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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

७१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
से कही है। सत्यवती का पुत्र, व्यास, साक्षात् नारायण जिसने वेद का अर्थ स्पष्ट किया है और जो महाकवि के
रूप में प्रसिद्ध है, वह समस्त पुराणों का कर्त्ता है और जिसके कारण 'सारा संसार व्यासोच्छिष्ट है' ऐसा कहा
जाता है, उसने भी भगवत्पूजा के मार्ग तथा इस क्रियायोग का प्रतिपादन किया है। इनकी तो बात ही छोड़ो
लेकिन सारे संसार के दादा, विष्णु के पुत्र ब्रह्मदेव ने भी यही विचार दृढ़ किया है।
निःसृतं ते मुखाम्भोजाद् यदाह भगवानजः ।
पुत्रेभ्यो भृगुमुख्येभ्यो देव्यै च भगवान् भवः ॥ ३ ॥
तुमने कल्प के प्रारम्भ में यही पूजाविधि पुत्र बुद्धि से स्वयं ब्रह्मदेव को बतायी है। उसने भी स्वयं कल्प
के पूर्व नाभिकमल में बैठकर भृगुकश्यपादि पुत्रों को भी यह पूजाविधान बताया है। श्री महादेव ने भी स्वयं यह
क्रियायोग विधि विधान भक्तिभाव से पार्वती को एकान्त में निरूपित किया है।
एतद् वै सर्ववर्णानामाश्रमाणां च सम्मतम् ।
श्रेयसामुत्तमं मन्ये स्त्रीशूद्राणां च मानद ॥ ४ ॥
हे दीनोद्धारा ! इस प्रकार दीनोद्धार के लिये तुमने यह श्रेष्ठ परम्परा शुरू की है। तुम सचमुच दीनों के प्रति
दयालु हो। अतः उसका भी विचार सुनो। आश्रमधर्म और विधि विधान इनके अधिकारी ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य हैं।
विधिविधान में त्रुटि होने से उन्हें दोष लगता है। इसलिये ब्राह्मण कर्मों में व्यस्त रहते हैं। लेकिन तुम्हारा भजन
वैसा नहीं है। भजन का अधिकार सबका है। भजन दीनों का पूर्णरूप से उद्धार करने वाला है। उसने स्त्रियों का
और शूद्रों का उद्धार किया है। उत्तमोत्तम लोग कर्म में व्यस्त रहते हैं और अधमाधमों का भी भजन उद्धार होता
है। भजन सभी के लिये सुगम है। भजन से स्वधर्म का सार्थक होता है। भजन की महिमा अपूर्व है। उसके योग
से अधम को भी उत्तमोत्तम पद प्राप्त होता है और जो उत्तम होते हुए भजनहीन रहते हैं, वे स्वयं अधमाधम हो
जाते हैं। सभी वर्णों के और आश्रमों के लोगों को भगवद्भजन से ही सद्गति प्राप्त होती है। यही भक्ति का रहस्य
है और इसे निष्काम भक्त ही जानते हैं। भक्त भगवद्भक्ति करके ही स्वयं भगवद्रूप होते हैं, इसीलिये हे श्रीकृष्ण !
तुम भक्तों को अत्यन्त प्रेम से सम्मान देते हो। तुम्हारा भजन-पूजन करने से तुम अपने भक्तों को तारते हो, तुम्हीं
भक्तों के सम्मानदाता बनते हो, अतः तुम्हारी पूजा की कथा (विधानतः) मुझे बतायें।
एतत्कमलपत्राक्ष कर्मबन्धविमोचनम् ।
भक्ताय चानुरक्ताय ब्रूहि विश्वेश्वरेश्वर ॥ ५ ॥
हे कमलनाथ नारायण ! हे भक्तविश्राम कमलवदन श्रीकृष्ण ! मेरी विनती सुनें। तुम्हारा कृपादृष्टि से देखना
ही पर्याप्त है, तत्काल कर्मबन्धन की गाँठें खुल जाती हैं। भक्तों को स्वानंद की पुष्टि मिलती है। जिस प्रकार घृत
की कड़ाही को सूर्य के किरण एक ही क्षण में पिघला देते हैं, उसी प्रकार हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारा कृपावलोकन
कर्मबंधन का निवारण ही कर देता है। जिस प्रकार नमक का बड़ा पर्वत भी समुद्र में घुल जाता है, उसी प्रकार,
श्रीकृष्ण ! तुम्हारी कृपा कर्मबन्धन को भस्म कर देती है। जिस प्रकार सूर्योदय हो जाने के बाद जुगनूँ दिखायी
नहीं पड़ता उसी प्रकार तुम्हारी कृपादृष्टि पड़ते ही, कर्माकर्म से छुटकारा मिल जाता है। अन्धकार में करोड़ों
जुगनूँ चमकते हैं उसी प्रकार अज्ञान में कर्मों का आडम्बर फैलता है। तुम्हारे कृपारूपी सूर्य का साथ मिलते ही
कर्म बेचारे कर्महीन हो जाते हैं। ऐसी निष्कर्म कृपा से युक्त होकर तुम्हारे भक्त विचरण करते हैं और वे विषय के
प्रति सदा विरक्त रहकर हरिचरणों के प्रति ही अनुरक्त रहते हैं। इसके अलावा तुम्हारी पूर्ण कृपा का स्थान ही जो

सत्ताईसवाँ अध्याय ७१७
तुम्हारी पूजा का विधान है उसके सम्बन्ध में कृपया मुझे बताएँ। मैं तुम्हारा अत्यन्त दीन बालक हूँ। शायद तुम
कहोगे कि यह जानने का मेरा अधिकार नहीं है। लेकिन हे श्रीकृष्ण, मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ और दूसरी बात
यह है कि तुम्हारे यहाँ शरणागत की उपेक्षा नहीं होती है। तुमने जटायु-संपाती-गजेन्द्र आदि पशु-पक्षियों का
उद्धार किया है। तुमने गणिका और वेश्या का भी उद्धार किया है। हे कृपालु ऋषिकेशी वही कृपा तुम मुझ पर
भी करो। शायद तुम कहोगे कि सृष्टि में ब्रह्मदेव, शंकर आदि सबके होते हुए मुझे ही कहने की श्रद्धा तुम्हारे मन
में कैसे उत्पन्न हुई ? तो उसका कारण भी बताता हूँ। ब्रह्मदेव संसार का निर्माणकर्त्ता होते हुए भी वह आत्मस्वरूप
भूल गया इसीलिये वह तुम्हारा ही पुत्र बनकर तुमसे आत्मज्ञान सीखा। शंकर ने भी तुम्हारे चरणों की तीर्थ-गंगा
को अपने मस्तक पर धारण कर, तथा सदासर्वदा तुम्हारे ही नाम का जप कर, सचमुच तुम्हारी की कृपा के
कारण उन्होंने आत्मस्वरूप प्राप्त किया। इस प्रकार तुम ज्ञान के निधि हो तथा पूर्णबोध के सागर हो। इसलिये
जिससे आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है वह पूजाविधि मुझे बताओ। ऐसे भक्त के भाषण से संतोष प्राप्त करने
वाले, पूर्ण निजबोध से द्रवित होने वाले तथा आत्मकृपा से विह्वल श्रीकृष्ण ने क्या कहा?
श्रीभगवानुवाच
न ह्यन्तोऽनन्तपारस्य कर्मकाण्डस्य चोद्धव।
संक्षिप्तं वर्णयिष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥६॥
जिसका वचन सुनते ही वेदवाणी मौन हो जाती है, जिसका स्मरण करते ही मन अपना मनं पन भूलता है,
जो वेदार्थ का प्रकाशक, जो सूर्य का भी आदिसूर्य, वह यदुनायक श्रीकृष्ण उद्धव को अपने मुख से बताने लगा।
वेद और शास्त्रों ने मेरी पूजा की जो विधि बतायी है, उसे यदि विस्तार से बताने लगूँ तो वह अनन्त और अपार
है। ब्रह्मादिक देवता भी उसका पार नहीं पा सकेंगे। उद्धव ! सुनो। मैं देवाधिदेव यदि बताने भी लगूँ तो पूरा विधि
विधान मैं भी नहीं बता पाऊँगा। कोई कितना ही ज्ञानसम्पन्न क्यों न हो लेकिन पूजाविधि का विधान बताने का
सामर्थ्य कभी भी किसी में नहीं हो सकता। इसलिये वेदशास्त्र का सार तत्त्व लेकर तुम्हें संक्षेप में बताऊँगा।
पूजाविधि का सार वैदिक, तांत्रिक और मिश्र इन तीन प्रकार का है। विधि प्रक्रिया के अनुसार उनके विभागों के
बारे में सुनो।
वैदिकस्तान्त्रिको मिश्र इति मे त्रिविधो मखः।
त्रयाणामीप्सितेनैव विधिना मां समर्चयेत् ॥७॥
वेद के ही मंत्र और वेद की ही विधि लेकर मेरी यथासाङ्ग पूजा करना 'वैदिक मार्ग' है। अब आगम,
प्रयोग के बारे में भी सुनो। आगम के ही मंत्र और आगम की ही विधि लेकर मेरी पूजा आगमोक्त रीति से करने
का ही नाम है 'तंत्रमार्ग'। अब मिश्रविधि के सम्बन्ध में भी सुनो। वेद के मंत्र और तंत्र की विधि को लेकर पूजा
करना, इसी का नाम है 'मिश्रमार्ग'। इन तीन प्रकार की विधियों से मेरी यथासाङ्ग पूजा करना, यही मेरा तीन
प्रकार का याग है। इसके योग से मैं श्रीकृष्ण संतोष प्राप्त करता हूँ और सपरिवार साथ में खड़ा रहता हूँ। इस
प्रकार मेरा भजन तीन प्रकार का है। इनमें से जिस पर जिसकी पूर्ण श्रद्धा हो, उस विधि से उसे पूजा करनी
चाहिये। भक्ति से किये जाने पर मुझे प्रत्येक विधि में समान रूप से तृप्ति होती है। भक्तिभाव से जो मेरा पूजन
होता है, उससे मैं जनार्दन अत्यन्त तृप्त होता हूँ। यह आगमोक्त यज्ञ है और तीनों लक्षण समान हैं। वैदिकादि तीन
प्रकारों से मेरा पूजन करने पर मैं श्रीकृष्ण तृप्त होता हूँ। अब पूजा के अधिकार के सम्बन्ध में भी बताता हूँ। सुनो।

