श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
तेईसवाँ अध्याय ६४१
जायें। हरि की शरण में जाने से जन्म-मरण अपना मुँह भी नहीं दिखाते। जब हरि स्वयं ही अपने भक्तों की रक्षा
करता है तो फिर द्वंद्व की पीड़ा कौन दे सकेगा ? श्रीहरि पूर्णरूप से मोक्षदाता हैं। उसकी शरण में कैसे जायें ? वह
अनंतस्वरूप होते हुए भी स्वयं निर्गुण है। वहाँ कौन जायेगा ? किन्तु हरि का स्वरूप अत्यन्त निर्गुण होते हुए भी,
उसकी सगुण मूर्ति का चिन्तन करने से, यदि वही मूर्ति मन में बस जाय तो भी द्वंद्व से होने वाले सारे दुःखों का
लय हो जाता है। यदि श्रीहरि की सम्पूर्ण मूर्ति मन में न बसती हो तो उनके चरणों का ही ध्यान करना चाहिये।
इससे जन्म-मरण भाग जाता है और भेदभाव भी अपने ही भय से स्वयं भाग जाते हैं। अगर उनके चरणों का भी
ध्यान सम्भव न हो तो केवल नाम-स्मरण करना चाहिये। उस नामस्मरण से यम और काल थर-थर काँपते हैं।
जहाँ हरिनाम का नित्य घोष चलता है, वहाँ मरण का भी मरण हो जाता है। जन्म का मुँह काला पड़ जाता है
और वह शरमा कर भाग जाता है। रामनाम के घोष के आगे भेदाभेद का दुःख ही कितना होता है ? नाम माहात्म्य
की गर्जना करते समय संसार का सारा भय ही उड़ जाता है। जिसकी वाणी निरन्तर नाम की गर्जना करती है,
उसके शब्दों में श्रीहरि का वास रहता है। उसके घर ऋद्धि-सिद्धि पानी भरती हैं, मुक्ति उसकी दासी बनकर
रहती है। स्वयं विकल्परहित, शुद्ध भक्तिभाव से सगुण ध्यान, निर्गुण चिंतन अथवा नामस्मरण आदि में से भक्त
भक्ति भाव से जो भी स्वीकार करेगा, वह सब सद्भक्ति से परिपूर्ण होता है। भक्ति भाव से भगवान से प्रीति करने
का नाम ही सच्ची भक्ति है। भक्तिभाव से ही श्रीहरि प्रसन्न होकर साधकों को आत्मशान्ति प्रदान करता है। उस
आत्मशांति के साथ ही करोड़ों द्वंद्वों के दुःख समाप्त हो जाते हैं। सारी सृष्टि परमानन्द से भर जाती है और 'मैं',
'तू' दृष्टि को नहीं दिखायी देता। ऐसे अभेदभाव से श्रीहरि के चरणों की सेवा करने पर मैं स्वयं ही मुझे
भवसागर से तारूँगा। लेकिन जो सचमुच ही श्रीहरि का भक्त हो जाता है उसका संसार ही नहीं होता। इस प्रकार
भिक्षु ने जिस गाथा का वर्णन किया, वह भगवान को बहुत अच्छी लगी। उनका अंतःकरण आनन्द से भर आया
और उन्होंने उद्धव का मस्तक सहलाया। ऐसी जो यह आत्मशान्ति है वह मेरे उद्धव को प्राप्त हो ऐसी भाव
विह्वलता मन में उत्पन्न होकर श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा-
श्रीभगवानुवाच
निर्विद्य नष्टद्रविणो गतक्लमः प्रव्रज्य गां पर्यटमान इत्थम्।
निराकृतोऽसद्भिरपि स्वधर्मादकम्पितोऽमूं मुनिराह गाथाम् ॥ ५९ ॥
जिसके विश्वास से वेदों का निर्माण हुआ, जिसके चरणों से गंगा का उद्गम हुआ, जिसका नाम संसार का
बन्धन तोड़ डालता है वह श्रीकृष्ण अपने मुख से उद्धव को बताने लगा। इसलिये उद्धव के भाग्य की प्रशंसा करनी
चाहिये। श्रीकृष्ण उस पर सन्तुष्ट हुआ और उसने उसके शाश्वत निवास के लिये आत्मशांति का मन्दिर दिखलाया।
उद्धव ! अच्छी तरह ध्यान देकर सुनो। जो धन का लोभी था उसका धन नष्ट होकर वह धननाश ही उस धन लोभी
पर प्रसन्न हुआ और उसे विवेकसम्पन्न वैरागी बनाया। जो धन लोभी पूरा पेट खा भी नहीं रहा था, जिसका कोई नाम
नहीं ले रहा था, उसे ही वैराग्य ने सर्वश्रेष्ठ बनाया। उसकी बात सदा मेरे मुख में रहती है। उसका नाम मेरे मुख में
रहता है। उसकी कृति का स्वयं मैं ही वर्णन करता हूँ। जो विवेकसम्पन्न वैरागी रहता है वह मुझे अत्यन्त प्रिय रहता
है। वैराग्य जैसा महान भाग्य संसार में और कोई नहीं है। उद्धव ! जो सचमुच विवेक और वैराग्य से युक्त रहता है
वह मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है। विवेक और वैराग्य से जो सम्पन्न हो जाता है, वह मेरा हो जाता है, ऐसा समझ
लो। मैं उसकी बातों के वश में रहता हूँ और वह भी पूरी तरह मुझ पर समर्पित रहता है। लोभी का धन गया, धन
६४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
के साथ मान अभिमान गया और उस अभिमान के ही साथ द्वंद्व के कारण होने वाला दुःख भी समाप्त हो गया। धन
के जाते ही विरक्ति उत्पन्न हुई, जिससे वह नियमित एकनिष्ठ संन्यासी बन गया। भिक्षा के लिये भटकते समय दुष्ट
लोगों ने अपने दुर्भाषणों से उसकी भर्त्सना की। अनेक प्रकार के विकारों से पीड़ित होने पर तथा नाना प्रकार के
