श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअट्ठाईसवाँ अध्याय ७५१
देहाभिमान को नष्ट करना चाहिये और इसके लिये निष्ठापूर्वक मेरा भजन करना चाहिये। व्रत, तप, तीर्थ, दान
आदि करने से; या योग, त्याग और यजन आदि करने से; वेदशास्त्र अथवा पुराणश्रवण करने से भी देहाभिमान
नहीं ढलता। किन्तु भक्तिभाव से मेरा भजन करने से देहाभिमान का समूल लय हो जाता है। उसके लिये भक्ति
ही उत्तम साधन है। परब्रह्म भक्ति के अधीन रहता है। उद्धव! ज्ञान, वैराग्य, निवृत्ति, धृति, शान्ति और ब्रह्मस्थिति
आदि की जननी मेरी भक्ति है यह स्मरण रखो। मेरी भक्ति चारों मुक्तियों से अधिक श्रेष्ठ है। उनकी शक्ति अपार
है। सचमुच, मैं उससे बँध गया हूँ। मेरा स्वरूप अनंत और अपार होते हुए भी, मैं सचमुच भक्ति में उलझ गया
हूँ। इसीलिये मैं निरन्तर मेरे भक्तों के द्वार में उपस्थित रहता हूँ। मैं भक्ति से बंध गया हूँ, इसीलिये मैं भक्तों के
अधीन रहता हूँ। मेरी भक्ति की महिमा स्वयं मैं भी नहीं जानता। अनेक लोग मेरी भक्ति कर मुझसे मोक्ष की ही
माँग करते हैं किन्तु चारों मुक्तियों की उपेक्षा कर जो मेरी भक्ति करता है, वह धन्य है। मेरे प्रति ऐसी भक्ति जहाँ
होती है, वहाँ चारों मुक्तियाँ पैरों पर आकर गिरती हैं। उसके भावार्थ पर मैं श्रीकृष्ण पूर्णरूप से न्योछावर हूँ।
उसके लिये वह भक्ति ही प्रमुख साधन रहती है, इसलिये मैं भी भक्तों के अधीन रहता हूँ। उसके वचन का मैं
कभी भी उल्लंघन नहीं करता। वह मुझे सगुण होने के लिये कहते हैं तो मैं तत्काल सिंह, बराह आदि बन जाता
हूँ; उनके लिये मैं विदेही होते हुए भी पूर्ण देहधारी बनता हूँ। अम्बरीष के लिये मैंने दस जन्म भोगे। अजन्मता
का व्रत भी मैं तोड़ देता हूँ लेकिन भक्त को किसी बात की कमी नहीं होने देता। कौरव द्रौपदी को विवस्त्र कर
रहे थे यह देखकर मैं उसकी सहायता के लिये दौड़ पड़ा और उसे एक क्षण के लिये अनावृत्त नहीं रहने दिया।
उसे करोड़ों वस्त्र पहनाये। इस प्रकार मैं भक्तों का सहायक हूँ। अजन्मा होते हुए उनके लिये जन्म लेता हूँ।
अरिमित्रों से सम होते हुए मैं अपने भक्तों का पक्षधर बन जाता हूँ। जो मेरे भक्तों का हित करता है, वह संसार में
मेरा बहुत बड़ा मित्र होता है और जो मेरे भक्तों से बैर करता है, उसका मैं अनेक प्रकार से विनाश करता हूँ। इस
प्रकार मैं भक्तों का सहायक होते हुए, भी वे अभागे लोग मुझ श्रीकृष्ण का भजन न कर अधःपतन की ओर
अग्रसर होते हैं। तुम कहोगे कि जब शरीर में पाप है तो तुम्हारा भजन कैसे सम्भव होगा? तो सुनो। मेरा नाम
क्षणभर में सारे पापों का विनाश कर देता है और उन्हें भस्म कर देता है। नाम का घोष सुनकर महापापों का
समुदाय सरपट भागने लगता है, नाम के पास पापों का ठौर नहीं मिल पाता। सूर्य अन्धकार में डूब सकता है
लेकिन पाप भक्त के पास नहीं आयेगा। जहाँ भक्तों के चरणों की धूलि पड़ती है वहाँ पापों का मूल ही नष्ट हो
जाता है। मेरा नाम समझ लो संसार का एक ब्रह्मास्त्र है और महापातक बेचारी चींटी है। नाम के सामने उसका
अस्तित्व टिक नहीं सकता। जब मेरे नाम का ऐसा प्रताप है, तो फिर मेरे भक्तों की दशा का क्या वर्णन करें? मेरी
भक्ति की मुहर लगते ही वह सहसा कलिकाल की भी परवाह नहीं करता। इसलिये भजन देहाभिमान का नाश
करता है, मेरे निजभजन के बिना देहाभिमान नहीं जाता। जिससे देहाभिमान टूटता है वह तुम्हारी भक्ति कैसी है?
इसका उत्तर यही है कि अभेदभाव से पूर्णभक्ति करनी चाहिये, इससे देहाभिमान नष्ट होता है। समस्त प्राणिमात्र
के प्रति भगवद्भावना रखना इसी का नाम है 'अभेद भक्ति'; यह भजन साध्य होते ही अहंकार शेष नहीं रहता।
उसके मुख में मेरा नाम, उसके कान में मेरी कीर्ति, उसके मन में मेरी भक्ति और उसके हाथ पैर आदि अवयवों
में मेरी क्रिया अर्थात् सेवा रहती है। वह जागृति में मुझे ही देखता है, वह स्वप्न में मुझ अकेले को ही देखता है,
सारांश वह अपनी निष्ठा से मेरे सिवा चित्त को खाली नहीं रखता। इस प्रकार के भजन से तीनों गुणों का विलय
हो जाता है। जिससे अहंकार से निवृत्ति होकर विषयासक्ति भी नष्ट होती है। ऐसे भक्तों को विषयों का सेवन
कभी भी बाधक नहीं होता। सारे विषय वह मुझे ही अर्पण करता रहता है इसलिये उसे उनकी बाधा नहीं होती।