७१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यदा स्वनिगमेनोक्तं द्विजत्वं प्राप्य पूरुषः।
यथा यजेत मां भक्त्या श्रद्धया तन्निबोध मे ॥ ८ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये द्विजन्मा तीन वर्ण, इनके अधिकारों का लक्षण इस प्रकार है—गर्भ से आठवें
वर्ष में उपनयन करना यह पूर्ण अधिकार ब्राह्मण का है। क्षत्रियों का शुद्ध अधिकार यह है कि उन्हें बारहवें वर्ष
में व्रतबंध करना चाहिये तथा वैश्यों को सोलहवें वर्ष में व्रतबन्ध करना चाहिये। गायत्री मंत्र के उपदेश के साथ
उपनयनविधि करना यह दूसरा जन्म है इसे 'सावित्री जन्म' कहते हैं। तीनों वर्णों के लोग द्विजन्मा होने के कारण
वेदोक्त विधि के लिये उपयुक्त हैं। उद्धव इसी का नाम वेदोक्त अधिकार लक्षण है। अब मेरे प्रिय भक्त उद्धव!
मेरी पूजाविधि का स्थान बताता हूँ, सुनो।
अर्चायां स्थण्डिलेऽग्नौ वा सूर्ये वाप्सु हृदि द्विजे।
द्रव्येण भक्तियुक्तोऽर्चेत् स्वगुरू माममायया ॥ ९ ॥
मेरी पूजा करने के स्थान आठ प्रकार के हैं। उनके लक्षण ध्यान से सुनो। जो 'प्रतिभा' हमें प्रिय हो वह
मेरी पूजा का पहला स्थान है। जमीन पर स्थंडिल (मिट्टी का चौकोर चबूतरा) बनाकर पूजा करना दूसरा
स्थान है। 'अग्नि का तेज' मेरा ही स्वरूप है, अतः वह मेरी पूजा का तीसरा स्थान है और 'सूर्यमण्डल' में
जो पूजा करते हैं वह मेरा चौथा पूजास्थान है। 'उदक' में मेरा पूजन करना पाँचवाँ पूजास्थान है और 'हृदय'
में मेरा आवाहन करना छठवाँ पूजास्थान है। शालिग्राम मेरा अचेतन स्वरूप है तथा 'ब्राह्मण' मेरा सचेतन
स्वरूप है। वह अखण्ड पूर्ण परब्रह्म ही है। इसलिये उनकी सम्मानपूर्वक षोडशोपचार पूजा करनी चाहिये।
ब्राह्मणों के प्रति जिसकी ब्रह्मभावना होती है उसे अत्यन्त भाग्यवान समझना चाहिये। वह ब्रह्मादिकों को भी
पूज्य है। इतना ही नहीं बल्कि मैं देवाधिदेव भी उसे वंदन करता हूँ सभी पूजनीयों में मुख्यरूप से ब्राह्मण
पूज्य हैं। उद्धव! वही मेरा अत्यन्त श्रेष्ठ सातवाँ पूजास्थान है। इन समस्त पूजनीयों में पूज्यत्व की दृष्टि से
पूजा करने योग्य, वरिष्ठों में भी अति वरिष्ठ, जो मेरा आत्मा ही है वह 'गुरुराजा' सबको वन्दनीय है।
सद्भाव से जिसके चरण छूने से मैं पूर्णब्रह्म सुखी होता हूँ, उसका मद्रूप से स्तवन करने से मुझ परमात्मा को
अत्यन्त उल्हास होता है। सद्गुरु का नामस्मरण भयंकर संसारभय का निवारण करता है। जन्म-मरण का
निराकरण कर निजात्मबोध से पूरी तरह तृप्त कर देता है। मैं परमात्मा नारायण गुरुरूप से प्रकट होकर शिष्य
के द्वारा परब्रह्म का पूर्णत्त्व प्रकाशित करता हूँ। ब्रह्म का परब्रह्मत्त्व सद्गुरु के कारण ही सत्य होता है। गुरु
की महिमा इतनी अगाध और गहन है। सारांश, सद्गुरु ज्ञानधन हैं तथा हरिहर के लिये भी पूर्णरूप से
वन्दनीय हैं। सद्गुरु मेरा सत्स्वरूप अधिष्ठान है तथा आठवाँ पूजास्थान है। उद्धव! मेरे इस आठवें पूजास्थान
का अखण्ड स्मरण रखने से उस स्मरण से ही मेरी पूजा हो जाती है। इस प्रकार इन आठ पूजास्थानों के बारे
में उत्तम लक्षणों से युक्त जानकारी तुम्हें दी। अब उस पूजा के भिन्न-भिन्न प्रकार भी तुम्हें बताता हूँ। इन सारे
अधिष्ठानों में हमें जो सबसे प्रिय लगता हो, उसे ही पूजा का मुख्य लक्षण मानना चाहिये। उसमें भी रहस्य
की पहचान बताता हूँ, सुनो। लोकरंजन करने की प्रवृत्ति छोड़ कर, दंभ के उपाय त्याग कर, कपट का
व्यवहार न कर, सच्चे भक्तिभाव से भजनतत्पर रहना चाहिये। उद्धव! ये जो आठ पूजास्थान बताये, उनमें
निष्कपट रूप से पूजा करना यही सबसे उत्तम पूजन है। उसमें जो निष्कपट सेवा होती है, वह देवाधिदेव को
अत्यन्त प्रिय है। अब पूजा की विस्तृत विधि भी बताता हूँ। सुनो।

सत्ताईसवाँ अध्याय ७१९
पूर्वं स्नानं प्रकुर्वीत धौतदन्तोऽङ्गशुद्धये।
उभयैरपि च स्नानं मन्त्रैमृद्ग्रहणादिना ॥ १०॥
मल विसर्जन तथा दंतधावन कर प्रातःकाल मृत्तिका ग्रहणपूर्वक देहशुद्धि के लिये स्नान करना चाहिये। इस
प्रकार यह मलत्याग स्नान होने के उपरान्त वैदिक-तांत्रिक पद्धति से यथाविधि जैसी दीक्षा ग्रहण की हो उसके
अनुसार मंत्रस्नान करें। सद्गुरु का जो सम्प्रदाय हो, उसके अनुसार परम्परागत आचार का पालन करें। यथाविधि
स्नान कर निर्मल भाव धारण करें।
संध्योपास्यादिकर्माणि वेदेनाचोदितानिमे।
पूजां तैः कल्पयेत् सम्यक् संकल्पः कर्मपावनीम् ॥ ११॥
अपनी-अपनी वर्णाश्रम विधि के अनुसार वेद में जिस प्रकार उल्लिखित है उस प्रकार उन-उन वर्णाश्रमों
में नित्य नैमित्तिक कर्मों के साथ संध्या करनी चाहिये। वेदों के अनुसार स्वकर्म का आचरण करें। निषिद्ध कर्म
और काम्य कर्म का पूर्णरूप से बहिष्कार करें। इसी का नाम है शुद्ध स्वकर्म और उत्तमोत्तम अधिकार। वेदों में
वर्णित स्वकर्म का त्याग करना यही मुख्य रूप से अत्यन्त अधर्म है। परब्रह्म प्राप्त होने पर, कर्म का त्याग किये
बिना ही कर्म अपने आप बन्द हो जाता है। स्वयं ही स्वधर्म का त्याग करना यही अधर्म का मुख्य लक्षण है।
स्वधर्म से चित्त की शुद्धि करनी होती है और इसीलिये अहंता का त्याग करना होता है। इस प्रकार स्वधर्म कर्म
करते समय मन में ऐसा भाव उत्पन्न होता है कि इसमें मैं कर्मकर्त्ता भी नहीं हूँ और फलभोक्ता भी नहीं हूँ। देह
जड़, गूढ़ और अचेतन है। उसे जनार्दन चेतना देता रहता है। उसमें मेरा 'मैं' अथवा मेरा कर्तापन प्रवेश नहीं
करता। ऐसी बुद्धि से किया हुआ कर्माचरण भक्ति के कारण ब्रह्मार्पण ही होता है। इस प्रकार साधकों को मेरी
अभिमानरहित उपासना का लाभ मिलता है। अस्तु ! मेरी प्रतिभा का पूजाविधान यही मेरा प्रथम पूजास्थान है। वे
प्रतिमाएँ कैसे बनायी जाएँ उसके लक्षण बताता हूँ, सुनो।
शैली दारुमयी लौही लेप्या च सैकती।
दनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टधि स्मृता ॥ १२॥
प्रतिमाएँ आठ प्रकार की होती हैं, उनकी पूजा करने से वे तत्काल कल्याण करती हैं। गंडकी नदी में प्राप्त
शालिग्रामादि 'शिला की मूर्ति'—देवदार, मंदार अथवा ब्रह्मकाष्ठ (पीपल) आदि, 'लकड़ी की मूर्ति' अथवा
सुवर्णादि 'धातुओं की मूर्तियाँ' साधकों को तत्काल लाभ प्रदान करती हैं। उसी प्रकार मिट्टी, कपड़ा आदि की
लेप्य मूर्ति तैयार करते हैं, उन्हे लेप्या कहते हैं और कुछ लोग अत्यन्त भक्ति से स्थंडिल पर भी प्रतिमा का चित्र
बनाते हैं। उन्हें लेख्या मूर्ति कहते हैं। बालू की मूर्ति बनाते हैं, उसे 'सिकतामूर्ति' कहते हैं। वह भी सुवर्ण की
मूर्ति की ही तरह पूजनीय है। रत्नों की सुन्दर मूर्ति, हीरे की मूर्ति, मरकत की मूर्ति, नीलमणि की, पद्मराग की
अथवा मोती की मूर्ति भी अत्यन्त पूज्य है। सभी मूर्तियों में जो अत्यन्त श्रेष्ठ है, वह है मनोमय मूर्ति। वह
अत्यन्त पवित्र है। उसकी उपासना करने से साधकों को अत्यन्त समाधान प्राप्त होता है। अब उन प्रतिमानों का
पूजाविधान तथा चल-अचल लक्षण आदि का निरूपण भी श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
चाललेति द्विविधा प्रतिष्ठा जीवमन्दिरम्।
उद्वासवाहने न स्तः स्थिरायामुद्धवार्चने ॥ १३॥

७२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अचेतन को चेतनता देने वाला, जड़ को जीवत्व देने वाला- 'जीवत्व का अर्थ है चिन्मात्रत्त्व' उसे ही
परमेश्वर समझना चाहिये। शुद्ध भक्तिभाव से निर्मित जीव का निज मन्दिर-अर्थात् आगमशास्त्र की सम्मति से
स्थापित स्थावर-जंगम प्रतिमा समझनी चाहिये। साधक यदि 'स्थावर' मूर्ति का पूजन करता है तो उसका
आवाहन या विसर्जन नहीं करना पड़ता। उसमें अधिष्ठान स्वयंभू रहता है।
अस्थिरायं विकल्पः स्यात् स्थण्डिले तु भवेद् द्वयम्।
स्नपन्नंत्वविलेप्यायामन्यत्र परिमार्जनम्॥ १४॥
'जंगम' प्रतिमाओं में भी किसी में आवाहन विसर्जन रहता है और किसी में नहीं रहता। शालिग्राम की
मूर्ति में मेरा स्वयंभू अधिष्ठान ही रहता है। इसलिये इसमें आवाहन या विसर्जन की आवश्यकता नहीं रहती।
शालिग्राम का टूटा-फूटा टुकड़ा भी जिसके पास पूजा में हो वहाँ निज सखा परमात्मा सदा सर्वकाल विद्यमान
रहता है, ऐसा समझना चाहिये। इसके अतिरिक्त अन्य जंगम अर्थात् चलमूर्ति हैं जिन पर आवाहन और विसर्जन
लागू है। उसे निष्ठापूर्वक करना चाहिये। यही आगमोक्त विधि विधान है। स्थंडिल पर बनायी हुई मूर्ति का
आवाहन करें और पूजा होते ही उसका विसर्जन करें। ये दो प्रकार के भावना विधान स्थंडिल पर करना
आवश्यक है। हृदय में स्थित चिद्धन परमात्मा का ही मूर्ति में आवाहन करें और पूजा होने के बाद उसका
विसर्जन कर उसे पुनः हृदय में धारण करें। इसमें, हम स्वयं ही परिपूर्ण ब्रह्म हैं इसका निजस्मरण होने के लिये
ही आवाहन विसर्जन करना होता है। इसके द्वारा साधक को आत्मस्वरूप का स्मरण होता रहता है। आगम शास्त्र
का गूढ़ार्थ यही है कि हम स्वयं ही देवता हैं और स्वयं ही अपने पूजक हैं। इस प्रकार अपनी पूजा में अपने ही
आत्मस्वरूप की पहचान होती हे। स्वयं देव बनकर ही देवता की पूजा करें, यही आत्मस्वरूप का प्रिय खाद्य है
जिसे उपासना काण्ड के रूप में श्रीकृष्ण ने उद्धव को दिया है। आत्मस्वरूप का यह माधुर्य यदि पग-पग पर न
मिले तो उपासना का शुष्क प्रयास कौन करेगा ? यही आगमशास्त्र का गूढ़ रहस्य है। हे उद्धव ! इससे साधक
पग-पग पर सुख-सम्पन्न होकर स्वयं ही चिद्धन बन जाते हैं; ऐसी यह उपासना है। कृष्ण का यह भाषण सुनकर
उद्धव आनन्द से ओतप्रोत हो गया, उसने श्रीकृष्ण के पैर पकड़ लिये और वह निरूपण साद्यंत सुनने की इच्छा
प्रकट की। इस पर श्रीकृष्ण बोले, रुको, यह आगमोक्त गूढ़ साधकों को मेरी कृपा के बिना प्राप्त नहीं होगा। यह
अत्यन्त गहन है। यह मेरा गुप्त धन है। अस्तु ! हे उद्धव ! तुमने पूजा का विधान पूछा था, उसे ध्यानपूर्वक सुनो।
'लेप्या' और 'लेख्या' मूर्तियों को स्नान नहीं कराना चाहिये। अन्य मूर्तियों को यथाविधि स्नान कराना चाहिये।
द्रव्यैः प्रसिद्धैर्मद्यागः प्रतिमादिष्वमायिनः।
भक्तस्य च यथालब्धैर्हृदि भावेन चेवहि ॥ १५ ॥
पूजक यदि सकाम अर्थात् फल की इच्छा करने वाला हो तो पूजा साहित्य यथाविधि रहना चाहिये। पूजा
साहित्य में यदि कमी होगी तो फल भी निर्व्यंग नहीं मिलेगा। भक्त निष्काम हो और उसे पूजा में लगाव हो तो
उसे पूजा साहित्य का कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा क्योंकि भगवान को उपचार की अपेक्षा भाव ही अधिक प्रिय रहता
है। ऐसे समय अनायास जो कुछ भी मिल जाय उसमें भगवान सन्तुष्ट रहता है। वही पूजायोग यथोचित है।
निष्काम वृत्ति हो तो फल, मूल, दूब अथवा निर्मल जल इतने से ही अर्थात् सद्भाव से ही पूरा पूजायोग सफल
होता है। जहाँ मेरा भाव दृढ़ रहता है, वहाँ अन्य उपचारों की क्या प्रतिष्ठा है ? भक्तों का भाव ही मुझे प्रिय
लगता है, इससे मेरे भक्त को भी महासुख का लाभ होता है। जो भी बाह्योपचार किये जाते हैं वे सब प्रतिमा मूर्ति

