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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

छब्बीसवाँ अध्याय

हे देव जगन्मोहन ! मोहिनी की मोहकता के प्रमुख कारण ! तुम्हें नमस्कार है। कार्यकारणातीत तथा
ज्ञानस्वरूप, जगद्गुरु जनार्दन की जय हो। संसार पर माया की जो मोहरूपी छाया पड़ती है, उसे तुम
ज्ञानस्वरूप होने के कारण दूर करते हो। संसार में सब कुछ जगद्रूप से जनार्दन ही है। वह दीनों के प्रति
पूर्णरूप से कृपालु है। देवता ही माया स्त्री के रूप में उसके हावभाव और नेत्रकटाक्षों से मोहिनी डाल कर
दीन दुखियों को भुलावे में रखती है। लेकिन स्त्री के मोह जैसे मोहक सारे स्वरूप जनार्दन की कृपा से नष्ट
हो जाते हैं। जहाँ परिपूर्ण वैराग्य की वृद्धि होती है, वहाँ जनार्दन की पूर्ण कृपा समझनी चाहिये। जहाँ वैराग्य
होता है, वहाँ ब्रह्मज्ञान सहज ही होता है। जीव मूलतयः ब्रह्म ही है लेकिन वह माया के गुणों से जीवत्व
पालता है। जिस प्रकार पलंग पर सोया हुआ राजा स्वप्न में स्वयं को भिकारी के रूप में देखता है किन्तु
उसके सेवक उसे राजसिंहासन पर बैठने के लिये जगाते हैं, उसी प्रकार वैराग्य जब त्रिगुणों का नाश करता
है, उस समय जीव स्वयंसिद्ध ही ब्रह्म है। इस प्रकार स्वयंभू ही परब्रह्म प्राप्त होने पर स्त्री और पुरुष यह
ज्ञान मिथ्या हो जाता है और भोग्य और भोक्तापन शेष नहीं रहता। अस्तु ! साधक के पास देवता की माया
स्त्री के रूप में भुलावा देने आती है। उस समय भक्तिपूर्वक गुरुराया का स्मरण करने से उस स्त्री की पीड़ा
समाप्त हो जाती है। सद्गुरु का केवल एक ही नाम बड़े-बड़े दोषों की बाधा को दूर करता है और लौकिक
वैराग्य उत्पन्न करता है, जिससे साधकों को अत्यन्त सुख होता है। सचमुच, हमें अबाध रूप से सुख देने
वाला एक सद्गुरु ही है। उसके चरणों पर मस्तक रखने से साधकों को सुखलाभ होता है। संत वास्तव में
साधकों की सच्ची माता है और शान्ति आत्मसुख की छाया है। जनार्दन के कृपालु चरणों के प्रसाद से यही
कथा यथार्थ रीति से चल रही है। निर्गुण हाथ लगने पर साधक सुखसम्पन्न होते हैं, इसलिये मेरा भजन
करना चाहिये ऐसा श्रीकृष्ण ने पचीसवें अध्याय में कहा था। भक्तिभाव से भगवद्भजन करने से भगवान स्त्री
के रूप में बाधा डालते हैं। उस विघ्न का निवारण करने के लिये मेरा नामस्मरण करना चाहिये। अच्युत नाम
से स्मरण करने से वे अपने प्रभाव से ही कर्माकर्म का नाश करते हैं और समस्त पातकों को भस्म कर
डालते हैं। हरि के नाम में इतना अधिक सामर्थ्य है। नाम से ही मनुष्य निर्मल होता है, नाम से ही चित्त
निर्मल होता है, नाम से ही गुणातीतता प्राप्त होती है और नाम से ही संसारपाश टूटते हैं। नाम से ही, चित्त
आसक्त होने पर संसारभय का प्रवेश नहीं होता। इस प्रकार जहाँ नाम पर विश्वास रहता है, वहाँ भगवान
प्रसन्न है, ऐसा समझना चाहिये। दुष्ट की संगत से यदि विषयासक्त पुरुष विषय में ही पूरी तरह रममाण हो
गया हो, तो उसे पश्चात्ताप होते ही वह आधे क्षण में ही विरक्त हो जाता है। बड़े-बड़े दोषों के लिये सच्चा
पश्चात्ताप यही सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है। अनुताप हुए बिना प्रायश्चित्त करना केवल उपहास है। लोगों के
लिये संसार में पश्चात्ताप जैसा मित्र नहीं है। एक बार पश्चात्ताप हो जाय तो वह समस्त पातकों को भस्म
कर देता है। पश्चात्ताप होते ही वह क्षणार्ध में विरक्त कर छोड़ता है। इसी अर्थ का 'ऐलगीत' श्रीकृष्ण उद्धव
को सुना रहे हैं। यहाँ इस छब्बीसवें अध्याय में जिसका चित्त विषयासक्त से उसे विरक्त होने के लिये यह
'ऐलगीत' की प्रस्तावना है।

६९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीभगवानुवाच
मल्लक्षणमिमं कायं लब्ध्वा मद्धर्म आस्थितः ।
आनंदंपरमात्मानमात्मस्थं समुपैति माम् ॥ १ ॥
ब्रह्म को पूरी तरह जानना यही इस नरदेह का प्रमुख कर्तव्य है। वह यह मानव शरीर तीनों लोकों में पवित्र
है। इस मनुष्य देह को पा कर अधर्म करने से परब्रह्म हाथ नहीं लगता। इसलिये जो परम पावन भागवत धर्म है,
उसका आचरण करना चाहिये। भागवत धर्म के अनुसार भक्ति करने से चित्तवृत्ति निर्मल होती है और जीव ही
ब्रह्म है यह ज्ञान निश्चयपूर्वक मन में अंकित हो जाता है। ब्रह्मस्फूर्ति मन में अंकित होते ही, उससे साधक
परमानन्द में लीन हो जाते हैं। यही मेरी सच्ची प्राप्ति है। मेरी प्राप्ति होने का लक्षण है, प्रत्यक्ष देह में होते हुए भी
विषय का बिलकुल स्मरण न होना। उसी का निरूपण श्रीकृष्ण करते हैं।
गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया ।
गुणेषु मायामात्रेषु दृश्यमानेष्ववस्तुतः ।
वर्तमानोऽपि न पुमान् युज्यतेऽवस्तुभिर्गुणैः ॥ २ ॥
जो मूल अज्ञान की खान है, जो संसार प्रवाह की पंक्ति है, जो तीन गुणों की माँ है, वह अनादि मायारानी
है। अरे देखो! इस मायागुणों के योग से सोलह कलाओं युक्त (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच विषय और
मन को मिलाकर कुल सोलह) वासनात्मक लिंगदेह, वही जीव से चिपक कर बैठ जाता है। जिस लिंगदोह के
कारण ही वह जीव नानाप्रकार के सुख-दुःख भोगता है, स्वर्ग-नरक के भवँरे में फँसता है और मिथ्या जन्म-
मरण के फेरों को सहता है, वह संसार जीव के लिये बाँझ के बच्चे के गृहस्थाश्रम जैसा है। देहाभिमान ने उसे
अपार तथा असीम बढ़ाया है। परन्तु गुरुपदेश के कारण ज्ञान का अनुभव आने पर माया का अभाव होता है,
लिंगदेह मिथ्या लगने लगता है और जीव का जीवत्व भी मिथ्या लगने लगता है। जिस प्रकार सूर्योदय होते ही
अन्धकार के साथ रात्रि समाप्त होती है, उसी प्रकार गुरुपदेश से ज्ञानप्राप्ति होने पर माया का स्वरूप धुँधला पड़ने
लगता है। इस प्रकार गुणों का विकार नष्ट होने पर पुरुष जीवन्मुक्त होता है। जिस प्रकार कुम्हार का पहिया पूर्व
प्राप्त गति से घूमता रहता है, उसी प्रकार पूर्वप्रारब्ध की बची हुई वृत्ति से ज्ञाता भी अपने देह में विचरण करते
रहते हैं। लेकिन इस प्रकार देह में विचरण करते हुए भी उन्हें देह का अभिमान नहीं होता। जिस प्रकार यदि कोई
अपनी छाया को कष्ट दे अथवा उसकी पूजा करे तो किसी को उसमें रुचि नहीं होती, उसी प्रकार ज्ञाता को भी
देह के विचरण में कोई रुचि नहीं होती। वह भले ही देह के ही भाग्य से विषयों में लिप्त हो, लेकिन उसकी
वृत्ति उस विकार के साथ मलिन नहीं होती। उसके लिये विषयों का दर्शन पूर्णतया मिथ्या रहता है। मृगजल पीने
से किसी के हाथ गीले नहीं होते। यदि आकाशकमल के मकरंद और सुवास का सेवन भ्रमर करेगा तभी ज्ञाता के
शरीर को विषय का स्पर्श होगा। अस्तु। मुक्तों की स्थिति अतर्क्य है। किन्तु श्रीकृष्ण मुमुक्षुओं को आत्मप्राप्ति के
लिये उससे सम्बन्धित नियम बता रहे हैं।
सङ्गं न कुर्यादसतां शिश्नोदरतृपां क्वचित् ।
तस्यानुगस्तमस्यन्धे पतत्यन्धानुगान्धवत् ॥ ३ ॥
कामविषय भोग तथा उदरभरण इसी में आसक्त होकर, स्वधर्म का त्याग कर अधर्म में मग्न रहने वाले जो

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विषयासक्त होते हैं, उन्हें सचमुच असाधु ही समझो। ऐसे जो भी असाधु हों, उनके साथ कभी भी काया, वाचा,
मन के साथ संगत नहीं करनी चाहिये। आवारा मवेशियों के संगत में यदि कोई अच्छी गौ चली जाय तो उस
संगत से उसके गले में जीवनभर के लिये मोटा लक्कड़ पड़ जाता है। इस प्रकार दुर्जनों की क्षणभर की संगत से
भी अनर्थ हो जाता है। मुमुक्षुओं को ऐसे स्थान पर क्षणभर के लिये भी नहीं जाना चाहिये। लोहार की भट्टी से
कोई भी सहज ही झुलस सकता है, उसी प्रकार दुर्जनों की संगत भावुक लोगों को भ्रम में डालती है। गलती से
भी यदि असाधु की संगति हो जाय तो विषयासक्ति बढ़ती है जिससे विवेक स्फूर्ति को नष्ट करने वाले अधर्म की
प्रीति होती है। विवेकवृत्ति का अस्त होते ही ज्ञानस्फूर्ति अन्धी होकर मेघों से व्याप्त अमावस्या की रात्रि की तरह
हो जाती है और अपनी ही गति नहीं दिखायी देती। अन्धा यदि अन्धे का हाथ पकड़ता है तो दोनों ही खड्ग में
गिर जाते हैं, उसी प्रकार अविवेक की स्थिति के कारण विषयांध लोग 'अंधतम' नामक नरक में गिरते हैं।
कुसंगति से नरकवास प्राप्त होता है। उससे छुड़ाने वाला एक पश्चात्ताप ही है। उस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण
'ऐलगीत' सुनाते हैं।
ऐलः सम्राडिमां गाथामगायत् वृहच्छ्रवाः।
उर्वशीविरहान्मुह्यन् निर्विण्णः शोकसंयमे ॥ ४॥
समुद्र से घिरी हुई पृथ्वी का पालन करने वाला, सभी राजाओं का मुकुटमणि चक्रवर्ती राजा पुरुरवा की
कीर्ति पुराणों में प्रसिद्ध है। तेज, प्रभाव, महाशौर्य, उचित दातृत्व, गांभीर्य, मस्ती, पराक्रम तथा धार्मिक धैर्य आदि
गुणों से राजा पुरूरवा पूरी तरह युक्त था। राजधर्म की नीति के अनुसार वह स्वधर्म से पृथ्वी का पालन करता
था। ब्राह्मण जितना था उतना ही ब्रह्म की मूर्ति था। चाहे प्राण चला जाय लेकिन वह ब्राह्मण की निन्दा नहीं
करता था। गौ के लिये तो प्राण देने के लिये भी तत्पर था। दीनों का रखवाला था। पुरुरवा का दूसरा नाम 'ऐल'
था। ऐसा वह धार्मिक चक्रवर्ती राजा उर्वशी के फेर में अपनी स्थिति भूल गया। उस समय उसने पश्चात्तापपूर्वक
गीत गाया, उसके बारे में तुम्हें सुनाता हूँ। लेकिन उसकी पूर्व कथा तथा कामासक्तता के बारे में सुनो। वह अपना
बड़प्पन भूलकर, लंपट होकर वेश्या के आगे दीन बन गया। काम मनुष्य को किस प्रकार पागल बना देता है यह
श्रीकृष्ण ऐला के इतिहास से बताते हैं। ऐल (अर्थात् इला से बुध को हुआ पुत्र) पुरुरवा राजा उर्वशी के प्रति
कितना लंपट था और उसे किस प्रकार पश्चात्ताप होकर विरक्ति हुई, यह कथा वेदों में भी बतायी गयी है। उर्वशी
और पुरुरवा का सम्बन्ध नौवें स्कन्ध में विस्तार से आया है। इसे ध्यान में रखकर श्रीकृष्ण ने वह कथा विस्तार
से नहीं बतायी। उर्वशी, को स्वर्ग के भूषण स्वरूप नारायण ने स्वयं स्वर्ग में भेजा था; लेकिन वहाँ वह स्वयं को
श्रेष्ठ समझ कर अहंकार से फूल गयी। उसी अहंकार में शान से नृत्य करते समय ताल पर पैर गलत पड़ गया
और ब्रह्मदेव ने उसे शाप दिया कि तुम मृत्युलोक में जाओगी और मनुष्य तुम्हारा उपभोग करेंगे। इस पर उसने
उःशाप माँगा। इस पर ब्रह्मदेव ने कहा कि यदि तुम पुरुरवा को नग्न देख लो तो तुम स्वर्ग में आ सकोगी। ऐसा
शाप प्राप्त कर उर्वशी मृत्युलोक में आयी। उसका स्वरूप देखकर राजा पुरुरवा उस पर लट्टू हो गया। अपनी
महानता भूलकर वह उस वेश्या के वश में हो गया। उसके रूप पर वह इतना पागल हो गया कि उसे विचार
करने तक का भान नहीं हुआ। राजा को नग्न स्थिति में देखने के बाद, उर्वशी उसे छोड़कर चली जाय यह करार
मानकर राजा उसे अपने उपभोग के लिये ले आया। वह अपने शाम के परिहार के लिये अपने साथ दो भेड़ ले
आयी थी। उनका पुत्रवत पालन किया जाय इस सम्बन्ध में उसने राजा को कसम दिलाई थी। इस प्रकार उर्वशी