उपद्रवों के चलते भी वह अपने दृढ़ निश्चय से नहीं डिगा। स्वधर्म के धैर्य ने उसे पूर्णरूप से अभेदस्वरूप बना
दिया था। संन्यासी का पूर्ण स्वधर्म यही है कि मैं देह से भिन्न नारायण स्वरूप हूँ। इस भाव ज्ञान से उसके
देहाभिमान का त्याग किया रहता है इसीलिये वह आत्मस्वरूप से नहीं डिगता। जिस प्रकार छाया पर प्रहार करने से
उस पुरुष को जरा भी भय नहीं होता, उसी प्रकार दुर्जन जब उसके देह को प्रताड़ित करते हैं तो उस निरहंकारी
पुरुष को दुःख या भय नहीं होता। देह को नाना प्रकार की पीड़ा होने पर उसकी जो देहातीत स्थिति हुई थी, उसी
की गाथा उस भिक्षु ने गाकर सुनायी और वही अब मैंने तुम्हें सुनायी। इसमें हमें जो सुख-दुःख का अनुभव होता है
वह हमारा भ्रम ही है ऐसा समझो। इसी बात का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
सुखदुःखप्रदो नान्यः पुरुषस्यात्मविभ्रमः।
मित्रोदासीनरिपवः संसारस्तमसः कृतः॥६०॥
अविद्यात्मक जो हमारा अज्ञान है, उसमें मन के स्वरूप से मन ही उत्पन्न होता है और वही मन भेदभाव
उत्पन्न कर सुख-दुःख भोगने को बाध्य करता है। आत्मा भेदरहित है। उसमें शत्रु, मित्र, उदासीन आदि भेद की
मन ही कल्पना करता है और वह मन स्वयं चालित करता है। इस प्रकार भेदभाव में मन का उलझे रहना ही
पुरुष का अज्ञान है। ऐसे भ्रमित पुरुष के लिये द्वंद्व दुःख के कारण संसार भयावह हो जाता है। मन ही सुख-
दुःख का कारण है और संसार भी मन की ही कल्पना है, यह ध्यान में रखो। उस मन का निग्रह कैसे किया जाय
इसका उपाय स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
तस्मात् सर्वात्मना तात निगृहाण मनो धिया।
मय्यावेशितया युक्त एतावान् योगसंग्रहः ॥ ६१ ॥
जिसे संसार का दुःख नष्ट करना हो, उसे मन का नियंत्रण करना चाहिये क्योंकि त्रिभुवन में मन जैसा दुःख
देने वाला अन्य कोई नहीं है। मन अत्यन्त चंचल है, वह सहसा स्थिर नहीं हो पाता। इसलिये जिससे भेदभाव दूर
हो सके ऐसा दिन-रात विचार करने का उसे अवसर देना चाहिये। मन कहीं विवेक को धोखा देकर भाग न जाये
इसलिये इन दोनों के हाथों में बेड़ियाँ डाल कर इन्हें एक साथ रखना चाहिये ताकि यदि मन विकल्प उत्पन्न करने के
लिये भागना चाहे तो वहाँ विकल्प को नष्ट करने के लिये विवेक तत्पर होकर खड़ा रहे और जहाँ मन अधर्म की
ओर मुड़ना चाहे वहाँ विवेक उसे भगाने के लिये दौड़ कर आ जाये। मन यदि कामक्रोध के पास जाकर बैठता है तो
विवेक उसके केश पकड़ कर उसे पीछे खींचता है। मन यदि निन्दा के पास जाता है तो विवेक उसे चपत मारता है
मन विषय की ओर जाने की बात करता है तो विवेक उसके मस्तक में वैराग्य की लाठी से प्रहार करता है। मन
कल्पना के पीछे भागने लगता है तो विवेक उसे उससे परावृत्त करता है। परस्त्री और पराया धन की इच्छा कर यदि
मन उस ओर दौड़ने लगता है तो विवेक वहाँ जाकर भीषण युद्ध शुरु कर देता है। इस प्रकार मन और विवेक में
झगड़ा प्रारम्भ होकर शिकायत सद्गुरु के सामने आती है। उनका न्याय करने के लिये वह उन दोनों को अद्वैत के
बाड़े में बन्द कर देता है। उस स्थान को देखते ही मन का स्वभाव ही बदल जाता है और मन विवेक के साथ ऐक्य
स्थापित कर लेता है। वहाँ मन भी अपना मनपन भूल जाता है और विवेक मन का आकलन करना भूल जाता है।
तेईसवाँ अध्याय ६४३
जीव का जीवत्व नष्ट हो जाता है और अद्वय के योग से सम्पूर्ण परब्रह्म ही बन जाता है। सुवर्ण के सर्पाकार
अलंकार बनाने पर उस पर नाग के ही अनुरूप फन, पूँछ आदि सुशोभित रहते हैं, लेकिन यदि नाग के आकार का
वह अलंकार तोड़ा न जाय तो सुवर्ण सुवर्ण के ही रूप में होने के कारण आग को उसका भान ही नहीं रहता। उसी
प्रकार पूर्ण ब्रह्म जानकर संसार को तोड़े बिना ही जीव जीवत्व भूल जाता है और मन मनस्वरूप से वंचित हो उठता
है। विवेक की ऐसी युक्ति से मन मेरे स्वरूप में प्रवेश करता है। जहाँ मन मनस्वरूप से उद्वेलित नहीं होता, उसी का
नाम मनोनिग्रह है। हे चतुर चित्तचिंतामणि! हे विवेक चक्रवर्त्ति चूड़ामणि! हे भक्तशिरोमणि उद्धव! तुम मनोनिग्रह
करने का प्रयास करो। श्रीकृष्ण मानों प्रेम से पागल हो गया था। उसने कहा—"अरे भाई! तुम यहाँ आदरपूर्वक
मनोनिग्रह करो। जो आदरपूर्वक मन का निग्रह कर मन से उत्पन्न होने वाले भेद का त्याग करता है, उसे, जिस
प्रकार माँ अपने बच्चों को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार शान्ति उसे नहीं छोड़ती। सच्ची आत्मशान्ति यदि मन में रचबस
