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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 771, कुल 869 में से

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पृष्ठ 771

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५५
रहता है। किन्तु कार्य, कर्म और कर्तव्यता यह अहंता ज्ञाता को नहीं होती क्योंकि वह प्रपंच में ही निजात्मस्वरूप
निश्चित रूप से वश में कर लेता है। विषयादि प्रपंचों का भान अज्ञानी सत्य मानते हैं; किन्तु ज्ञाता उसी प्रपंच को
परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप मानते हैं। शर्करा से बनाया करेला मीठा ही लगेगा, उसी प्रकार प्रपंच की कथा है। लाभ और
हानि यह ज्ञान और अज्ञान पर निर्भर करता है। सुवर्ण की गुल्ली देखकर मूर्ख लोग उसे ईंट या पत्थर समझते हैं,
किन्तु ज्ञाता उसकी कद्र करते हैं और ज्ञानदृष्टि से अच्छा मोल देकर खरीदते हैं। उसी प्रकार सांसारिक क्रिया
कर्म मूर्ख को मूर्खता के कारण विषम लगता है; किन्तु ज्ञाता को वही परब्रह्म लगता है और वह सर्वकाल उसमें
स्वानंद से सन्तुष्ट रहता है। पहले प्रपंच को खन कर हटा देना और फिर ब्रह्मभाव धारण करना इस बात की भी
उस भाग्यवान को आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि वह सब कुछ ब्रह्मरूप देखता रहता है किन्तु अनाड़ी लोग
मिलकर उससे भीषण अनुमान निकालते हैं और उन्हें सच समझते हैं। उसी प्रकार प्रपंच का मिथ्या भान अज्ञानी
लोग बाधक मानते हैं किन्तु ज्ञाता लोग उसे ही परिपूर्ण ब्रह्म समझते हैं। सोये हुए व्यक्ति को स्वप्न सच ही
मालूम होता है, उसी प्रकार अपने भ्रम के कारण प्रपंच सच ही मालूम होता है, लेकिन जिसका आत्मज्ञान जागृत
होता है, उसे वही प्रपंच स्वस्वरूपज्ञान के बोध से निश्चित ही मिथ्या मालूम होता है। प्रपंच का भास मिथ्या है
यह जानकर जो ज्ञानसम्पन्न होते हैं, उन्हें किसी भी कर्म में विचरण करते समय कभी भी देहाभिमान उत्पन्न नहीं
होता। साधकों का स्वार्थ साधने के लिये पहले 'स्वस्वरूप से भगवान हो गया' यह कहने से वह सचमुच
विचारवश हो गया है ऐसा कहोगे तो उचित नहीं होगा क्योंकि परब्रह्म और आत्मतत्त्व कभी विकारवश नहीं
होते। वह सदा सर्वदा समसाम्य अर्थात् निर्विकार ही रहता है। इसी सम्बन्ध में श्रीकृष्ण आत्मज्ञान से बता रहे हैं।
पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्रमज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग।
निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा॥ ३३॥
यह संसार साधकों की पूर्वावस्था में मायावशता के कारण अत्यन्त अतर्क्य मालूम पड़ता है, किन्तु शुद्ध
परब्रह्म गुणकर्मों के प्रकारों से अनेक रूपों में भासित होता है। नाम, रूप, व्यक्ति, वर्ण, कुल, गोत्र, क्रियाचरण
इस प्रकार प्रपंच को अज्ञानी भिन्न और सत्य मानते है। लेकिन यह प्रपंच ब्रह्म के स्थान पर आरोपित है, इसलिये
ब्रह्म भी तद्रूप ही मालूम होता है। स्फटिक किसी भी रंग से अलिप्त रहता है, लेकिन जिसके साथ उसका
सम्बन्ध होता है, उसी की तरह वह भी लगता है। इस प्रकार अज्ञान के कारण संसार भिन्न मालूम होता है,
इसीलिए आत्मा को भी विकारी कहते हैं। लोग अज्ञान के कारण इतने अविचारी हो जाते हैं। उस अज्ञान की
निवृत्ति हो जाए तो साधकों को मेरी प्राप्ति सुलभ हो जाएगी। इसलिये मेरी सच्ची भक्ति मैंने यथार्थ रूप में
प्रकाशित की। साधकों का सच्चा स्वार्थ शीघ्र पूर्ण हो सके इसीलिये 'समस्त प्राणिमात्र में भगवान है' यह गुह्यार्थ
मैंने बता दिया। इस अनुसंधान को धारण कर मेरा मनोभाव के साथ भजन करने से 'मैं' 'तू' वाली भावना नष्ट
होकर, अविद्या के साथ अज्ञान भी समूल नष्ट हो जाता है। फिर दृश्य, द्रष्टा, दर्शन, त्रिगुणों के साथ कार्य,
कारण और प्रपंच का भान भी नहीं रहेगा। परिपूर्ण ब्रह्म ही पूर्णत्व से भर जायेगा। वहाँ नाम, रूप, गुण, जाति,
महाभूत तथा भूतव्यक्ति इनमें से कुछ भी नहीं रह जाता। सहज स्थिति में परिपूर्ण चैतन्य ही रहता है। ब्रह्म के
ब्रह्म की स्फूर्ति भी उत्पन्न नहीं होती। वह ऊँचा भी नहीं है और नाटा भी नहीं है। मोटा भी नहीं है और कृष भी
नहीं है, सरल भी नहीं है और वक्र भी नहीं है। उसे किसी भी प्रकार का विकार नहीं है। वहाँ न ठंडक है, न
उष्णता है। वह मृदु भी नहीं है और कठोर भी नहीं है। वह मीठा भी नहीं है और कडुआ भी नहीं है। सुख-