६९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
से भेंट होते ही राजा की कामेच्छा भी प्रबल हो गयी। उसके साथ विलास करने में कब सुबह हुई और कब रात
हुई, कुछ समझ में नहीं आया। इसी प्रकार कई दिन बीत गये। उर्वशी के साथ विलास कर्म करने में वह अपना
स्वधर्म कर्म भी भूल गया। उसके नियम-संयम टूटते चले गये, विलासभोग की अति हो गयी। भेड़ों के रूप में
उर्वशी के साथ आये वे दोनों अश्विनीकुमार थे। इन्द्र ने उर्वशी का भोगक्षय करने के लिये उन्हें उसके साथ भेजा
था। पुरुरवा के भोग के अन्त में उर्वशी को स्वर्ग में ले जाने के लिये चोर उन भेड़ों को रात में चुरा ले गये, तब
वे 'ब्याँ', 'ब्याँ' कहकर चिल्लाने लगे। भेड़ों की आवाज सुनकर उर्वशी दुःख से व्याकुल हो उठी और राजा की
भर्त्सना करती हुई बोली, "तुम नपुंसक हो। व्यर्थ ही पुरुषार्थ की शेखी बघारते हो। मेरे बच्चों को चोर उठा कर
ले गये, तुम्हारे काले मुँह में आज लगे।" विलाप करते हुए वह अपना सिर पीटने लगी। उर्वशी का वह शोक
देखकर पुरुरवा ने तत्काल शस्त्र उठाया और चोरों का पीछा करने लगा। दौड़ने में उसका पीताम्बर खुल गया।
उसे उसका भान नहीं रहा। उसने भेड़ों को चोरों से मुक्त कर उन्हें उर्वशी के सामने खड़ा कर दिया। इतने में
बड़े जोर से आकाश में बिजली चमकी और राजा का नग्न शरीर चमक उठा। राजा को नग्न देखते ही उर्वशी
अपनी शर्त के अनुसार स्वर्ग चली गयी और उसके शोक में राजा व्याकुल हो उठा।
त्यक्त्वाऽऽत्मानं व्रजन्तींतांनग्नउन्मत्तवन्नृपः।
विलपन्नन्वगाज्जाये घोरे तिष्ठेति विह्वलः ॥५॥
पृथ्वी का पालन करने में वरिष्ठ; स्वधर्म में श्रेष्ठ धार्मिक, शत्रु का संहार करने में वीर तथा पराक्रम में
महावीर; वेदशास्त्र विवेक जानने वाला, जिसका सभी लोग वन्दन करते हैं, ऐसा व्यक्ति एक वेश्या का दास बन
गया? देवदानवों के सामने भी जिसकी गर्दन नहीं झुकती, जो जरा-सा भी अपमान सहन नहीं कर सकता, वह
अपनी श्रेष्ठता भूलकर एक वेश्या के आगे दीन बन गया? उर्वशी को जाते देख वह वैसा ही नग्न अवस्था में
खड़ा रहा और बेहोश होकर रोते-रोते उसके पीछे लग गया; उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहा था। जरा एक
बार तुम्हें देख तो लूँ; प्रेम की दो-चार बातें कर लूँ, तुम आँखों से दूर चली जाती हो तो प्राण निकलने लगते हैं।
अपने पूर्वजों की कसम खाकर कहता हूँ कि तुम्हारे वचन का कभी उल्लंघन नहीं करूँगा, मेरी बात को सच
मानो, तुम्हें मुझ से नाराज होने का कारण ही क्या है? चलते समय तुम्हारे पैरों में कंकड़-पत्थर लगेंगे, तुम कहाँ
जा रही हो? मैं भी आता हूँ, तुम्हारे साथ। एक बार मेरी ओर मुड़कर तो देख लो। कह कर वह उसके पैर
पकड़ने लगा। वह उसकी ओर बिना देखे चली गयी। जिसे बड़े-बड़े राजा साष्टांग दण्डवत किया करते थे, वह
राजाधिराज एक वेश्या के पैर पकड़ रहा है? काम की करनी कितनी अद्भुत है। उसने कहा, तुम्हारे लिये मेरा
चित्त व्याकुल हो रहा है, तुम इतनी पाषाण हृदया कैसे हो गयी हो? मुझ पर इतना गुस्सा भला क्यों करती हो?
इस प्रकार राजा का चित्त अत्यन्त विरहातुर और शोक से भर गया। वह अत्यन्त ग्लानियुक्त हो गया। श्रीकृष्ण
उसकी ग्लानि का वर्णन कर रहे हैं।
कामान्तृप्तोऽनुजुषन् क्षुल्लकान् वर्षयामिनीः।
न वेद यान्तीर्नायान्तीरुर्वश्याकृष्टचेतनः ॥६॥
उर्वशी का कामभोग में राजा का चित्त बिलकुल तल्लीन हो गया था। सूर्य कब उदित होता है और कब
अस्त होता है इसका भी उसे पता नहीं चलता था। मदन ने उसे इतना पागल कर दिया था। एक बार भोग की हुई
स्त्री को प्रतिदिन भोगते रहने से उसके प्रति प्रेम बढ़ जाता है। उसी प्रकार उसकी अवस्था हुई और वह उसका

छब्बीसवाँ अध्याय ६९७
आसक्त हो गया। उर्वशी का भोग करते कितने दिन, मास और वर्ष बीत गये कुछ पता ही नहीं चला। जीवन का
नाश हुआ इसका भी स्मरण नहीं रहा। अग्नि में घृत पड़ने पर उसकी ज्वालायें अधिकाधिक तीव्र हो जाती हैं,
उसी प्रकार स्त्री का बार-बार भोग करने से काम भी बढ़ जाता है। स्त्री विषय का विचार करने पर वह अत्यन्त
तुच्छ मालूम होता है किन्तु रात-दिन भोग करते हुए भी राजा के मन में वैराग्य नहीं उत्पन्न हुआ। उर्वशी में
उसके प्राण बसे हुए थे इसलिये उसने उससे करुणा की गुहार की। लेकिन राजा की ओर मुड़कर देखे बिना ही
वह तेजी से चली गयी। जब उर्वशी सामने नहीं दिखायी दी तो राजा विरह शोक से मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।
फिर उठकर इधर-उधर देखने लगा। जोर-जोर से रोते हुए उसने ताण्डव मचा दिया। इस प्रकार दसों दिशाओं में
भटकते हुए वह एकाएक कुरुक्षेत्र आ गया। वहाँ अन्तरिक्ष में बैठी हुई उर्वशी उसे दिखायी दी। उसे देखते ही
वह चिल्लाया, "दौड़ो उर्वशी ! मुझे अपने आलिंगन में ले लो।" तब वह बोली, हे विषयांध ! यह सारी मूर्खता
अब त्याग दो; भूपते, हम स्त्रियों की आसक्ति कभी अच्छी नहीं होती। हे महाराज ! स्त्रियाँ स्वभाव से ही दुष्ट
होती हैं। विशेष रूप से वेश्याएँ तो स्वच्छंद होती हैं। अपने मन के अनुसार व्यवहार करती हैं, और परपुरुष से
स्वेच्छा से संग करती हैं; इसलिये हे राजा ! तुम मन में हमारा कभी भी विश्वास न करना। हे राजा! हम स्त्रियों
की संगत से आज तक कितने लोग फँसे हैं इसका कोई पता नहीं है; तुम अब हमारी आसक्ति छोड़कर परमार्थ
मार्ग का अनुसरण करो। इतने दिन तक तुमने मेरा भोग किया लेकिन तुम्हें अभी वैराग्य प्राप्त नहीं हुआ। इसलिये
अब तुम कामासक्ति समूल छोड़ दो और अपने सच्चे स्वार्थ की साधना में लग जाओ। लेकिन उसका वह भाषण
उसे अच्छा नहीं लगा। वह पुनः उसके पैर पकड़ कर उसकी प्रार्थना करने लगा। कहने लगा, "तुम कुछ भी
करो लेकिन एक बार अपना अंग संग दो। हे सुन्दरी ! एक बार तुम अपना सुख संभोग दो।" उसकी वह ग्लानि
देखकर उर्वशी का मन पसीज उठा। वह राजा को अपना पूर्व वृत्तांत सुनाने लगी। मैं अत्यन्त सुन्दर स्वर्गांगना हूँ,
मुझे ब्रह्मदेव ने शाप दिया था; किन्तु तुम अत्यन्त पुण्यवान राजा होने के कारण तुम्हारी संगति से मैं उस पाप से
मुक्त हो गयी। तुम्हारी संगत से मैं निष्पाप हुई, मेरे शाप का निवारण हो गया। अब तुम्हारा और मेरा संग इस
लोक में असम्भव है। मैं अब स्वर्ग जा रही हूँ। उर्वशी का यह भाषण सुनकर राजा उसके विरह में रोने लगा।
उर्वशी का मन व्याकुल हो उठा और उसने उसे एक अच्छा उपाय बतलाया। पहले उसने गन्धर्व की प्रार्थना कर
एक अग्निपात्र प्राप्त किया और उसे राजा को देकर बोली, इस अग्निपात्र पर यज्ञ करो, जिससे तुम्हें मेरी प्राप्ति
होगी। उर्वशी के वियोग में व्याकुल होने के कारण राजा अग्निपात्र वहीं छोड़कर अपने मन्दिर में चला आया।
उस समय अत्यन्त शोक से व्याप्त होने के कारण वह अत्यन्त दुःखी हो गया था। उसके मन में उर्वशी का दुःख
था इसलिये वह उसे स्वप्न में दिखायी दी। वह जागृत होकर तत्काल अग्निपात्र देखने पहुँचा। तो उसे वहाँ
अश्वत्थ के वृक्ष पर शमी का पेड़ दिखाई दिया। उसने उस अश्वत्थ की ही अरणी तैयार की और यज्ञ के लिये
पवित्र अग्नि तैयार किया और विधिपूर्वक यज्ञ कर कामसुखभोगेच्छा के कारण वह उर्वशी के लोक में पहुँचा।
उस उर्वशी से विलास करते-करते राजा को विरक्ति हुई और उसने क्या कहा, तुम्हें बताता हूँ। वह निरूपण राजा
ने अठारह श्लोकों में किया है। उसमें के आठ श्लोकों में उसका सच्चा पश्चात्ताप है। वही श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
ऐल उवाच
अहो मे मोहविस्तारः कामकश्मलचेतसः ।
देव्या गृहीतकण्ठस्य नायुःखण्डाइमेस्मृताः ॥ ७॥