गयी हो तो उसे किसी प्रकार का भेदभाव पीड़ा नहीं पहुँचाता। जिसे बड़े-बड़े सिद्ध और योगी 'योगसंग्रह' कहते
हैं, वह यही है। संसार की स्फूर्ति छोड़कर चित्स्वरूप की ओर वृत्ति मुड़ती है और जीव-शिव एकसाथ आते हैं,
उसी का नाम है 'योगसंग्रह स्थिति'। ऐसे योगसंग्रह की शान्ति प्राप्त होने पर साधकों को द्वंद्व की बाधा नहीं होती।
लेकिन अब इतना ही पर्याप्त है। सारांश जिस किसी को भी यह भिक्षुगीत की भक्ति प्राप्त होगी उसे द्वंद्वों से मुक्ति
मिल जायेगी।"
य एतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहितः।
धारयञ्छ्रावयञ्छृण्वन् द्वन्द्वैर्नैवाभिभूयते॥६२॥
शान्ति प्राप्त करने के लिये कोटि-कोटि साधन करने पर भी वह नहीं प्राप्त होती। किन्तु इस भिक्षुगीत का
रहस्य मन में रखने से वह साधकों को अपने आप ही प्राप्त हो जाती है। वह योगनिष्ठा और ब्रह्मज्ञान ही
भिक्षुगीत का निरुपण है जो ध्यानपूर्वक इस मन में रखता है, उसके पास शान्ति दासी बनकर रहती है। इस
भिक्षुगीत का गूढार्थ जो शान्त चित्त से ध्यान में रखता है, उसे द्वंद्व की पीड़ा नहीं सताती और आत्मज्ञान से वह
बिलकुल शान्त हो जाता है। भिक्षुगीत के रहस्य के अनुरूप चलने से समाधान होगा इसमें आश्चर्य करने की
बात नहीं है। लेकिन जो केवल भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करेगा, उसे भी द्वंद्व पीड़ा नहीं पहुँचाएंगे। पति अधिक
समय तक दूसरे देश में गया हो तो उसका पत्र पत्नी जिस उत्कंठा से सुनती है, उसी एकाग्रता से भिक्षुगीत सुनना
चाहिये। लड़का घर से भाग गया हो और उसका पता लगने का समाचार जब कोई उसकी माँ को देता है तो भाग
जाने का कारण आदि सुनकर माँ मन ही मन छटपटाती है, विह्वल होती है। ऐसे समय उसके पास जो अन्य
स्त्रियाँ होती हैं वे भी स्नेह से विह्वल हो उठती हैं किन्तु माँ के मन में जो छटपटाहट होती है वह अन्य स्त्रियों में
नहीं होती। उसी प्रकार भिक्षुगीत का श्रवण करते समय जिसका मन द्रवित हो उठता है, जो सात्त्विक वृत्ति से
परिपूर्ण हो जाता है, वह द्वंद्वों के चक्कर में नहीं फँसता। अस्तु! इस प्रकार आदरपूर्वक श्रवण सम्भव न भी हो तो
भी इसका नित्य पठन करने से भिक्षुगीत के प्रभाव से द्वंद्व उसका स्पर्श भी नहीं करते। सिंह के शरीर के दर्प से
ही मदोन्मत्त हाथी भागना शुरु करते हैं, उसी प्रकार भिक्षुगीत के पठन से द्वंद्वों में भगदड़ प्रारम्भ हो जाती है। मन
में लोभरहित होकर, जो साधु-सन्तों के सान्निध्य में भिक्षुगीत सुनेगा, उसे द्वंद्व स्पर्श भी नहीं करेंगे। इस भिक्षुगीत
का अर्थ अथवा इस भिक्षुगीत पाठ का श्रवण करने से यह भिक्षुगीत द्वंद्वों का निवारण करता है। यह मर्म श्रीकृष्ण
को मालूम था। उसने उसे उद्धव के कल्याण के लिये बतलाया। जिस भिक्षु के गीत की फलश्रुति स्वयं श्रीकृष्ण
अपने मुख से सुना रहे हों, उस भिक्षु के भाग्य का क्या वर्णन किया जाय? त्रिभुवन में वही एक धन्य पुरुष है।
६४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विवेक और वैराग्य को शरीर में धारण कर जो बड़े-बड़े द्वंद्वों को सहन करता है, वही भगवान को प्रिय बनता है,
यह बात उन्होंने उद्धव को स्पष्ट कर दी। उद्धव ने समस्त संसार पर उपकार किया है क्योंकि उसके लिये
श्रीकृष्ण ने अपना गुह्य और आध्यात्मिक ज्ञान का भण्डार खोलकर भिक्षुगीत का रहस्य प्रकट किया। उद्धव ने
यदि शांति के बारे में न पूछा होता तो श्रीकृष्ण ने यह वर्णन क्यों किया होता ? लेकिन श्रीकृष्ण को उद्धव से
अत्यन्त प्रेम था इसलिये उसने उद्धव को अनेक प्रकार से उपदेश किया। इस उपाय से दीन-हीन भी संसार सागर
पार कर लेते हैं। जगजीवन श्रीकृष्ण ने संसार का उद्धार करने के लिये ही उद्धव को उपदेश करने के बहाने ये
बातें कहीं। श्रीकृष्ण ने ऐसा भिक्षुगीत सुनाया है जिसमें वेदशास्त्रों का तात्पर्य, उपनिषदों का सार और वार्तिक में
निहित गूढ़ रहस्य है। इस भिक्षुगीत से जीव अपने आप ही आत्मा से तद्रूप हो जाता है। ऐसा यह गूढ़ज्ञान
श्रीकृष्ण ने भक्तों की कृपा के लिये बतलाया। इसके योग से जीव का जीवत्व नष्ट होता है, शिव का शिवत्व
विलीन हो जाता है, द्वंद्वों का पीड़ा देने का गुण नष्ट हो जाता है और आत्मांनंद का भण्डार खुल जाता है। जहाँ
वेद मौन रह गये, शब्द शास्त्र भी लजा गये ऐसा उत्कृष्ट वह भिक्षुगीत मुझ जैसे साधारण पुरुष ने सुनाया। जिस