सत्ताईसवाँ अध्याय ७२१
की पूजा में ही लगते हैं, मानस पूजा में तो इन उपचारों की कोई आवश्यकता नहीं है। वहाँ मन ही मेरी मूर्ति
रहती है और उपचार का साहित्य भी मनोमय ही रहता है। लेकिन यह उपचार सम्पत्ति भी वे मुझे निर्लोभ होकर
अर्पित करते हैं। इससे मैं श्रीपति सन्तुष्ट होता हूँ। अस्तु ! प्रतिमा आदि को लेकर आठ पूजास्थान हैं, उनका भी
यथोचित पूजा विधान तुम्हें बताता हूँ। तो सुनो, उद्धव !
स्नानालंकारणं प्रेष्ठमर्चायामेव तूद्धव।
स्थण्डिले तत्त्वविन्यासो वह्नावाज्यप्लुतं हविः ॥ १६ ॥
सूर्ये चाभ्यर्हणं प्रेष्ठं सलिले सलिलादिभिः।
प्रतिमामूर्ति यह एक पूजास्थान है। उस मूर्ति को जो महाभिषेक करते हैं, उसी को 'स्नान' कहते हैं। मुकुट
आदि सभी अलंकार मूर्ति को पहनायें। जो पदार्थ अत्यन्त अच्छे लगते हों अथवा जो अत्यन्त मूल्यवान अलंकार
हों उन्हें लेकर उनसे श्रद्धापूर्वक श्रीहरि की पूजा करनी चाहिये। स्नान, भोजन, अलंकार आदि सर्वोपचारों के
साथ यथाविधि पूजा करना यही प्रतिमा पूजा का ढंग है। अब स्थंडिल के बारे में सुनो। स्थंडिल पर जो
पूजास्थान होता है, वहाँ तत्त्वों का ध्यान लगाकर उस पर तत्त्वविन्यास का लेखन करना चाहिये। यही उसका
पूजा विधान है। आत्मतत्त्व आदि के विचारों का स्थंडिल पर विचार कर हृदय, मस्तक, शिखा, कवच, नेत्र,
अस्त्र आदि उस पर बनाकर उनका दिशाबन्धन कर पूजा करनी चाहिये। अग्नि की जहाँ पूजा करनी हो, वहाँ
मेरा ध्यान कर घृतपूर्ण आहुति देकर होम करना यही अग्नि का पूजाविधान है। अग्नि देवताओं का मुख है इस
श्रद्धा से हविर्द्रव्य का हवन करना यही 'अग्निपूजन' है। सूर्य में प्रकाशमान होने वाला मंडलात्मा जो सूर्यनारायण
है, उसका सौर मंत्रों से पूजन एवं स्तवन करें। यही सूर्य का पूजाविधान है। श्रुति के अर्थ का विचार करने पर
'आप' अर्थात् जल साक्षात नारायण स्वरूप ही है। उसका यथोचित पूजा विधान है जल में ही जल का तर्पण
करना। 'हृदय' में मेरा जो पूजास्थान है, वहाँ मन से ही मन की पूजा की जाती है। मूर्ति भी मनोमय और
पूजाविधि भी मानसिक। मेरा मुख्य अधिष्ठान है, ब्रह्ममूर्ति ब्राह्मण। उनका दासत्व से आज्ञापालन करना यही
उनका पूजाविधान है। ब्रह्मा को भी जिससे ब्रह्मत्व प्राप्त होता है, वह 'सद्गुरु' तो मेरे सबसे श्रेष्ठ और पवित्र
पूजास्थान है। उसका पूजन इस प्रकार है—स्वयं जीवप्राण से उसकी अनन्य शरण में जाना और उसके वचन पर
प्राण न्योछावर करना। गुरु की छोटी से छोटी सेवा भी चाहपूर्वक करना यही उसकी पूजा का विधान है। इसी से
साधकों को सच्चा सुख प्राप्त होता है। सद्गुरु की सेवा करने से ब्रह्मसायुज्य प्राप्त होता है। गुरुसेवा से श्रेष्ठ
अन्य कोई साधन है ही नहीं। सद्गुरु का स्वरूप यह अखण्डपूर्ण ब्रह्म है। उसका आवाहन और विसर्जन कभी
नहीं करना चाहिये। सम्पूर्ण निष्कपट भाव से जो सद्गुरु की शरण में जाता है, उसका चरण मैं भी वन्दन करता
हूँ। वह इतना धन्य है। निर्लोभ भाव से सहज पूजा करने से भगवान को संतोष होता है। उसी भाव का रहस्य
श्रीकृष्ण बताते हैं।
श्रद्धयोपाहतं प्रेष्ठं भक्तेन मम वार्यपि ॥ १७ ॥
भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते।
गन्धो धूपः सुमनसो दीपोऽन्नाद्यं च किं पुनः ॥ १८ ॥
जो मेरे प्रति अत्यन्त प्रेम और श्रद्धायुक्त अनन्य भक्ति से मुझे केवल उदक अर्पण करते हैं, उससे भी मैं
श्रीपति सन्तुष्ट होता हूँ। वह जलबिन्दु मैं आदिपुरुष अत्यन्त प्रेम से मुख में ग्रहण करता हूँ और मूलतः सुख

७२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वरूप होते हुए भी भक्तकाम के हर्ष से अधिक सुखी होता हूँ। त्रैलोक्य मुझसे सुख प्राप्त करता है, ऐसा सुख
का सागर होते हुए भी, भक्त का उदक पीने से मुझे परम सन्तोष होता है। उस जलबिन्दु से प्रिय मुझे मेरी सुन्दर
लक्ष्मी भी नहीं लगती; ब्रह्मदेव मेरा अपना पुत्र है लेकिन वह भी मुझे उतना अच्छा नहीं लगता। भक्तों के जल
बिन्दु के सामने मुझे मेरा वैकुण्ठ भी फीका लगता है। शेष पर शयन करने का सुख भी उसके आगे हलका
मालूम होता है। भक्तों के उदक के सामने मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता; तिस पर गंधादि के साथ पूजा की,
षड्रस का नैवेद्य मिला। उस पूजा के सुख की त्रिभुवन में कोई उपमा ही नहीं है। भक्तों की भक्ति से मैं श्रीपति
इतना अधिक सुखी होता हूँ। भाव के साथ भक्ति कर स्वयं कृतकृत्य होने का जिसका निश्चय रहता हे उसी के
उदक से मैं तृप्त होता हूँ। अन्य जो ढोंगी भक्त मन में धन की आशा तथा बाहर विरक्ति का ढोंग करता है, लोगों
में प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये मेरी भक्ति प्राप्त करता है, ऐसा अभक्त मुझे छत्र, चामर अथवा गजान्त लक्ष्मी भी
अर्पण करता है तो भी मेरे चित्त में सुख का संचार नहीं होता। दूध और पानी को अलग करने वाले राजहंस के
सामने यदि धुनकने के लिये रुई रखी जाय तो उसे जिस प्रकार संतोष नहीं होता, उसी प्रकार अभक्तों के भजन
पूजन से मुझ हृषीकेश को संतोष प्राप्त नहीं होता। कौओं की गायनकला देखकर जिस प्रकार किन्नरों को संतोष
नहीं होता, उसी प्रकार अभक्तों की भजन लीला देखकर मेरी ज्ञानकला को संतोष नहीं होता। रजस्वला स्त्री द्वारा
बनाया गया पकवान कितना ही उत्तम क्यों न हो लेकिन वह अत्यन्त अमंगल होता है, उसी प्रकार अभक्तों के
भजन को जनार्दन कभी स्पर्श नहीं करता। जिस भजन को नारायण स्पर्श नहीं करता, ऐसे अभक्त के भजन से
जनार्दन को जरा भी संतोष नहीं होता। इस प्रकार भक्त और अभक्त के मार्ग और उनके अधिकार के क्षेत्र बतला
दिये। अब श्रीकृष्ण साद्यंत पूजामार्ग ही बता रहे हैं।
शुचिःसम्भृतसम्भारःप्राग्दर्भैः कल्पितासनः।
आसीनः प्रागुदग् वार्चेदर्चायामथ सम्मुखः॥१९॥
शरीर शुद्धि का स्नान हो जाने के बाद वैदिक तांत्रिक मंत्रस्नान करें तथा नित्यकर्म पूरा करें। इसका नाम है
'शुचिर्भूत' होना। इसके उपरान्त देवपूजा की सामग्री खोज कर उसे पवित्र करें और फिर गंधादिक पूजा सामग्री
यथास्थान रखें। श्वेत कम्बल, मृगचर्म और पूर्वाभिमुख दर्भाग्र आसन बिछाकर उस पर पूर्वाभिमुख अथवा
उत्तराभिमुख होकर बैठें। स्थावर मूर्ति की पूजा करते समय अपना आसन मूर्ति के सामने बिछाएँ। यह निर्दोष
आसनविधि है। अब पूजान्यास आदि के बारे में श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
कृतन्यासः कृतन्यासां मदर्चां पाणिनामृजेत्।
कलशं प्रोक्षणीयं च यथावदुपसाधयेत्॥२०॥
इस प्रकार विधिपूर्वक आसन बिछाकर गुरु को प्रणाम करें; परमगुरु (गुरु के गुरु) तथा परमेष्ठी गुरु
(परमगुरु के गुरु) का भी प्रेमपूर्वक अभिनन्दन करें। गुरु से जो मंत्र मिला हो उस मंत्र का देह पर न्यास करें।
कलश और प्रोक्षण पात्र (पंचपात्र आदि) को उचित स्थान पर रखकर, उसे जल से भरकर, उसमें दूब, चन्दन
आदि पूजाद्रव्य डालें।
तदद्भिर्देवयजनं द्रव्याण्यात्मानमेव च।
प्रोक्ष्य पात्राणि त्रीण्यद्भिस्तैस्तैर्द्रव्यैश्च साधयेत्॥२१॥
उस प्रोक्षण पात्र के जल में उँगलियाँ बिना डुबाये, सारी पूजा सामग्री का उस जल से दर्भ के शीर्ष से