६९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पुरुरवा का यह पश्चात्ताप गीत सुनने से अगम्यागमन पातक का नाश होता है। उसे सुनने वाला निष्पाप हो
जाता है और साधकों को कभी भी मदन की बाधा नहीं होती। मत्त हाथी जिस प्रकार हथिनी के साथ नाना प्रकार
की आपदायें भोगता है, उसी प्रकार उर्वशी की संगति से पुरुरवा भी दुःख भोग कर विरक्त हो गया। जो उर्वशी
पर अत्यधिक लुब्ध हुआ था वही उससे ऊब गया और वैराग्य से पश्चात्ताप पाकर पुरुरवा राजा स्वयं ही बोलने
लगा। मेरे मोह के कारण विषयवासना बहुत बढ़ गयी जिससे उस अमंगल मदन के घर का मैंने ही सेवन किया।
उर्वशी के लालच में मैं अत्यधिक लंपट हो गया। मेरा चित्त काम से व्याप्त हो गया और मैंने बहुत बड़ा अनर्थ
कर दिया। मेरा जीवन मैंने व्यर्थ गँवाया। गले से सटे हुए उर्वशीरूप शस्त्र ने जिसमें जीवन को काटने की तेज
धार है, कितने ही जीवन नष्ट कर दिये हैं। लेकिन मुझ पापी को उसकी स्मृति ही नहीं रही। कामेच्छा के भुलावे
में मैंने कांता-आलिंगनरूपी विष की बेल गले में लटका ली। उसने सारे जीवन की होली जलाकर विचार को
निगल ही लिया। स्त्री का आलिंगन रूपी दावाग्नि मैंने अपने गले में जला लिया जो आयुष्यरूपी वन में भड़क
कर उसने विवेकरूपी भूमि को भी झुलसा दिया। नरदेह का उत्तम से उत्तम जीवन मैंने भस्म कर दिया। मैंने एक
निंदनीय अधर्म ही कर दिया। नरदेह के आयुष्य के सहारे साधक बैकुण्ठ पहुँच जाते हैं, ज्ञानी तो देखते-देखते
ब्रह्मपद प्राप्त कर लेते हैं। उस आयुष्य को मैंने स्त्रीवसन में नष्ट कर दिया।
नाहं वेदाभिनिर्मुक्तः सूर्यो वाभ्युदितोऽमुया।
मुषितो वर्षपूगानां वताहानि गनान्युत॥८॥
नरदेह के आयुष्य का एक क्षण करोड़ों सुवर्ण मुहरें देने पर भी नहीं मिलेगा। वह सारा आयुष्य नष्ट कर
मैंने अपना विनाश कर लिया। साधुओं का हित करने के लिये ही प्रतिदिन सूर्य का उदय होता है। इसीलिये साधु
क्षण-प्रतिक्षण परमार्थ साधते रहते हैं। वही सूर्य स्त्रीलंपट पुरुष की आयु रात-दिन कम करता रहता है। यह बात
जो नहीं जानता वह स्वयं ही नरक पात का असली मूल है। दूसरों की बात क्यों करूँ ? मैं स्वयं ही उर्वशी के
फेर में फँस गया, मेरे जीवन की हानि हो गयी। यह बात किसे बताऊँ ? लोगों का हित करने के लिये ही रोज
सूर्य का उदय होता है यह बात पुरुष होते हुए भी मैंने नहीं जानी। उर्वशी के जाल में फँस कर उन्मत्त हो गया।
सूर्योदय और सूर्यास्त होते हुए वर्ष के वर्ष बीत गये। लेकिन मुझे उसका विचार नहीं आया। उर्वशी के अधरामृत
का पान करते-करते मैं उसी बेहोशी में रहा। शराब की खुमारी अगले दिन उतरती है, धन की मस्ती दरिद्र होने
पर उतरती है; शक्ति क्षीण होने पर यौवन का ज्वार थमता है; लेकिन स्त्री का नशा कभी नहीं उतरता। नरदेह का
जीवन अत्यन्त दुर्लभ है। वह पुनः हाथ नहीं आता। मरे वह देवांगना, उर्वशी ! सचमुच, इसने मेरा सत्यानाश कर
दिया। मैं निर्भय, सबकी रक्षा करने वाला, लेकिन इसने मुझे नंगा कर दिया। यह लज्जास्पद बात बताऊँ तो किसे
बताऊँ ? इतना कह कर वह सुबकने लगा। मेरे हित की चोरी करने वाली उर्वशी है। इसे मार डालना चाहिये।
उसने कहा। लेकिन फिर वह सोचने लगा कि इसमें उसका क्या दोष है ? अविचारी तो मैं हूँ। एक मैं ही अभागा
हूँ, कामचेष्टा में मैंने ही अपने जीवन का विनाश कर लिया। बहुत बड़ी हानि हो गयी। फिर बड़े जोर का
आक्रोश करते हुए बोला, इस मदन ने मुझे नंगा कर दिया। मैंने अपना जीवन गँवाया। वास्तव में इससे अधिक
हानि संसार में और कोई नहीं है।
अहो मे आत्मसम्मोहोयेनात्मायोषितां कृतः।
क्रीडामृगश्चक्रवर्ती नरदेवशिखामणिः ॥९॥

छब्बीसवाँ अध्याय ६९९
बड़े-बड़े वीर पराक्रमी मुकुटमणि राजा भी मेरी शरण में आते हैं और मैं एक तुच्छ वेश्या के चरण पकड़
रहा था, इससे अधिक निर्लज्जता और क्या होगी? मुझ पुरूरवा की आज्ञा पर सारे राजा कठपुतली की तरह
नाचते रहते हैं और मैं स्वयं एक वेश्या की आज्ञा से श्वान की तरह लांगूलचालन कर रहा था। मदारी के बन्दर
की तरह मैं स्त्री के इशारों पर नाचता रहा। मेरे चक्रवर्ती होने का ऐसा निंद्य फल मुझे प्राप्त हुआ? सारे राजा मुझे
बहुत सम्मान देते हैं, भूपति मेरे चरणों का वंदन करते हैं और मैं एक स्त्री का दास बनकर हीन, दीन, भिखारी
बन गया। स्त्री को प्रसन्न रखने के लिये उसके पैरों पर गिरना उचित है ऐसा कहने वाले कामी पुरुषों के मुँह में
आग लगे क्योंकि वह मदन का बहुत बड़ा प्रहार है। मैं समुद्रवलयोक्ति पृथ्वी का सार्वभौम हूँ और उसे एक
वेश्या ने भँवर जाल में फँसाया? उसी भँवर जाल का वर्णन राजा स्वयं कर रहे हैं।
सपरिच्छदमात्मानं हित्वा तृणमिवेश्वरम्।
यान्तीं स्त्रियं चान्वगमं नग्न उन्मत्तवद् रुदन्॥१०॥
स्त्री केवल साकार-माया-भ्रम है। इसीलिये स्त्री को 'प्रमदा' कहते हैं। इन स्त्रियों के मोह में बड़े-बड़े
लोग फँस चुके हैं। स्त्रियाँ, वस्त्र और अलंकार ये माया के प्रमुख तत्त्व हैं; जिसके भुलावे में बड़े-बड़े लोग आ
चुके हैं। उसी प्रकार मैं भी स्त्री की संगति में पापी बना मुझे स्वयं ही अपना कार्य दीन-हीन लगता है क्योंकि
उर्वशी तो वैसे भी एक वेश्या थी। उसे कितने ही लोगों ने भोगा होगा। ऐसी कामासक्ति के कारण मैं सब कुछ
भूल गया। अपनी भूलने की कथा पश्चात्तापपूर्वक राजा स्वयं बता रहा है। धर्मपत्नी के साथ कामोपभोग करने से
सहसा स्वधर्म की हानि नहीं होती किन्तु मेरा दुष्कर्म आड़े आया और मैं वेश्या के जाल में फँस गया। जो परस्त्री
की अभिलाषा करते हैं वे तो निश्चित रूप से नरक में जाते ही हैं, लेकिन जो अपनी पत्नी पर भी आसक्त होते हैं
उन्हें भी अधोगति नहीं छोड़ती। स्त्रियों ने हरिहर पर भी मोहिनी डाली है, स्त्रियों ने बड़े-बड़े ऋषियों को भी
भुलावा दिया हे, स्त्रियों ने बड़ों-बड़ों को अपने पाश में उलझाया है, उसी प्रकार मुझे भी स्त्रियों ने दास बनाया।
राज्य और राजवैभव मैंने वेश्या के हवाले किया। इतना ही नहीं, बल्कि उसके लिये मैंने अपना जीवन भी अर्पण
किया। सारे राजाओं का मैं मुकुटमणि था, लेकिन मैं उसके चरणों का दास बन गया। मदन की करनी अद्भुत
है। उसने मुझे स्त्री के वश में कर दिया। मुझ राजराजेश्वर को उस वेश्या ने लात मार कर, मेरी उपेक्षा कर मेरा
बहिष्कार किया, मेरे सामने मुझे छोड़कर चली गयी। उसे जाता देख मैं नग्न अवस्था में उसके पीछे दौड़ा,
लाज-लज्जा छोड़कर रोया लेकिन उसने मेरी ओर देखा तक नहीं। किसी उन्मत्त ब्रह्मपिशाच की तरह, मैं
नग्नावस्था में रोता हुआ उसके पीछे दौड़ रहा था लेकिन उसका चित्त द्रवित नहीं हुआ। फिर भी मैं रोता हुआ,
लड़खड़ाते हुए किसी निर्लज्ज की तरह उसके पीछे दौड़ रहा था, मेरे मोह के कारण हुए अनर्थ के कारण मैं
अपमानग्रस्त हो गया।
कुतस्तस्यानुभावः स्यात्तेज ईशत्वमेव वा।
योऽन्वगच्छं स्त्रियं यान्तीं खरवत् पादताडितः॥११॥
मैं बहुत बड़ा राजराजेश्वर हूँ, ऐसा असाध्य अहंकार मुझे था। लेकिन मैं स्वयमेव वेश्या का नौकर और
दास बन गया। नौकर की तरह उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था, फिर भी उसने मेरा अंगीकार नहीं किया, बल्कि
जिस प्रकार गदही लात मार कर गधे को दूर भगा देती है, उसी प्रकार उसने मुझे भगा दिया। गदही को देखकर
जिस प्रकार गधा उसकी खुशामद करता है लेकिन गदही उसे लात मारती रहती है। उसकी लातें सिर पर लगती