प्रकार राम ने डूबने वाले पत्थरों को तारा, उसी प्रकार मैं जड़, मूढ़ और अज्ञानी होते हुए भी जनार्दन की कृपा
मुझसे ब्रह्मज्ञान कहलवा रही है। जो अहिल्या व्यभिचारिणी थी वह श्रीराम के चरणों में लगने के कारण, उसके
नामस्मरण से पाप भी नष्ट हो जाते हैं। उसका नाम प्रातःस्मरणीय लोगों की श्रेणी में लिखा हुआ है। उसी प्रकार
यह सद्गुरु की कृपा का प्रसाद है। मेरी प्राकृत जड़ और मूढ़ वाणी साधु और ज्ञाता स्वीकार कर सकें ऐसे भाषण
आपने मुझसे कहलवाये। सरस्वती जिस पर प्रसन्न होती हैं, वह गूँगा होने पर भी वेदशास्त्र बोलता है उसी प्रकार
जनार्दन मुझ पर प्रसन्न हुए और प्राकृत भाषा में भिक्षुगीत गवाया। जिसके हाथ में राजमुद्रा रहती है, उसे सब
लोग सम्मान देते हैं। उसी प्रकार जनार्दन ने ही मेरी वाणी को श्रेष्ठ बनाया। बच्चे के तोतले बोल सुनकर माँ
प्रसन्न होती है, उसी प्रकार मेरी संस्कारहीन वाणी भी संतजनों को प्रिय लगती है। मैं और मेरी अच्छी-बुरी बातें
कौन-कौन स्वीकार करेगा ? क्योंकि मेरा मैं पन लेकर स्वयं जनार्दन स्वामी ही यह ग्रन्थ लिखवा रहे हैं। वैसे ही
यह भागवत है, तिस पर गूढ़ार्थ से भरा हुआ एकादश स्कन्ध और उसमें भी यह भिक्षुगीत पूर्णरूप से निर्द्वंद्व करने
वाला, अत्यन्त गूढ़ अर्थ से भरा हुआ है। उस भिक्षुगीत पर टीका लिखने वाला अकेला एक एकनाथ ही नहीं है
क्योंकि वह एकपन नष्ट कर ग्रंथार्थ का निरूपण जनार्दन ने कराया। उसमें न एक है न अनेक है। उसमें द्वंद्वों की
समता करने का कौशल है जिसके योग से ग्रन्थ का उत्तम स्वागत होता है। एका जनार्दन की शरण में है।
जनार्दन से उसका ऐक्य हो गया है। ऐसे ऐक्यरूप से यह भिक्षुगीत समाप्त किया। मेरे गुरु का भी गुरु, वही
योगियों का योगीश्वर इस भिक्षुगीत के अर्थ से सन्तुष्ट हुआ। उस अद्भुत आनन्द से उन्होंने मुझे आश्वासन दिया
और मुझे अभय का आशीर्वाद देकर आनन्द से डोलने लगे। एका जनार्दन की शरण में है। श्रोतागण सावधान हो
जाएँ। अगले अध्याय में श्रीकृष्ण प्रकृति-पुरुषों के लक्षण बतायेंगे। उस कथा का विचार मेरे अंतःकरण में घूम
रहा है इसलिये मैं सुख-दुःख द्वंद्व से अलग हो गया हूँ। आत्मज्ञान के योग से मेरा आत्मा से ऐक्य हो गया है।
संतसज्जनों को मैं दण्डवत् करता हूँ। श्रोताओं को भी दण्डवत् करता हूँ। अब एकनाथस्वरूप जनार्दन विनती
करते हैं कि आगे का निरूपण अत्यन्त मधुर और रस से परिपूर्ण है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे एकाकार टीकायां
भिक्षुगीत निरूपणं नाम त्रयोविंशतितमोध्यायः ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।
चौबीसवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप गुणातीत ! तुम्हें नमस्कार है। हे व्यक्तिरहित ! हे अव्यक्त ! तुझमें द्वैत की बात ही नहीं है।
तुम अद्वैत में ही रहने वाले हो। अद्वैत ही तुम्हारा अपना निवास है। वहाँ देवी-देवता आदि का भेदभाव नहीं है।
वहाँ उदय-अस्त नहीं है, क्योंकि सूर्य और चन्द्रमा को वहाँ कोई स्थान ही नहीं है। वहाँ शब्द के साथ वेद लीन
हो गया। बुद्धि को ज्ञान मिथ्या लगने लगा। वहाँ रत्तीभर भी भेदभाव नहीं है। एक अद्वयानंद ही भरा हुआ है।
ऐसे अद्वैत में प्रकृति पुरुषों की कहानी केवल अज्ञानी लोग ही ज्ञानी होने का ढोंग रचकर बड़ी चतुरता से सुनाते
हैं क्योंकि वास्तव में जहाँ 'मैं' और 'तू' के लिये स्थान नहीं है, वहाँ प्रकृति और पुरुष के लिये स्थान कहाँ मिल
पाएगा ? जिसके गर्भ में आने की भी सम्भावना नहीं रहती, उसकी जन्मपत्रिका बनाकर सुनाते हैं। जिसका जन्म
ही नहीं हुआ उसका श्राद्ध करना क्या उचित है? कोई बाँझ स्त्री के बेटे के विवाह समारोह में चलने के लिये
कहे तो अज्ञानी को यह बात सच और ज्ञानी को मिथ्या लगती है, वही बात प्रकृति-पुरुषों की है। इस प्रकार जो
मिथ्या है उसे सच बना दिया जाय और एक में ही अनेकता दिखाई जाय तो भी उसका एकपन नहीं टूटता। इस
प्रकार एकपन से एक ही होने के कारण वह स्वयं ही अपनी पत्नी बना और पत्नी का पति भी खुद ही बना। यह
विलक्षण प्रेम समझ से बाहर है। जिस प्रकार अर्धनारीश्वर की मूर्ति में जो पुरुष है वही स्त्री रहता है, उसी प्रकार
संसार में प्रकृति और पुरुष एक साथ रहते हैं। वह पुरुष और उस पतिव्रता में एकात्मभाव से अत्यन्त प्रेम है।
एक-दूसरे से अलग रहकर वे एक पग भी नहीं चल सकते। दोनों सदा एक साथ रहते हैं, दोनों का परिधान एक