सत्ताईसवाँ अध्याय ७२३
केवल प्रोक्षण करें। उसी से देवपूजाघर का भी प्रोक्षण करें, स्वयं प्रोक्षण कर लें तथा देवपूजा स्थान का प्रोक्षण
कर पूजा प्रारम्भ करें। पाद्य, अर्घ्य और आचमन के लिये तीन पात्र रखें और उनमें पानी भर कर तीनों पात्रों में
भिन्न-भिन्न पदार्थ डालें। श्यामाक, कमल, दूब और विष्णुकांता ये पाद्य पात्रों के शुद्ध द्रव्य हैं। गन्ध, फूल, फल,
अक्षत और दर्भाग्र ये अर्घ्य पात्रों में डाले जाने वाले शुद्ध द्रव्य हैं। इलायची, खस, जायफल, लौंग, कपूर, कंकोल
ये 'आचमनीय' पात्रों में डाले जाने वाले शुद्ध पदार्थ हैं।
पाद्यार्घ्याचमनीयार्थं त्रीणि पात्राणि दैशिकः।
हृदा शीर्ष्णाथ शिखया गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत् ॥ २२॥
जैसी गुरुमंत्र की दीक्षा हो उसके अनुसार मार्ग पकड़कर गुरु सम्प्रदाय के अनुसार, पाद्यादि तीनों पात्र रखें।
हृदय मंत्र से पाद्य दें, शिरोमंत्र पढ़कर अर्घ्य अर्पण करें तथा शिखामंत्र से आचमन करें। आगमोक्त गुरुसंस्कार
जैसा हो उसके अनुसार यह सब करें। ये तीनों पात्र स्वयं गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर देवता को अर्पण करें।
गुरुसम्प्रदाय से पवित्र हो जाने के कारण आत्मद्रष्टा तथा दीक्षा का विवेक जानने वाला जो श्रीकृष्ण है, उसने
स्वयं ही पूजक को 'देशिक' कहा है। आगमशास्त्र का निजमार्ग, भूतशुद्धि और प्राणप्रतिष्ठा का योग, इस
सम्बन्ध में श्रीकृष्ण अगले श्लोक में सब कुछ बता रहे हैं।
पिण्डे वाय्वग्निसंशुद्धे हृत्पद्मस्थां परां मम।
अण्वीं जीवकलां ध्यायेन्नादान्ते सिद्धभाविताम्॥ २३॥
वायु बीज से आवाहन कर, पिंगला नाड़ी से प्राण को पूरी तरह भर कर (दाहिनी नासिका से भीतर की
ओर श्वाँस लेकर, कुंभक से उसे रोक कर मात्रा धारण से धारण करें।) (उदाहरणार्थ—पूरक चार मात्राओं से
करने पर कुंभक १६ मात्राओं से तथा रेचक मात्राओं से करना चाहिये।) वायु को उतनी ही देर तक रोक कर
रखना चाहिये ताकि वह किसी अन्य रास्ते से न निकल जाय और फिर उसे धीरे-धीरे बाहर छोड़ना चाहिये।
ऐसा प्राणायाम करने से शरीर क्षीण हो गया है ऐसी कल्पना करें। इस प्रकार शरीर शुष्क हो गया है, ऐसी
कल्पना कर उसका दहन प्रारम्भ करना चाहिये। मूलाधार चक्र का अग्नि अग्निमंत्रों से जागृत कर और उसे देह
से लगाकर अपना देह भस्म हो गया है ऐसी कल्पना करनी चाहिये। देह अग्नि से अत्यन्त तप्त हुआ है, यह
मानकर उसे चन्द्रमा के बीज से चन्द्रामृत लाकर उससे शरीर को शीतल करना चाहिये। इसमें जिस नये देह की
कल्पना करें वह सभी इन्द्रियों से युक्त, निरोगी और कार्यक्षम हो और उसके हृदय कमल में मेरी आण्विक अर्थात्
सूक्ष्म जीवकला है यह देखें। मेरी वह जीवकला सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म है इसीलिये उसे अणुरूप (अग्नि)
कहते हैं। वही सारे संसार का विश्राम स्थल है। अकार, उकार और मकार को भी अण्वी जीवज्योति ही प्रकाशित
करती है। वह तो शब्दों से परे होने के कारण योगी लोग नाद के अंत में उसे देखते हैं। देह में वह अन्तर्बाह्य
परिपूर्ण से भरी हुई है लेकिन सूक्ष्म होने के कारण उसका आभास नहीं होता। योगी लोग उसे आसन-प्राणायाम
आदि के योग से हृदयकमल में देखते हैं। वह अणुरूपी जीवकला अव्यक्त रहती है, उसे योगी लोग आत्मनिष्ठा
से व्यक्त कर उसकी महामूर्ति का हृदय में चिन्तन करते हैं। 'नार' अर्थात् जीवसमुदाय, उसका 'आयतन' अर्थात्
आधारस्थान, वही श्रीनारायण की महामूर्ति है जिसका सज्जन लोग हृदय में चिन्तन करते हैं।
तयाऽऽत्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पूज्य तन्मयः।
आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्ताङ्गं मां प्रपूजयेत् ॥ २४॥

७२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
दीपक जिस प्रकार घर को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार जीवज्योति देह को प्रकाशित करती है। वही
मेरी साकार मूर्ति का हृदय में चिन्तन करती है। घृत जमने पर स्वयं रंगविहीन होने पर भी रंग, रूप, आकार
लेता है, उसी प्रकार मेरा चैतन्य ढल कर रूप में साकार हो गया है। ऐसी वह मेरी सगुण मूर्ति चिन्मात्र तेज
से हृदय को प्रकाशित करती है। वही सारे देह में समाकर मन में भक्ति उत्पन्न करती है। देह जड़, मूढ़ और
अचेतन है। उसमें चिन्मय मूर्ति प्रकट होकर अचेतन को सचेतन कर उल्हास से भजन करवाती है। हिरन का
स्वांग करने वाला जिस प्रकार हिरन के ही रूप में नाचता रहता है, उसी प्रकार भक्त के रूप में भजन पूजन
करने वाला स्वयं नारायण ही है। इस प्रकार चिन्मय-चिद्धन मूर्ति की पूजा करने से अभेद भक्ति उत्पन्न होती
है और पूज्य और पूजक यह स्मृति सहज ही धुँधली पड़ जाती है। यह भजनभेद समाप्त होते ही भक्ति का
अभेद बोध बढ़ता जाता है। यही अतिशुद्ध, प्रसिद्ध और मुझे प्रिय गुरुमार्ग है। जहाँ मेरी अभेद भक्ति रहती है,
वहाँ मैं स्वानंद प्रेम के उल्लास से पूर्णतया भक्तों के अधीन रहता हूँ। जिस प्रकार अपार वर्षा के जल को
बाँध बनाकर तालाब में एकत्र किया जाता है, उसी प्रकार अभेद भजन के योग से मुझ अनंत से ऐक्य किया
जाता है। जंगल में अतुल वर्षा होने से उत्तम फल नहीं आएगा, लेकिन वर्षा का जल तालाब में एकत्र करने
से उससे अच्छे चावल की खेती हो सकती है। उसी प्रकार मेरा अनंत अपार स्वरूप प्रेमपूर्वक अभेद भावना
के भक्तों में ही दिखाई देता है। तब ब्रह्मानन्द परमोत्कर्ष पर पहुँचता है और भक्ति अपने शिखर पर जा
पहुँचती है। अभेद भावना के भक्त के पास तीर्थ भी पवित्र होने के लिये आते हैं। देव और मानव उसके
चरणों पर गिरते हैं और मैं भगवान भी उसके पास रहता हूँ। अभेद भावना के भक्त के पास सारे तीर्थ आकर
निर्दोष हो जाते हैं। वह भक्ति का मायका है। मुझे भी उनके ही कारण सुख प्राप्त होता है। अभेद भक्ति का
ही नाम 'उत्तम भक्ति' है ऐसा श्रीकृष्ण ने अत्यन्त उल्लास से उद्धव से कहा। अभेद भक्ति के सम्बन्ध में प्रेम
से बताते समय कथा भाग एक ओर रह गया इसका उन्हें स्मरण ही नहीं रहा। भगवान निरूपण भूल गये
लेकिन उद्धव के मन पर भक्ति की पहचान अमिट हो गयी। वह भी अपने उद्धव को भूल गया और कृष्ण
भी अपने अस्तित्व को भूल गये। अभेद भजन के हर्ष से देव और भक्त एक हो गये। दोनों स्तब्ध होकर बैठ
गये और परम सुखी हो गये। उद्धव जब आत्मज्ञान से इतना अधिक पूर्ण था तो फिर उसे पूजाविधान पूजने
की क्या आवश्यकता थी? ऐसी शंका मन में होगी। तो उद्धव के मन में यह था कि यदि मैं चुपचाप बैठा
रहा तो यह निजधाम चला जायेगा। इसलिये वह प्रश्न पूछने लगा। उपासना कांड का गुप्त ज्ञान, आगमोक्त
पूजा विधान आदि वेद का अर्थ उद्धव के बहाने श्रीकृष्ण स्वयं ही बताने लगे। सचमुच, साधकों की जैसी
श्रद्धा हो, वैसी ही सिद्धि प्राप्त हो, इसलिये वेदार्थ का सारा शास्त्रविधि श्रीकृष्ण इस ग्रन्थ में प्रतिपादित कर
रहे हैं। अद्वैत भक्ति के बारे में सुनते-सुनते उद्धव मन में तृप्त हो गया। इससे श्रीकृष्ण को भी समाधान हुआ।
उसने आनन्दपूर्वक कहा, उद्धव! ध्यान से सुनो, आगे का यथोक्त पूजाविधान तुम्हें सुनाता हूँ। पूज्य और
पूजक की एकात्मता का ध्यान दृढ़ कर, उसका ही बाह्य पूजा के लिए प्रतिमा में आवाहन करें। स्वयं प्रतिमा
के सामने बैठ कर, आवाहन मुद्रा दिखाकर, मेरा सारी चित्कला उस प्रतिभा में आ गयी है ऐसी भावना करें।
उस समय मूर्ति की जड़ता का ख्याल न करें, मूर्ति चैतन्यरूप है, ऐसी ही कल्पना करें। इसी का नाम है
मुख्य 'आवाहन'। गुरु के मुख से मिला हुआ मंत्र निर्दोष होता है। इसलिये उस मंत्र से मूर्ति के सर्वांग पर,
आगमशास्त्र के अनुसार सभी न्यास धीरे-धीरे करें। इस प्रकार आवाहन, संस्थापन, संन्निधि, संनिरोधन,
संमुखीकरण, स्वायतन ये मुद्रायें करके दिखायें।