७०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
रहती हैं, फिर भी गधा पीछे नहीं मुड़ता। उस गधे की ही तरह मूर्खता मुझ पर पूरी तरह हावी हो चुकी थी।
कामदृष्टि से वह उदासीन थी लेकिन मैं ही आसक्त होकर उसके पीछे पड़ा हुआ था। मेरे पराक्रम की बात सुनाते
हुए मुझे स्वयं भी लज्जा होती है। इस प्रकार, जिसका मन स्त्री के विषय में लंपट हुआ उसका सारा योग, याग,
अनुष्ठान, सब कुछ व्यर्थ हो जाता है।
किं विद्यया किं तपसा किं त्यागेन श्रुतेन वा।
किं विविक्तेन मौनेन स्त्रीभिर्यस्य मनो हृतम्॥ १२॥
जिसका मन स्त्रीकाममय हो जाता है, उसकी विद्या, तप, धन, त्याग और संन्यास वगैरह सब कुछ व्यर्थ हो
जाता है। उसका एकांतवास व्यर्थ, उसका मौन व्यर्थ उसी प्रकार राख में हवन करने की तरह उस स्त्रैण का
अनुष्ठान सब कुछ व्यर्थ है। जिसका चित्त कामासक्त हुआ हो उसके सारे नियम भी व्यर्थ हैं। इस प्रकार अपने
पूर्व आचरण की निन्दा करता हुआ राजा पश्चात्ताप कर रहा है।
स्वार्थस्याकोविदं धिङ्मां मूर्खपण्डितमानिनम्।
योऽहमीश्वरतां प्राप्य स्त्रीभिर्गोखरवज्जितः ॥ १३॥
चारों पुरुषार्थों का अधिष्ठान जो पावन नरदेह है, उसका योगपूर्वक भजन करने से सनातन ब्रह्म की ही
प्राप्ति होती है। नरदेह का एक-एक क्षण भी जन्म-मरण का विनाश करता है, भक्तिभाव से हरि का स्मरण करने
से बड़े-बड़े पातक भी नष्ट हो जाते हैं। ऐसे नरदेह का लाभ लेकर नृपश्रेष्ठ चक्रवर्ती राजा बना और वेश्या के
भुलावे में आ गया। मैं स्वयं को श्रेष्ठ और ज्ञानी कहता था किन्तु अज्ञों से भी अधिक अज्ञानी था। मेरा सच्चा
हित किसमें है यह मेरी समझ में नहीं आया और मैं वेश्या के अधीन हो गया। नरदेह जैसी निधि मिलने पर भी
मैंने मन में ज्ञान का अभिमान किया और स्वहित का कोई साधन नहीं किया यह मेरी मूर्खता है। बैल, उल्लू
होकर गाय के पीछे दौड़ता रहता है, आगे क्या अनर्थ होगा, यह वह नहीं जानता। जिस प्रकार गदही के पीछे
गधा दौड़ता है, उसी प्रकार मैं कामासक्त और निर्लज्ज बन गया था। गदही गधे को लात मारती रहती है फिर भी
वह आगे बढ़ता रहता है। उसी प्रकार मैं भी विषय की इच्छा से वेश्या के पीछे पागल था। 'काम भोग के अन्त
में विरक्ति उत्पन्न होती है' ऐसा विचारी लोग कहते हैं, लेकिन वे मूर्ख हैं। वे अधःपात की ही ओर ले जाते हैं,
यह मेरा अपना अनुभव है।
सेवतो वर्षपूगान् में उर्वश्या अधरासवम्।
न तृप्यत्यात्मभूः कामो वह्निरहुतिभिर्यथा ॥ १४॥
सत्ययुग का मेरा आयुष्य, ऐश्वर्य तो सार्वभौम राजा का। उर्वशी अपने स्वर्ग के स्वार्थ के लिये मुझसे
अनेक प्रकार के भोग भोग रही थी। ऐसा विलासपूर्ण सुख भोगते-भोगते करोड़ों वर्ष बीत गये। किन्तु मुझमें
विरक्ति की बात नहीं आयी। 'भोग के अंत में वैराग्य आता है' ऐसा कुछ लोग कहते हैं लेकिन वह मूर्खों की
बकवास है। स्त्री के अधरपान को 'अमृत' कहते हैं वे भी मूर्ख ही हैं। वह अमृत तो नहीं ही है, अपितु नशा
लाने वाली शराब है और वह चित्त को भ्रमित करती है। स्त्री के अधरपान की जो माधुरी है, उसके आगे सारे
मद्य बेकार हैं क्योंकि वह तत्काल अनर्थ में ढकेलती है और निजस्वार्थ को नष्ट कर देती है। जिस प्रकार घृत की
करोड़ों आहुतियों से भी अग्नि की तृप्ति नहीं होती, उसी प्रकार स्त्रीसंग से कभी विरक्ति नहीं होती। इस प्रकार
राजा ने अपना पश्चात्ताप आठ श्लोकों में व्यक्त कर दिया क्योंकि जब हृदय में विवेकदीप प्रज्ज्वलित हुआ, तो

छब्बीसवाँ अध्याय ७०१
मदन का ताप किससे नष्ट होगा, इसका उसे स्मरण हुआ। कामिक पुरुष विषय का त्याग करे, फिर भी उसकी
वासना बिलकुल नहीं छूटती और जब रुचि से विषय सेवन कर रहा हो तो फिर विरक्ति कैसे उत्पन्न होगी ?
उसका क्या उपाय है इसका विचार कर स्त्रीविषय त्याग का सच्चा विचार राजा बता रहा है।
पुंश्चल्याहतं चित्तं को न्वन्यो मोचितुं प्रभुः।
आत्मारामेश्वरमृते भगवन्तमधोक्षजम्॥ १५॥
पुरुष सदा ही स्त्री पर अनुरक्त रहता है; लेकिन वह एकाएक उससे अति प्रसंग नहीं कर सकता। इसलिये
वेश्या की संगत मिलने पर वह उसके हावभाव से कामपीड़ित होता है। वेश्या के नेत्रकटाक्ष ही पुरुष को बन्धन
में डालने के लिये पर्याप्त हैं। स्त्री विषय का यह बन्धन नारायण के अलावा और कौन छुड़ाएगा ? स्त्रीविषय से
मुक्त करने वाला केवल एक ईश्वर ही समर्थ है। आत्माराम भगवंत से उससे निश्चित रूप से छुड़ा सकता है।
काम का संचार माया के गुणों से होता है; अविद्या उसकी वृद्धि करती रहती है। इसलिये माया का नियंता जो
ईश्वर है, वही मदन की पीड़ा दूर कर सकता है। आत्मस्वरूप में लीन, आनन्दस्वरूप रहने वाला वह आत्माराम,
वही सारे विषयों का निवारण कर आत्मस्वरूप विषयक भ्रम को दूर करता है। भोग करते हुए भी वह अभोक्ता
रहता है, उस अनंत की शरण में जाने से ही विषय विकार बाधा नहीं कर पायेंगे। स्त्रीसंग से छुड़ाने वाला एक
वही है। अधोगति से छुड़ाने वाला जो अधोक्षज है, वह भक्तों का पालन करने वाला होने के कारण, उसकी शरण
में जाने से वही कामासक्ति का निवारण करता है। राजा कामासक्ति से अत्यन्त त्रस्त हो गया, विषय के प्रति
अंतर्बाह्य उदासीन हुआ, लेकिन हृदय की वासनाओं का त्याग वह नहीं कर पा रहा था। सर्वोपरि हरि की शरण
में जाने से ही सारी वासनाओं का निवारण अपने आप होता है। कुछ लोग ऐसा भी मत प्रतिपादित करते हैं कि
वेदाध्ययन कर इन्द्रादि देवताओं के प्रीत्यर्थ यज्ञायाग करने से हृदय की वासनाओं की निवृत्ति होती है। लेकिन जो
ज्ञानी ऐसा कहते हैं, वे अज्ञानी हैं क्योंकि श्रीहरि की शरण में गये बिना कामबाधा का शमन नहीं होता। इन्द्रादि
देवताओं की भी कामासक्ति के कारण कितनी दुर्दशा हुई इसका उन्हें पता नहीं है। ऐसा होते हुए, उनके भजन से
काम की निवृत्ति होती है, ऐसा जो कहते हैं वे अतिमूर्ख हैं।
बोधितस्यापि देव्या मे सूक्तवाक्येन दुर्मतेः।
मनोगतो महामोहो नापयात्यजितात्मनः॥ १६॥
काम्य कर्म से सुख होगा यह कहना ही बिलकुल मिथ्या है क्योंकि काम्य कर्म में अधिक दुःख होता है।
लेकिन उन मूर्ख सकाम लोगों की समझ में यह बात नहीं आती। मैंने याग कर इन्द्रादि देवताओं का यजन कर
उर्वशी का उपभोग किया फिर भी मैं अत्यन्त दुःखी हुआ। नारायण ऋषि के ऊरू अर्थात् जंघा से उत्पन्न हुई
इसलिये उसका नाम 'उर्वशी' पड़ा। उसने मुझे निष्काम भाव से शुद्ध वेदवाक्य से उपदेश किया। श्रुति का
निष्कामवचन श्रवण करने पर भी मेरी सकाम भूल नष्ट नहीं हुई। जब तक श्रीहरि की कृपा नहीं होगी, तब तक
काम की चाल नहीं रुकेगी। भक्तिभाव से श्रीहरि की शरण जाने से हृदयस्थ नारायण प्रकट होता है तब हृदय के
सारे काम अपने आप भाग जाते हैं। उर्वशी की आसक्ति के कारण मैंने तो अत्यधिक कष्ट सहन किये लेकिन
इसमें उसका क्या दोष है ? मुझे स्वयं ही श्रीहरि का विस्मरण हो गया था। यदि मैंने ही श्रीहरि का स्मरण किया
होता तो बेचारा काम क्या मुझे बाधा पहुँचाने वाला था ? यदि मुझे ही मेरा स्मरण रहता, तो उर्वशी मुझे बिलकुल
तुच्छ लगी होती।

७०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किमेतया नोऽपकृतं रज्ज्वा वा सर्पचेतसः।
रज्जुस्वरूपाविदुषो योऽहं यदजितेन्द्रियः ॥ १७॥
मैं भी मूर्खतावश अब तक उर्वशी को ही अपराधी मान रहा था। लेकिन ठीक तरह से विचार करने पर
देखा कि मैं ही सकाम और मतिमंद हूँ। उर्वशी को देखते ही मैं कामासक्त हो गया और अपनी ही लंपटता के
कारण मैंने स्वयं को कष्ट दिया। शाम को रस्सी दिखायी देने पर भीरु व्यक्ति को वह बड़ा सर्प ही मालूम होता है
और अगर ठीक से न देखो तो वह एक भयानक अजगर मालूम होता है। साँप के भय से दौड़ने में रस्सी उसके
पैर में फँस जाती है और उसे वह साँप की कुण्डली समझ लेता है। इसमें उसकी कल्पना ही उसे बाधक सिद्ध
होती है। उसी प्रकार मेरी कामभ्रांति से उर्वशी मुझे सुन्दर स्त्री लगी और मेरी ही कामासक्ति से भी रतिविलास में
नग्न हो गया। इस प्रकार मैं ही अविचारी प्राणी उस उर्वशी के काम पर लुब्ध हो गया था, ऐसी स्थिति में उस पर
नाराज होना अधर्म है। स्त्री देखने पर विषयलंपट पुरुष को वह अत्यन्त रमणीय मालूम होती है, किन्तु विचारी
पुरुष को वही अत्यन्त गन्दी और नरक की खान लगती है। सुअर को जिस प्रकार विष्ठा से प्रेम रहता है, उसी
प्रकार विषयी पुरुष को स्त्री का संग रमणीय मालूम होता है किन्तु विचारी लोग उसकी ओर देखकर थूकते हैं,
यही बात राजा श्लोकरूप में बता रहे हैं।
कायं मलीमसः कायो दौर्गन्ध्याद्यात्मकोऽशुचिः।
क्व गुणाः सौमनस्याद्या ह्यध्यासोऽविद्यया कृतः ॥ १८॥
स्त्री, पुरुष ये जो नाम हैं वे केवल देह के ही लिये हैं। उसमें, स्त्रीदेह के गुणधर्म देखने से उसमें
मलीनता ही भरी हुई है। जो नित्य नये स्राव की खान है, रजस्वला के प्रवाह की वह नाली, दुर्गंधि का स्रोत
और विष्ठा से भरी हुई गठरी जो दोषों का जन्मस्थान है, विकल्प का आश्रय है, जो महादुःख का पात्र है
और जिसके कारण अधःपतन होता है। वह मन का उद्वेग बढ़ाने वाली, जिसके योग से मन को क्षयरोग की
बाधा होती है, अत्यन्त निर्लज्जता के कारण जिसका अंगसंग त्रस्त कर देता है। जिस प्रकार गन्दे मटके का
गोल किनारा बिल्ली के गले में फँस जाने पर वह घर-घर में उसी अवस्था में जाती है और पवित्र घरों के
बर्तनों को अपवित्र कर देती है उसी प्रकार स्त्रियों की संगत है। वह जिसके गले में फँस जाती है, वापस
नहीं जाती। स्त्री काम में लंपट कितने लोगों की दुर्दशा हो चुकी है, उसका कोई अन्त नहीं है। वह बिल्ली
जिस बर्तन में भी मुँह लगाती है, उसे वह किनारा अवरोध कर देता है; उसी प्रकार स्त्रीसंगति से अपार दुःख
होता है, लेकिन पुरुष उसमें सुख ही मानते हैं। मृगजल का कमल अत्यन्त मनोहर दिखाई देता है उसी
प्रकार स्त्री का मुख सुन्दर, सुहास्य, रमणीय और सुकुमार है ऐसा विषयी पुरुष वर्णन करते हैं किन्तु यदि
उनके मुँह की वास्तविक स्थिति देखें तो वहाँ नाक में सदा कफ की बस्ती रहती है। ऐसी स्थिति में वे विष
को अमृत की उपमा देते हैं। स्त्रियों के मुख से लार झरती रहती है, उसे वे अधरामृत कहते हैं। अविद्या का
बल भी धन्य है। ऐसे स्त्री देह पर देव-दानव दोनों ही लुब्ध दिखायी देते हैं। स्त्री और पुरुष इन दोनों में
आत्मा एक है। लेकिन स्त्री का रूप अविद्यात्मक है। विषयी पुरुष उसके भुलावे में आ जाते हैं। सारांश,
माया का गुण प्रबल है। स्त्री संभोग के समय आत्मा नित्यमुक्त होकर अलिप्त रहता है। यदि स्त्री संयोग में
देह को भोक्ता कहें तो देह जड़ है। वहाँ विषय-भोग का कारण मुख्य रूप से देहाभिमान है। लेकिन उसमें
भी कई हिस्सेदार हैं।