है, दोनों एक ही सत्ता के अधीन रहते हैं, दोनों एक ही जीव बन कर रहते हैं। दोनों एक ही चीज देखते हैं, एक
ही चीज खाते हैं, दोनों की बातें एक-सी होती हैं और करना भी एक-सा ही होता है। दोनों का प्रेम कितना
अलौकिक है। वे एक-दूसरे के बिना विष भी नहीं खा सकते। वे दूसरे के बिना पानी भी नहीं पीते। एक-दूसरे
के बिना वे अन्धे ही रहते हैं। उसमें पत्नी का कर्तृत्व तो और भी विचित्र है। उस नपुंसक को यह पुरुषत्व प्रदान
करती है और फिर यह सदा उसी के अधीन रहता है। फिर यह उसी की आँखों से देखता है, उसके ही मुख से
बोलता हे, उसके ही कारण यह सुख-दुःख भोगता है, उसके ही कारण बन्ध मोक्ष का स्वाद चखता है। उसके
ही कारण 'मैं ब्रह्म' कहलाता है, उसके कारण यह कर्माकर्म करता है और उसके ही कारण धर्माधर्म के परिणाम
के अनुसार मरण और जन्म भोगता है। उसके ही कारण उसके हाथों पाप होता है, उसके ही कारण उसे पुण्य
प्राप्त होता है, उसके ही कारण उसका महत्त्व बढ़ता है और उसके ही कारण उसका अधःपतन होता है। अब
तक अपनी प्रकृति इस पुरुष ने बढ़ायी और प्रकृति ने भी पतिव्रत धर्म के अनुसार आचरण कर पति को अपने
वश में रखा। इन दोनों का रिश्ता विचित्र है। ये दोनों सगे भाई-बहन थे अथवा वह बाप और वह उसकी कन्या
थी और अधिक विचार करें तो वह उसका पुत्र होता है। इस प्रकार उन दोनों ने अगम्यागमन (जिन स्त्री-पुरुषों
के लिये संभोग निषिद्ध है, उनसे संभोग करना) कर किसी तीसरे का सम्पर्क हुए बिना अनेक लोग उत्पन्न किये।
इस प्रकार अव्यभिचार रूपी व्यभिचार कर संसार का आकार बढ़ाया है। वह शंकर आदि के लिये भी अतर्क्य,
अगोचर और दुर्गम असाध्य है। यह अपनी ही शक्ति प्रकृति के साथ मिलकर शिवत्व के सारे सुख भोगता है।
उसका कोई गाँव नहीं है, ठौर ठिकाना नहीं है, रूप, नाम, काल, समय नहीं है, फिर भी प्रकृति ने केवल अपने
६४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
गुणों से उसे प्रबल किया है। प्रकृति ने अपने गुणों से ही वर्ण, व्यक्ति, रूप, नाम आदि नाना प्रकार के वैभव से
अपने पति को स्वरूप दिया। तब शिव ने अपना पूर्णत्व छोड़कर शिवत्व धारण किया और वह प्रकृति सुहागिन
पतिव्रता रहकर रूप और नाम से शिव की पूजा करती है। उन दोनों के संगम से ही सारा संसार उत्पन्न हुआ है।
लेकिन उसमें तीसरी कोई भी बात नहीं दिखायी देती, और भिन्नता दिखाने का प्रयत्न करने पर भी अनन्य भाव
से स्थापित एकता भंग नहीं होती। सारा त्रिभुवन ढूँढ़ने पर भी तीसरी चीज नहीं दिखायी देती। प्रकृति और पुरुष
से ही सारा संसार भरा हुआ है। दोनों में इतना प्रेम है कि वे अनन्य भाव से एक-दूसरे से चिपके रहते हैं। एक
अणु में भी वे अपनी मालकियत के हक से रहते हैं। यदि पति न हो तो वह पतिव्रता पूरी तरह समाप्त ही हो
जायेगी और पति स्त्री के बिना अस्तित्वहीन हो जायेगा। वह वास्तव में कुछ न होते हुए ही पति बन गया है।
शिव सचमुच सदा निःसंग, बिना कोई कर्म किये ही रहता है। लेकिन उसकी स्त्री अपने प्रेमपाश से उसे वश में
कर उसे अनेक प्रकार के सुख-दुःख भोगने को विवश करती है। इस प्रकार प्रकृति ने अपने पति को गृहकर्म में
उलझा दिया और फिर उस पर प्रपंच का अधिकार जताने लगी। प्रकृति पतिव्रता होती है तथा कभी पति से
वंचना नहीं करती। वह अनेक कर्माकर्म में कष्ट सह कर भी अनेक प्रकार के सुख-दुःख पति को देती है और
आश्चर्य की बात तो यह है कि पत्नी जो कमाती है, वह पति खाता है। कारण यह है कि पत्नी के बिना उसे
एक कौड़ी भी नहीं प्राप्त होती। प्रकृति पतिव्रताओं में बिल्कुल श्रेष्ठ है। उसने अपने गुणों से ही पति को वश में
किया है। वह सुगृहिणी रात-दिन पति से वासना तंतुरूपी सेवई का सेवन कराती है। जब प्रकृति के भय से वह
भी संसार सागर में जलक्रीड़ा करने लगता है, उस समय प्रकृति ही जबर्दस्ती से पुरुष को उसमें डुबाती है।
कभी-कँभी पुरुष भी प्रकृति को डुबोता है। ऐसी प्रकृति की सोहबत में जब पुरुष के पीछे पंचमहाभूत लग जाते
हैं, उस समय वह साकार होकर जन्म-मरण की डुबकी लगाता रहता है। ऐसी प्रकृति के भय से पुरुष पागल बन
गया है और अपना मूलरूप भूल जाने के कारण प्रकृति ने उसे दीनहीन बना दिया है। इस प्रकार पूर्णत्व को
भूलकर वह जीव और शिव का भेद स्वयं ही भोगने लगता है। उसे पुनः उसके मूलस्वरूप में लाने में गुरुराज ही
पूर्णरूप से कुशल हैं। उसके वचन का इतना प्रभाव रहता है कि उसके एक ही शब्द पर जीव का जीवत्व समाप्त
