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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 772, कुल 869 में से

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पृष्ठ 772

७५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
दुःख रहित वह केवल निर्द्वंद्व ही है। चिद्रूप होने के कारण वह न आँखवाला है न अन्धा है। वह यहाँ भी नही है,
वहाँ भी नहीं है, वह न आता है न जाता है, वह न निकट है न पास में है, वह सदा सर्वसिद्ध ही है। वह खाता
भी नहीं है और भूखा भी नहीं है; वह न देता है, न लेता है; वह न जीता है न मरता है, वह परादि वाचा के परे
होने के कारण परात्पर है। वह बद्ध भी नहीं है और मुक्त भी नहीं है; वह नित्य भी नहीं है और अनित्य भी नहीं
है; वह नाराज भी नहीं होता और प्रसन्न भी नहीं होता। परब्रह्म सदा सत्वस्वरूप में ही रहता है। वहाँ पाप भी
नहीं है और पुण्य भी नहीं है; वह साकार भी नहीं है और शून्य भी नहीं है। वह सगुण भी नहीं है और निर्गुण
भी नहीं है; वह स्वानंद से पूर्ण सुखस्वरूप है। समस्त प्राणिमात्र भगवान के ही रूप हैं, इस दृष्टि से मेरे भक्त
मेरा भजन कर स्वयं मेरा परिपूर्ण स्वरूप बनकर रहते हैं। संत के रूप में कुछ लेना अथवा असंत के रूप में कुछ
त्यागना ऐसा अलग कुछ उनमें रह ही नहीं जाता क्योंकि वे ब्रह्मस्वरूप में परिपूर्ण हुए रहते हैं। बद्धकाल की
बद्धता आत्मा स्वीकार नहीं करता अथवा मुक्तकाल की मुक्तता को भी आत्मा स्पर्श नहीं करता। आत्मा
अविकारी है, वह इस निरूपण से तुम्हारी समझ में आ जायेगा। इतने पर भी न समझ में आये तो पुनः बताता हूँ,
सुनो। आत्मा सर्वदा नित्य है, इसलिये उसे उत्पत्ति नहीं है। जिसे उत्पत्ति ही नहीं है वह कभी गर्भ को स्पर्श नहीं
करेगा और जिसे गर्भ और जन्म नहीं है, उसे देह भी नहीं है और देह के बिना वृद्धि भी सम्भव नहीं है। जो सदा
विदेही है, उसे कर्म सम्भव नहीं होता और बिना कर्म के आत्मा को बन्धन भी नहीं होता। जिसे कोई अवयव ही
नहीं है, उसका कोई संस्कार ही नहीं होगा और जिसका आकार ही नहीं है, उसे विकार भी स्पर्श नहीं करेगा।
जो गर्भ और जन्म से विरहित है, उसके पास मृत्यु भी नहीं आ सकती। काल भी उस पर आघात नहीं कर
सकता। इस प्रकार परमात्मा क्षयातीत है। जिसे जन्म, कर्म और मरण नहीं है उसे विकारी कौन कहेगा? इस
प्रकार उद्धव ! परब्रह्म पूर्ण अविकारी है यह जान लो। प्रगाढ़ अज्ञान फैलने पर भी आत्मा को नष्ट नहीं किया जा
सकता; अथवा ज्ञान कितना ही प्रखर हो तो आत्मा नया नहीं हो सकता। आत्मा ज्ञान, अज्ञान से अलिप्त नित्य
तथा निर्विकार है। यही बात श्रीकृष्ण दृष्टांत देकर बताते हैं।
यथा हि भानोरुदयो नृचक्षुषां तमो निहन्यान्न तु सद् विधत्ते ।
एवं समीक्षा निपुणा सतो मे हन्यात्तमिस्रं पुरुषस्य बुद्धेः ॥ ३४॥
आँखों की दृष्टि पर अन्धकार प्रतिबन्ध करता है। सूर्य का उदय होने पर वह उस अन्धकार को दूर करता
है लेकिन नयी दृष्टि उत्पन्न नहीं करता। उसी प्रकार अविद्या क्षुब्ध होकर कितनी भी उग्र हो जाय लेकिन वह
आत्मा को नष्ट नहीं कर सकती। वह पुरुष की बुद्धि पर परदा डाल कर झूठा द्वंद्व दिखाती है। शुद्ध ज्ञान प्राप्त
होने पर वह अविद्या का मल निकाल देती है लेकिन नया आत्मा उत्पन्न करने का सामर्थ्य ज्ञान में नहीं है। आत्मा
अपने प्रकाश से ज्ञान को तथा अज्ञान को भी प्रकाशित करती है अर्थात् वह ज्ञान अथवा अज्ञान परमात्मा को
कभी भी स्पर्श नहीं करता। ज्ञानाज्ञान विकार सचमुच अविद्याजन्य है और आत्मा अविद्या से परे है। इसीलिये वह
नित्य और निर्विकार है। सूर्य को यदि रात्रि नहीं है तो उसके लिये दिन भी कौन-सा है? उसी प्रकार आत्मा को
भी ज्ञान और अज्ञान दोनों ही स्पर्श नहीं करते। आत्मा निर्विकार एवं स्वयंप्रकाश है। वह ज्ञान की और अज्ञान की
स्थिति से अलिप्त है। ऐसी उस स्वरूप की सुलभ प्राप्ति का उपाय श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेया महानुभूतिः सकलानुभूतिः ।
एकोऽद्वितीयो वचसां विरामे येनेषिता वागसवश्चरन्ति ॥ ३५॥