सत्ताईसवाँ अध्याय ७२५
पाद्योपस्पर्शार्हणादीनुपचारान् प्रकल्पयेत्।
धर्मादिभिश्च नवभिः कल्पयित्वाऽऽसनं मम॥ २५॥
पद्ममष्टदलं तत्र कर्णिकाकेसरोज्ज्वलम्।
उभाभ्यां वेदतन्त्राभ्यां मह्यं तूभयसिद्धये॥ २६॥
स्नान मण्डप की कल्पना कर वहाँ चित्स्वरूप देवता को लायें और पाद्य, अर्घ्य, आचमन, मधुपर्क आदि
विधियाँ करें। अभ्यंग से अंगमर्दन कर पुरुष सूक्त से स्नान करायें और स्नान के मण्डप में ही देवता को पीताम्बर
धारण करायें। अन्य यथोक्त पूजन सिंहासन पर ही करायें। उस आसन और पीठावरण के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण
स्वयं बता रहे हैं। सिंहासन पर के आवरण क्रम में आधारशक्ति, मूलप्रकृति, क्षीराब्धि, श्वेतदीप तथा वहाँ के
मनोरम कल्पवृक्ष इत्यादि की वहाँ भावना करें। उसके नीचे सुन्दर रत्न मण्डप, उसमें सुवर्ण के पलंग की कल्पना
करें। उस पलंग के बारे में श्रीकृष्ण बताते हैं धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य ये उस मंचक के चार पैर हैं। अधर्म,
अज्ञान, अनैश्वर्य तथा अवैराग्य ये उस मंचक के चौखट की चार आड़ी लकड़ियाँ हैं। ईश्वर तत्त्व सूत है,
गुणागुण से उसे बुनकर यह मंचक योगयुक्त महामुद्रा से मजबूती से बुना हुआ है ऐसी कल्पना करें। उस मंचक
पर अत्यन्त सुन्दर और सुशोभित शेष कुण्डली मार कर बैठा है तथा उसके पीछे उसके सहस्र फन रत्नों की
दिव्यता से दमक रहे हैं। शेष के वर्तुल में डंठल के साथ निर्मल लाल कमल खिला हुआ है, उसकी आठ
पंखुड़ियाँ हैं जो अपनी मनोहर शोभा बिखेर रही हैं। सत शक्ति यह उस कमलकंद का मूल है तथा ज्ञान उसकी
सरल नाल है और अष्टधा प्रकृति उस कमल की आठ पंखुड़ियाँ हैं। ऐसा वह सुन्दर कमल है तथा षड्विकार
उसके केसर हैं और वैराग्य उसका सुगन्धित मकरंद है। पूर्वादि अष्टदिशा के कमलदलों में उन-उन देवताओं का
न्यास करें। विमला, उत्कर्षिणी ज्ञाना और चौथी क्रियाशक्ति। उसी प्रकार योगा, प्रह्वी, सत्या और ईशाना इन
अष्टशक्तियों की स्थापना करें। उसी प्रकार अनुपम कल्पना से सजे हुए कमल के मध्यभाग में नौवें अनुग्रह की
स्थापना करें। आत्मा, अंतरात्मा और परमात्मा यह देवोत्तम का अगला भाग है। सत्त्व, रज, मोह, तम, यह उस
पुरुषोत्तम का पृष्ठभाग है। इस प्रकार धीरे-धीरे आगमोक्त पीठ न्यास कर देवाधिदेव को सिंहासन पर ले आयें।
छत्र और दो चँवर के साथ अनेक प्रकार के वाद्यों के जयघोष में उचित ढंग से मुद्रा दिखाकर श्रीहरि को आसन
पर बिठायें। मैं सर्वव्यापी होते हुए मेरा आवाहन करते हैं, मुझ निर्विकार को विकार मुद्रा दिखाते हैं। मुझ
ज्ञानस्वरूप को आँखें, निःशब्द को कान तथा मुझ विश्वतोमुख को सुन्दर मुख है ऐसी कल्पना करते हैं। मैं
विश्वपाद होते हुए दो पैरों से चलता हूँ; मुझ विश्वबाहु को चार हाथ हैं; और सर्वगत को एकदेशी स्थान की
कल्पना करते हैं। मुझ निरूपचार को उपचार; मुझ निदेह को अलंकार और सदा सम रहने वाले को शत्रु-मित्र;
ऐसी विचित्र कल्पना करते हैं। मुझ अकर्त्ता को कर्मबन्धन; अजन्मा को जन्म-निधन; नित्य-तृप्त को भोजन; और
निर्गुण को सगुण ऐसी कल्पना करते हैं। इन सबका यही तात्पर्य है कि उपासना काण्ड का निर्वाह हो। उपासकों
की जैसी भावना रहती है, उसके अनुसार मैं उनका देव बनता हूँ। मैं पूर्णकाम होते हुए भी भक्त के प्रेम के लिये
सकाम बनता हूँ। भक्तों का जैसा भाव होता है उसके अनुसार मैं पुरुषोत्तम उन्हें दिखायी देता हूँ। भक्त मेरे प्रति
जैसी भावना रखता है, वैसा ही मैं उसके लिये हो जाता हूँ। वह भावार्थ से मुझे जो भी अर्पण करता है, वह
सहज ही मेरे पास पहुँचता है। मैं सर्वत्र व्याप्त हूँ, भक्त मुझे अर्पण करने के लिये जहाँ भी कहीं बैठा हो लेकिन
वह मुझे अनायास सहज ही अर्पण होता है। मैं देवाधिदेव सर्वत्र उपस्थित हूँ ऐसी प्राणियों में भावना नहीं होती,

७२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इसलिये जहाँ भक्तों की भावना रहती है, वहाँ सहज ही मैं देव प्रकट हो जाता हूँ। सारांश, भक्तों को भावार्थ मुझे
अत्यन्त प्रिय लगता है, उसके आगे मुझे वैकुण्ठ अथवा क्षीराब्धी भी अच्छा नहीं लगता। भक्तों के भावार्थ का
अलंकार धारण करने के लिये मुझ निर्गुण श्रीकृष्ण को सगुण रूप लेना पड़ता है। यह सब भक्तों के भावार्थ के
लिये। इसीलिये मैं अजन्मा होते हुए जन्म लेता हूँ, अकर्मा होते हुए भी कर्म करता हूँ, अनामा होते हुए भी भक्तों
को मनोधर्म से प्रसन्न करने के लिये नाम धारण करता हूँ। निर्गुण के प्रति मन रमने पर वह चैतन्यरूप हो जाता है
और सगुण स्वरूप में मन लीन हो जाने पर साधक स्वयं ही श्रीकृष्णरूप हो जाते हैं। निर्गुण का ज्ञान होना
अत्यन्त कठिन है, इसीलिये यह उपासना की योजना की गयी है। सगुण मूर्ति की भावना मन में रखकर साधना
करने से साधक अनायास तर जाते हैं। यह उपासना विधि का आगमोक्त विधान था। इससे साधकों को भोग और
मोक्ष दोनों साध्य होते हैं और मैं कृपानिधि सन्तुष्ट होता हूँ। अब आवरण पूजा का विधि बताता हूँ।
सुदर्शनं पाञ्चजन्यं गदासीषुधनुर्हलान्।
मुसलं कौस्तुभं मालां श्रीवत्सं चानुपूजयेत् ॥ २७॥
अण्वी-जीवकला को देहावरण, सिंहासन पर शक्ति का आवरण और सुदर्शनादि अस्त्रों के बारे में श्रीकृष्ण
स्वयं ही बता रहे हैं। लपलपाता हुआ तेज धार का 'सुदर्शन'; शोभायमान 'पांचजन्य', शंख, 'नंदक' नाम का
खड्ग और 'कौमोदकी' नामक प्रचण्ड गदा अत्यन्त मजबूत 'शार्ङ्ग' नामक धनुष्य; सुवर्णमय पंख के सरल बाण;
'हल' और 'मूसल' इन प्रबल अस्त्रों की पूजा करें। सशस्त्र सरल आठ हाथ, गले में कौस्तुभ मणि और
वनमाला; कटि के नीचे परिधान किया पीला पीताम्बर, ऐसी मेघ जैसी श्यामवर्ण सुन्दर मूर्ति की कल्पना करें।
साक्षात् लक्ष्मी का पति लेकिन ब्राह्मण ने मारी हुई लात अलंकार के रूप में हृदय पर अंकित करने वाला ब्राह्मण
भक्त देव उस श्रीवत्स चिह्न से विलक्षण शोभा प्रदान करता है। उस वत्स की पूजा करें। चिद्रत्नों के अलंकार में
से गुण बाहर निकाल कर अत्यन्त कुशलतासे पिरोयी हुई वैजयन्ती माला भी हृदय पर लहरा रही है। इस प्रकार
सालंकार और सायुध; शंख, चक्र, पद्मादि के साथ अद्भुत दीखने वाला स्वयंबोध (स्वयंप्रकाश) भगवान जिसके
पास नारदादि सदा उपस्थित रहते हैं। इस प्रकार अलंकारों के साथ पूज्य जो श्रीहरि हैं उसकी पूजा कर फिर
उसके परिवार की पूजा करें। वह पार्षद भी तुम्हें विस्तार से बताता हूँ।
नन्दं सुनन्दं गरुडं प्रचण्डं चण्डमेव च।
महाबलं बलं चैव कुमुदं कुमुदेक्षणम् ॥ २८ ॥
नंद और सुनंद ये सदा देव के पास रहते हैं। गरुड़ तो सदा आँख के सामने खड़ा ही रहता है। चण्ड और
प्रचण्ड ये दोनों ओर रात-दिन खड़े रहते हैं। बल और महाबल ये नेत्र संकेत से ही किसी भी आशा का पालन
करने के लिये तत्पर रहते हैं. और कुमुद और कुमुदाक्ष ये दोनों महाबलि पीछे खड़े रहते हैं। गरुड़ आँखों के
सामने ही खड़ा रहता है; और शेष नंदादिक आठ असामी आठ दिशाओं की ओर रहते हैं। इस प्रकार श्रीहरि के
सान्निध्य में रहने वाला पार्षदावरण है।
दुर्गां विनायकं व्यासं विष्वक्सेनं गुरून् सुरान्।
स्वे स्वे स्थाने त्वभिमुखान् पूजयेत् प्रोक्षणादिभिः ॥ २९ ॥
इसके अतिरिक्त दुर्गा, विनायक, व्यास और विष्वक्सेन को चार कोनों में स्थापित कर, देवताओं के साथ ही
उनका भी पूजन करें। मूल मूर्ति से एकरूप रहने वाले गुरु और परम गुरु का परमेष्ठी गुरु से ऐक्य स्थापित कर

सत्ताईसवाँ अध्याय ७२७
उनका पूजन करें। गुरु-दुर्गादिक तथा अष्ट लोकपालों की, प्रोक्षण पाद्य आदि उपचारों से निश्चल मन से यथासांग
पूजा करें। उस पूजा के क्या उपचार हैं आदि के बारे में श्रीकृष्ण अगले छह श्लोकों में संक्षेप में बता रहे हैं।
चन्दनोशीरकर्पूरकुंकुमागुरुवासितैः ।
सलिलैः स्नापयेन्मन्त्रैर्नित्यदा विभवे सति ॥ ३० ॥
स्वर्णधर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया।
पौरुषेणापि सूक्तेन सामभी राजनादिभिः ॥ ३१ ॥
इलायची, खस, कर्पूर, चन्दन, रोरी, केशर तथा उसमें अगर मिलाकर उससे सुगन्धित किया हुआ जल
स्नान करने के लिये दें। सुगन्धित किया हुआ यह पवित्र गंगा जल शंख में शंखमुद्रा दिखाकर भरें। ऐसा शुद्ध
जल लेकर आपस्तंभ शाखा का 'सुवर्णधर्म' अनुवाक पढ़कर उससे अभिषेक करें अथवा केवल पुरुषसूक्त,
रुद्राभिषेक या विष्णुसूक्त मंत्रों से देवता को स्नान करायें अथवा सामवेद का गायन कर अर्थात् उसमें के राजनादि
साम गाकर उससे देवता को स्नान करायें। द्रव्य की अनुकूलता के अनुसार इस ठाठ से प्रतिदिन महाभिषेक करें।
अन्यथा किसी विशेष पर्व पर अथवा जयन्ती उत्सवों के समय इस प्रकार का स्नान करायें। आगमशास्त्र में वर्णित
सुलक्षण महापुरुष विद्या आदि के साथ देवता को स्नान करायें। देवता का सम्पूर्ण स्नान होने के बाद मंगलारती
करें और फिर देवता को वस्त्र, आभूषण आदि से अलंकृत करें।
वस्त्रोपवीताभरणपत्रस्रग्गन्धलेपनैः ।
अलंकुर्वीत सप्रेम मद्भक्तो मां यथोचितम् ॥ ३२ ॥
देव मेघ की तरह श्यामवर्ण का है। उसकी कटि में जरी का पीताम्बर पहनायें, गले में सुवर्ण यज्ञोपवीत
डालकर कटि में रत्नजड़ित करधनी पहनायें। कंकण चूड़ियों का सुमधुर घोष, पैरों में घुँघरू की झंकार, मस्तक
पर मनोरम मुकुट, कान में कुण्डल तथा हृदय पर सुन्दर महापदक ! कपाल पर जड़ित मोतियों की बेल, उसके
नीचे पीले चंदन का टीका, कंठ में शोभे कौस्तुभ, बाहुओं पर कंकण, उँगलियों में रत्नों से जड़ी अँगूठियाँ और
पीताम्बर की आभा तो ऐसी कि उसके तेज के आगे सूर्य का तेज भी फीका पड़ जाये। भगवान के साँवले अंग
पर शुभ्र चन्दन का लेप शोभा दे रहा है मस्तक पर केशों पर लपेटी पुष्पों की माला है जिस पर भ्रमर अपने
घोंसले बनाने की ताक में हैं। 'वैजयंती' और वनमाला पैरों तक झूल रही हैं और आँखों को भव्य दिखायी दे रही
हैं। इस प्रकार वह मेघ श्याम देव सुशोभित दिखायी दे रहा है। इस प्रकार वस्त्रालंकार भूषणों से श्रीहरि की पूजा
करें। लेकिन पूजा से भी अधिक श्रद्धा मन में होनी चाहिये। भक्त अत्यन्त सम्पन्न हो अथवा दरिद्र हो, जहाँ
परिपूर्ण श्रद्धा होती है वहीं नारायण सन्तुष्ट होता है। सकल पूजा में श्रद्धा ही प्रमाण है। जो अत्यन्त श्रद्धालु होता
है वही देव का अत्यन्त लाडला होता है।
पाद्यमाचमनीयं च गन्धं सुमनसोऽक्षतान्।
धूपदीपोपहार्याणि दद्यान्मे श्रद्धयार्चकः॥ ३३ ॥
इस प्रकार मूर्ति का पूरी तरह शृंगार करने के बाद पाद्य, अर्घ्य और आचमन करें और मधुपर्क विधान कर
श्रद्धायुक्त पूजा करें। गन्ध, अक्षत, अच्छे सुगन्धित फूल, दशांग धूप, दीपदान, नीरांजन आदि साहित्य के साथ
साधकों को पूर्ण श्रद्धा से मेरी पूजा करनी चाहिये।

