श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अनेक प्रकार के साधनों का प्रयोग कर जो विषय का त्याग करते हैं उन्हें ऐसा करने में अत्यन्त दुःख होता है
लेकिन मेरे भक्त अपने विषय भगवान को ही अर्पण करते हैं इसलिये वे नित्यमुक्त होते हैं। हर ग्रास पर हरि का
स्मरण करने से वह अन्न पूर्णरूप से परब्रह्म हो जाता है। उसकी बाधकता नष्ट होकर वह अपने ही आप ब्रह्मार्पण
होता रहता है। भक्तों की भजन करने की रीति कुछ ऐसी होती है कि वे विषय में भी मेरे ही स्वरूप की भावना
रखते हैं, जिससे विषय की स्फूर्ति मुरझा जाती है और वह बाधक नहीं होते। इस रीति से मेरा भजन करने से
मन का मैल साफ हो जाता है और विकार सहित तीनों गुण और देहाभिमान नष्ट हो जाता है। इस प्रकार जो मेरी
भक्ति नहीं करते, अहंकार नहीं छोड़ते, विषय की आसक्ति करते हैं वही वास्तव में बाधक होती है।
अकर्तात्मबोध पूरी तरह अंकित हुए बिना विषय का सम्बन्ध नहीं करना चाहिये क्योंकि विषयों की विषयरूप में
निहित जागरूकता अत्यन्त अमंगल और बाधक है। विषय यद्यपि मिथ्या और मायिक हैं फिर भी साधकों को वे
बाधक होते हैं। इसी विषय को श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
यथाऽऽमयोऽसाधुचिकित्सितो नृणां पुनः पुनः संतुदति प्ररोहन्।
एवं मनोऽपक्वषायकर्म कुयोगिनं विध्यति सर्वसङ्गम्॥२८॥
जिस वैद्य को रोग का निदान नहीं है, धातु पुष्ट है या क्षीण है यह समझ में नहीं आता, पथ्य और अनुपान
का भी ज्ञान नहीं है और नाड़ी ज्ञान भी नहीं है, ऐसे वैद्य से दवा लेने से रोग और भी अधिक बढ़ जाएगा। उसी
प्रकार वैराग्य हुए बिना विषय का त्याग करने से साधक को वह अपार बाधक सिद्ध होता है। अंतःकरण में
विषय के प्रति घृणा नहीं है और ऊपरी त्याग से विरक्ति का भाव प्रदर्शित करता है, ऐसी पाखण्डी वृत्ति को
'कुयोग' समझना चाहिये। भगवद्भजन छोड़ तथा वेदविधि का मार्ग छोड़कर त्याग करना इसी का नाम है
'कुयोग'। कनककांता विषयों की आसक्ति और मन में दृढ़तर वासना के कायम रहते हुए बाह्य तौर पर झूठी
विरक्ति दिखाने का नाम है 'कुयोग'। स्वयं को बहुत बड़ा राजयोगी समझना और पर्याप्त विषय सेवन करना इसी
का नाम उत्तम 'कुयोग' है। अपनी विषयासक्ति को छिपाकर बाहर से विरक्ति का प्रदर्शन करना, यही 'कुयोग'
का लक्षण है, उद्धव! ऐसे कुयोगी बार-बार जन्म लेकर और पुनः-पुनः मर कर दुःख के भँवर में गोते लगाते
रहते हैं। उन्हें कौन छुड़ाएगा? न इहलोक का विषयभोग ही पूर्ण हुआ और न परमार्थ के लिये आवश्यक त्याग
ही हुआ है। दोनों से वंचित होने के कारण कुयोगी के भाग्य में दुःख ही आता है। परमार्थ के लिये विषय त्याग
का साधन करते हुए उन्हें भले ही रुकावट या विघ्न आयें, फिर भी जिन्हें पूर्ण अनुताप हुआ रहताहै उन्हें दुर्गति
नहीं प्राप्त होती, यह ध्यान में रखो।
कुयोगिनो ये विहतान्तरायैर्मनुष्यभूतैस्त्रिदशोपसृष्टैः।
ते प्राक्तनाभ्यासबलेन भूयो युञ्जन्ति योगं न तुकर्मतन्त्रम्॥२९॥
साधक ब्रह्मज्ञान के लिये विषय का त्याग करे और ठीक से अभ्यास करने लगे तो बीच में ही कोई विघ्न
उपस्थित हो जाता है; साधकों के मार्ग में अनेक विघ्न आते हैं। काम की ही इच्छा प्रबल हो उठती है; संताप
बढ़कर खलबली मचा देता है; शिष्य और सगे-सम्बन्धियों का उपसर्ग होता है और मन में स्वहित के प्रति ही
ऊब उत्पन्न होती है। स्त्री के रूप में देवता भी अनेक प्रकार के उपसर्ग देने लगते हैं। ऐसे विघ्नों से योग का भंग
होता है। वहाँ अनुराग अथवा अनुताप उसका उद्धार करता है। एकनिष्ठा से अभ्यास शुरू करने पर भी दैवयोग
से विघ्न आते हैं। उस समय मन में वैराग्य उत्पन्न होने से वह योगी नियमित रूप से अभ्यास करने लगता है और