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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 766, कुल 869 में से

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पृष्ठ 766

७५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
आये लेकिन आकाश जरा भी गीला नहीं होता। इस प्रकार आकाश निर्मल है। उसे मैल लगाने पर भी नहीं
लगता। जो आकाश से भी अलिप्त, जो क्षर-अक्षर से भी अतीत है, वह अक्षर परब्रह्म सदा तीन गुणों से अतीत
और चिन्मात्रस्वरूप है। जो अजरामर, अविनाशी और स्वयं प्रकाश से प्रकाशमान है, ऐसे परब्रह्म की जिसे
अद्वयत्व से प्रतीती हुई, उसी प्रकार जैसे सोने का सिक्का सर्वांग से सोना ही रहता है, उसी प्रकार जो बिना
किसी कर्म के ऊपरी साधनों से परब्रह्म होते हैं उनके शरीर में गुणों की त्रिकुटी नहीं लगती, विषयों का भोग
भोगते हुए भी, वे उससे अलिप्त ही रहते हैं। मेघों में चन्द्रमा का बिम्ब दिखायी देता है लेकिन वह घटाओं को
स्पर्श नहीं करता अथवा उसके जल से वह गीला नहीं होता। उसी प्रकार देह में जीव अलिप्त ही रहता है। उन
घटाओं में यदि गोबर मिलायें या कस्तूरी मिलायें तो भी वह जिस प्रकार उस प्रतिबिम्ब से नहीं चिपकता, उसी
प्रकार देह के पाप पुण्य का प्रभाव जीव शिव पर नहीं होता। आकाश को जलाने के लिये यदि घृत को जलाकर
अग्नि प्रज्वलित की जाय तो उस समय आकाश अग्नि के बिलकुल निकट रहता है लेकिन इससे आकाश को
उसकी आँच नहीं लगती। उसी प्रकार ज्ञाता भी विषय की भीड़ में कभी विषयी नहीं होता। गुणों के और देह की
संगति में योगी भले ही विचरण करते हों तो भी विषयों का भोग करते हुए भी वे सदा सर्वांग से अलिप्त ही रहते
हैं। भोग का यह मर्म जिसने जान लिया वह देह में होते हुए भी परब्रह्मस्वरूप ही है। वे स्वयं ही शुद्ध अक्षर होने
के कारण उन्हें भोगभ्रम की बाधा नहीं होती। 'वे अब अक्षर हो गये' यह कहना भी कम ही है क्योंकि संसार
भले ही ज्ञान अथवा अज्ञान में विचरण करता हो लेकिन अक्षरता कायम ही रहती है। उस ब्रह्मस्वरूपता को
भूलकर, देहअहंता 'मैं देही' कहती है, उस समय विषयावस्था बढ़ कर दृढ़ बन्धन प्राप्त होता है। उस बन्धन को
दूर करने के लिये विषयलोलुपता का त्याग करना होगा क्योंकि विषयत्याग किये बिना नित्यमुक्तता कभी नहीं हो
पायेगी। नित्यमुक्तता यदि साध्य न हुई हो तो साधक कितना भी बड़ा ज्ञानी क्यों न हो जाय लेकिन उसे उस
ज्ञातृत्व के लिये विषयासक्ति कभी नहीं करनी चाहिये।
तथापि सङ्गः परिवर्तनीयो गुणेषु मायारचितेषु तावत्।
मद्भक्तियोगे न दृढेन यावद् रजो निरस्येत मनःकषायः॥ २७॥
सम्पूर्ण स्वरवर्णों से युक्त चारों वेदों में कोई भले ही निपुण हो जाय लेकिन उसके बल पर यदि वह
विषयाचरण करता है तो वह उसे अत्यन्त बाधक होता है। केवल शब्दज्ञान के लिये विषयाचरण बाधक ही है।
प्राणापान को सम कर मृत्यु को टालने का भले ही सामर्थ्य आ जाय लेकिन विषयाचरण उसके लिये भी बाधक
है। शाप अथवा वरदान देने का सामर्थ्य रखने वाले पुरुष भले ही अपने को महान समझें लेकिन यदि वे
विषयाचरण करने लगेंगे तो उन्हें वह घातक होगा। कोई योग सामर्थ्य से अंतरिक्ष में आसन उड़ाते हैं और सिद्धि
के अनेक प्रकार दिखाते हैं। उन्हें भी विषय भोग की चाह निश्चित रूप से बाधक होती है। मंत्रानुष्ठान के योग
से प्रत्यक्ष मंत्रदेवता भले ही प्रसन्न हो जाय, लेकिन उनके लिये भी विषय वासना घातक ही है। किसी की
किंचित् स्वस्वरूप का अनुभव होकर 'मैं मुक्त हूँ' ऐसा स्फुरण होने लगता है, उनके लिये भी विषय की संगति
निश्चित रूप से बाधक है। स्वयं अभिमान का निर्दलन कर जब तक नित्यमुक्त नहीं हुआ तब तक विषयाचरण
बाधक ही है। जिस प्रकार चकमक की आग खम्भे को नहीं जला सकती, उसी प्रकार ब्रह्म प्राप्ति प्रथम रंग प्रपंच
की संगति से नष्ट हो जाता है। ये विषय मिथ्या और मायिक हैं फिर भी उनका भोग करते समय जब तक हर्ष
होता है, तब तक हे उद्धव ! विषय सचमुच ही बाधक हैं, यह जान लो। उन विषय भोगों से छूटने के लिये