नहीं
है; वह नाराज भी नहीं होता और प्रसन्न भी नहीं होता। परब्रह्म सदा सत्वस्वरूप में ही रहता है। वहाँ पाप भी
नहीं है और पुण्य भी नहीं है; वह साकार भी नहीं है और शून्य भी नहीं है। वह सगुण भी नहीं है और निर्गुण
भी नहीं है; वह स्वानंद से पूर्ण सुखस्वरूप है। समस्त प्राणिमात्र भगवान के ही रूप हैं, इस दृष्टि से मेरे भक्त
मेरा भजन कर स्वयं मेरा परिपूर्ण स्वरूप बनकर रहते हैं। संत के रूप में कुछ लेना अथवा असंत के रूप में कुछ
त्यागना ऐसा अलग कुछ उनमें रह ही नहीं जाता क्योंकि वे ब्रह्मस्वरूप में परिपूर्ण हुए रहते हैं। बद्धकाल की
बद्धता आत्मा स्वीकार नहीं करता अथवा मुक्तकाल की मुक्तता को भी आत्मा स्पर्श नहीं करता। आत्मा
अविकारी है, वह इस निरूपण से तुम्हारी समझ में आ जायेगा। इतने पर भी न समझ में आये तो पुनः बताता हूँ,
सुनो। आत्मा सर्वदा नित्य है, इसलिये उसे उत्पत्ति नहीं है। जिसे उत्पत्ति ही नहीं है वह कभी गर्भ को स्पर्श नहीं
करेगा और जिसे गर्भ और जन्म नहीं है, उसे देह भी नहीं है और देह के बिना वृद्धि भी सम्भव नहीं है। जो सदा
विदेही है, उसे कर्म सम्भव नहीं होता और बिना कर्म के आत्मा को बन्धन भी नहीं होता। जिसे कोई अवयव ही
नहीं है, उसका कोई संस्कार ही नहीं होगा और जिसका आकार ही नहीं है, उसे विकार भी स्पर्श नहीं करेगा।
जो गर्भ और जन्म से विरहित है, उसके पास मृत्यु भी नहीं आ सकती। काल भी उस पर आघात नहीं कर
सकता। इस प्रकार परमात्मा क्षयातीत है। जिसे जन्म, कर्म और मरण नहीं है उसे विकारी कौन कहेगा? इस
प्रकार उद्धव ! परब्रह्म पूर्ण अविकारी है यह जान लो। प्रगाढ़ अज्ञान फैलने पर भी आत्मा को नष्ट नहीं किया जा
सकता; अथवा ज्ञान कितना ही प्रखर हो तो आत्मा नया नहीं हो सकता। आत्मा ज्ञान, अज्ञान से अलिप्त नित्य
तथा निर्विकार है। यही बात श्रीकृष्ण दृष्टांत देकर बताते हैं।
यथा हि भानोरुदयो नृचक्षुषां तमो निहन्यान्न तु सद् विधत्ते ।
एवं समीक्षा निपुणा सतो मे हन्यात्तमिस्रं पुरुषस्य बुद्धेः ॥ ३४॥
आँखों की दृष्टि पर अन्धकार प्रतिबन्ध करता है। सूर्य का उदय होने पर वह उस अन्धकार को दूर करता
है लेकिन नयी दृष्टि उत्पन्न नहीं करता। उसी प्रकार अविद्या क्षुब्ध होकर कितनी भी उग्र हो जाय लेकिन वह
आत्मा को नष्ट नहीं कर सकती। वह पुरुष की बुद्धि पर परदा डाल कर झूठा द्वंद्व दिखाती है। शुद्ध ज्ञान प्राप्त
होने पर वह अविद्या का मल निकाल देती है लेकिन नया आत्मा उत्पन्न करने का सामर्थ्य ज्ञान में नहीं है। आत्मा
अपने प्रकाश से ज्ञान को तथा अज्ञान को भी प्रकाशित करती है अर्थात् वह ज्ञान अथवा अज्ञान परमात्मा को
कभी भी स्पर्श नहीं करता। ज्ञानाज्ञान विकार सचमुच अविद्याजन्य है और आत्मा अविद्या से परे है। इसीलिये वह
नित्य और निर्विकार है। सूर्य को यदि रात्रि नहीं है तो उसके लिये दिन भी कौन-सा है? उसी प्रकार आत्मा को
भी ज्ञान और अज्ञान दोनों ही स्पर्श नहीं करते। आत्मा निर्विकार एवं स्वयंप्रकाश है। वह ज्ञान की और अज्ञान की
स्थिति से अलिप्त है। ऐसी उस स्वरूप की सुलभ प्राप्ति का उपाय श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेया महानुभूतिः सकलानुभूतिः ।
एकोऽद्वितीयो वचसां विरामे येनेषिता वागसवश्चरन्ति ॥ ३५॥

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५७
'एष स्वयंज्योति' का अर्थ यह है कि परमात्मा स्वप्रकाशघन है और साधक भी परमात्मा से अभिन्न होने
के कारण तद्रूप ही है। आत्मा अपने पूर्णत्व से ही परिपूर्ण है; उसे निराली माता, पिता कहाँ से होंगे? इसलिये
आत्मा को जन्म की बात ही नहीं है। त्रिगुणों के तीन प्रकार के मल समूल मिथ्या अर्थात् मायिक हैं। उनका
आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं होता। इसलिये आत्मा निर्मल है। अब उसे 'अप्रमेय' क्यों कहते हैं, यह सुनिये।
उसके सम्बन्ध में कोई प्रमाण नहीं बताया जा सकता। काला, गोरा, साँवला, नीला, सफेद, पीला अथवा यहाँ,
वहाँ, दूर, पास, इन सारे प्रमाणों से अलग ही परमात्मा है। 'महानुभूति' इस पद का अर्थ—आत्मा अखण्ड
