श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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नाना प्रकार के उपायों से ब्रह्मज्ञान कैसे प्राप्त किया जाय, उसे पहले बता चुका हूँ और उसे अनुभव के
साथ स्पष्ट भी कर चुका हूँ। श्रुति-युक्ति-अनुभव के साथ ब्रह्मोपदेश का लक्षण बताकर ज्ञान और अज्ञान का
फल भी तुम्हें बता दिया है। उसी में देहेन्द्रियों का मिथ्यत्त्व, देहात्मभाव का निराकरण और ब्रह्म अद्वितीय तथा
परिपूर्ण है यह गुरुज्ञान भी प्रकट कर दिया। अत्यन्त दुर्लभ, दुर्गम तथा प्राप्त होने में कठिन पूर्ण ज्ञान मैंने प्रकट
कर दिया। यह सिद्धों का समाधान भी है और साधकों का साधन भी। मैंने अभी जो ब्रह्मज्ञान बताया उसी
उपदेशरूपी तेज शस्त्र को पूरी तरह साध्य कर साधक संशय का उच्छेद कर देते हैं। मैंने बताये हुए ब्रह्मज्ञान में
मन सन्देह करने लगता है, जिसमें देहाभिमान बढ़ता है, ऐसे सन्देह के साथ देहाभिमान को साधक इस शस्त्र से
छेद देते हैं। इस प्रकार संशय को काट कर द्वैत को दूर भगाते हैं और 'मैं' 'तू' का भाव नष्ट कर साधक स्वानंद
में निमग्न हो जाते हैं। उद्धव ! वर्णाश्रम, कुल, जाति, जीव-शिव स्थिति आदि के प्रति अहंकार उत्पन्न न होना,
इसी का नाम 'उपरति' (विराग) है। ऐसी उपरति प्राप्त हो जाने पर ऐहिक और पारलौकिक फलों की कामना
कौन करेगा? क्योंकि यहाँ विषय, विषयी और विषयोपभोग का अस्तित्व ही नहीं होता। इस प्रकार नित्य
निष्काम रहने वाले साधक आत्माराम स्वरूप होकर परमानन्द स्वरूप में निमग्न होने के कारण परम उपशम प्राप्त
करते हैं। अब, देहेन्द्रियों में प्राण रहते हुए देहाभिमान कैसे जाता है ऐसा तुम सोच रहे हो, उद्धव ! तो उसका
निरूपण श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
नात्मा बपुः पार्थिवमिन्द्रियाणि देवा ह्यसुर्धायुजलं हुताशः ।
मनोऽन्नमात्रं धिषणा चहंसत्त्वमं कृतिः खं क्षितिरर्थसाम्यम् ॥ २४ ॥
देह यह पृथ्वी का अंश अर्थात् जड़ होने के कारण वह कोई आत्मा नहीं है, उसी गुणों के कारण इन्द्रियाँ
भी आत्मा नहीं हैं, वे तो देह की उपकरण हैं, उनका व्यवहार भी एकपक्षीय होता है। इन्द्रियों के अधिष्ठाता देव
भी आत्मा नहीं होते, उन्हें इन्द्रियों का अभिमान होता है। इसलिये उन्हें आत्मपद में कहाँ स्थान मिल सकता है ?
देह को चलाने वाला जो प्राण है, वह भी आत्मा नहीं है। प्राण तो केवल अज्ञान है जो देह को वश होते समय,
उसके साथ आता-जाता रहता है, बस इतना ही। प्राण ही अगर आत्मा होता तो वह देह के साथ न चला जाता।
इसीलिये प्राण में भी आत्मत्व नहीं होता। पृथ्वी जड़ होने के कारण आत्मा नहीं होती। जल भी आत्मा नहीं है
क्योंकि उसमें द्रवत्त्व होता है। अग्नि दाहक होने के कारण वह भी आत्मा नहीं है। चंचलता के कारण वायु भी
आत्मा नहीं है। आकाश शून्य होने के कारण आत्मा भी आकाश नहीं है। संकल्प गुणों के कारण मन भी आत्मा
नहीं है। नश्वर होने के कारण आत्मा अंतःकरण नहीं है। चित्त चिन्तन करता रहता है इसलिये वह भी आत्मा
नहीं है। अभिमान भी आत्मा नहीं है क्योंकि उसे सुख-दुःख का बन्धन होता है। बुद्धि आत्मा नहीं है क्योंकि
उसमें बोधकता है। तीन गुण भी आत्मा नहीं है क्योंकि गुण तो विकारों से भरे होते हैं। महत्तत्त्व गुणों का कारण
हैं। इसलिये वे तो कभी भी आत्मा नहीं हो सकते। प्रकृति अर्थात् गुण साम्यावस्था भी सचमुच आत्मा नहीं है,
क्योंकि आत्मदृष्टि से प्रकृति की ओर देखने पर वह भी मिथ्या ही लगती है। मूल प्रकृति ही जहाँ मिथ्या सिद्ध
होती है, वहाँ उसके कार्यों में सत्यत्व कहाँ से आयेगा ? इस प्रकार साधक निश्चित होकर आत्मा का अनुभव
लेते हैं। इस प्रकार ज्ञान को साध्य कर साधक देहाभिमान को नष्ट कर देते हैं, और निरभिमान होकर सदा सुखी
रहते हैं। सारांश, जो साधक इस प्रकार निरभिमान रहते हैं, वह यदि प्रारब्ध के अनुसार विषम सेवन करें तो भी
उन्हें गुणदोषों की बाधा नहीं होती, यही बात श्रीकृष्ण निरूपित करते हैं।