हो जाता है और शिव को शिव पद का स्थान मिलता है। उसका उपदेश भक्तिभाव से सुनने पर अहंकार तत्काल
नष्ट हो जाता है, जन्म-मरण का फेरा टूटता है और संसार का भय दृष्टि को दिखायी भी नहीं देता। जिसकी
कृपादृष्टि से जीव और शिव का बन्धन टूट जाता है माया मिथ्या होकर पूर्णरूप से उड़ जाती है और पूर्णत्व का
भण्डार खुल जाता है। शिव अपना शिवत्त्व भूलकर जब दूर चला जाता है, तभी वह अपने मूलस्वरूप में आने के
लिये जब गुरु से आज्ञा माँगता है तभी उसे उसका मूल शिवस्वरूप प्राप्त होता है। सद्गुरु की ऐसी महिमा है।
उसका वर्णन मैं शब्दों में कैसे करूँ? लेकिन गौरव की वाणी से वर्णन करने के लिये मेरे मुख से साक्षात् गुरुराज
ही बोलते हैं। अतः वर्णन करने का श्रेय मैं अपने माथे कैसे ले सकता हूँ? गुरु ने तो सारा अहंकार ही छीन
लिया है अतः मैं कर्त्ता कैसे हो सकता हूँ? तिस पर ऐसे प्रसंग में यदि मैं अहंता स्वीकार भी करता हूँ तो मेरे
'मैंपन' में गुरु का ही वास है। गुरु के सिवा कोई स्थान रिक्त नहीं है इसलिये 'मैंपन' के माथे पर गुरुराज ही हैं।
मेरा जो 'मैंपन' है वह सद्गुरु स्वयं ही बन गये हैं। अतः हम दोनों का रूप एक ही हो गया है, केवल नाम
अलग-अलग है। वैसे, एका और जनार्दन ये दोनों ऐक्य रूप से एक ही हैं। सर्वत्र जनार्दन ही है, लेकिन वही
उपनाम से एकनाथ हो गया है और उसी के नाम से श्रीमद्भागवत का अर्थ देशी भाषा में बताया। अब तेईसवें
अध्याय के अन्त में भगवान ने उद्धव से यह कहा था कि यदि हमें द्वंद्व भोग प्राप्त हों तो उन्हें शान्तिपूर्वक सहन
चौबीसवाँ अध्याय ६४७
करना चाहिये। जिनके मन में अटल शान्ति का वास होता है वे मुझ अजेय को भी जीत लेते हैं। वही वास्तव में
परमार्थ साधक होते हैं ऐसा श्रीकृष्ण ने स्वमुख से कहा है। कृष्ण का वह भाषण सुनकर उद्धव का मन चौंक
उठा। उसने सोचा कि भेदाभेद सहन करने का यह काम तो अत्यन्त कठिन है। वह मुझसे कैसे सध पायेगा?
फिर, भेदाभेद सहन करने के लिये साधन क्या है, यह पूछने पर भगवान नाराज हो जायेंगे। इसलिये उद्धव
संकोच के मारे मौन रह गया। भगवान ने उद्धव के मन का हेतु जान कर द्वंद्व को सहन करने का उपाय मूल से
ही बताया। पुरुष अद्वयगुण से परिपूर्ण है तथा वह प्रकृति से भिन्न है यह आत्मज्ञान मन में जम जाने पर द्वंद्व की
बाधा नहीं होती। इसलिये द्वंद्वों पर पूर्णरूप से विजय प्राप्त करने के लिये प्रकृति पुरुषों का विवेचन उद्धव के पूछे
बिना ही श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं। श्रीकृष्ण भक्तों के अंतःकरण की बात जानता है इसीलिये वह भक्तों का
अंतरात्मा है। वह अपने भक्तों के कल्याण के लिये पूर्ण परमार्थ बता रहा है। भक्तों का मनोगत जानकर कृपालु
श्रीकृष्ण उन भक्तों के हित के लिये कृपापूर्वक बता रहा है। संसार में उद्धव अपने भाग्य के कारण धन्य है
क्योंकि त्रिभुवन का देवता श्रीकृष्ण स्वयं ही कृपा की वर्षा कर प्रकृतिपुरुष का रहस्य उसे बता रहा है। उद्धव ने
अपनी शंका स्पष्ट न करने पर भी, श्रीकृष्ण उसका निरूपण सुनाने लगा। कृष्ण जिसे तारने की बात करते हैं,
वह पहले ही तर गया ऐसा समझना चाहिये। सारे संसार का उद्धार करने के लिये श्रीकृष्ण कृपापूर्वक बोलने
लगा। गौ बछड़े के प्यार के कारण जिस प्रकार पूरे घर को दूध देती है, उसी प्रकार पद्मनाभ कृष्ण ने उद्धव से
प्रेम के कारण सारे संसार का उद्धार किया।
श्रीभगवानुवाच
अथते सम्प्रवक्ष्यामि सांख्यं पूर्वैर्विनिश्चितम्।
यद् विज्ञाय पुमान् सद्यो जह्याद् वैकल्पिकं भ्रमम् ॥ १॥
जो योगियों का योगीन्द्र है, ज्ञानियों का ज्ञानेन्द्र है, भक्तचित्तरूप चकोर का चन्द्र है, जो यदुवंश का
यादवेन्द्र है, जो प्रकृति पुरुष से भिन्न है, उस श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा- उद्धव ! द्वंद्व सहन करने के प्रकार का
अत्यन्त गूढ विचार तुम्हें बताता हूँ, सुनो। जिस निरूपण को सुनते ही हम सुख-दुःख से बिलकुल विलग हैं यह
भाव उत्पन्न होता है, वह गुप्त ज्ञान सुनो। मैंने कपिलऋषि का अवतार लेकर अपनी माँ से (देवहुति को) प्रकृति
पुरुष के सम्बन्ध में सविस्तार बताकर उपदेश किया। वही पूर्व की बात सुनाऊँगा। इस बात को सुनने से मनुष्य
स्वयं ही ज्ञानसम्पन्न हो जाता है। पुरुष से प्रकृति भिन्न है और सारा सुख-दुःख उसी के पास है यह ध्यान में