दंडायमान अर्थात् सर्वव्यापी, अपने आत्मस्वरूप में ही समसमान तथा सदा-सर्वदा स्वानंदघन है। यहाँ देश, काल
वर्तमान, ध्येय, ध्याता, ध्यान अथवा ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञान; यह भी सच नहीं रहता। नाम, रूप, जाति, गोत्र और
क्रियाकर्म आदि से अलिप्त रहने वाला, उसे जन्म और मरण किसका? आत्मावस्तु सर्वदा स्वानंदपूर्ण ही रहती
है। वहाँ वृद्धि और ह्रास या आदि-मध्य-अन्त का खेल अथवा परिणामादि विकार आदि का भी प्रवेश नहीं
होता। तुम कहोगे कि पहले बताये हुए धर्म इसमें कैसे प्रवेश नहीं करते? तो 'सकलानुभूति' इस पद से
आत्मवस्तु सर्वोपरि अलिप्त है यह बताया गया है ऐसा समझना चाहिये। इस प्रकार धर्म और अधर्म, तथा
प्राणिमात्रों का क्रिया कर्म इनका प्रकाश मैं आत्माराम ही हूँ। श्रेष्ठ परमात्मा इससे भी अलिप्त है। घर के गंगाजल
को अथवा मद्य को आकाश का आवरण रहता है, लेकिन वह दोनों से ही अलिप्त रहता है। इस प्रक्रार परमात्मा
भी ज्ञान-अज्ञान से अलिप्त रहता है। जहाँ ज्ञान-अज्ञान का ही अभाव है, वहाँ कर्माकर्म को कहाँ स्थान है? इसी
का नाम है 'सकलानुभूति' यहाँ स्वानंद के कारण भेदभाव नहीं है। ऐसा परमात्मा परमानंदरूप है। इसमें
सजातीय, विजातीय तथा स्वगत का भेदभाव नहीं है। इस प्रकार आत्मवस्तु शुद्ध होती है, यह प्रसिद्ध ही है यह
आत्मज्ञान से जानना चाहिये। मैं देह हूँ यह कहना 'विजातीय भेद' है। मैं जीव हूँ यह कहना 'सजातीय भेद' है
और मैं ब्रह्म हूँ इस बात का स्फुरण यह 'स्वगत भेद' है। ये तीनों ही भेद परमात्मा को नहीं मालूम हैं। वहाँ युक्ति
प्रयुक्ति लक्षण की आवश्यकता नहीं होती। ब्रह्म परिपूर्ण एवं एक है। ऐसा एक ही अद्वितीय परब्रह्म आत्मगुह्य का
गुह्य है। जो इसे जान ले वह बहुत भाग्यवान है। उसे संसार भ्रम की बाधा नहीं होगी। देह में रहने पर भी उसे
देह की बाधा नहीं होती। उन्हें कर्माचरण भी कमी बाधक नहीं होता और जन्म-मरण की भी बाधा नहीं होती।
ऐसे ज्ञान के बारे में सुनकर यदि तुम उसे स्पष्ट करने को कहो तो उसे करने में वाचा समर्थ नहीं है। शब्दों के
साथ श्रुति भी पीछे हट जाती हैं। जहाँ विवेक सम्पन्न बुद्धि भी प्रवेश नहीं कर सकती, चंचल होने के कारण मन
भी जहाँ पहुँच नहीं पाता, वह परब्रह्म वाणी के अधीन कैसे रह सकता है? अर्थात्, कभी नहीं होगा। शास्त्रों की
व्युत्पत्ति समाप्त हो गयी, दर्शन अभी तक वाद-विवाद ही कर रहे हैं; श्रुति भी 'जहाँ नेति नेति' - न इति
कहकर थक गयी वहाँ वाणी क्या करेगी? वह भी ठहर गयी। जिज्ञासा की उत्कंठा से शब्द ज्ञान ने पहल की।
लेकिन परब्रह्म का एक भी नाम लेने के लिये ज्ञान कम पड़ा। इस प्रकार अच्छी तरह विचार करने पर परादि
वाणी भी उसका उच्चार नहीं कर सकी। इसीलिये यह ब्रह्म परात्पर और क्षर-अक्षर से परे है। वह सदा सभी
अवयवों से शून्य लेकिन अन्त में स्वयं भी शून्य है। शून्य का प्रकाशक चित्स्वरूप परब्रह्म भी एकत्व से परिपूर्ण
है। वहाँ प्रवेश करने के लिये अनेक प्रकार की युक्तियाँ चलायी लेकिन जिस प्रकार सूर्योदय होते ही जुगनूँ
अदृष्य हो जाते हैं उसी प्रकार वे चिदाकाश में लुप्त हो गयी। जुगनूँ यदि सूर्य से गले मिल सकता तो ब्रह्म भी
वाचा के हाथ लग जाता है। आत्मवस्तु के आगे शब्दों का सारा पांडित्य लुप्त हो जाता है। सूर्योदय हो जाने पर
जुगनू जिस प्रकार खोजने पर भी नहीं मिलता उसी तरह आत्मवस्तु जब हाथ में आ जाती है तब शब्दों का

७५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। अँधियारी रात में जो दीपक से काम चलाते हैं, वे सूर्योदय होने पर दीपक को
त्याग देते हैं। उसी प्रकार साधक शाब्दिक ज्ञानयुक्ति से, अनुतापयुक्त अंतःकरण से ब्रह्म का विचार करते हैं,
लेकिन जिन्हें ब्रह्मप्राप्ति हो चुकी है, वे शब्द की उपेक्षा करते हैं। जैसे-जैसे शब्दों का अभिमान बढ़ता है, वैसे-
वैसे ब्रह्मज्ञान दूर भागता जाता है। उद्धव, उसका भी लक्षण बताता हूँ, सुनो। जब वर को कन्या देनी होती है तो
माता, पिता, बन्धु, ज्योतिषी तथा इष्टमित्रों से मिलकर वह कन्या वर को अर्पण करते हैं। किन्तु पति के साथ