छब्बीसवाँ अध्याय ७०३
पित्रोः किं स्वं नु भार्यायाः स्वामिनोऽग्नेः श्वगृध्रयोः।
किमात्मनः किं सुहृदामिति योनावसीयते ॥ १९ ॥
माँ गर्भ धारण करती है, उसका पोषण करती है और स्वयं कष्ट सह कर उसका पालन-पोषण करती है
अतः वह देह 'माता' का है। लेकिन यदि माता अकेली ही हो तो उसे पुत्र की बात स्वप्न में भी नहीं लानी
चाहिये क्योंकि वहाँ वीर्य का निक्षेप करने वाला पिता होता है। इसलिये वास्तव में यह देह पिता का है और
अग्नि-ब्राह्मण की साक्षी से जिसे शपथ दिलाकर भार्या बनाकर लाया रहता है और जो प्राण देकर भी सेवा के
लिये तत्पर रहती है, जिसे उसके कारण ही सुख और शोभा, जिसे इसके ही कारण इहलोक और परलोक है; इन
सबका सूक्ष्म रीति से विचार करने पर यह देह सचमुच 'स्त्री' का ही है। 'सुहृद-बंधु-मित्र' भी इस देह के लिये
आवश्यक हैं। उन्हें भी इस देह के सुख से सुख प्राप्त होता है, इसलिये एक दृष्टि से यह देह उनका भी है। उसी
प्रकार स्वयं वेतन लेकर स्वयं ही जिसे देह विक्रय किया रहता है, जिसकी आज्ञा के बिना क्षणभर के लिये भी

७०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जिसकी आसक्ति होती है वे कीड़ों की ही तरह हैं। इस प्रकार विचार करें तो स्त्रियों का देह अत्यन्त गन्दा है।
उसे वस्त्रालंकार से सुशोभित कर पुरुष उस पर आसक्त होते हैं। बहेलिया जाल लगाकर हिरनों को पकड़ता है
लेकिन पुरुष स्त्रियों का श्रृंगार कर स्वयं ही उस जाल में फँसता है। इसलिये विरक्तों को स्त्री की संगत कभी
नहीं करनी चाहिये, गृहस्थाश्रमियों को भी उसकी आसक्ति छोड़नी चाहिये। इसके सम्बन्ध में राजा बता रहे हैं।
अथापि नोपसज्जेत स्त्रीषु स्त्रैणेषु चार्थवित्।
विषयेन्द्रियसंयोगान्मनः क्षुभ्यति नान्यथा ॥ २२॥
स्त्रियों का यह देह यदि वास्तव में सुन्दर होता, तो वस्त्रालंकार के बिना भी सुन्दर लगता। लेकिन वह
अत्यन्त निंद्य और गन्दा होने के कारण वस्त्रों के बिना बिलकुल अच्छा नहीं लगता इसीलिये स्त्रियाँ अपना देह
वस्त्रालंकारों में लपेटती हैं। जिस प्रकार धोखेबाज ब्राह्मण का स्वांग बनाकर विश्वास जता कर घात करते हैं,
उसी प्रकार यह स्त्रियों की संगत है। स्त्रियों की संगत नाना प्रकार के तरीकों से दास्यत्व कराती है और अन्त में
अपने साथ नरक ले जाती है। इसलिये विरक्तों को उधर नहीं जाना चाहिये। यदि स्त्री विरक्त हो तो भी साधक
को उसकी संगत नहीं करनी चाहिये। अग्नि के संग से जिस प्रकार घी पिघलता है, उसी प्रकार स्त्री की संगत से
भी वृत्तियों में विकार उत्पन्न होता है। अमृत के स्थान पर विष खा लेने से मृत्यु अवश्यंभावी है, उसी प्रकार स्त्री
सात्त्विक है यह जानकर सेवन करने पर भी वह दुःख ही देती है। यदि अग्नि में घृत बहुत समय तक रह पाता
तो स्त्री की संगत से भी पारमार्थिक लोग आत्मस्वरूप प्राप्त करते। घृत समाप्त होकर यदि साठ वर्ष भी हो गये
हों तो भी अग्नि के संगत से घृत की गागर द्रवित हो उठती है। उसी प्रकार स्त्रियों के सहवास से वृद्धावस्था में
भी काम विकार प्रबल होता है। कपूर अगर अग्नि में बिना जले रह गया होता तो स्त्री की संगत से सबको
परब्रह्म का लाभ हुआ होता। अग्नि हाथ में लेते ही, वह जलाता है वैसी ही स्त्रियों की संगत है। उसकी संगति
से आसक्ति बढ़ती है और वह पुरुष को अनर्थ में डालती है। स्त्री से भी ज्यादा यदि स्त्रैण की संगति मिले तो वह
करोड़ों अनर्थ का मूल है। उसकी संगति से अधःपतन ही होगा। स्त्रीलंपट पुरुष से यदि भेंट हो जाय तो वह
सारा ब्रह्मानन्द स्त्री सुख में ही है, ऐसा आदेश विरक्त को देता है। इससे तत्काल स्त्री कामना उत्पन्न होती है।
फिर वह स्वदारा और परदारा का विचार ही नहीं करने देती और स्वेच्छाचार की ओर प्रवृत्ति मुड़ती है। इसलिये
स्त्रैण ही वास्तव में घातकी है। स्त्रैण जहाँ प्रवेश करता है, वहाँ अनाचार की बेल बढ़ी ही समझिये। अधर्म सर्वांग
से फलता-फूलता है और वह बाधक बनकर अनर्थ के फल देता है। इसलिये जिसे परमार्थ साधना हो उसे स्त्री
की अथवा स्त्रैण की संगत कभी नहीं करनी चाहिये क्योंकि उनकी संगत अनर्थ में डालती है। लेकिन यदि स्त्रैण
को ही वर्जित कर दिया जाय तो फिर स्त्रीसंग रह ही कहाँ जाता है ? सारांश यह संगत ही परमार्थ के लिये
उपयोगी नहीं है। इसलिये साधक को स्त्रियों की ओर नहीं देखना चाहिये और बातें तो नहीं ही करनी चाहिये
और एकान्त में भी कभी नहीं बैठना चाहिये। अब आप यह कहेंगे कि जो विचारी है उसे स्त्रीसंगति क्या करेगी ?
तो भाई ! इस स्त्री की संगत के पीछे बड़े-बड़े ज्ञाताओं ने भी आघात सहे हैं। पराशर ऋषि को नाव में क्षणभर के
लिये नाविक की कन्या मिली, लेकिन उतने ही क्षणों के लिये उन पर अपयश का आघात हुआ। ऋष्यशृंग बहुत
बड़ा तपस्वी था किन्तु वह भी वेश्या के वश में हो गया, औरों की क्या बात करें ? साक्षात महादेव पर भी
मोहिनी ने मोहिनी डाली। विषय और इन्द्रियों की संगत से चित्तवृत्ति निश्चित रूप से क्षुब्ध होती है। सज्ञान भी
जब उनमें बँध जाते हैं तो अज्ञानों की क्या कथा ? लेकिन, स्त्रियों की प्रत्यक्ष संगत न होते हुए भी स्त्री के स्मरण
मात्र से भी काम विकार उत्पन्न होता है। इसी का स्पष्टीकरण राजा कर रहे हैं।

छब्बीसवाँ अध्याय ७०५
अदृष्टादश्रुताद् भावान्न भाव उपजायते।
असम्प्रयुञ्जत: प्राणान् शाम्यति स्तिमितं मन: ॥ २३ ॥
जिसे न कभी देखा है न सुना है, ऐसे विषय से पुरुष का मन कभी क्षुब्ध नहीं होता। लेकिन पहले के भोगे
हुए जो विषय हैं, उनका स्मरण मन में होते ही स्त्री की संगत न होने पर भी वृत्ति का क्षोभ होता है। इस प्रकार
पहले से चली आ रही विषयासक्ति ही पुरुष को निश्चित रूप से बाधक होती है। वह एकान्त में अकेला ही बैठा
हो, लेकिन वासना के संस्कार से उसकी वृत्ति सकाम होकर क्षुब्ध होती है। पिछली रात के पकवान ढँककर रखे
रहते हैं, वे दूसरे दिन सुबह बिना पकाये खाये जा सकते हैं। उसी प्रकार वासना में स्थित काम ही पुरुष को
सकाम कर देता है। उस काम का क्षोभ होने पर कर्म और अकर्म का स्मरण नहीं हो पाता। सारांश, वासना-
कामसंगति यही परमार्थ में साधक होते हैं। इसलिये सभी साधकों को स्त्री विषय की आसक्ति छोड़ देनी चाहिये।
मन में यदि कामासक्ति क्षुब्ध हो जाय तो साधकों को एक उपाय करना चाहिये। उन्हें बाह्य इन्द्रियवृत्ति पर
नियंत्रण रखना चाहिये, ताकि धीरे-धीरे मन को शान्ति प्राप्त हो। कर्मेन्द्रियों को दृढ़ वैराग्य से वश में रखने से,
मन में काम कितना ही क्षुब्ध क्यों न हो जाय लेकिन वह अपने आप ही शान्त हो जाता है। जिससे अनर्थ हो
जाता है। वह संगत ही छोड़ देनी चाहिये। वह संगत्याग कैसे किया जाय उसका स्पष्टीकरण राजा श्लोकार्थ में
कर रहे हैं।
तस्मात्सङ्गो न कर्तव्यः स्त्रीषु स्त्रैणेषु चेन्द्रियैः।
विदुषां चात्यविश्रब्धः षड्वर्गः किमु मादृशाम् ॥ २४ ॥
जो ज्ञानियों को भी चक्कर में डालता है, कामी पुरुष को तत्काल अपने वश में कर लेता है, ऐसा यह
स्त्रीसंग अनर्थकारी है और स्त्रैण पुरुषों के लिये तो और भी अधिक अनर्थकारी है। इसलिये जो अपना सच्चा
हित साधने के इच्छुक हों ऐसे परमार्थी लोग कर्मेन्द्रियों को स्त्री और स्त्रैण की संगत न होने दें। मन विषयों में
भले ही क्षुब्ध हो जाय फिर भी हमें अपने इन्द्रियों को काबू में रखना चाहिये। जिससे मन का विषय अपने आप
ही समाप्त हो जाता है। विषय और स्त्रीसंगत साथ होने पर विषयासक्ति से मन क्षुब्ध होता है। क्षणार्ध के लिये
हुए स्त्रीसंग के कारण भी सज्ञान लोग अनर्थ में पड़े हैं। स्त्री को देखकर देवेन्द्र कामातुर हो गया और उसके
शरीर में छिद्र पड़ गये और गुरुपत्नी तारा ने चन्द्रमा को भी कलंकित करके छोड़ा। सौभरी नाम का ऋषि महान
तपस्वी था, वह मत्स्य का मैथुन देखकर कामातुर हो गया (यह कथा नौंवे स्कंध के छठवें अध्याय में आयी है)
इस प्रकार यह स्त्रियों का स्कंध अनर्थकारी है। जब ब्रह्मदेव अपनी ही कन्या को देखकर कामासक्त हो गया तो
औरों की क्या बात की जाय ? कामिनी का संग महाभयंकर है। शिव का लिंगपतन इसी कारण हुआ। इन स्त्रियों
की संगत में बड़े-बड़े सज्ञान और योगी भी फँस गये हैं। नारद ने केवल विनोद ही विनोद में कृष्ण की स्त्री माँग
ली, उसके लिये गंगातट पर उसकी नारदी बना दी और उसके गर्भ से साठ पुत्र उत्पन्न हुए। सहज मौज के लिये
भी यदि स्त्रियों के पास जाएँ तो जब सज्ञानों के लिये भी वह संगत बाधक होती है तो औरों की क्या बात करें ?
आधे क्षण के लिये स्त्रियों की संगत करके ज्ञानी भी ठग गये हैं। इसलिये जो स्त्रीसंग पर विश्वास करेंगे वे मेरी
ही तरह दुःखी होंगे। इसलिये स्त्री संग पर विश्वास रखने से छह इन्द्रियों का समूह सबको चक्कर में डाल देता
है। इसीलिये इन्द्रियों को वश में रखकर स्त्रियों का सर्वथा त्याग करना चाहिये। इस प्रकार स्त्रियों की संगति
छोड़कर इन्द्रिय वृत्तियों को नियंत्रण में रखकर राजा ने परम शान्ति प्राप्त की। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।

