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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 763, कुल 869 में से

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पृष्ठ 763

रूप जानना

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चाहिये। प्रपंच का आडम्बर नामरूप का समुदाय तैयार करता है जो आकाश में दिखाई देने वाले गन्धर्व नगर की

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तरह नश्वर प्रत्यक्ष ही दिखाई देता है। पिता के सामने पुत्र मरता है, पुत्र के सामने पिता घुलता है, काल के प्रवाह में

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सब कुछ नष्ट हो जाता है, क्रिया करने के लिये भी कोई नहीं बचता। समुद्र में लहर उठती है और देखते-देखते

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गायब हो जाती है, उसी प्रकार नामरूप जो भी दिखायी देता है, वह सहज ही नष्ट हो जाता है। यह प्रपंच केवल

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नाममात्र का है। लेकिन मैं ही स्वतंत्र परमात्मा हूँ। संसार की ऐसी जन्मपत्रिका है लेकिन उसे न जानकर जीव उसे

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'असाध्य' कहते हैं। जिससे यह प्रपंच उत्पन्न हुआ है, उसने उसे प्रकाशित किया है और अन्त में वह जिसमें

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विलीन होता है वह सस्वरूप आत्मा तद्रूप से भरा हुआ है। सीप पर चाँदी का आभास होता है लेकिन वह सीप ही

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रहती है। इस दृष्टि से प्रपंच ब्रह्म से अभिन्न रहता है। उद्धव ! प्रपंच का जो स्फुरण होता है वह भी ब्रह्मरूप ही है।
(Wait, space before exclamation mark: "उद्धव! प्रपंच")

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जिस मेरे कारण श्रुति और स्मृति सत्यत्त्व में आयीं उस सत्यप्रतिज्ञ, मैं