एकान्त के समय माता, पिता और रिश्तेदारों की उपस्थिति उसके लिए पति सुख में व्यवधान उपस्थित करती है।
उसी प्रकार योग्यता, चातुर्य, शब्द ज्ञान आदि होने पर ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। जिस प्रकार
आँख में एक कण भी सहन नहीं होता, उसी प्रकार ब्रह्म में भी कल्पना सहन नहीं होती। इसलिये निर्विकल्प
भाव से देखने पर ही शुद्ध ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जब सारे ज्ञान का अन्त और सारे भाषणों का जहाँ विराम
होता है, तभी परब्रह्म की प्राप्ति होती है, ऐसा श्रीकृष्ण ने बताया। जिसका बुद्धि से आकलन नहीं होता, वह मन
को कभी प्राप्त नहीं होता, जो शब्द का विषय ही नहीं है वहाँ प्रमाण के कदम नहीं बढ़ते। इस प्रकार आत्मवस्तु
किसी उपाय से नहीं प्राप्त होती इसलिये वह वस्तु ही नहीं है, ऐसा यदि तुम मन में विचार कर रहे हो, तो उसके
बारे में सुनो। मूल श्लोक का पद—'येनेषिता वागसवश्वशति', अर्थात् देह, इन्द्रिय और प्राण ये जड़मूढ़ और
अचेतन हैं; उन्हें चिद्रूप आत्मा ही चैतन्य प्रदान करतां है। उसका भी लक्षण सुनो। आत्मा के प्रकाश से ही दृष्टि
प्रकाशित होती है लेकिन आत्मा दृष्टि को स्पर्श भी नहीं करता, दृष्टि में भीतर और बाहर आत्मा ही रहता है,
लेकिन वह अदृश्य होने के कारण दिखायी नहीं देता। आत्मा की सत्ता से ही कान श्रवण करते हैं, लेकिन उस
कान को आत्मा स्पर्श नहीं करता। कान के भीतर और बाहर व्याप्त होने पर भी आत्मा श्रवण का विषय नहीं
बनता। आत्मसत्ता से ही वाणी प्रकट होती है लेकिन वाणी के शब्दों को आत्मा स्पर्श नहीं करता। शब्द के आगे-
पीछे आत्मा भरा रहता है लेकिन उस शब्द को आत्मा का अनुभव नहीं होता। आत्मसत्ता से ही मन चपल है;
मन के भीतर और बाहर आत्मा है लेकिन वह मन को बिलकुल स्पर्श नहीं करता। आत्मा को मन नहीं जान
पाता। चैतन्य ही चित्त को जागृत करता है, चित्सत्ता से ही चित्त में चिन्तन उत्पन्न होता है; चित्त के भीतर-बाहर
परिपूर्ण चैतन्य ही रहता है; फिर भी उस चित्त को चैतन्य मालूम नहीं होता। आत्मा के संयोग से 'अहं' उल्हसित
होता है लेकिन उस अहंता को आत्मा कभी स्पर्श नहीं करता। अहंता के अंतर्बाह्य आत्मा रहता है लेकिन वह
अहंकार को दिखायी नहीं देता। आत्मप्रभा के प्रकाश से ही विवेकबुद्धि प्रकाशित होती है; बुद्धि के भीतर और
बाहर आत्मा रहता है लेकिन बुद्धि आत्मा को नहीं पहचानती। आत्मा की प्रभा से ही प्राण चालित होता है, फिर
भी प्राण को आत्मा स्पर्श नहीं करता। प्राण के भीतर-बाहर आत्मा रहता है लेकिन प्राण परमात्मा को नहीं
पहचानता। उद्धव तुम इस प्रकार देखने का प्रयत्न करो। जिसके योग से जड़ व्यवहार कर रहा है, वह आत्मा
स्वतः सिद्ध ही होता है। वह नहीं है, ऐसा कल्पांत में भी नहीं हो सकता। इस प्रकार आत्मा स्वतःसिद्ध है। भेद
में रमण कर अभेद ही रहता है, द्वंद्व प्रकाशित करके भी निर्द्वंद्व रहता है। इस आत्मज्ञान को दृढ़ करना चाहिये।
सारांश आत्मा निर्द्वंद्व और अद्वैत है, वह है या नहीं यह कहने के लिये भी कोई नहीं बचता क्योंकि आत्मा
आत्मस्वरूप से परिपूर्ण है। आत्मा सदा आत्मस्वरूप में ही रहता है, व्यर्थ ही उस पर सांसारिक होने का आरोप
लगा है। इस विषय में श्रीकृष्ण अगले श्लोक में बता रहे हैं।
एतावानात्मसम्मोहो यद् विकल्पस्तु केवले।
आत्मन्नृते स्वमात्मानमवलम्बो न यस्य हि॥ ३६ ॥

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५९
आत्मा नित्यमुक्त है, तीन गुणों से परे है; सर्वदा परिपूर्ण ही रहने के कारण वह आकाश से भी अत्यन्त
अलिप्त रहता है। ब्रह्म अखण्ड दण्डायमान होकर सदा सर्वदा आनन्दघन है। ऐसी अलिप्त वस्तु पर प्रपंच का
आरोप मिथ्या है। उस आरोप का अधिष्ठान भी स्वयं परमात्मा ही है। इसलिये प्रपंच का भान होता है। प्रपंच को
परमात्मा से अलग कोई स्थान ही नहीं है; इसलिये उत्पत्ति, स्थिति और लय का भी वहाँ भास होता है। रस्सी
वाला सर्प रस्सी से अलग नहीं दिखायी देता लेकिन वह रस्सी सर्प नहीं बन जाती, फिर भी वहाँ सर्प का आभास