७०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीभगवानुवाच
एवं प्रगायन् नृपदेवदेवः स उर्वशीलोकमथो विहाय।
आत्मानमात्मन्यवगम्य मां वै उपारमज्ज्ञानविधूतमोहः ॥ २५॥
जिसने उर्वशी सह स्वर्ग के सारे भोगों का भोग किया, जिसे देवता भी श्रेष्ठ मानते हैं; जो सभी समस्त
राजाओं का मुकुटमणि था, जिसके आगे राजा साष्टांग दण्डवत् करते थे, ऐसा चक्रवर्ती राजा पुरु उर्वशी का तथा
स्वर्ग का उपभोग कर विरक्त हुआ, इसलिये वह एक भाग्यशाली राजा था। जिन्हें विषयों का लाभ ही नहीं हुआ
ऐसे विरक्त योगी बहुत दिखायी देते हैं किन्तु स्वर्ग की देवांगना का उपभोग कर राजा पुरुरवा विरक्त हुआ, इस
दृष्टि से वह बहुत ही धन्य है। पुरुरवा जैसी विरक्ति अन्य किसी में नहीं देखी, इसलिये पुरुरवा सारे त्रिभुवन में
धन्य हे ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण अपने मुख से वर्णन करते हैं। अनुताप के आवेग में उसने अपनी स्थिति की निन्दा
कर स्त्रीविषय की आसक्ति छोड़ दी और मोह को सचमुच ही धो डाला। पश्चात्ताप की अँगीठी सुलगा कर,
वैराग्य का पुट देकर, विचारों से भलीभाँति इन्द्रियदमन कर उसने काममोह का दाग धो दिया। जिस प्रकार सुवर्ण
का पुट देने से उसका वजन घट जाता है किन्तु गुणवत्ता बढ़ जाती है, उसी प्रकार आत्मानुभव के लाभ से वृत्ति
को भलीभाँति धो-पोंछ दिया। इस प्रकार ऐसी अत्यन्त शुद्ध वृत्ति हो जाने के कारण विवेक वैराग्य रूप सम्पत्ति
से और पूर्ण पश्चात्ताप से वह मेरे कृपा प्रसाद का सुपात्र बना। मेरी कृपा के बिना देह में कभी अनुताप उत्पन्न
नहीं होता। जिसमें पूर्ण अनुताप हुआ दिखायी दे उसके प्रति मेरी पूर्ण कृपा है, ऐसा समझना चाहिये। मेरी कृपा
होने से जीव पूर्ण ब्रह्मरूप होता है और देहाभिमान समूल नष्ट होकर 'मैं' 'तू' का आभास ही नहीं होता। फिर
कार्य, कर्म, और कर्ता; भोग्य, भोग और भोक्ता; दृश्य, दर्शन और द्रष्टा यह त्रिपुटी बिलकुल शेष नहीं रहती।
तीन गुणों की त्रिपुटी का कारण जो मूलभूत अज्ञान है वह सद्गुरु कृपा से समाप्त हो जाता है। रस्सी से सर्प का
भास होना जिस प्रकार रस्सी को पहचानने से समाप्त हो जाता है उसी प्रकार गुणों के साथ अविद्या भी गुरुपदेश
से अदृश्य हो जाती है। सद्गुरु के उपदेश के अनुसार जब द्वैत का भान नहीं होता तो फिर उर्वशी का भोग कौन
करेगा? राजा आत्मानंद से अत्यन्त तृप्त हो गया। राजा जब ब्रह्मरस से तृप्त हुआ, तब वह उर्वशी को छोड़,
स्वर्गलोक छोड़कर आत्मानंद से तृप्त होकर वहाँ से चल पड़ा। अन्य ज्ञाता स्त्रियों को अवश्य त्याग करते हैं
किन्तु उनसे कामासक्ति का त्याग नहीं होता। लेकिन राजा की वैसी स्थिति नहीं थी। वह वास्तविक विरक्ति में
पहुँच गया था ऐसी विरक्ति में जहाँ स्त्री विषय की बात ही नहीं उठती, ब्रह्मानन्द से सारी सृष्टि भर जाती है, ऐसे
आत्मानंद की पुष्टि से वह तृप्त हुआ। ऐसे आनन्दरूप में वह सहज ही मत्स्वरूप होकर मुझसे मिल गया।
कल्पना से उत्पन्न काम-विषय को जीत कर वह आत्मानंद में नाचने लगा। ऐसे दृढ़निश्चय से उसे मेरा
निजस्वरूप प्राप्त हुआ और उसी ने अपना इतिहास अपने सुख समाधान के लिये सुनाया। अनुताप के आवेग में
सहज ही अविद्या का नाश हो वह आत्मसुख से तृप्त हुआ। ऐसा निजलाभ प्राप्त करना हो तो स्त्रियों की
विषयासक्ति छोड़ देनी पड़ेगी और अच्छी संगति करनी होगी। यही बात श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
ततोदुःसङ्गमुत्सृज्य सत्सुसज्जेतबुद्धिमान्।
सन्त एतस्यच्छिन्दन्ति मनोव्यासङ्गमुक्तिभिः ॥ २६ ॥
यदि दुःसंग हो तो उसे अवश्य छोड़ देना चाहिये। अब दुःसंग कैसा ? तो स्त्री और स्त्रैण इनसे अधिक
दुःसंग और कोई नहीं है जो वेदशास्त्र को नहीं मानता, जो परमार्थ पर विश्वास नहीं करता और जिसका अन्तर

छब्बीसवाँ अध्याय
७०७

विकल्प से भरा रहता है वह भी सचमुच दुःसंग ही है। जो अत्यन्त विरक्ति की बात करता है किन्तु हृदय में
अधर्म काम की प्रीति रहती है; कामना के आड़ आते ही द्वेष बढ़ता है; वह भी सचमुच दुःसंग है। उसी प्रकार
स्वधर्म, कर्म, विनय, और सात्त्विक वृत्ति का बाहर प्रदर्शन करना और अंतःकरण में संतों के दोष देखना; और
संवाद में उसका उदाहरण देना, वह अत्यन्त कठिन दुःसंग है। मुख्यतः हमारी सकामता ही सचमुच दुःसंग है।
उस काम का समूल त्याग कर देने से दुःसंग का त्याग होता है। काम कल्पना की मार यही सबसे असाध्य
दुःसंग है। जो पुरुष कामकल्पना का त्याग करेगा उसी का संसार सुखमय होगा। कामकल्पना छूटने के लिये
सत्संग ही प्रमुख कारण है। संतों के चरणों में लीन होने से कल्पना और काम का अपने आप लय हो जाता है।
संग सभी अर्थों में बाधक है इसलिये यदि सभी प्रकार का संग छोड़ने को कहें तो सत्संग न करें तो साधक कैसे
छूट पायेंगे ? सत्संग के बिना जो साधन है वही साधक के लिये दृढ़ बन्धन हो जाता है। सत्संग के बिना किया
हुआ त्याग ढकोसला है। चित्त और विषय का बन्धन दृढ़ है; उसे विवेक से छुड़ाने से केवल साधु ही समर्थ है।
संतों की सहज बातें करोड़ों उपदेशों से अधिक प्रभावी होती हैं; देहात्म भाव से उत्पन्न हुए जीवों के बन्धन वे
शब्दों से काट देते हैं। सद्भाव से संगत करने से साधकों की संसारपाश से मुक्ति होती है। इसलिये बुद्धिमानों को
संतों की संगति अवश्य करनी चाहिये। उन संतों के लक्षण यथार्थ ढंग से और अपनी प्रसाद वाणी से श्रीकृष्ण
अत्यन्त संक्षेप में और अत्यन्त प्रेम से उद्धव को बता रहे हैं।

सन्तोऽनपेक्षा मच्चित्ताः प्रशान्ताः समदर्शिनः।
निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः॥ २७॥

साधुओं के अनेक लक्षण हैं किन्तु श्रीकृष्ण उनमें से केवल आठ लक्षण चुनते हैं। सुनो। लाभ अथवा हानि
साधुओं के चित्त को बाधा नहीं पहुँचा सकते, चित्त सदा भगवान की ही ओर लगा रहता है। इसी का नाम है
'निरपेक्षण'। कोई एक विशिष्ट विषय मुझे प्राप्त हो इसका स्मरण भी जीव को नहीं होता। उद्धव ! साधुओं की
यह निरपेक्षता की निधि, यह उनका पहला गुण है। चित्त से चैतन्य का ही चिन्तन करना, इसी का नाम है
'मच्चित्त' होना। इसी का नाम है, पूर्ण निरपेक्षता। अन्य किसी भी बात का चिन्तन करना संसार बाधा का कारण
बनता है। इस प्रकार निरपेक्ष होने के लिये जागृती में, स्वप्न में और सुषुप्ति में चित्स्वरूप में दृढ़ रहना, इसी का
नाम है 'मच्चित्त'। यह दूसरा गुण है। देह का चाहे श्रृंगार हुआ हो या वह आपत्ति से ग्रस्त हुआ हो, फिर भी
परमानन्द में निमग्न रहना, इसी का नाम है 'मच्चित्त'। चित्त जब कामलोभादि से दोषरहित होकर परमानन्द में
स्थिर हो जाता है, तभी वहाँ शान्ति का वास होता है, इसीलिये उसे प्रशान्त कहते हैं। कोई प्राणान्त होने तक
अपराध करता रहे फिर भी जो उसे 'दुष्ट' नहीं कहता, उलटे उस अपकार करने वाले पर भी उपकार करता है,
उसी को उत्कृष्ट 'शांति' कहते हैं। कोई सब कुछ ठग ले फिर भी जो उस पर क्रोध नहीं करता, उसे दोषी नहीं
कहता, बल्कि उसे ब्रह्मार्पण समझता है; इसी कारण उसके शरीर में प्रशांतता आती है। सचमुच, ब्रह्मभावना से
सभी प्राणियों पर विश्वास करना तथा चित्त में किसी प्रकार का विकल्प उत्पन्न न होने देना, इसी का नाम
'प्रशांतता' है। यह तीसरा गुण है। यह गुण आने का कारण यही है कि संसार में सर्वत्र वैषम्य ही भरा हुआ है,
फिर भी जो उस वैषम्य में भी 'समभाव' देखता है, वही सच्चा 'समदर्शी' है। यही निरुपम चौथा गुण है। यह
समदृष्टि हाथ लगने के लिये, भक्तिभाव से भगवान को भजन कर अहंता और ममता का पूर्णरूप से त्याग करना
चाहिये। उसके बारे में भी सुनो। देह में देहाभिमान रखने से 'अहंता' 'मैं' पन बढ़ाती है और उस 'मैं पन' के