रखो। सुख-दुःख केवल मायिक हैं यह ज्ञान जिसे हो गया वह उसी क्षण संसारभय का भ्रम त्याग देता है। जिस
प्रकार मोतियों का हार सर्प का भ्रम दूर होने के बाद ही गले में डालते हैं और फिर सर्प के भय का कष्ट नहीं रह
जाता, उसी प्रकार शिव और शक्ति का विचार मैं तुम्हें पूरी तरह बताता हूँ। ब्रह्म आनन्दरूप में केवल एक है।
जिनके कारण उत्पन्न हुए द्वंद्वों के सुख-दुःख त्रिभुवन में भी नहीं समा पाते, ऐसे प्रकृति और पुरुष कहाँ से
आये? इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं। प्रकृति-पुरुषों का जन्म ही मुख्य रूप से सुख-दुःखों का
कारण है।
आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमेवाविकल्पितम्।
यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगेऽयुगे ॥ २॥
जिस प्रकार सोये हुए पुरुष की छाया उसके शरीर के नीचे ही समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार सविकार
६४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
माया को निगल कर ब्रह्म फिर से एक अकेला बच रहता है। ब्रह्म अकेला रहकर भी परिपूर्ण है। लेकिन ऐसा
कौन कहेगा ? उसका न नाम है, न रूप है और न पूर्ण व्यक्तित्व ही है। पूर्ण ब्रह्म में ब्रह्मपन का स्फुरण नहीं
होता। उसमें न युगों की संख्या है, न काल है, न समय है। दिनमान नहीं, घटिका और पल नहीं। शून्य से
शून्यत्व का मण्डल भी नहीं है। ऐसा यह ब्रह्म केवल परिपूर्ण स्वरूप के कारण है। उसमें मैं ब्रह्म हूँ का जो
स्फुरण होता है, वही माया का मुख्य लक्षण है। प्रकृति और पुरुष इन दोनों का जन्मस्थान वही है। वहीं से इन
जुड़वाँ फलों की उत्पत्ति होती है। जिस प्रकार पेट में अनाज का दाना रख कर सत्त्वहीन छिलका स्वयं बढ़ता है,
उसी प्रकार पुरुष के योग से यह प्रकृति पूर्णरूप से विकसित होती है। मिठास अन्दर रखकर कटहल के शरीर
पर काँटे बढ़ते रहते हैं, उसी प्रकार पुरुष के योग से प्रकृति को बहुत अहंकार होता है। जिस प्रकार आँख का
पानी जमकर आँख में ही परदा आ जाता है, उसी प्रकार ब्रह्म में भी मायारूपी मैल एकत्र होकर वह शुद्ध ब्रह्म
को भी मलिन कर देता है। आँख पर आया परदा दृष्टि को क्षीण करता है, उसी प्रकार माया आत्मानन्द के आड़े
आती है। उसकी ही माया उस पर विकसित होकर पुरुष को पागल बना देती है। इस प्रकार कर्त्ता के बिना ही
जिस कार्यकारण ने आकार लिया उसे कृतयुग कहने के लिये वेद तत्काल उद्यत हुआ। 'अ' कार, 'उ' कार तथा
'म' कार के साथ प्रकृति पुरुषों में वेद उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार अंकुरित बीज में पहले तीन पत्तों का उद्भव
होता है, उसी प्रकार उस वेद का भावार्थ वही है कि ब्रह्म ही सत्य हैऔर माया मिथ्या है और यदि हम भेदाभेद
का त्याग करें तो ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति होती है। विचारशील और कुशल लोग यह बात जानते हैं। इस प्रकार जो
वेद के विचार से, अभेद भावना से योगी बनते हैं, वे कृतयुग से लेकर कलियुग तक विचरण करते समय सदा
युगरहित ही रहते हैं। उन्हें युग का बन्धन नहीं होता। कृतयुगादि जो युगों की पंक्तियाँ हैं या चराचरादि जो नाना
प्रकार के व्यक्ति हैं उन्हें प्रकृति ही उत्पन्न करती है। उस प्रकृति की उत्पत्ति श्रीकृष्ण बताते हैं।
तन्मायाफलरूपेण केवलं निर्विकल्पितम्।
वाङ्मनोऽगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत् ॥ ३ ॥
जो परब्रह्म है, वह सर्वव्यापी है, जिसमें रूप और नाम का प्रवेश नहीं है, जो मन और बुद्धि को भी दुर्गम
है और इन्द्रियों के लिये भी जो दुर्गम है, जो सचमुच ही सत्यस्वरूप है, जो परा से परे है और जो निर्विकार तत्त्व
है, उस परब्रह्म में माया के चमत्कार तर्क से परे हैं। वह परब्रह्म में ही दृश्य और द्रष्टा का विकार उत्पन्न करती
है, वही वास्तव में प्रकृति और पुरुष बन जाती है और इस प्रकार चराचर की वृद्धि करती है। जिस प्रकार स्वरूप
के साथ ही छाया की मूर्ति उत्पन्न होती है, उसी प्रकार ब्रह्म में माया की स्थिति है। उसी ने शिव-शक्ति को पुरुष
और प्रकृति इस भेद से उत्पन्न किया है। ब्रह्माण्ड में जो ईश्वर का स्वरूप होता है वही पिण्ड में (देह में) जीव
का रूप ले लेता है। इस प्रकार प्रकृति-पुरुष की यह जोड़ी माया ने ही दो प्रकार की बनायी है। ब्रह्म अच्छेद्य है,
ऐसा वेद कहते हैं। उसे फाड़कर दो भाग कैसे किये? उसी प्रकार जैसे दर्पण में हमें अपना मुख अलग प्रकार