होता ही है। उसी प्रकार ब्रह्म पूर्व निर्विकल्प है। उसे रूप, नाम, गुण, कर्म आदि स्पर्श भी नहीं करते। फिर भी
मन का भ्रम विषम प्रपंच की कल्पना करता ही है। जिस प्रकार रस्सी में मिथ्या सर्प का आभास होता है, उसी
प्रकार ब्रह्म में संसार का मिथ्या आरोप होता है। अर्थात्, उसमें सुख, दुःख, भय, कम्पन यह प्रयास भी मायिक
ही है। सारांश प्रपंच का भास मिथ्या है, आत्मवस्तु शुद्ध एवं आनन्दमय है। उसी प्रकार ब्रह्म परिपूर्ण एवं अद्वय
है, ऐसा निरूपण से स्पष्ट हुआ है। इस प्रकार अनेक युक्तियों से ब्रह्म की अद्वयता अबाधित रूप से सिद्ध की।
जो पण्डित यह नहीं मानते उनके मत का श्रीकृष्ण खण्डन करते हैं।
यन्नामाकृतिभिर्ग्राह्यं पञ्चवर्णमबाधितम्।
व्यर्थेनाप्यर्थवादोऽयं द्वयं पण्डिमानिनाम्॥ ३७॥
इस प्रकार वेदों द्वारा प्रतिपादित, सभी शास्त्रों का मतिमार्थ जो ब्रह्म है वह सदासर्वदा अद्वय ही रहता है यह
मैंने सिद्ध करके दिखला दिया। मेरे इस मत को पण्डित लोग झटक कर, अपने ज्ञान में अत्यन्त उन्मत्त होकर
अपने पांडित्य के अभिमान में चूर हो जाते हैं। उनका मत है कि जब प्रपंच अनुभव सिद्ध है, तो उसे मिथ्या
मानकर यह अद्वैत कहाँ से निकल आया? अद्वैत को स्थान ही नहीं है, कहीं भी जाकर देखिये, अद्वैत का कोई
निश्चित ठिकाना नहीं है। इसलिये वह सारा झूठ है। ये पण्डित लोग रूप, नाम, गुण, कर्म विषम से पंचमहाभूत
और भौतिक, चातुर्वर्ण्य और चार आश्रम ये सत्य हैं, ऐसा मानते हैं। इन्हें सत्य मानने का कारण यह है कि ये मन
के भ्रम से भ्रमित हुए रहते हैं, ज्ञानाभिमान के कारण फँस जाने के कारण वे अपने आप को ही भूल जाते हैं। वे
विषय के सुख को प्रमुख मानते हैं और उसके लिये उत्कृष्ट पुण्य कमाकर स्वर्ग का भोग अवश्य करना चाहिये
यही सत्य है, ऐसा मानते हैं। विषय को बिलकुल सच मानना यह देहाभिमान का असली मर्म है। उसने संज्ञान
लोगों को अधम बनाकर जन्म-मरण भोगने को बाध्य किया है। पुनः स्वर्ग, पुनः नरक, पुनः गर्भवास, इस प्रकार
पण्डित लोगों के अहंकार ने पठत मूर्ख बना दिया है। उनका ज्ञान वेदबाह्य होने के कारण बिलकुल ग्राह्य नहीं है।
अंत्यजों का अन्न जिस प्रकार अग्राह्य है, उसी प्रकार उनका ज्ञान भी अत्यन्त त्याज्य है। ज्ञानाभिमानी लोगों का
विचार अज्ञान का शुद्ध सार है। उनका जो दृढ़ निश्चय है वह सचमुच महामोह है। उनका विवेक इन्द्रायण फल
जैसा है, ऊपर से देखने में सुन्दर किन्तु भीतर विष से भरा हुआ। प्रपंच नामरूपात्मक है, मायिक होने के कारण
वह मिथ्या है यह बिलकुल सच है किन्तु ज्ञानाभिमानी उसे ही सच मानकर व्यर्थ की कचकच करते रहते हैं।
प्रपंच की रचना को यदि सत्य मानें तो 'मैं देह हूँ' यह बुद्धि माथे पर बैठ जाती है और दारिद्र्य में गिराती है।
उनकी योग्यता देखें तो उनका वेदपठन बिलकुल गायत्रीतुल्य रहता है। सारे शास्त्र, श्रुति, पुराण, इतिहास सब
कुछ उन्हें अवगत रहता है, उत्कृष्ट वक्तृत्त्व और समय-सूचक भाषण करने में पारंगत होने के कारण वह
अहंकार से फूल जाता है। अद्वैत का समाधान उन्हें मालूम नहीं होता फिर भी योग्यता का अहंकार कम नहीं
होता। ऐसे अहंकारी पण्डितों की बात गरीब अज्ञजनों को नहीं सुननी चाहिये क्योंकि देहाभिमान से जिन्हें लूट

७६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
लिया है ऐसे लोगों के सौजन्य से भी अधःपतन होता है। विष खानेवालों की पंक्ति में जो पुरुष अन्न की आशा से
बैठेगा उसे, बिना बुलाये ही मृत्यु का निमंत्रण प्राप्त हो जायेगा। इसलिये ऐसे लोगों की संगत नहीं करनी चाहिये,
उनसे बात भी नहीं करनी चाहिये; उनके घर कभी नहीं जाना चाहिये, जीवभाव से उनका त्याग ही करना
चाहिये। उनके मुँह नहीं लगना चाहिये, उनके मार्ग पर नहीं चलना चाहिये, जो ज्ञान के अभिमान में भूल जाते
हैं, वे अपने हित से वंचित हो जाते हैं। उन्हें अपने घर नहीं जाना चाहिये, स्वयं उनके घर नहीं जाना चाहिये। जो
अभिमान से लुट जाते हैं, उनसे कोई बात नहीं करनी चाहिये। उनसे बाजार में भी नहीं मिलना चाहिये; उन्हें