७०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कारण देह सम्बन्धी 'ममता' बढ़ती है। यह बढ़ी हुई अहंममता महादुःख के भँवर में फँसती है। उसी निज दुःख
का निवारण करने के लिये भक्तिभाव से श्रीगुरु की शरण में जाना चाहिये। गुरु की कृपा पूर्ण होने तथा उनके
द्वारा देह की अहंत प्रकट कर देने से सारा संसार 'मैं' ही हूँ ऐसा अनुभव होता है। छोटा-बड़ा जो भी कुछ सृष्टि
में दिखायी पड़ता है, वह सब मेरा ही स्वरूप है, मेरे 'मैं' पन की इतनी प्रसिद्धि है कि वह सारे त्रैलोक्य को
व्याप लेती है। ऐसे शुद्ध 'मैं' पन से परिपूर्ण होने पर देह को मैं कहने वाला कौन होगा? 'मैं'-'तू' सब कुछ वहाँ
समाप्त हो जाता है। इसी का नाम है 'निरभिमान'। इस प्रकार मेरे 'मैं' पन का विचार करने पर 'मेरा पन' अर्थात्
'ममता' पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती है। यदि मेरे 'मैं' कहने लायक कोई दूसरा स्थान शेष हो तभी वहाँ ममता का
स्फुरण हो सकता है। उसे मैंने चिन्मात्रस्वरूप से निगल ही लिया है। इसलिये मैं पन से 'मैं और मेरा', तथा 'तू'
पन से तेरा कहने का प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसा परब्रह्म से ऐक्य होने के कारण ही सहज ही 'निर्मम' होता है।
उद्धव ! 'निर्मम' और 'निरभिमान' वह यही है। संतों का निजगूढ़ तथा पाँचवाँ और छठवाँ लक्षण यही है। इस
प्रकार जो सचमुच ही निर्मम और अहंकार रहित होकर रहते हैं, उन्हें द्वंद्व दुःख के पहाड़ों की भी बाधा नहीं
होती। देह को प्रारब्ध के भरोसे छोड़ देने पर चाहे सुख दुख की झड़ी भी लग जाय तो भी वह ब्रह्मसुख के
चौराहे पर देह का केवल द्रष्टा-साक्षी होकर रहता है। देह को बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त होने पर भी वह मन में हर्षित
नहीं होता अथवा कोई देह को नरक में ढकेल दे तो दुःखी नहीं होता। देह बाघ के मुँह में फँस जाय तो भी वह
दुःख से विह्वल नहीं होता अथवा पालकी में बैठने पर आनन्दित नहीं होता। परछाई विष्ठा पर पड़े अथवा
पालकी पर चढ़े इससे उस पुरुष को सुख या दुःख कुछ भी नहीं होता। उसी प्रकार देहभोग मुक्त के लिये होते
हैं। उसकी दृष्टि में दुःख दुःख से वंचित होता है और सुख सुख को भूलता है, इसीलिये वह निर्द्वन्द्व बनता है।
उसी प्रकार जो निर्मम और अभिमानरहित होता है उसे भेद का भान नहीं रहता और अभेद में द्वंद्व बन्धन मिथ्या
होता है। यह 'निर्द्वन्द्व' अर्थात् अभेद भाव मुक्त का सातवाँ गुण है। अरे ! जरा देखो। जो निर्द्वन्द्व और निरभिमान
होता है, उसे जब अपना देह बिलकुल मिथ्या लगता है तो उसे देह सम्बन्धी परिवार बढ़ाने का अवकाश कहाँ
है? अपने सगे-सम्बन्धी, धन सम्पदा, पत्नी-बच्चे इनके साथ रहकर भी वह इन्हें स्पर्श नहीं करता। जिस प्रकार
जगे हुए व्यक्ति के लिये स्वप्न का व्यवहार नहीं रहता, उसी प्रकार साधुओं का भी संसार नहीं होता। सारांश,
साधु परिग्रही होते हुए भी पूर्णरूप से 'अपरिग्रही' होते हैं। यह उनका आठवाँ मुख्य लक्षण है। संसार के लिये
यह दुर्गम है क्योंकि साधु परिग्रही दिखाई देते हैं किन्तु परिग्रही नहीं होते हैं। संतों की यह स्थिति प्राप्त करने के
लिये उनकी ही भक्ति करनी चाहिये। साधुओं के ये आठ लक्षण वास्तव में ब्रह्मा के अष्ट अंग ही हैं अथवा
निर्गुण की ये अष्ट महासिद्धियाँ ही साधु के आठ पंखुड़ियों का कमल खिला हो, ऐसा यह संतों का स्वानंदशील
साधु का लक्षण है। ये श्रेष्ठ आठ गुण सभी भूषणों के भूषण हैं। ये गुण जिनमें पूर्णरूप से अंकित हो जायें वे
साधु सज्जन नितांत पवित्र हैं। अन्य किसी का भी संग अत्यन्त बाधक होता है। लेकिन यह सत्संगति वैसी नहीं
है। इस संग के योग से देहसंग की आसक्ति टूटती है। इसके लिये उन्हें उपदेश नहीं करना पड़ता। केवल संग ही
देही को विदेही बनाता है। वही अपूर्वता सात श्लोकों में श्रीहरि वर्णन करते हैं।
तेषु नित्यं महाभाग महाभागेषु मत्कथाः।
सम्भवन्ति हिता नृणांजुषतां प्रपुनन्त्यघम्॥ २८॥
इन्द्र पद से ब्रह्मलोक तक प्राप्त होने को बड़ा 'भाग्य' कहते हैं। लेकिन यह भी सत्संग का एक अंश भी
नहीं है। ऐसी सत्संगति महाभाग्यवानों को ही प्राप्त होती है। साधु मेरी यशगाथा का गायन करते हुए

छब्बीसवाँ अध्याय ७०९
भगवद्भावना से ही व्यवहार करते हैं। वह कथा यदि अकस्मात भी सुनायी पड़ी तो कलियुग के सारे पाप
तत्काल धो देती है। वह गंगा से भी अधिक पवित्र है। जहाँ मेरी निजकथा का गायन होता है, वह तीर्थ स्थान भी
पवित्र हो जाते हैं। ऐसे भगवान की कथा कीर्ति का साधु घोष करते रहते हैं। स्वयं भागीरथी भी मन ही मन
चिन्तन करती रहती है कि कभी कोई साधु मेरे पास आये तो मेरे सारे पाप धुल जायें। मेरे मन में पार्वती का द्वेष
होने के कारण मैं भी पाप से बद्ध हूँ। वह पातक भी संतचरणों से झड़ जायगा क्योंकि सत्संगति से सारे पाप घुल
जाते हैं अथवा जिसके मुख में हरिनाम की कीर्ति होगी उसके पैर यदि मेरे पात्र तक पहुँचेंगे तो मेरे सारे पाप चले
जायेंगे, ऐसा स्वयं भागीरथी कहती है। इस प्रकार भागीरथी भी संतों के संगति की निरन्तर इच्छा करती है। ऐसा
उन संतों के मुख से मेरी कथा अत्यन्त आदर से जो श्रोता सुनेगा उसका भाग्य सचमुच मैं भी वर्णन नहीं कर
पाऊँगा। मेरी कथा में रुचि रखने से उसमें नित नया माधुर्य मिलने लगता है और आदरपूर्वक सुनने से करोड़ों
पाप जल कर नष्ट हो जाते हैं। मेरी कथा अथवा मेरा नाम सारे पातकों को भस्म कर देता है। उद्धव ! चित्तशुद्धि
का अत्यन्त सुगम मर्म यही है। अनेक प्रकार के योग अथवा वेदाध्ययन करने से भी मन पवित्र नहीं होता। उसी
हरिकथा का श्रवण करने से अंतःकरण पवित्र होता है। अबद्ध रीति से वेद का पठन करने से अनेक प्रकार के
दोषों की बाधा होती है। किन्तु नाम यदि अशुद्ध भी कहा जाय तो भी उसे कहने वाले परमार्थ से शुद्ध ही हो जाते
हैं। अनेक प्रकार के योग, याग अथवा वेदाध्ययन के अधिकारी केवल ब्राह्मण ही होते हैं। किन्तु उद्धव ! कथा के
श्रवण से चारों वर्ण पावन होते हैं। जब कथाश्रवण से इतना लाभ है तो फिर सभी लोग उसका श्रवण क्यों नहीं
करते, ऐसा यदि कोई कहे तो उसका उत्तर है भगवत्कृपा के बिना किसी को वह भाग्य प्राप्त नहीं होता। जिन
पर भगवान की पूर्ण कृपा रहती है, उनका ही कथा कीर्तन से प्रेम रहता है। भाग्य से वही श्रेष्ठ हैं। ऐसा श्रीकृष्ण
स्वमुख से बताते हैं। मेरा नाम और यश संसार को पवित्र कर देता है ऐसा श्रीकृष्ण ने विह्वल होकर उद्धव से
कहा। किन्तु ऐसी भगवत्कथा हमें कैसे प्राप्त हो ? उसी के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण अगले श्लोकार्थ में स्पष्ट करके
बताते हैं।
ता ये शृण्वन्ति गायन्ति ह्यनुमोदन्ति चादृताः ।
मत्पराः श्रद्दधानाश्च भक्तिं विन्दति ते मयि ॥ २९॥
कोई अपने घर के काम से कहीं जा रहा हो और जाते-जाते सहज ही उसके कान में हरिकथा पड़ जाय तो
कृष्ण कीर्ति की कथा के अक्षर कर्णद्वार में घुसते ही भीतर के सारे पातक खड़बड़ा कर बाहर आ जाते हैं। सिंह
की गर्जना कान पर आते ही जिस प्रकार मदमत्त हाथी की हालत खराब हो जाती है, उसी प्रकार हरिकथा कान
पर पड़ते ही महापापों की राख हो जाती है। इस प्रकार पातकों का कचरा साफ होते ही हरिकथा में रुचि जगती
है और कथा श्रवण की ओर ध्यान देने से मन भी हर्ष से प्रफुल्लित होता है। जैसे-जैसे कथा का रहस्य समझ में
आने लगता है वैसे-वैसे उसके प्रति प्रेम बढ़ने लगता है और उसी प्रेम के आवेग में वह स्वयं ही वह कथा गाने
लगता है। लोकलज्जा की गाँठ खोलकर खुले मन से हरि के गुणानुवाद गाने से रुचि अपने आप उत्पन्न होने
लगती है तो वह मन में लज्जा नहीं करता। भक्तिभाव से भगवत्कथा गाने से अपने आप रुचि उत्पन्न होती है।
इसलिये वह अधिक आदर से और अधिकाधिक श्रद्धा से कथा सुनाने लगता है और जैसे-जैसे रुचि से कथा
सुनाता है वैसे-वैसे श्रद्धा भी अधिक बढ़ने लगती है और अन्त में प्रेम का ज्वार आकर उसमें श्रद्धा भी डूब जाती
है। कथा कीर्तन का प्रतिपादन बढ़ती श्रद्धा में होने पर विषयासक्ति की बाधा नहीं होती और इस प्रकार साधकों

७१० श्रीमद् एकनाथी भागवत

को मत्परायण स्थिति प्राप्त होती है। भगवद्भजन न कर वेदाध्ययन अथवा यज्ञदान करने से ही हम तर जायेंगे
ऐसा कहने वाले लोग महामूर्ख हैं। इसमें भगवद्भक्ति ही मुख्य है, ऐसा मन में विश्वास करने पर वृत्ति
भगवत्परक ही होती है और इस प्रकार सभी प्राणियों में मद्भाव उत्पन्न होता है। ऐसा भाव अंतःकरण में धारण
कर मेरी भक्ति करने के अलावा वे और कुछ नहीं करते। इस प्रकार वे मत्पर हो जाते हैं। ऐसी मत्पर वृत्ति से वे
निजस्थिति में सावधान रहते हैं। इससे उन भक्तों में चौथी भक्ति उत्पन्न होती है। वहाँ स्मरण किये बिना ही हरि
का अखण्ड स्मरण होता रहता है। जो-जो क्रिया होती है उससे निरन्तर भगवद्भजन सहज ही होता रहता है।
दृष्टि से वह जो भी दृश्य देखता है, वह भले ही बड़ा हो या छोटा हो उसमें हरि का ही दर्शन होता है। यही
अहेतुक और सहज भजन है। उसकी वाणी से जो निकलता है, वह सब स्तव्य, स्तविता आदि लक्षणों को
भूलकर केवल हरि का स्तवन होता है। शब्दों से शब्द सजाते समय शब्दरूप से वह हरि की सत्ता ही रहती है।
इसी प्रकार शब्द जिस शब्दार्थ का द्योतक रहता है वह अर्थग्राहकता भी हरि की अर्थात् हरिरूप ही है। उसी
प्रकार कानों से शब्दों का श्रवण होते समय वह सारा शब्दार्थ ब्रह्मार्पण ही होता रहता है। नाक और सुवास का
मिलन होता है, उस समय भोक्ता के रूप में हरि ही खड़ा रहता है। अर्थात् जिसकी गंध लेनी है, वह वस्तु, गन्ध
लेने वाला तथा नाक यह त्रिगुट गन्ध निगल लेता है। 'रस', 'रसना' और 'रसाभिरुचि' इसमें भी श्रीहरि ही
भोक्ता रहता है। इसलिये भोग्य, भोक्ता और भोजन सम्बन्ध निजबोध के योग से वह परमानन्दरूप कर देता है।
शीत-उष्ण-मृदु-कठोर ('स्पर्श' विषय के चार गुण) आदि का शरीर से स्पर्श होते ही वह सारा वह स्वयं हो
जाता है क्योंकि मृदु, कठिन आदि भेद वह मिथ्या समझता है। उसे इस सबमें चित्सत्ता का ही स्फुरण होता है।
हाथ की क्रिया वह अकर्ता के ही रूप में करता रहता है इसलिये लेने-देने में भी अकर्त्तात्मभाव से हरि का ही
भजन होता है। निजरूप पर निश्चल हो जाने के कारण वह चपल कदमों को इस सूक्ष्मता से चलाता है जिस
प्रकार सूर्य किरणों के कारण मृगजल पर लहरें चलती हैं। जागृति, स्वप्न तथा सुषुप्ति में वृत्ति चित्स्वरूप में ही
लगी रहती है, इसलिये उद्धव ! 'चित्त' को अंतःकरण की स्फूर्ति का ही विस्मरण हो जाता है। इसी का नाम
'मद्भक्ति' है। यह मेरे पसन्द की भक्ति है। इसी का नाम 'चौथी भक्ति' है। इस भक्ति का भाग्य जिसे प्राप्त होता
है, उसकी चारों मुक्तियाँ दासी बन जाती हैं।
भक्तिं लब्धवतः साधोः किमन्यदवशिष्यते।
मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि॥ ३०॥
यह मेरी अत्यन्त प्रिय चौथी भक्ति है। यदि यह भाग्य से प्राप्त हो जाय तो चारों मुक्तियाँ तृणवत् हो जाती
हैं। जहाँ मेरी निरपेक्ष भक्ति रहती है वहाँ चारों मुक्तियाँ चरणों पर गिरती हैं लेकिन भक्त उनका स्पर्श तक नहीं
करते। मेरे भजन से उन्हें इतना अधिक प्रेम रहता है। मेरे भजनों से प्रेम के कारण उन्हें स्वप्न में भी किसी प्रकार
की बद्धता का आभास नहीं होता और बिना बद्धता के मुक्ति व्यर्थ है इसलिये मेरे भक्त मुक्ति स्वीकार नहीं करते।
जहाँ समूल बद्धता ही मिथ्या वहाँ बेचारी मुक्ति क्या है? मेरे भजन की चाह में ही मेरे भक्तों को स्वानंद की राशि
मिलती है। निरपेक्ष और प्रेमयुक्त भक्ति से मेरा अनन्य भजन करने से, उस भजनास्थिति में ही भक्तों को स्वानंद
की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार गर्भवती स्त्री गर्भ के साथ बढ़ती है अथवा कोई युवती अपने यौवन के साथ
व्यवहार करती है, उसी प्रकार आत्मानंद की परिपूर्णता के साथ मेरे भक्त मेरे भजन में लीन रहते हैं। उस समय
सगुण अथवा निर्गुण इन दोनों रूपों से परिपूर्ण ब्रह्म मैं ही रहता हूँ। इसलिये भक्ति से मेरा भजन करने से मेरे