७२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
गुडपायससर्पींषि शष्कुल्यापूपमोदकान्।
संयावदधिसूपांश्च नैवेद्यं सति कल्पयेत् ॥ ३४ ॥
धूप, दीप, नीरांजन आदि दिखाने के बाद देवता को भोजन अर्पण करें। उनमें नाना प्रकार के पकवान तथा
षड्रसयुक्त भोजन हो। सादे और शर्करायुक्त पराठे, गुजिया, अमृत फल, रबड़ी, दूध औटा कर उसमें बनायी हुई
खीर, विभिन्न प्रकार के बड़े, तिल्ली के तथा बेसन के लड्डू, खट्टे पकौड़े आदि पदार्थ भगवान को परोसें। दूसरी
पंक्ति में सब्जियाँ हों, बीच में पतले और मुलायम चावल का भात हो, उस पर मूँग की दाल तथा घर में तैयार
किया हुआ सुगन्धित घृत हो। गुड और केसर मिलाकर तैयार किया हुआ हलुआ हो, उसी प्रकार छाछ की कढ़ी
हो, आमरस से भरी हुई कटोरी हो जिसे देखकर इन्द्र की भी लार टपकने लगे। नैवेद्य में दही, दूध, मलाई,
शक्कर आदि पदार्थ रखें। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि देवता उपचारों की ओर ध्यान नहीं देते। वे श्रद्धा से
ही तृप्त हो जाते हैं। यदि सामर्थ्य हो तो इतने पदार्थ रोज तैयार कर देवता को नैवेद्य अर्पण करें। अन्यथा किसी
विशेष पर्व पर अर्पण करें। सचमुच, जो अपनी उपास्य मूर्ति हो उसके जयन्ती अथवा विशेष पर्व पर अर्पण करने
का पूजोपचार श्रीहरि बता रहे हैं।
अभ्यङ्गोन्मर्दनादर्शदन्तधावाभिषेचनम्।
अन्नाद्यं गीतनृत्यादि पर्वणि स्युरुतान्वहम्॥ ३५ ॥
आगमशास्त्र में बताये गये पर्व अथवा अन्य वार्षिक पर्व आते हैं, अथवा अपनी उपास्य मूर्ति की जयन्ती
आती है उस दिन की पूजा श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं। दंतधावन, उद्वर्तन, अभ्यंजन मूर्ति को देकर पंचामृत से स्नान
करायें और नाना प्रकार के आभूषणों के साथ उसकी पूजा करें। इसके उपरान्त उसे षड्रस अन्न का नैवेद्य अर्पण
करें। फिर हाथ धोने के लिये सुगन्धित उदक देकर मुखशुद्धि के लिये ताम्बूल अर्पण करें। देव को अपने देवत्व
का विस्मरण हो गया था। वह देवत्व अब उसे प्राप्त हो गया, इस भावना से देवता को दर्पण दिखायें। इससे
भगवान को सन्तोष प्राप्त होता है। विशेष पर्व के दिन अथवा जयंती के दिवस पर संत वैष्णवों को एकत्र कर,
प्रेमपूर्वक रात-दिन गीत, नृत्य और कीर्तन का आयोजन करें। उसी प्रकार शास्त्रों के अनुसार दीक्षा लेकर हवन
करने से भी देवता तत्काल प्रसन्न होता है। उद्धव ! उस होम का विधिविधान भी अच्छी तरह ध्यान देकर सुनो।
विधिना विहिते कुण्डे मेखलागर्तवेदिभिः।
अग्निमाधाय परितः समूहेत् पाणिनोदितम् ॥ ३६ ॥
परिस्तीर्याथ पर्युक्षेदन्वाधाय यथाविधि।
प्रोक्षण्याऽऽसाद्य द्रव्याणि प्रोक्ष्याग्नौ भावयेत माम्॥ ३७॥
कुण्ड का विधान अर्थात् आगमशास्त्र में वर्णित उसकी लम्बाई, चौड़ाई, गहराई तथा कोनों का प्रमाण
लेकर ऊँचाई भी ठीक तरह से नाप लें तथा कुण्ड तैयार करें। अपनी शाखा के वेद में वर्णित मेखला के साथ गर्त
को साधकर योनि के साथ यथोक्त लक्षण की वेदी तैयार करें। उस पर अग्न्याधान कर जो अग्नि तैयार किया गया
हो, उसका करस्पर्श कर परिसमूहन करें। दर्भ से परिस्तरण करें और तदुपरान्त परिसमूहन करें। दर्भ से परिस्तरण
करें और तदुपरान्त पर्युक्षण करें। इध्माबर्ह का विसर्जन कर उस पर त्रिसंधान रखें। बर्ही का आस्तरण कर उस पर
घृत का बर्तन रखें। व्याहर्तीं से समिधाओं का होम करने की क्रिया को 'अन्वाधान' कहते हैं। प्रोक्षणीपात्र का जो

सत्ताईसवाँ अध्याय ७२९
विधान हो उसे पूरा कर उसे जल से पूरा भर लें। फिर दर्भ (कुश) के शीर्ष से उसमें का उदक लेकर सारे
होमद्रव्यों पर प्रोक्षण करें। फिर कुण्ड के प्रदीप्त अग्नि में मेरा ध्यान करें। उस ध्यान की मूर्ति का लक्षण स्वयं
श्रीकृष्ण ही बताते हैं।
तप्तजाम्बूनदप्रख्यं शङ्खचक्रगदाम्बुजैः।
लसच्चतुर्भुजं शान्तं पद्मकिञ्जल्कवाससम् ॥ ३८ ॥
स्फुरत्किरीटकटककटिसूत्रवराङ्गदम्।
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम् ॥ ३९ ॥
तप्तसुवर्ण की कांति के समान उस मूर्ति की अंग कांति है तथा अत्यन्त सुशोभित और चिन्मात्र गाभा वाली
ऐसी साकार है। हाथ में शंख, चक्र, पद्म ये अस्त्र कटि पर पीताम्बर, आभा ऐसी कि उसके आगे अग्नि की आभा
भी फीकी पड़ जाय। मुकुट, कुण्डल, मेखला अर्थात् कमरपट्टा, वक्षःस्थल पर शोभा देने वाला श्रीवत्सलांछन, पैरों
तक लटकने वाली वनमाला और गले में झलकने वाला कौस्तुभमणि, ऐसी मूर्ति का ध्यान करें।
ध्यायन्नभ्यर्च्य दारूणिहधिषाभिघृतानि च।
प्रास्याज्यभागावाधारौ दत्त्वा चोज्यप्लुतं हविः ॥ ४० ॥
इस प्रकार अग्नि में यथासांग मेरे ध्यान की कल्पना कर, उसका आवाहन और पूजन कर विधियुक्त होम
की शुरुआत करें। अग्नि का विधियुक्त आवाहन कर समिधायें घृत में भिंगो कर पहले होम में दो आज्य भाग की
आहुति दें। उसमें तिल्ली, घृत आदि होमद्रव्य लेकर घृत में भिंगोकर आगमोक्त विधि से होम करें। वह विधान
श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
जुहुयान्मूलमन्त्रेण षोडशार्चावदानतः।
धर्मादिभ्यो यथान्यायं मन्त्रैः स्विष्टकृतं बुधः ॥ ४१ ॥
देवता के मुख की ओर ध्यान देकर साधकों को अष्टाक्षरी मूलमंत्र से होम करना चाहिये अथवा पुरुषसूक्त
की सोलह ऋचायें पढ़ कर होम करने की भी विधि है। पहले बताये गये पीठार्चन में से धर्मादिक देवताओं को,
तथा अन्य देवताओं की यदि पूजा की हो तो उन्हें भी नाममंत्र से एक-एक अवदान दें। फिर साधक को
'स्विष्टकृता' का भी विधियुक्त अवदान करना चाहिये। मेरा ऐसा भजन सज्ञान भक्त जानते हैं। होम आदि की
सहायता से मूर्तिभजन की विधि से साधकों को तत्काल सिद्धि प्राप्त होती है और हे उद्धव! ऐसे भक्त ब्रह्मपद
प्राप्त करते हैं यह निश्चित रूप से जान लो।
अभ्यर्च्यथ नमस्कृत्य पार्षदेभ्यो बलिं हरेत्।
मूलमन्त्रं जपेद् ब्रह्म स्मरन् नारायणात्मकम् ॥ ४२ ॥
इस प्रकार विधियुक्त होम और पूजन कर देव को साष्टांग नमस्कार करें और फिर देव के सेवकों को बलि
अर्पण करें। इसके उपरान्त जहाँ बाह्य प्रतिमा का पूजास्थान हो वहाँ जाकर ध्यानपूर्वक मूलमंत्र का स्मरण करें।
पूज्य और पूजक से जो भिन्न नहीं है उस परात्पर नारायण को उस परब्रह्म के प्रति मन में ध्यान कर अंतःकरण से
आसन लगायें। ध्यान में जब तक मन स्थिर रहे तब तक आसन स्थिर रखें। जब वहाँ मन को शान्ति मिले तो
अगली पूजा विधि कैसी हो इसके बारे में श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।