आँखों से देखना भी नहीं चाहिये; धर्मशील मनुष्य के लिये जिस प्रकार परनिंदा त्याज्य है, उसी प्रकार उसे भी
पूरी तरह त्याज्य समझना चाहिये। वेदशास्त्रों का मतितार्थ अद्वैत परमार्थ जो स्वार्थ सिद्ध करने वाला है, उसे जो
नहीं पसन्द करते हैं, उनके यहाँ अनर्थ विचरता रहता है। इसीलिये उनकी संगत से दूर रहना चाहिये। अब
साधकों के योग का स्वरूप और उसमें आने वाले विघ्नों की निवृत्ति श्रीकृष्ण बताते हैं।
योगिनोऽपक्वयोगस्य युञ्जतः काय उत्थितैः ।
उपसर्गैर्विहन्येत तत्रायं विहितो विधिः ॥ ३८ ॥
योगी योगाभ्यास प्रारम्भ करता है तो उसके पूर्ण होने के बीच अनेक प्रकार के विघ्न उसे कष्ट देते हैं।
शरीर में कोई रोग ही उत्पन्न होता है; अथवा विषय का विकार खलबली मचा देता है; अथवा जल्दीबाजी या
भ्रान्ति के कारण संकट आता है; या विकल्प उत्पन्न होकर ही योग का भंग होता है। अथवा ज्ञान का अहंकार ही
बहुत बढ़ जाता है जिससे दूसरों के गुणदोषों की कुचेष्टा करना यही एकान्त में बात करने का विषय बन जाता
है। कभी देह में शीत बढ़ जाता है या ऊष्मा बढ़ जाती है; प्राणवायु गलत राह पकड़ लेता है या क्षुधा अधिक
बार लगने लगती है। कभी कल्पना का भय तथा प्रकाश दर्शन आदि विघ्न उपस्थित हो जाते हैं अथवा पराया
धन और परस्त्री का चस्का लग जाता है। इस प्रकार के अनेक उपसर्ग आते हैं। उन्हीं के निवारण के लिये
श्रीकृष्ण उपाय बताते हैं।
योगधारणया कांश्चिदासनैर्धारणान्वितैः ।
तपोमन्त्रौषधैः कांश्चिदुपसर्गान् विनिर्दहेत् ॥ ३९ ॥
देह में ठंडक बढ़ने पर, अग्निधारण करने से उसका निवारण होता है; देह में उष्णता बढ़ने पर सोमधारणा
करने से वह दूर होती है। अकस्मात् वायु वाममार्ग पर चला गया हो तो देह में वायु भर लेना चाहिये, वायु में
वायु मिलने पर, अभ्यास से वह पूर्व स्थिति पर आ जाता है। कभी-कभी जब वायु का क्षोभ बढ़ कर उसका
दबाव पेट पर होता है, तब क्षुधा अत्यन्त बढ़ जाती है, कभी खाने से तृप्ति नहीं होती। ऐसे समय प्राणवायु का
उत्सर्ग कर अपानवायु को अन्दर करें। वह जठर की ओर आता है तो क्षुब्ध हुआ प्राणवायु सहज ही उधर ही
आता है। उस समय साधक को प्राण और अपान की एकता सहज ही प्राप्त होती है; फिर षट्चक्र भेद कर
निकलने में क्षणभर का समय भी नहीं लगता। तब साधक को सत्रहवीं को अमृतपान करने का अवसर प्राप्त
होता है। इस प्रकार योगी क्षुधा की बाधा को समाप्त कर देते हैं। अब हे उद्धव! परद्रव्य और परस्त्री पर आसक्ति
होना, पापों का फल है। उसका निवारण करने के लिये तपश्चर्या ही एकमेव साधन है। भक्तिभाव से मंत्रों का
अनुष्ठान करने से वैराग्य उत्पन्न होता है; उस वैराग्य से साधक की विषयवृत्ति का सहज ही निर्दलन होता है।
शुद्ध मंत्रों का पुरश्चरण सभी विघ्नों का नाश करता है। उससे पिशाच बाधा का भी समूल विनाश होता है। शरीर

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७६१
में व्याधि का प्रवेश होने पर दिव्यौषधि उसका संहार करती है; उसी प्रकार मन की व्याधि दूर करने के लिये
निश्चयपूर्वक योग की साधना करें। योगसिद्धि साध्य होने से आधिव्याधि समूल नष्ट हो जाती है। उसी प्रकार
उद्धव! वह योगसिद्धि अन्य भी कई विघ्नों का नाश करती है। ये भिन्न-भिन्न उपाय कितने बतायें ? भक्तिभाव से
मेरा ध्यान करने पर सारे विघ्नों का नाश होता है। उसी का निरूपण श्रीकृष्ण करते हैं।
कांश्चिन्ममानुध्यायेन नाम संकीर्तनादिभिः ।
योगेश्वरानुवृत्त्या वा हन्यादशुभदाञ्छनैः ॥ ४० ॥
उद्धव! मेरा क्षण भर ध्यान करने से ही आधि-व्याधि सहित सारे विघ्न, विकल्प, विकर्म, देहाभिमान तथा
ज्ञानाभिमान आदि सारे भस्म हो जाते हैं। मेरा ध्यान करने की आदत डालने से सभी उपसर्ग धीरे-धीरे भाग जाते
हैं, खोजने से भी विघ्न नहीं दिखायी देता। साधकों के लिये सारी सृष्टि निर्द्वंद्व हो जाती है। सारे विघ्नों का
अभाव होकर विकल्प अपने आप ही नष्ट हो जाते हैं। अब तुम पूछोगे कि आसन लगाकर कब बैठा जाय ? मन
को कब एकाग्र किया जाय ? इतना करके भी जब तुम्हारा ध्यान मन में बसेगा तभी तो विघ्नों की बाधा होगी ?
