श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 761, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंअट्ठाईसवाँ अध्याय ७४५
हूँ। इसीलिये 'वेदवचन' प्रमाण है। श्रुति का शब्दज्ञान पठन करने वाले को पावन करता है। उद्धव ! आत्मस्वरूप
जानने के लिये देहादि विषयों का जो अनुताप है, जिससे साधक निष्पाप होते हैं, उसका नाम 'तप' है। अनुताप
से मन का दमन करने से पातकों का क्षालन होता है। तब वह श्रुति के अर्थ के अनुरोध से परब्रह्म का 'अनुमान'
करने में समर्थ होता है। देह जड़, मूढ़ और अचेतन है, उसमें चैतन्यस्वरूप नारायण है और देह मिथ्या है इस
बात का निश्चय होकर मन अद्वैत में रंग जाता है। उस अद्वैत प्राप्ति का मार्ग यही है कि हम अभिमानरहित
होकर भक्तिभाव से सद्गुरु की अनन्य भाव से शरण जायें। उसे गुरु की कृपा होती है। शरणागत का अधिकार
और लक्षण देखकर गुरु भी उसे गुरुज्ञान का उपदेश करते हैं। 'सब में निर्मल परब्रह्म ही है' यही श्रुति का उत्तम
गुह्य है। जो परम सौभाग्यशाली होता है उसके मन में ही यह सुगम रीति से अंकित होता है। गुरु के वचन कान
में पड़ते ही आत्मसमाधान से वृत्ति चित्स्वरूप में तल्लीन होकर स्वानंद में समरस हो जाती है। अब उसके लिये
आगे साधन अथवा कर्म का आचरण रह गया है, ऐसा कौन कहेगा ? वेद भी वहाँ मौन रह गये हैं। जहाँ द्वंद्व की
स्फूर्ति नहीं रह जाती सारे दुःखों की समाप्ति हो जाती है, देह में ही विदेह परब्रह्म की प्राप्ति होती है; उसे ही
'प्रत्यक्ष' कहते हैं। विस्मृति की ठौर पूछकर, स्मरण के बिना ही नित्य स्मरण होना और अखण्ड स्वस्वरूप का
अनुभव प्राप्त होना, इसी का नाम है 'प्रत्यक्षता'। मैं स्वानंदकंद आत्मा हूँ, इस प्रकार का परमानन्द का अनुभव,
यही 'प्रत्यक्ष' पद का वास्तविक अर्थ है, ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा। भाग्यशाली साधक को यह बोध श्रवण
होते ही प्राप्त होता है, किसी को मनन से प्राप्त होता है और किसी को अनवरत चिन्तन से प्राप्त होता है। कइयों
को स्वरूपाकार वृत्ति के अभ्यास से यह बोध प्राप्त होता है और कइयों को मेरी अद्वैत भक्ति के योग से यह बोध
अर्थात् मैं श्रीकृष्ण पूरी तरह प्राप्त होता हूँ। उद्धव ! पूर्ण रूप से आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने के लिये यह साधन
प्रमुख है। इस प्रकार आत्मज्ञान प्राप्त होने पर उसका क्या 'फल' मिलता है वह भी बताता हूँ। मैं अनंत सृष्टि का
मूल कारण हूँ, किन्तु नित्यमुक्त होने के कारण अहेतुक, वही मैं श्रीकृष्ण लीला से सारी सृष्टि की उत्पत्ति का
मूल कारण हूँ उसी प्रकार रजोगुण की सहायता से मैं उत्पन्नकर्ता के रूप में अद्वैत में ही अनेक व्यक्ति दिखाता हूँ।
जिस प्रकार जड़ के बिना फलदार वृक्ष बढ़ता है, उसी प्रकार सृष्टि के संरक्षण का मुझ निष्काम को शौक है।
एक लकड़ी से शतरंज की गोटियाँ बनती हैं। उनमें राजा, प्रधान पशु और प्यादे बनते हैं। उनके अपने पूर्वकर्म
नहीं होते, उसी प्रकार निष्कर्म से सृष्टि को प्रकाशित करने वाला मैं हूँ। निष्कर्म करके ही सृष्टिकर्त्ता ने इस
संसार का निर्माण किया यह देखकर मीमांसकों का मन कुंठित हो गया। सारांश यह संसार सदा से ही निष्कर्म
ब्रह्मस्वरूप ही है। जिस प्रकार शतरंज के खेल में अचेतन को भी शुद्ध करना पड़ता है, उसी प्रकार लोकरक्षण
की आत्मीयता से मैं सृष्टि का प्रतिपाल करता हूँ। प्रकृति की सारी गोटियाँ जड़मूढ़ ही होती हैं, उसे पुरुष के
हाथ से सचेतन कर, हाथ में काल के पासे लेकर चराचर का खेल खेलाने वाला मैं एक विष्णु हूँ। निर्जीवों के
इस झगड़े में न मरने वाले को भी मृत्यु आती है। एक की जीत और एक की हार ऐसे दो पक्षों को खेल खेलाने
वाला मैं ही हूँ। गोटी मरने पर कौन पुण्यवान वैकुण्ठ में जाता है और कौन पापी नरक में जाता है ? इस सृष्टि के
बंध-मोक्ष इस प्रकार के हैं। उसी प्रकार अपना 'एकपन' छोड़े बिना, उस खेल की ही तरह मैं संसार का पालन
'दूजे 'पन का स्पर्श किये बिना करता हूँ। रस्सी का सर्पाकार अपने सामर्थ्य से वीर पुरुष मार कर नष्ट करता है,
उसी प्रकार मैं प्रलयरुद्र इस सृष्टि का संहार करता हूँ। स्वप्न में देखे हुए संसार को जागने पर नष्ट करने में कष्ट
कैसा? उसी प्रकार मैं प्रलयकर्त्ता हूँ, ऐसा समझ लो। उत्पत्ति, स्थिति और लय केवल सृष्टि पर ही लागू होती है,
आत्मा आत्मस्वरूप में अखण्ड परिपूर्ण है। वही स्वरूप ज्ञानसम्पन्न लोग स्वानुभव से स्वयं होकर रह रहे हैं।