७३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
दत्त्वाऽऽचमनमुच्छेषंविष्वक्सेनाय कल्पयेत्।
मुखवासं सुरभिमत् ताम्बूलाद्यमथार्हयेत्॥ ४३॥
इस प्रकार ध्यान का विसर्जन होने पर देवता का भोजन हो गया ऐसी कल्पना कर, उसे शुद्ध आचमन
अर्पण करें। अग्नि का मूर्तिध्यान एवं स्वयं पूजी हुई प्रतिमा इन दोनों स्थानों में यथोक्त रीति से शुद्ध आचमन
समर्पित करें। देवता के नैवेद्य का अवशिष्ट भाग विष्वक्सेना को दें और फिर जूठन साफ करवाये। देवता के हाथ
धुलवायें। कर्पूर मिलायी हुई सुपारी के कतरे, पके पान का ताम्बूल, कत्था आदि मिलाकर रुचि के लिये दें।
इलायची, लौंग, कंकोल, थोड़ा जायफल, इन पदार्थों से युक्त ताम्बूल से देव का मुख रंग जाता है और अत्यन्त
सुन्दर लगता है। चोवा, (चंदन से तैयार किया एक सुगन्धित पदार्थ) कस्तूरी, बुक्का तथा पुष्पांजलि अर्पण करें।
अब जिससे श्रीकृष्ण शीघ्र प्राप्त होंगे उस प्रेम के बारे में श्रीहरि बता रहे हैं।
उपगायन् गृणन् नृत्यन् कर्माण्यभिनयन् मम।
मत्कथाःश्रावयञ्छृण्वन् मुहूर्त क्षणिको भवेत्॥ ४४॥
ज्ञान, ध्यान, उपासना ये सब गौण बातें हैं; देव भाव का भोक्ता। सचमुच देव भाव से ही प्राप्त होता है।
मन ध्यान से फिसल जाय तो मेरा नामस्मरण करें; अथवा आदरपूर्वक मेरे गुणों का श्रवण करें। हरि के गुणों का
अथवा हरि के यश का श्रवण करने से अंतःकरण को सुख प्राप्त होता है। उस सुख से उत्स्फूर्त हो स्वयं
हरिकीर्तन करें। बहुरुपिया की तरह स्वच्छंद होकर हरि के सभामण्डप में नाचें गायें। गोवर्धन पर्वत किस तरह
उठाया होगा इसका अभिनय स्वयं करके दिखायें और फिर आसन जमा कर राम ने शिव का धनुष किस प्रकार
तोड़ा इसका प्रदर्शन करें। पूतना का प्राणहरण, कुवलय हाथी का संहार अथवा मल्लमर्दन का प्रदर्शन कर फिर
हरिकीर्तन करें। प्रेम का आविर्भाव अद्भुत होता है। उसमें गद्य, पद्य, नामप्रबन्ध, भुजंग प्रयातादि छंद में भक्त
आनन्दपूर्वक स्तुतिगोत्र गाते हैं।
स्तवैरुच्चावचैः स्तोत्रैः पौराणैः प्राकृतैरपि।
स्तुत्वा प्रसीद भगवन्निति वन्देत दण्डवत्॥ ४५॥
मेरे स्तुतिस्तोत्र और पुराण आदरपूर्वक श्रवण करें। कोई सुनने वाला हो तो स्वयं ही कथा का निरूपण
करें। स्तोत्रपठन यदि शुद्ध पढ़ने में या ठीक तरह से गाने में कठिनाई हो तो भी प्रेम से कहने वाले को दोष नहीं
लगता। बल्कि उससे महादोष का निर्मूलन ही होता है। वेदों के उपनिषदों का पठन, अथवा ऋचामंत्रों से हरि का
स्तवन, इनमें लौकिक दृष्टि से ऊँच-नीच का भाव है किन्तु देवता को भक्तिभाव के कारण दोनों ही प्रिय हैं।
पुराणों के बड़े-बड़े स्तोत्र पढ़े या केवल नाम ले लें, अर्थ और भाव की दृष्टि से मैं उन्हें एकसमान मानता हूँ।
कोई भोला भाला व्यक्ति जिसे वेद, शास्त्र, पुराण आदि कुछ भी समझ में न आता हो, और वह प्राकृत में ही
स्तवन करे तो भी मैं श्रीकृष्ण सन्तुष्ट होता हूँ। वेद पठन करने में यदि कोई स्वर-वर्ण चूक जाता है तो पठन
करने वाले को दोष लगता है; किन्तु प्राकृत में ही श्रीहरि का स्तवन करें तो उससे दोषों का निर्दलन होता है।
शास्त्रश्रवण के लिये अथवा पुराण प्रवचन के लिये पंचमी-सप्तमी आदि विभक्तियों का ज्ञान आवश्यक होता है
किन्तु प्राकृत में नामकीर्ति यदि अशुद्ध भी गायी जाय तो भी वह भगवत्प्राप्ति करा देती है। संस्कृत भाषा यदि
भगवान ने बनायी तो क्या प्राकृत चोरों ने बनायी? इसमें केवल पक्षाभिमान की बात है। ईश्वर के काम में
अभिमान की बात नहीं होती है। चाहे वेदशास्त्र हो या पुराण हो, या प्राकृत भाषा में स्तवन हो, उसमें भक्तिभाव

सत्ताईसवाँ अध्याय ७३१
ही मुख्य है। उसी से नारायण सन्तुष्ट होता है। देव को भक्ति-प्रेम की ही चाह है। वह भाषा का आडम्बर नहीं
देखता। भाविक का भावार्थ ही उसे प्रिय लगता है। इसलिये देव के लिये भक्तों की बात टालना कठिन हो जाता
है। सारांश, भक्तिभाव से स्तवन करने से देव भक्तों के वश में हो जाता है। इसलिये भक्तिभाव से ही नमस्कार
कर हरि चरणों में मत्था नवाना चाहिये। मुहूर्त, निमेष अथवा क्षणभर के लिये भी यदि मन हरिचरणों में सुखी
हुआ तो उस सुख से अन्य कार्य सहज ही सम्पन्न हो जाते हैं। जिससे मेरा अनुसंधान टूट रहा हो, ऐसा कर्म छोड़
दें और जिससे मन स्वरूपनिष्ठ हो कर रहे, ऐसा ही समाधान रखें। जिससे भगवान को सप्रेम नमन करने से
नित्य नया समाधान प्राप्त होता हो, उस नमन का क्या लक्षण है? तो साष्टांग दण्डवत् यही लक्षण है। हाथ से
डण्डा छूट रहा हो फिर भी जो आगे-पीछे मुड़ कर नहीं देखता उसी प्रकार देहाभिमान त्याग कर अहेतुक होकर
साष्टांग दण्डवत् करें। देह की ओर ध्यान देते हुए भी जो परमार्थ सिद्धि के लिये नमन करता है उसका लक्षण
श्रीकृष्ण बताते हैं।
शिरोमत्पादयोः कृत्वा बाहुभ्यां च परस्परम्।
प्रपन्नं पाहि मामीश भीतं मृत्युग्रहार्णवात्॥ ४६॥
भक्त मेरे चरणों पर शीश रखकर दोनों पैर भक्तिभाव से पकड़ता है और कहता है कि संसारसागर के गर्भ में
मृत्युरूपी मगर ने मुझे पकड़ रखा है; इसलिये हे जगज्जेती, मुझे इस मगर की पकड़ से बचाइये। संसार भय से
आक्रांत होने के कारण मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ। मुझे जन्म-मरण की बाधा से मुक्त कीजिये। मैंने भक्तिभाव से
तुम्हारे पूज्य चरण कस कर पकड़ रखे हैं। तुम्हारे जैसा स्वामी मेरी रक्षा में हो तो बेचारा मृत्यु मुझे कैसे मार सकता
है ? इसलिये भक्तिभाव से आपके चरणों पर दण्डवत कर रहा हूँ। हे कृपालु! कृपा करके मेरा उद्धार करें। वह
साष्टांग नमस्कार और भयभीत होकर किया हुआ स्तवन सुनकर नारायण प्रसन्न हुआ ऐसी मन में भावना करें।
इति शेषां मया दत्तां शिरस्याधाय सादरम्।
उद्वासयेच्चेदूद्वास्यंज्योतिर्ज्योतिषि तत् पुनः॥ ४७॥
तदुपरान्त मैंने दिया हुआ शेष प्रसाद प्रसन्नतापूर्वक धारण करें। जहाँ प्रसिद्ध अचल (स्थावर) मूर्ति हो, वहाँ
विसर्जन विधि नहीं करनी चाहिये। किन्तु जहाँ चल (जंगम) प्रतिमामूर्ति हो, उसमें जिस आत्मज्योति से
आवाहन किया हो, उस ज्योति को पुनः अपने हृदय में स्थापित करें। पुनः उसका अपनी आत्मज्योति से मिलन
करायें। इस प्रकार विसर्जन तक की पूजा-विधि सुनकर उद्धव के मन में आया कि साधकों की पूज्य मूर्ति कौन-
सी है? उद्धव का यह मनोगत जानकर उसके सम्बन्ध में ही देव बताते हैं।
अर्चादिषु यदा यत्र श्रद्धा मां तत्र चार्चयेत्।
सर्वभूतेष्वात्मनि च सर्वात्माहमवस्थितः॥ ४८॥
उद्धव! जिसे जो मूर्ति अच्छी लगी हो, वह उसके लिये पूज्य है, इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। विष्णु,
ब्रह्मदेव, सूर्य, शिव, शक्ति अथवा गणपति इनमें से किसी भी मूर्ति में मैं सर्वात्मा समान हूँ। किसी भी प्रतिमा का
पूजन करो लेकिन वह पूजा मेरे लिये समान है। भक्तों का प्रेम जिसमें अधिक रहता है, उसके अधीन मैं परमात्मा
रहता हूँ। बच्चे के साथ खेलते समय जिस प्रकार माँ उसी की इच्छा के अनुसार खेलती है। उसी प्रकार भक्त प्रेम
की लीला के अनुसार मैं भी क्रीड़ा करता हूँ। मैं इन सभी प्राणियों में तथा अवतारों में लिये गये देह में एक
समान हूँ, इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। उद्धव! मैं जहाँ न रहूँ ऐसा कोई स्थान ही नहीं लेकिन प्राणियों का भाग्य

७३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जरा देखो। वे ऐसे विश्वास से मेरा भजन नहीं करते। जो जहाँ भी मेरा भजन करने बैठता है, वहाँ मैं उसे वैसा
ही दिखायी देता हूँ, यह रहस्य उपासना मार्ग प्रकट करने के बहाने सहज ही प्रकट किया। उपासनाकाण्ड का
मर्म यही है कि समस्त प्राणियों में मैं देवाधिदेव हूँ। यह बात जिनकी समझ में नहीं आती उनके लिये यह मूर्ति
प्रकार बताया। मेरी प्रतिमामूर्ति ही क्यों न हो, लेकिन वह भी चिदात्मरूप मैं ही हूँ। उद्धव! उसकी भावपूर्ण भक्ति
करने से भी भक्तों का उद्धार होता है।
एवं क्रियायोगपथैः पुमान् वैदिकतान्त्रिकैः।
अर्चन्नुभयतः सिद्धिं मत्तो विन्दत्यभीप्सिताम्॥ ४९॥
सारांश, क्रियायोग का लक्षण वैदिक और तांत्रिक अर्थात् मिश्र है। उसका वेदशास्त्र में अत्यधिक विस्तार
है। उसका थोड़ा सार-तत्त्व तुम्हें बताया। इस क्रियायोग के भजनमार्ग से भक्त यदि भोग और मोक्ष माँगे तो इन
दोनों की सिद्धि श्रीहरि उन्हें तत्काल देता है। भक्त यदि निष्काम बुद्धि से अनन्य भक्ति करने लगे तो भोग मोक्षादि
सम्पत्ति लेकर मैं श्रीपति उसके द्वार पर उसकी सदा प्रतीक्षा करता रहता हूँ।
मदर्चां सम्प्रतिष्ठाप्य मन्दिरं कारयेद् दृढम्।
पुष्पोद्यानानि रम्याणि पूजायात्रोत्सवाश्रितान्॥ ५० ॥
मेरे भक्त अत्यन्त प्रेम से मेरी निर्व्यंग प्रतिमा तैयार कराकर सद्भाव से स्थापित करते हैं और मजबूत
देवालय बनवाते हैं। वन, उपवन, उद्यान, पुष्पवाटिका आदि का आयोजन करते हैं और विधियुक्त नित्य पूजा कर
उत्साहपूर्वक महापूजा करते हैं। उस देवता की यात्रा का आयोजन हो, बहुजन समाज एकत्र हो, वार्षिक पर्व में
महापूजा आयोजित हो और वह अखण्ड चलती रहे, इसके लिये श्रीकृष्ण सहज उपाय बताते हैं।
पूजादीनां प्रवाहार्थं महापर्वस्वथान्वहम्।
क्षेत्रापणपुरग्रामान् दत्वा मत्सार्ष्टितामियात् ॥ ५१ ॥
नित्यपूजा, महापूजा अथवा वार्षिक पर्व नियमित रूप से चलें इसके लिये राजा ग्रामवासियों को कुछ वार्षिक
सहायता देकर निर्वाह की व्यवस्था करता है। 'क्षेत्र' अर्थात् बड़ा खेत, 'बाजार' उस बाजार में होने वाली आमदनी
देता है, जो बिना बाजार के होता है, वह है 'ग्राम'। अब 'पुर' का अर्थ सुनो। 'बाजार' जहाँ लगता है वह है 'पुर'
अर्थात् शहर। इस प्रकार जो लोग देवालय को अर्पण करते हैं, वे सर्वत्र मेरा ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं। देवालय में मूर्ति
की प्रतिष्ठा करने से अथवा पूजा करने से कर्त्ता को क्या फल मिलता है, इसके सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
प्रतिष्ठया सार्वभौमं सद्मना भुवनत्रयम्।
पूजादिना ब्रह्मलोकं त्रिभिर्मत्साम्यतामियात् ॥ ५२ ॥
जो मूर्ति की प्रतिष्ठा करके रखता है, उसे सार्वभौम राज्य प्राप्त होता है, जो स्वयं देवालय बनवाता है, वह
त्रिभुवन का स्वामी बनता है। जो पूजाविधान करता है वह सत्यलोक में जाता है। जो ये तीनों बातें करता है उसे
मेरे जैसा ऐश्वर्य प्राप्त होता है। ये तीनों प्रकार के साधक सकाम होते हुए भी अपने इच्छित लोक में जाते हैं।
लेकिन जो निष्काम भक्त होते हैं, उन्हें क्या प्राप्त होता है, उनका लक्षण श्रीकृष्ण अत्यन्त आदर से बता रहे हैं।
मामेव नैरपेक्ष्येण भक्तियोगेन विन्दति।
भक्तियोगं स लभते एवं यः पूजयेत् माम् ॥ ५३ ॥