तो सुनो! मेरा ध्यान भी मन में न बसता हो तो दूसरा आसान उपाय है। वह यही है कि मेरा नामकीर्तन करो।
हरिनाम से भी विघ्नों का नाश होता है। जहाँ नाम की घड़घड़ाहट होती है वहाँ विघ्नों को रास्ता ही नहीं मिल
पाता। मेरे नाम की कीर्ति जिसके मुख में अखण्ड बस्ती करती है, उसे देखकर सारे विघ्न भाग जाते हैं। समस्त
उपसर्गों का नाश हो जाता है। मेरे नाम का गजर महापातकों का संभार भगा देता है। विघ्नों के लिये स्थान ही
नहीं छोड़ता। हरि के नाम में इतना सामर्थ्य है। भूल कर भी मेरा नाम ले लेने से वह समस्त पातकों को भस्म
कर देता है। फिर जहाँ मेरे गुण नाम-कर्म का अखण्ड गायन चल रहा हो वहाँ विघ्नों का स्पर्श भी नहीं होगा।
जिसकी वाणी मेरे नाम की विरुदावली गाती हो, उसके सामने विघ्न उसी प्रकार नहीं आते, जिस प्रकार सूर्य के
सामने अन्धकार नहीं आ पाता। इस लोक में मेरी नामकीर्ति के अलावा जिसका मुँह खाली नहीं रहता, वह जिस
प्रकार पतंगे को अग्नि जलाता है, उसी प्रकार महाविघ्नों को भस्म कर देता है। 'नामकीर्ति' श्रेष्ठ है यह तो
विश्वासपूर्वक स्वीकार है, किन्तु वह नाम मुख में रहे तो कैसे ? उसके लिये क्या करना चाहिये ? यह कहोगे तो
इसके लिये साधु की सेवा करे, संतों की सेवा पर जीव-भाव से भक्ति करें। इससे, वहाँ विघ्नों का प्रवेश नहीं
होता। सद्भावना से सत्संगति करने से उससे मुख में नामकीर्ति बस जाती है और चित्त में विकल्प उत्पन्न नहीं
होता। मुख को हरिनाम की मधुरता तथा मन को संतसेवा की चाह हो तो उसके प्रभाव से कोटि-कोटि विघ्नों का
नाश होता है। साधकों का रक्षक संतसंग यदि निजसखा हो जाय तो वह एक ही क्षण में महाविघ्नों के मुँह तोड़
देता है। साधु का चरणोदक सेवन करने से साधक अत्यन्त शुद्ध हो जाते हैं और उस शुद्धत्व से महादोष निर्मूल
हो जाते हैं। साधु के चरणतीर्थ के पास सारे तीर्थ शुद्धि के लिये आते हैं, इसलिये वह तीर्थ भक्तिभाव से सेवन
करने से सारे विघ्न नष्ट हो जाते हैं। साधुओं की चरणधूलि का वन्दन करने से साधकों का कार्य सिद्ध होता है।
विघ्नों का बीज ही नष्ट होकर उन्हें स्वानंद का अनुभव होता है। भाग्य से यदि संतों की चरणरज मस्तक पर पड़
जाय तो वह कलिकाल को भी लात मारता है फिर विघ्नों की क्या बिसात है ? निर्भय वीर वैसे ही बलशाली
होता है, फिर उसके हाथ में अच्छा सा शस्त्र देकर युद्ध में भेजें और उसकी पीठ थपथपायें तो उस उल्हास से
वह शत्रुओं का भीषण संहार करने लगता है। उसी प्रकार भक्तिभाव से सत्संगति धारण कर मुख में अखण्ड
नामकीर्ति रखें और भावपूर्वक संतों की भक्ति करें तो साधक सहज ही महाविघ्नों का विनाश कर सकते हैं।

७६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कीर्ति, भक्ति और सत्संगति इस त्रिवेणी का जिसे स्नान होता है, उन्हें विघ्न स्पर्श भी नहीं करते, उनके कारण
त्रिभुवन पावन हो उठता है। मेरी भक्ति और नामकीर्ति की सत्संगति माता समान है। वह सत्संग प्राप्त हो जाय तो
साधकों को विघ्नों की बाधा नहीं होती। योग, याग, आसन, ध्यान, तप, मंत्र, औषधि आदि साध्य करने से भी
देहाभिमान नहीं छूटता। लेकिन सत्संग से वह समूल नष्ट हो जाता है। योग आदि समस्त उपायों से छोटे-छोटे
विघ्न दूर हो जाते हैं लेकिन सारे विघ्नों का राजा देहाभिमान उनसे नहीं हिल पाता। देहाभिमान असाध्य है, वह
विद्वत्ता के अहंकार से तो और भी भयंकर हो उठता है। इसका समूल निर्दलन केवल सत्संग ही कर सकता है।
अज्ञानी लोगों का अभिमान तो तत्काल चला जाता है लेकिन ज्ञानाभिमान वैसा नहीं है। वह जानकार के लिये
सदा बाधक होता है। लेकिन सत्संग उस अभिमान का भी पीछा कर उसका अस्तित्व समाप्त कर देता है,
इसलिये सत्संग जैसा अन्य कोई साधन नहीं है। देह को ही अजर-अमर करने की कोई बात करता है तो उस
मूर्ख के चक्कर में पड़कर लोग योगादि साधन को सिद्ध करने के फेर में पड़ जाते हैं।
केचिद् देहमिमं धीराः सुकल्पं वयसि स्थिरम्।
विधाय विविधोपायैरथ युञ्जन्ति सिद्धये ॥ ४१ ॥
देह प्रारब्ध के वश में है; उसे प्रारब्ध से ही जन्म और मरण आता है। उस देह को पामर अमर करने का
प्रयत्न करते हैं। उस प्रारब्ध का सूत्र काल के हाथ में रहता है इसलिये काल द्वारा निर्धारित जन्म और मरण
सबके पीछे लगा ही रहता है। मार्कण्डेय को चौदह कल्प की आयु थी, फिर भी काल ने उसे दबोचा ही;
लोमहर्ष का एक-एक केश एक-एक युग में झरता था, उसका गला भी काल ने दबा ही दिया। चार-हजार युगों
का एक दिन ऐसी जिस ब्रह्मदेव ने कालगणना कर दी है वह सारी सृष्टि का कर्त्ता ब्रह्मदेव, वह भी काल की
सत्ता से नहीं बच पाता। उत्पत्तिकर्ता ब्रह्मदेव को काल निगल लेता है, उसी प्रकार पालनकर्ता विष्णु को भी वह