छब्बीसवाँ अध्याय ७११
भक्त ब्रह्मसम्पन्न होते हैं। निष्ठा से मेरी भक्ति करने से ऐसी कौन-सी वस्तु है जो भक्तों को नहीं मिल सकती ?
विवेक, वैराग्य, ज्ञानसम्पत्ति ये मेरे भक्तों के चरणों पर गिर पड़ते हैं। मेरे भजन से भेदभाव नष्ट होता है और
अभेदज्ञान अपने आप प्रकट होता है। इससे परमानंद भर जाता है और वह स्वतःसिद्ध स्वानंद का स्वरूप बन
जाता है। मेरे स्वरूप का अंत नहीं है इसीलिये मुझे 'अनंत' कहते हैं। किन्तु भक्त का भाव इतना समर्थ और
श्रेष्ठ रहता है कि वह अनंत को भी बाँध कर रख सकता है। जिनका प्रेम इतना मधुर है, उनकी सेवा की मुझे
चाह रहती है। उनका संकट मैं सहन करता हूँ और मुझ निरिच्छ को भी उनकी इच्छा रहती है। देव प्रेम के वश
में हो गया और बोला कि मैं उन्हीं का अंकित हूँ। मैं जीवकाल से उस पर न्योछावर हूँ और सारे त्रिभुवन में
उन्हीं का होकर रह गया हूँ। अकस्मात सत्संगति होने से मेरे भक्तों को जब इतनी प्राप्ति होती है तो फिर अनन्य
भक्ति से साधु की सेवा करते हैं उनकी गति मैं शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता। ऐसे संतों की महिमा का वर्णन
करने से श्रीकृष्ण को संतोष नहीं हुआ इसलिये वही संतमहिमा अगले चार श्लोकों में वर्णन कर रहे हैं।
यथोपश्रयमाणस्य भगवन्तं विभावसुम्।
शीतं भयं तमोऽप्येति साधून् संसेवतस्तथा ॥ ३१॥
उद्धव ! तेजोमूर्ति अग्नि की सेवा करना जो जानते हैं, उनकी ठंडक, अन्धकार और भय का वह (अग्नि)
निवारण करता है। उसके पास रहने से ठंडक नष्ट हो जाती है, उसकी तेजोवृद्धि से अन्धकार नष्ट होता है और
उस पर ईश्वर भावना रखने से भय का निवारण होता है। सत्संगति को भी तुम उसी प्रकार समझो। उस संगति से
त्रिविध तापों का निवारण होता है। यही बात उद्धव तुम्हें स्पष्ट करके बताता हूँ। ठंडक अर्थात् द्वंद्व के कारण होने
वाली पीड़ा साधु समूल नष्ट कर देते हैं। तम का अर्थ है अज्ञानांधकार। इसका भी वे आत्मज्ञानोपदेश से विनाश
करते हैं। भय में, मरने जैसा भय नहीं है। ज्ञानी साधु उसका निवारण करते हैं। इतना ही नहीं, बल्कि वे
जन्ममरण को दूर कर देते हैं क्योंकि वे दीनों के प्रति पूर्णरूप से दयालु हैं। अब साधु अग्नि जैसे हैं यह कहना
भी विसंगत है, क्योंकि साधु अग्नि से भी श्रेष्ठ हैं। अग्नि के पास भीषण धुआँ रहता है और साधु क्रोधरहित
तथा धूम्ररहित होते हैं। अग्नि अधम और उत्तम दोनों को ही झुलसाता है, किन्तु साधु सबके लिये, समान रूप से
सुखदायी होते हैं। साधु की संगति धन्य है। वे अपनी संगति से जड़ का जड़त्व नष्ट करते हैं, कर्म का कर्मत्व
तोड़ते हैं और निजसंगति से डूबते हुए को बचाते हैं।
निमज्ज्योन्मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायनम्।
सन्तो ब्रह्मविदःशान्ता नौर्दृढेवाप्सु मज्जताम् ॥ ३२॥
संसारसागर में क्षण-प्रतिक्षण ज्वार आता रहता है और उसका आकार असीम बढ़ता रहता है। उसमें गोता
खाते हुए लोगों में अधर्म बुद्धि ही उत्पन्न होती है। अधर्म से नरक में डूबते हैं और स्वधर्म से स्वर्ग में जाते हैं।
इस प्रकार संसारी लोग स्वर्ग और नरक में डूबते-उतराते रहते हैं। उन्हें तारने के लिये साधु सज्जन ही मजबूत
नौका है। पानी के समुद्र में गिरने पर संसार सागर में डूबने वालों के लिये भी सज्जनरूप नौका ही पार लगाती
है। कामक्रोध रहित शान्ति यही नाव की अछिद्रता है। वह ब्रह्मज्ञान से सुदृढ़ होने के कारण सुरक्षित है। काम-
क्रोधादि भयंकर जलचर आमिष खाने के लिये इस नाव तक कभी नहीं आ पाते। सारांश, सत्संग सभी को तारता
है। इस नाव की एक बात बिलकुल अद्भुत है और वह यह कि वह कल्पांत में भी पुरानी नहीं होती। बड़े प्रवाह
के भँवरों में भी उसे डुबाया नहीं जा सकता। वह अपनी संगति से सभी को तारती है। लेकिन उद्धव ! इस नाव

७१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
का एक और चमत्कार है। वह यह कि इस नाव पर जो चढ़ते हैं वे डूबते हैं और जो 'तल' में रहते हैं, वे तर
जाते हैं। यहाँ दीनों के प्रति दया ही मुख्य रूप से उपाय है। इस दया का उद्देश्य स्वयं श्रीकृष्ण बताते हैं।
अन्नं हि प्राणिनां आर्तानां शरणं त्वहम्।
धर्मो वित्तं नृणां प्रेत्य सन्तोऽर्वाग् विभ्यतोऽरणम् ॥ ३३ ॥
अन्न के बिना प्राण कभी नहीं बचता, क्योंकि प्राणियों के पोषण का पूर्ण सामर्थ्य अन्न में ही होता है। धर्म
से प्राप्त की हुई सम्पत्ति इस लोक में हमारा संरक्षण करती है। वही धर्मरूप धन देह में भी उत्तम गति प्रदान
करता है। संसार में नितांत त्रस्त और त्रिविध तापों संतप्त शरणागतों का आश्रयस्थान होने के नाते मैं नारायण ही
उनका संरक्षक होता हूँ। मेरा नामस्मरण करने से जन्म-मरण सहज ही दूर होता है; मेरी शरण आने पर भला
कौन-सा दुःख उसे पीड़ा देगा ? दुःख का भय होने के पहले ही जो सद्बुद्धि से साधु की सेवा करते हैं उन्हें
संसारभय की व्याधि जरा भी नहीं सताती। यदि प्राणी का पतन हो जाय और वहाँ सौभाग्य से सज्जनों की भेंट
हो जाय तो अधोगति का निवारण कर वे जन्म-मरण को भी समाप्त कर देते हैं। संसारसागर तरने के लिये
सत्संगति यही सबसे अच्छा आधार है ! भक्ति भाव से संतों के चरण छूने से उनके द्वारा दीनों का उद्धार होता है।
सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्कः समुत्थितः।
देवता बान्धवाः सन्तः सन्त आत्माहमेव च ॥ ३४ ॥
जिस प्रकार सूर्य अपने तेज से अन्धकार के साथ-साथ रात्रि को भी समाप्त कर देता है, उसी प्रकार
सत्संगरूपी सूर्य का उदय होते ही, वह अविद्या की रात्रि निश्चित रूप से समाप्त कर देता है। बाहर सूर्योदय होते
ही चोरों का भय दूर होता है, उसी प्रकार सत्संगति प्राप्त होने से संसार का भय कल्पांत में भी शेष नहीं रहता।
बाहर का सूर्योदय होते ही पक्षी अपना घोंसला छोड़ देते हैं, उसी प्रकार सत्संग का सूर्योदय होने पर जीव अपने
देहरूपी घोंसले छोड़ देते हैं (देहाभिमान छोड़ देते हैं)। बाहर के सूर्यकिरणों से कमलिनी हर्ष से विकसित होती
हैं, उसी प्रकार सत्संग रूपी सूर्य के प्रकाश से निर्विकल्प कमलिनी प्रफुल्लित होती है। आकाश में सूर्योदय होते
ही नरमादा चक्रवाक का मिलन होता है। उसी प्रकार सत्संग प्राप्त होने पर जीव और शिव ये दोनों एक हो जाते
हैं। बाहर सूर्य की भोर होते ही लोग अपने गाँव का रास्ता चलने लगते हैं, उसी प्रकार सत्संग सूर्य का प्रकाश
होते ही मुमुक्षु निजधाम चले जाते हैं। बाह्य सूर्य का उदय होते ही कर्म की गति शुरू होती है, उसी प्रकार सत्संग
सूर्य की संगति से निष्कर्म प्रवृत्ति प्रारम्भ होती है। सूर्य के उदय के समय वेदज्ञ लोग अर्घ्यदान देते हैं, उसी
प्रकार सत्संग सूर्य का उदय होते ही मुमुक्षु देहबुद्धि को तिलांजलि देते हैं। सूर्योदय होने पर याज्ञिक होम में
आहुति देते हैं, उसी प्रकार सत्संगरूप सूर्योदय होने पर मुमुक्षु ज्ञानाग्नि में अहंता की आहुति देते हैं। सूर्य आकाश
में उदित होकर संसार में जड़ निद्रा को दूर भगाता है; संत चिदाकाश में उदित होकर जीवों को चिद्प्रकाश से
जागृत करते हैं। इसलिये साधु को सूर्य जैसा कहा जाय तो उचित ही है, लेकिन यह बात पूरी तरह गौण है
क्योंकि सूर्य का अस्त होता है किन्तु साधु सदासर्वदा प्रकाशमान ही रहते हैं। सूर्य को बादल ढँक सकते हैं किन्तु
साधु संसार में सदा निर्मल ही रहते हैं। सूर्य को सदा सर्वदा परिक्रमा करनी पड़ती है किन्तु साधु सदा अटल ही
रहते हैं। ग्रहण काल में सूर्य को राहु ग्रस लेता है किन्तु साधु ग्रहों का अस्तित्व ही नष्ट कर आत्मानंद में रहते
हैं। गहरा धुँधलका छा जाने पर रविमण्डल आच्छादित हो जाता हे किन्तु साधु को अन्धकार, धुँधलका अथवा
मोहपटल की जरा भी बाधा नहीं होती। सूर्य अपनी किरणों से सबको तप्त करता है लेकिन साधु अपने अंग से