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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 769, कुल 869 में से

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पृष्ठ 769

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५३
अपने योगाभ्यास के सामर्थ्य से विघ्नादि दोषों को समूल जला देता है। किन्तु कर्म के कर्मठ जाल को योगी स्पर्श
भी नहीं करता। योग में विघ्न आकर उसमें योगी यदि मर भी जाता है तो भी अगले जन्म में वह कर्माधीन नहीं
होता। यही बात श्रीकृष्ण ने स्वयं श्लोकार्ध में बतायी। योगसाधना करते प्रारब्ध से उसमें विघ्न आकर योगी यदि
मर जाए तो उसमें क्या हानि है ? विघ्न आने के कारण उसे पुनः जन्म लेना पड़ता है, बस इतना ही। लेकिन इस
जन्म में भी वह कर्म के जाल में नहीं फँसता। पूर्वाभ्यास के योग से वह योगी पुनः नये सिरे से पहले के अभ्यास
में लग जाता है। प्रवासी को यदि मार्ग में कोई संकट आता है तो वह बीच में ही कहीं मुकाम कर लेता है और
दूसरे दिन पुनः उसी मार्ग पर लग जाता है। इस प्रकार योगी स्वयं ही प्रारब्ध के पूर्व संसार के योग से अपना
योगाभ्यास पूरा करने लगता है किन्तु कभी भी कर्म के अधीन नहीं होता। साधनों में यदि मेरी भक्ति है तो
अणुमात्र भी विघ्न नहीं आयेगा क्योंकि मैं भक्तों का पक्षधर श्रीपति दिन-रात अपने भक्तों का संरक्षण करता रहता
हूँ। जहाँ मेरी भक्ति की चाह है, वहाँ बेचारे विघ्न क्या करेंगे ? उद्धव ! मेरा केवल नाम ही करोड़ों महा विघ्नों का
नाश कर सकता है। भजन न करने वाले महायोगी, अभ्यास में विघ्न आने पर दूसरा जन्म लेते हैं, लेकिन वे भी
पूर्व संस्कार से कर्म में उलझे नहीं रहते। जो जीवन्मुक्त हो जाते हैं, वे भी प्रारब्ध के ही अनुसार व्यवहार करते
हैं; फिर योगभ्रष्ट पुरुष कर्मों का त्याग कैसे कर सकते हैं ? उसका कारण भी सुनो। मुक्त का जो मोक्ष का लक्षण
है वही साधक का मुख्य साधन रहता है, इसलिये उन दोनों को ही कर्मों का बन्धन बाधक नहीं होता। मैं कर्म
कर्त्ता हूँ ऐसा अहंकार जिसे नहीं होता, उसे भी कभी कर्मबन्धन का स्पर्श नहीं होता।
करोति कर्म क्रियते च जन्तुः केनाप्यसौ चोदित आनिपातात् ।
न तत्र विद्वान् प्रकृतौ स्थितोऽपि निवृत्ततृष्णः स्वसुखानुभूत्या ॥ ३० ॥
जन्म से मृत्यु तक प्राणी जो भी कर्म करता है, वह सब 'प्रारब्ध कर्म' के रूप में कोई अपनी सत्ता से
कराता है। उनमें सज्ञान और अज्ञान दोनों ही प्रारब्ध कर्म के अनुसार कर्म के ही अधीन रहते हैं; परन्तु अज्ञानी
को 'मैं कर्त्ता' इस बात का अहंकार रहता है और ज्ञाता कर्म में निरभिमान होकर रहते हैं। अब तुम कहोगे कि
देह में प्राण होते हुए देहाभिमान हुए बिना कैसे रहेगा ? तो ज्ञाता आत्मसुखानुभव से पूर्ण होने के कारण उसे
अहंकार का स्फुरण ही नहीं होता। रस्सी के साँप का भय रस्सी है यह देखकर जब बाधा समाप्त हो जाती है,
उसी प्रकार ब्रह्मसुख का अनुभव प्राप्त होने के बाद बाधा करनेवाली अहंता का स्फुरण नहीं होता। अब योगकष्ट
का लक्षण सुनो। उसका प्राचीन संस्कार, उसका योग पूरी तरह सिद्ध हो इसलिये उसमें देहाभिमान उत्पन्न ही
नहीं होने देता। जो देह में नित्य अभिमानरहित रहते हैं, वही ब्रह्मसुख से सदा सम्पन्न रहते हैं, उन्हें देह का
कर्माचरण कभी बाधक नहीं होता। ज्ञाता देहकर्म से अलिप्त रहता है, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। वह देहातीत
ही रहता है। यही बात श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
तिष्ठन्तमासीनमुत व्रजन्तं शयानमुक्षन्तमदन्तमन्नम् ।
स्वभावमन्यत् किमपीहमानमात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद ॥ ३१ ॥
देह खड़ा रहता है लेकिन ज्ञाता को खड़े रहने का अनुभव नहीं होता; फिर देह के बैठने पर उसके बैठने
को कौन स्वीकार करेगा ? परिपूर्ण ब्रह्म में उठना और बैठना ये दोनों ही नहीं है और ज्ञाता तो ब्रह्म ही हुआ रहता
है, इसलिये उठने या बैठने का उसे अनुभव नहीं होता। देह यह दैवयोग के अनुसार एकदेशी होता है किन्तु
अपने को सर्वत्र देखता है। देह परदेश जाने लगता है तो ज्ञाता उसमें अपने गमन का विचार नहीं करता क्योंकि