ग्रस लेता है, वह प्रलयकर्त्ता रुद्र को भी अपने सामर्थ्य से भस्म कर देता है। इस प्रकार काल अत्यन्त असाध्य है,
लेकिन यह जाने बिना अविचारी लोग देह को अजर-अमर करने के लिये काल पर ही प्रभाव जमाने का प्रयास
करते हैं। जो-जो दिखायी देता है, वह सब नष्ट होता है। काल की यह सत्ता देखकर भी मूर्ख लोग अजर-अमर
होने के लिये कितना प्रयास करते हैं। जलकुण्ड का तरंग अमर होने की इच्छा करता है तभी जलकुण्ड सूख
जाता है। उसी प्रकार यह संसार नाशवान है; उसमें पामर लोग देह को अजर-अमर करने की इच्छा करते हैं और
उसके लिये अथक प्रयास करते हैं। देह जाता है तो उसे जाने दें किन्तु जीव चिरंजीव रहे और उसके लिये प्रयास
करें, उसी में नरदेह का अमरत्त्व है। देह तो पूरी तरह नाशवान है; अविवेकी लोग उसे अनेक कष्टकारी उपायों
से अजर-अमर करने का प्रयत्न करते हैं। देह तो काल का एक खाद्य है, उसे अमर करने का उपाय साधक के
लिये हानिकारक होता है। सारांश, मूर्खतावश, देह के अमरत्व के लिये उपाय कर हठयोगी ठगे गये हैं। परकाया
प्रवेश साधने के लिये प्राण धारण करते-करते योगी थक गये हैं। सारांश, देहाभिमान के कारण ही योगी लोग
अपनी हानि कर चुके हैं। देह की नश्वरता को जान कर ही ज्ञानी लोग देहाभिमान नहीं करते। श्रीकृष्ण उसी का
निरूपण कर रहे हैं।
नहि तत् कुशलादृत्यं तदायासो ह्यपार्थकः।
अन्तवत्त्वाच्छरीरस्य फलस्येव वनस्पतेः ॥ ४२ ॥
विचार करने से मालूम होता है कि यह संसार समूल नश्वर है; इसलिये ज्ञानी लोग देह के अजर-अमर

अट्टाईसवाँ अध्याय ७६३
होने की ओर ध्यान नहीं देते क्योंकि देह को प्राप्त होने वाली सिद्धि सचमुच बाधक ही है। ज्वर से शरीर तप्त
होने पर, वह मृत्यु के भय से काँपने लगता है; लेकिन शीतोपचार करने पर भी उसे मृत्यु आती है। मिथ्या देह
का अभिमान ही हमेशा जन्म-मरण का भोग कराता है; ऐसे देह को अजर-अमर करने से देह बंधन और भी
कस जाता है। योगसाधन से देहबन्धन दृढ़ करने पर तथा देह की सिद्धि भोगने पर भी अधःपतन नहीं टलता।
ज्ञान के ही लिये क्यों न हो, लेकिन योग साधन करते हुए यदि सिद्धि समय पर आ जाय तो अपने कल्याण के
लिये उसका भी त्याग करना चाहिये जिसका राजा के पास आना-जाना रहता है उसी को रिश्वत मिलती है
लेकिन उसके कारण ही उसका अपमान होता है। उसी प्रकार साधक की सिद्धियाँ उसके लिये घातक होती हैं।
वृक्ष पर फल आते हैं लेकिन वृक्ष उन्हें नहीं छूता। उसी प्रकार सिद्धि प्राप्त होने पर भी उन्हें वैराग्य बल से छोड़
देना चाहिये। सूखे वैराग्यबल से त्याग करने पर वह स्थायी नहीं होता। विवेकयुक्त वैराग्य से त्याग करने पर
सिद्धियाँ तृणवत हो जाती हैं। अन्धा हाथी जब मदमस्त हो जाता है तो उसे अपना पतन नहीं दिखायी देता। उसी
प्रकार जो अविवेक से त्याग करते हैं, उनका अधःपतन होता है। जब देह ही नश्वर है तो उससे प्राप्त सिद्धि
कितनी शाश्वत होंगी ? ऐसे विवेक से जो वैराग्य सम्पन्न रहते हैं, वही देह के भोग से अलिप्त रहते हैं। यहाँ देह
जितना अनित्य है वहीं आत्मा सत्य और नित्य है। यह जानकर ही विवेकी लोग आत्माभ्यास के लिये तैयार हो
जाते हैं।
योगं निषेवतो नित्यंकायश्चेत् कल्पतामियात् ।
तच्छ्रद्दध्यान्न मतिमान् योगमुत्सृज्य मत्परः ॥ ४३ ॥
परमार्थ के लिये योगसाधन करते समय यदि सिद्धि प्राप्त हो जाए तो अपने हित के लिये उन्हें छोड़ देना
चाहिये। लेकिन सिद्धि छोड़ने पर भी नहीं छूटती प्रारब्ध के बल से गले पड़ जाती हैं। यदि ऐसा हो जाय तो
योगाभ्यास छोड़कर मेरे भजनमार्ग पर लग जाएँ। मेरे भक्ति मार्ग में विघ्नों का प्रवेश नहीं होता क्योंकि मैं श्रीरंग
भक्त के प्रेमरंग में रंग जाता हूँ। सद्भाव से मेरी भक्ति करने से विघ्न कभी नहीं आते क्योंकि मैं श्रीकृष्ण रात-
दिन भक्तों के साथ रह कर उनका संरक्षण करता हूँ। ऐसी भक्ति की महिमा का वर्णन श्रीकृष्ण करते हैं।
योगचर्यामिमां योगी विचरन् मदपाश्रयः ।
नान्तरायैर्विहन्येत निःस्पृहं स्वसुखानुभूः ॥ ४४ ॥
जो अनन्यप्रीति से मेरी शरण में आते हैं, समस्त प्राणिमात्र में मेरी ही भावना रखते हैं और अभेद बुद्धि से
मेरा भजन करते हैं उन्हें विघ्नों की बाधा बिलकुल नहीं होती। मेरे भक्तों के सारे उपसर्ग मैं श्रीकृष्ण निवारण
करता हूँ। जिसे अनन्य भजनयोग है ऐसे भक्त को मैं अपना अंग ही बस्ती के लिये देता हूँ। मेरे भक्तों की ओर
विघ्न आने लगते हैं तो मैं वहाँ कूद पड़ता हूँ। मेरे भक्तों का संकट मैं निवारण करता हूँ क्योंकि वे मेरे लाडले हैं।
वे कितने लाडले हैं, उसके बारे में सुनो। उनके संकट मैं निरन्तर सहन करता हूँ। राजा हिरण्यकश्यपु प्रह्लाद को
यातना दे रहा था उस समय मैंने उसकी पूरी तरह सुरक्षा की। अम्बरीष पर संकट आया तो मैंने दुर्वासा का
