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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 770, कुल 869 में से

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पृष्ठ 770

७५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
परब्रह्म स्वरूप से परिपूर्ण है; उसका आना-जाना कैसा? ज्ञाता सदा तद्रूप ही रहने के कारण उसे रहने या जाने
का भाव स्पर्श नहीं करता। ज्ञाता स्वयं शयन करने जाता है लेकिन वह भूमि पर की शैय्या नहीं देखता। इतना ही
नहीं, अपितु मैं सोया हूं यह भी वह नहीं मानता। वह सदासर्वदा स्वरूप में ही निमग्न रहता है। ज्ञाता
प्रसन्नतापूर्वक भोजन करने बैठता है; लेकिन मैं भूखा हूँ इसका भी उसे स्मरण नहीं रहता। रसना के जाने बिना
वह सारे रस चखता है। ऐसी आत्मसुख की मधुरता में ही वह भोजन करता है। वह पर्याप्त भोजन कर चुका है
ऐसा लगता है लेकिन न वह तृप्त ही रहता है और न क्षुधित ही रहता है, वह खाना झूठा भी नहीं करता और भरे
संसार से उठ जाता है। वह भले ही सहज बात करता है लेकिन उसकी बातों में अनकही ही अधिक रहती है।
उस बातचीत में भले ही रसमय माधुर्य उत्पन्न होता हो लेकिन उसकी मौन की गाँठ ढीली नहीं होती। मैं एक
बहुत अच्छा और चतुर वार्ताकार हूँ, इसका अभिमान भी उसमें उत्पन्न नहीं होता। निरर्थक बात करना तो उसे
आता ही नहीं। ठीक तरह बात करने पर भी वह न बोलने की तरह की रहता है। ज्ञाता सृष्टि की ओर आत्मसुख
से देखता है; 'मेरा' और 'तुम्हारा' यह भी समझता है लेकिन वह आँखों से देखता ही नहीं है। सारे त्रैलोक्य को
वह अपनी ही तरह समझता है। वह जिस दृश्य को देखने जाता है उस दृश्य का ठिकाना ही अदृश्य हो जाता है।
वह जो कुछ भी देखता है वह सब उसे अपने जैसा ही दिखायी देता है क्योंकि वह सारी सृष्टि को स्वयं
ऐक्यरूप से ही देखता है। आँखों का अंत कर ही ज्ञाता दर्शन रूप से देखता है, लेकिन उस देखने का सच्चा अर्थ
वेदशास्त्र भी नहीं समझ सकेंगे। वह शब्दों का शब्दज्ञान जानता है, किन्तु 'मैं श्रोता' हूँ इस बात का उसे स्मरण
ही नहीं होता। वह देह के कान की उपेक्षा कर सर्वांग से श्रवण करता रहता है। इस प्रकार वह स्वयं संज्ञान
होकर जागृत रहता है। शब्दज्ञान को छील कर उसमें का स्वाभाविक अर्थ वह ग्रहण करता रहता है। वह घ्राण से
सुगन्ध और दुर्गन्ध पहचानता है लेकिन उसका भोग करते समय वह नाक की अपेक्षा नहीं करता। पुष्प के
अंतर्बाह्य सुगन्ध का आस्वाद वह सदा लेता रहता है। त्वचा से वह मृदु-कठोर आदि स्पर्श को जानता है; किन्तु
'मैं जानता हूँ' इस बात का उसे स्फुरण नहीं होता। जिसका अंग से स्पर्श हो उसे निजांगरुप करना, इस प्रकार
का स्पर्श ज्ञाता अनुभव करते रहते हैं, ज्ञाता चरणों से चलता रहता है, लेकिन चलते समय भी वह अचरणीय
होता है। वह भले ही स्वेच्छा से पृथ्वी पर विचरण कर रहा हो लेकिन वह अपने स्थान से हिलता भी नहीं है।
वह अपने हाथ से दान देता है लेकिन तब भी 'मैं दाता हूँ' इस बात का उसे स्मरण नहीं होता। दिया हुआ और
लिया हुआ दान वह स्वयं ही हो जाता है। उसी प्रकार ज्ञाता हाथों की हलचल करता है। कायिक, वाचिक और
मानसिक कर्म स्वाभाविक रूप से ही होता रहता है किन्तु ज्ञाता ब्रह्मरूप से निर्दोष ही रहता है। वह देह का स्पर्श
ही नहीं करता। ज्ञाता अकर्ता होता है तथा आत्मसत्ता से सारे कर्मों में विचरण करता रहता है। निरन्तर आत्मबोध
में स्वस्वरूप में ही रहने के कारण वह कर्म, क्रिया अथवा कर्तव्यता को नहीं देखता। ज्ञाता नित्य आत्मसुख में
ही रहने के कारण वह देह में होते हुए भी देह की ओर नहीं देखता। परमात्मसुख में ही सन्तुष्ट रहने के कारण
वह देहकर्म में कैसे फँसेगा ? सारे संसार को कर्मबन्धन लगा हुआ है। ऐसा होते हुए खाने-पीने वाले ज्ञाता को
कर्मबन्धन क्यों नहीं होता। उसी का निरूपण श्रीहरि करते हैं।
यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं नानानुमानेन विरुद्धमन्यत्।
न मन्यते वस्तुतया मनीषी स्वप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम्॥ ३२॥
लोकरीति के अनुसार ज्ञाता भी लोकाचार से चलता रहता है। वह भी प्रपंच के लौकिक कर्म करता ही