मुख्यरूप से मुझे अंतःकरण में रखकर जो मेरा निष्काम भजन करते हैं, जो निष्कामता में अनन्य होते हैं, वे
पुरुष मैं बन जाते हैं। विद्यमान स्वरूप में रहते हुए भी वास्तव में मेरा ही स्वरूप रहते हैं। हम दोनों में कोई अन्तर
नहीं होता। निष्काम भजन करने के कारण वह भक्त मुझ जैसा हो जाता है। 'समान' भी क्यों कहा जाय, उसमें
और मुझमें कोई भेद नहीं रहता। इस प्रकार वह भक्त मुझमें और मैं भक्त के अन्दर-बाहर मिलकर विचरते रहते
हैं। गुड़ जिस प्रकार माधुरी से अभिन्न रहता है या जिस प्रकार लहरें समुद्र से अभिन्न रहती हैं, उसी प्रकार वह
और मैं अभिन्न रूप में रहते हैं। इस प्रकार जो निष्काम भक्ति करता है वह चराचर में धन्य है। अब जो देवता को
और ब्राह्मण को दी हुई वृत्ति (खेत इत्यादि) हरा करता है, वह अघोर नरक में जाता है। उसके बारे में भी सुनो।
यः स्वदत्तां परैर्दत्तां हरेत सुरविप्रयोः।
वृत्तिं स जायते विड्भुग् वर्षाणामयुतायुतम्॥ ५४॥
कर्तुश्च सारथेर्हेतोरनुमोदितुरेव च।
कर्मणां भागिनः प्रेत्य भूयो भूयसि तत्फलम्॥ ५५ ॥
जो देवालय की प्राप्ति का हरण करता है, ब्राह्मण की वृत्ति का अपहार करता है, वह करोड़ों वर्ष तक
सुअर की योनी में जन्म लेकर विष्ठा खाता रहता है। उसी प्रकार ब्राह्मण की वृत्ति हरण करने के काम में जो
सहायता करता है, अथवा उसका जो अनुमोदन करता है, वे तीनों अघोर नरक में जाते हैं। उद्धव! वे जन्म-मरण
के भँवर में फँस कर वही फल मर-मर कर बार-बार भोगते रहते हैं। मेरी प्राप्ति की यदि मन में इच्छा हो तो मन
को अकर्म का स्पर्श नहीं होने देना चाहिये। अधर्म कर्म की बात नहीं करनी चाहिये। किसी के दोष नहीं देखने
चाहिये, किसी को चोट पहुँचे ऐसी बातें नहीं करनी चाहिये और प्राणिमात्र का द्वेष कभी नहीं करना चाहिये।
दूसरे की निन्दा कभी नहीं सुननी चाहिये, दूसरे के दोष नहीं कहने चाहिये, अधर्म के भाषण में कभी भी किसी
से नहीं मिलना चाहिये। त्रिभुवन के सारे पातक जिसे अपने माथे पर लेने हों, वह अपने मुख से साधुओं की
निन्दा कर सकता है। दुःखों की सारी राशियाँ अपने पास आ जायें ऐसी जिसे इच्छा हो वह अवश्य ब्रह्मद्वेष करे।
सारा समय व्यर्थ ही बीत जाय, ऐसी जिसे इच्छा हो वह रात-दिन चौपड़ का खेल रचाये। हृदय में रहने वाला, मैं
आत्माराम, स्वतः सिद्ध परब्रह्म हूँ उसके दुर्गम होने के लिये ही संसार को अधर्म कर्म लगा हुआ है। वह
कर्माकर्म नष्ट करना अत्यन्त आसान है। पुरुषोत्तम, अच्युत, रामराम का अखण्ड नामस्मरण करते रहना चाहिये।
जहाँ हरिनाम का अखण्डघोष चलता है, वहाँ कर्माकर्म की राशियाँ पूरी तरह जल जाती हैं। उनकी जरा-सी राख
भी शेष नहीं रह जाती। हरि का नाम इतना पवित्र है। हरि का नाम सारे पापों का विनाश करता है, यह बात सारे
शास्त्र बता रहे हैं। ऐसा होते हुए भी जो इसमें सन्देह करता हो उसे वज्रपापी समझना चाहिये। श्रीमहाभागवत्
ऐसे वज्रपापों के पर्वत भी भस्म कर देता है। जनार्दन की कृपा से वह मुझे अनायास प्राप्त हो गया है। इस
भागवत का अर्थ यही है कि हरि का नाम अत्यन्त समर्थ है। इस सम्बन्ध में हरि ने स्वमुख से पराकाष्ठा का
वर्णन किया है। यहाँ भी जो विकल्प करे उसे संसार में अत्यन्त भाग्यहीन समझना चाहिये। विकल्प के कारण
वह महादोषों के दुःख सागर में डूबा ऐसा समझना चाहिये। संकल्प-विकल्प के ही कारण लोगों के दृढ़बन्धन
को काटने के लिये एक जनार्दन का नाम ही समर्थ है। कैसा भी भवभय क्यों न हो लेकिन जनार्दन का नाम
उसका विनाश कर देता है। वह नाम जो अंतर-प्रेम से स्मरण करता है, वह स्वयं ही पुरुषोत्तम बन जाता है।
स्वयं ही पूर्ण ब्रह्म कैसे बनें इस विषय का सुमधुर निरूपण अट्ठाइसवें अध्याय में श्रीकृष्ण उद्धव को सुनायेंगे।

७३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वह कथा कान में पहुँचते ही जीव को स्वयंभू सुख प्राप्त होगा और भीतर-बाहर वह भर जाएगा। जिस कथा की
माधुरी प्राण जाने पर भी नहीं छूट सकेगी, ऐसा रसमय निरूपण श्रीकृष्ण उद्धव को सुनायेंगे। उसे सुनते ही
ब्रह्मभाव उत्पन्न होगा। यह अट्ठाइसवाँ अध्याय ब्रह्मसुख की संचित निधि है, यह ध्यान रखो। इसकी सूक्ष्म से
सूक्ष्म बात श्रीकृष्ण उद्धव को स्पष्ट करके बतायेंगे। यह कृष्ण-उद्धव का आत्मज्ञान है। एकनाथ जनार्दन की
शरण में जाकर बिनती करता है कि आपकी पूर्ण कृपा से श्रोतागण इधर मेरी ओर ध्यान दें। श्रोताओं के ध्यान देने
से ग्रन्थ के निरूपण का उल्हास बढ़ता है। इसलिये एकनाथ जनार्दन की शरण जाकर उनके चरणों का वन्दन कर
रहा है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धव संवादे एकाकार टीकायां
प्रकृति पुरुष सांख्य योग नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

अठ्ठाईसवाँ अध्याय
हे परम सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। हे सद्गुरु पुरुषोत्तम ! तुम्हारी जय हो। हे सद्गुरु परब्रह्म ! तुम्हारी जय हो।
ब्रह्मा को 'ब्रह्म' यह नाम तुम्हारे ही कारण प्राप्त हुआ है। हे चित्तैक्य स्वरूपी सद्गुरु। तुम्हारी जय हो। इन साकार
और निराकार पदार्थों में चिद्रूप से तुम ही भरे हुए हो। हे सद्गुरु सत्क्षेत्र ! तुम्हारी जय हो। सद्गुरु सत्पात्र ! तुम्हारी
जय हो। हे स्वानंदपूर्ण सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। हे स्वानंदघन सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। आनन्द को मधुरता
तुम्हारी ही कारण आयी है। हे देव-अग्रणी सद्गुरु। तुम्हारी जय हो। हे देवशिरोमणि ! तुम्हारी जय हो। हे देवश्रेष्ठ
गुरुराया ! सारे देवता तुम्हारे चरणों को प्रणाम करते हैं। हे जीवादिजीव तुम्हारी जय हो। हे शिवादिशिव ! तुम्हारी
जय हो। हे देवादिदेव तुम्हारी जय हो। हे अभिनव गुरुराया ! तुम्हारी जय हो। हे सद्गुरु सुखसम्पन्न ! तुम्हारी जय
हो। हे सद्गुरु सुखनिधान तुम्हारी जय हो। हे सुखैकघना सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। सुख को सुख भी तुम्हारे ही
कारण प्राप्त हुआ है। तुम्हारे ही कारण आनन्द को निजानंद प्राप्त होता है; तुम्हारे ही कारण बोध को निजबोध का
लाभ होता है; तुम्हारे ही कारण ब्रह्म को ब्रह्मत्व प्राप्त होता है। तुम्हारे जैसे समर्थ एक तुम ही हो। ऐसे श्रीगुरु तुम
अनंत हो। तुम्हारे स्वरूप का अंत नहीं है। तुम कृपालु होकर अपने भक्तों को निजात्म स्वरूप से ज्ञान प्रदान करते
हो। अपने निजरूप का बोध करा कर देव-भक्त का भाव नहीं रहने देते हो। उस पर पुनः पूर्ण अद्वैतभाव से
आत्मभजन कराते हो। गंगा समुद्र में मिलने पर भी उस पर चमकती रहती है, उसी प्रकार भक्त तुम्हारे साथ मिल
जाने पर भी तुम्हारे ही कारण तुम्हारा भजन करते हैं। अद्वैतभाव से तुम्हारी भक्ति करने से तुम्हें परमसंतोष होता है
और प्रसन्न होने पर तुम शिष्य के हाथों आत्मसम्पत्ति अर्पण करते हो। शिष्य को निजात्मस्वरूप का दान देकर उसे
महान बनाते हो, यह तुम्हारा अद्भुत चमत्कार है। यह अतर्क्य विचार अंतहीन है। जो वेदशास्त्रों की समझ में
नहीं आता; जिसके लिये वेद रातदिन विवाद कर रहे हैं वह आत्मज्ञान तुम तच्छिष्य को एक क्षण में करा देते हो।
करोड़ों वेद एवं वेदान्त का पठन करने पर भी तुम्हारे आत्मोपदेश की शैली किसी को नहीं आ सकती। अदृष्ट
वस्तु ध्यान में आना सम्भव नहीं है। अनेक लोग जानने का दम भरते हैं। अनेक प्रकार की युक्तियाँ करते हैं
लेकिन उनकी बकवास तोता रटंत जैसी होती है। इसलिये तुम्हारी बोध कराने वाली शक्ति सबकी समझ में आने
लायक नहीं है। तुम्हारी कृपा युक्ति का लाभ होने पर ही दुर्गम सरल हो जाता है। श्रीभागवत अगम्य है, तिस पर
एकादश स्कंध का अर्थ अत्यन्त गहन है लेकिन तुम सद्गुरु और कृपालु होने के कारण तुमने मुझसे उसका अर्थ
प्राकृत में करवाया। माँ जिस प्रकार दही को मथ कर उसका मक्खन निकाल कर बालक को देती है, उसी प्रकार
जनार्दन ने यहाँ किया है। वेदशास्त्रों का मंथन कर व्यासजी ने भागवत निकाला; उस भागवत का मतितार्थ यह
ग्यारहवाँ स्कंध है, ऐसा समझो। उस एकादश स्कंध का माधुर्य स्वयं मेरी समझ में नहीं आया इसलिये जनार्दन ने
उसका मंथन कर उसका सारतत्त्व मुझे निकाल कर दिया। उसे सहज ही मुख में डाला तो उस एकादश की माधुरी
मेरी समझ में आयी। उसी माधुर्य की चाह से यह टीका तैयार हो रही है। इसलिये एकादश स्कंध पर की यह
टीका अकेले एक एकनाथ से नहीं बल्कि एक से एक मिलकर बाहर आ रही है। एक पीछे और एक आगे यही
एकादश का अर्थात् ग्यारह का स्वरूप है। जनार्दन ने अपना एकपन एका (एकनाथ) में (अद्वैत में) दृढ़ किया।
वही एकादश स्कंध के अर्थ में आया है। एका (एकनाथ) में एकत्व घुलमिल गया। भोजन में जिस प्रकार
मिष्ठान्न का ग्रास होता है, उसी प्रकार भागवत में यह एकादश स्कंध है। उसमें भी अठ्ठाईसवाँ अध्याय अत्यन्त