अपमान किया। उसके दसों गर्भवास मैंने झेले लेकिन भक्तों को कमी नहीं होने दी। गजेन्द्र को पीड़ा हुई तो मैं
हाथ में सुदर्शन लेकर, कूद कर उसके पास पहुँचा और क्षण भर में उसे छुड़ाया। कौरव सभा में द्रौपदी के
असाध्य संकट में, दुष्ट लोग उसे नग्न करने लगे, उस समय मैंने उसे वस्त्रों का ढेर उपलब्ध कराकर उसे उस
संकट से बचाया। यदि द्रौपदी के हाथ में साड़ी देता तो उसे पहनते समय वह नग्न दिखाई देती इसलिये मैं स्वयं

ही उसकी साड़ी बन गया। जब दावाग्नि ने गोपालों को पीड़ा दी तो मैंने अपने मुँह से ही वे ज्वालायें निगल लीं।
उद्धव ! अपने भक्तों के प्रति मेरे मन में अत्यधिक करुणा रहती है। अश्वत्थामा के शस्त्र की पीड़ा से मैंने परीक्षित
की गर्भ में रक्षा की। इन्द्र ने गोकुल को त्रस्त किया तब मैंने गोवर्धन को हाथ पर उठा लिया। अर्जुन को बचाने
के लिये मैंने दिन में ही सूर्य को छिपा दिया। रणभूमि पर हार ले जाकर मैंने ही भीष्म को सत्यप्रतिज्ञ किया।
भक्तों का ऐसा सहायक सिर पर हो तो उन्हें विघ्न कौन करेगा ? मैं श्रीहरि उनका रक्षक हूँ। जो मेरी भक्ति का
अनुसरण करते हैं, उन भक्तों पर मैं कभी विघ्न नहीं आने देता। मैं अपना देह उन्हें अर्पण कर उन्हें निजस्वरूप
में परमानन्द में रखता हूँ। सद्भाव से मेरी भक्ति करने पर साधकों को आत्मसुख का लाभ होता है। तब वासना
के साथ ही काम और लोभ लोप हो जाता है और भक्तों को मेरा सुख प्राप्त होता है। तुम कहोगे, देह के अन्त में
भक्त को आत्मसुख की प्राप्ति होगी लेकिन मेरी चौथी भक्ति वैसी नहीं है। इसके योग से देह में रहते हुए ही
आत्मसुख की प्राप्ति होती है। देह रहे या जाये, उस सुख का कभी भी अभाव नहीं रहता। इस प्रकार मेरे भक्त
सुखपूर्वक आत्मसुख का भोग करते रहते हैं। भक्त देह में विचर रहे हैं ऐसा लगता है, लेकिन वे मुझमें ही
विचरते रहते हैं। मैं सदा सर्वदा उनके हृदय में ही वास करता हूँ। भक्त आत्मज्ञान से मुझमें और मैं निजांग से
उनके भीतर और बाहर रहता हूँ। इस प्रकार आत्मसुख के बीच वाले घर में हम दोनों परस्पर विचरण करते रहते
हैं। मैं देव और वह भक्त यह तो बाहर कहने की बात है। गूढ़ दृष्टि से विचार करें तो मैं और भक्त दोनों एक हैं।
घी पिघला हुआ हो या जमा हो। उसी प्रकार मैं और भक्त दोनों एक हैं। मुझमें और भक्त में कल्पांत में भी
भेदभाव नहीं है। तब मैं और वह एक हैं, यह कहनेवाला भी कोई नहीं रहता। इस प्रकार भक्त मत्स्वरूप से
मिलकर आत्मानंद प्राप्त करते हैं। ऐसा यह अट्ठाईसवाँ अध्याय ब्रह्मज्ञान का कलश है। श्रीकृष्ण कुशल कारीगर
है, उसने मन्दिर पर यह कलश चढ़ाया। अलंकारों में जिस प्रकार 'मुकुटमणि' रहता है, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान का
यह अट्ठाईसवाँ अध्याय है। श्रीकृष्ण भक्तों की माता होने के कारण उसने उद्धव का श्रृंगार किया। उत्तम से उत्तम
अलंकार पहना कर जिस प्रकार माँ अपने मुन्ने का शृंगार करती है, उसी प्रकार उत्तम से उत्तम ज्ञाननिर्णय से
उद्धव का शृंगार किया। माँ अपने बच्चे को अलंकार पहनाती है और बाद में उन्हें उतार लेती है किन्तु श्रीकृष्ण ने
एक बार उद्धव का श्रृंगार किया तो वह शृंगार-शरीर से निकल ही नहीं पाया। शरीर पर वह अमूल्य अलंकार
स्थायी हो गया, इसमें उद्धव अनमोल हो गया। सारा त्रैलोक्य उसके पैरों पर गिरने लगा और ब्रह्मदेव आदि
देवतागण भी उसकी पूजा करने लगे। श्रीकृष्ण ने स्वस्वरूपालंकार से उद्धव का श्रृंगार किया था इसलिये वह
ब्रह्मस्थिति तक पहुँच गया, इसीलिए वह त्रिभुवन में वन्दनीय हो गया और पुराण में भी महाकवि उसका वर्णन
करने लगे। माधुर्य में अमृत श्रेष्ठ है, उसे भी फीका बना कर श्रीकृष्ण ने उद्धव को परमामृत पिलाया। देव
अमृतपान करते हैं लेकिन वे भी मृत्युरूपी संसार में डूबते ही हैं। श्रीकृष्ण ने उद्धव को कथामृत से तृप्त कर
अक्षय बना दिया। वह सर्वांग से शान्त हुआ, परमानन्द से तृप्त हुआ; इस प्रकार मैं उद्धव हूँ इसका भान ही वह
भूल गया और स्वानंद से डोलने लगा। फिर परमानन्द के उन्माद में वह जहाँ भी 'दूजा' देखता उसे मार कर
गिरा देता। इस प्रकार संसार को लात से ठुकरा कर वह देवताओं के मस्तक पर चढ़ गया। देवताओं के माथे पर
चढ़कर उनका देवत्व भी भक्तों का भक्तपन भी उसने निगल लिया और फिर सच्चिदानन्द के स्वानंद से स्वयं ही
आत्मस्वरूप बन गया। वहाँ सत्, चित् और आनन्द का त्रिविध भेद भी नहीं रहा। सदैव परमानन्द और आनन्द
ही भर गया। नश्वर का त्याग करते समय अविनाश को 'सत्' कहते हैं, जड़ की निवृत्ति करते समय वस्तु को
'चित्' कहते हैं और जहाँ दुःख की बाधा नहीं है उसे 'आनन्द' कहते हैं। इस प्रकार 'सच्चिदानन्द' शब्द की