श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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'वह आत्मस्वरूप मैं बना' यह कहना भी लज्जा स्पद है क्योंकि वह आत्मरूप ब्रह्मत्व से स्वयंभू होने के कारण
होना या न होना यह कहना केवल भ्रम है। रस्सी के मिथ्या सर्पाकार का आभास होने पर भी वह रस्सी ही रहती
है और सर्प का आभास समाप्त होने पर भी रस्सी ही रहती है। उसी प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति के समय आत्मा
जन्म नहीं लेता; अथवा सृष्टि का पालन-पोषण होते समय उसमें वृद्धि नहीं होती। सृष्टि का प्रलय होने पर
आत्मा को उसकी खबर भी नहीं होती। उत्पत्ति, स्थिति और लय इन तीनों स्थितियों में आत्मा वास्तव में
अविकारी ही रहता है। इसी साधन से ज्ञान साध्य कर साधक संज्ञान होते हैं और वे स्वयं अबाधित होकर पूर्ण
ब्रह्म होकर रहते हैं। साधक अज, अव्यय और आनन्दपूर्ण ब्रह्म हो जाते हैं। उद्धव ! यही सब ज्ञान का फल है,
यह जान लो। ज्ञान का यह फल प्राप्त होते ही उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होने पर भी आत्मस्वरूप अखण्ड और
परिपूर्ण ही रहता है। यही बात श्रीकृष्ण दृष्टांत के साथ बताते हैं।
यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य ।
तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥ १९॥
मुकुट, कुण्डल, कंकण आदि न बनाने पर भी सुवर्ण सोने के ही रूप में रहता है और बनाने पर भी उसमें
किसी प्रकार की कमी नहीं आती। उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और लय इनके योग से मेरा चित्त अविनाशी ही
रहता है। मेरा स्वरूप शुद्ध परब्रह्म है उसमें नाना प्रकार के रूप और नामों का आभास होने से संसार विषम
दिखाई देने पर भी ब्रह्म सर्वत्र सम ही है। सूर्य के किरण जिस प्रकार सूर्य से अलग नहीं होते, उसी प्रकार यह
संसार भी मुझसे भिन्न नहीं है। वही निरूपण श्रीकृष्ण बताते हैं।
विज्ञानमेतत्त्रियवस्थमङ्ग गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ ।
समन्वयेन व्यतिरेकतश्च येनैव तुर्येण तदेव सत्यम् ॥ २० ॥
सत्त्वगुण से जागृति, रजोगुण से स्वप्न और तमोगुण से गहरी, मूढ सुषुप्ति होती है। इस प्रकार मन तीन
अवस्थायुक्त है। कार्य, कर्त्तृत्व और कारण इन तीन से तीन प्रकार के संसार का भास होता है किन्तु ब्रह्म सदा से
सम ही है। मिट्टी के बिना घट नहीं होता, तन्तु के बिना वस्त्र नहीं बनता; उसी प्रकार मुझसे संसार भिन्न नहीं
है। जो-जो दिखायी देता है, वह मेरा ही स्वरूप है। मैं जो तीनों गुणों को स्पर्श नहीं करता, तीनों अवस्थाओं में
दिखायी नहीं देता और तीनों अवस्थाओं को प्रकाशित करता हूँ, वह मैं चौथा 'तुरीय' हूँ यह जान लो। तीनों
अवस्थाएँ, तीनों गुण, दृश्य, द्रष्टा और दर्शन यह त्रिपुटी पूर्ण रूप से प्रकाशित करने वाला मैं चौथा 'तुरीय' हूँ।
ऐसा तुरीय सच्चिद्घन मैं, अवस्था गुण न होते हुए भी जिस प्रकार आकाश में नीलेपन का भास होता है, उसी
प्रकार मुझमें अवस्थाओं का आभास होता है। (आशंका) तीनों अवस्थाओं का ज्ञान सबमें दिखायी पड़ता है
किन्तु हे श्रीकृष्ण ! चौथा 'तुरीय' ज्ञान के बारे में कुछ ज्ञात नहीं है। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं, चौथा ज्ञान अर्थात्
तुरीयावस्था का विचार न कर, वह मिथ्या ही है ऐसा सोचोगे तो उसका स्पष्टीकरण सुनो। (व्यतिरेकतथ्य)
देहादिक प्रपंच का व्यतिरेक, अर्थात् भूतों में ही होने वाले भूतों के लय को देखने पर गुणावस्था भी उसी में लीन
होकर, मैं चौथा 'तुरीय' शेष रहता हूँ। इस सम्बन्ध में कुछ बोलते समय वेदों को तो मौन ही रहना पड़ता है। यह
वास्तव में अनुभव से ही जानने की पीड़ा है, यहाँ शब्द पांडित्य काम नहीं आता। यहाँ युक्ति-प्रयुक्ति नहीं
चलती, ज्ञान की व्युत्पत्ति अथवा लक्ष्य-लक्षण स्थिति नहीं चलती, केवल गुरुकृपा से ही 'तुरीय' की प्राप्ति होती
है। जागृत्यादि सारी सत्ता; अथवा सुषुप्ति में साक्षी रूप में रहने वाला वह चौथा 'तुरीय' मैं हूँ यह जान लो। वही