का दिखायी देता है। उसी प्रकार हम यदि पूर्व की ओर मुँह करके खड़े हो जाएँ तो हमें दर्पण में अपना
प्रतिबिम्ब पूर्वाभिमुख नहीं दिखायी देता। वह हमारे सामने ही (पश्चिमाभिमुख) रहता है। यही माया का
चमत्कार है अर्थात् पुरुष यदि पूर्व की ओर देख रहा है तो प्रतिबिम्ब पश्चिम की ओर रहता है। उसी प्रकार
आत्मदृष्टि स्वरूप की ओर रहती है और जीवदृष्टि प्रपंच की ओर रहती है। इसलिये जीवस्वरूप के सम्मुख हो
नहीं पाता। जीव ठीक विपरीत दिशा की ओर देखता रहता है। उसी प्रकार ब्रह्म में ब्रह्म का जो स्फुरण होता है
चौबीसवाँ अध्याय ६४९
वही मूल माया का स्वरूप है। वहाँ हम ईश्वर के स्वस्वरूप से ही अपने सामने सन्मुख होते हैं। वास्तव में जो
शुद्ध और अद्वितीय ब्रह्म है, उसमें माया का सम्बन्ध मिथ्या है। किन्तु उस माया ने अभेद में भी भेद उत्पन्न कर
शिव और शक्ति (पुरुष और प्रकृति) अलग-अलग बना दिये।
तयोरेकतरो ह्यर्थः प्रकृतिः सोभयात्मिका।
ज्ञानं त्वन्यतमो भावः पुरुषः सोऽभिधीयते ॥ ४॥
उन दो भागों में प्रकृति का भाग विकारयुक्त है तथा पुरुष का भाग अविकारी है ऐसा श्रीकृष्ण स्वयं बताते
हैं। वहाँ पुरुष स्वयं ही अपनी स्त्री बनता है और स्वयं ही उस स्त्री का पति बनता है। इस प्रकार एक में ही
द्विधाभाव दिखा कर शिव और शक्ति ये दो भाग बना दिये। जिस प्रकार हमारा शरीर एक ही होने पर भी उसमें
दायाँ और बायाँ ये दो भाग होते हैं, उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष ये भाग भी पूर्णरूप से मायिक हैं, ऐसा समझना
चाहिये। अर्धनारीश्वर में जो पुरुष है, वही स्त्री रहता है। प्रकृति पुरुष का भी वही प्रकार है। अर्थात् उन दोनों
का शरीर एक होकर, उनका आत्मा भी एक है। जब पुरुष का भाग छिपाती है तो प्रकृति को स्वेच्छा से नाचने
देती है और जब प्रकृति का भाग छिपाती है तो पुरुष का स्वरूप स्पष्ट दिखायी देता है। प्रकृति और पुरुष के
बीच का भिन्न भाग जब टूटता है तब न पुरुष रहता है, न प्रकृति। उस समय हमारा स्वस्वरूप ही प्रकट होता है।
सारांश, स्त्री-पुरुष व्यक्ति यह भेद ही समूल व्यर्थ है। इस प्रकार प्रकृति मायिक होने के कारण मिथ्या है। उससे
गुण उत्पन्न होते हैं और उन गुणों से संसार उत्पन्न होता है, ऐसा श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
तमो रजः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन् गुणाः।
मया प्रक्षोभ्यमाणायाः पुरुषानुमतेन च॥५॥
प्रकृति पूर्णतयः गुणमयी है उसे पुरुषदृष्टि प्राप्त होने पर तीनों गुण प्रकट करती है। श्रीकृष्ण यही बात
अपने निरूपण में बताते हैं। सूर्य की दृष्टि पहुँचते ही कमल की कली अलग-अलग पंखुड़ियों से विकसित होती
है लेकिन वे सारी पंखुड़िया उस कली में ही होती हैं, उसी प्रकार प्रकृति ईश्वर की दृष्टि मात्र से ही अपने गर्भ
में गुणों को धारण कर गर्भिणी होती है और सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों को उत्पन्न करती है। जिस प्रकार
बीज पानी से फूल कर द्विदलों को खोलता है और उसमें से तीन पत्तों का अंकुर बाहर आता है, उसी प्रकार मुझ
परमात्मा ने स्वयं पुरुषत्व पाकर तथा प्रकृति को पूर्ण रूप से क्षुब्ध कर तीनों गुण प्रकट किये हैं। सूर्य की किरणों
से जिस प्रकार सूर्यकांत पत्थर से अग्नि प्रकट होता है, उसी प्रकार पुरुष जब प्रकृति का उपभोग करता है तो वह
तीनों गुण प्रकट करती है।
तेभ्यः समभवत् सूत्रं महान् सूत्रेण संयुतः।
ततो विकुर्वतो जातोऽहंकारो यो विमोहनः ॥ ६॥
वे तीनों गुण भिन्न-भिन्न हैं किन्तु उस भिन्नता में भी वे एक साथ बढ़ते रहते हैं। उनके नाम हैं सूत्र, प्रधान
और क्रिया। क्रियाशक्ति में जड़त्त्व होता है। उसमें जो चेतनात्मक ज्ञान उत्पन्न होता है उसी का नाम महत्तत्त्व है।
यह अलग नाम उसे इसी कारण प्राप्त हुआ है। महत्तत्त्व और प्रधान इन दोनों का स्वरूप एक ही है। वहाँ क्रिया
और ज्ञान का स्फुरण होता है, इसीलिये दोनों के नाम भिन्न हैं। क्रियायुक्त जिस ज्ञान का स्फुरण होता है, वहीं
अभिमान जागृत होता है और तीन गुणों से पूर्ण अहंकार वहाँ उत्पन्न होता है। अहंकार जब भीषण रूप से
उफनता है तो वह शिव को शिवत्त्व का विस्मरण कराता है और देहात्मवाद का पूरी तरह भुलावा देकर जन्म-
६५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
मरण का भोग भोगने को बाध्य करता है। उस अहंकार की सम्मोहक शक्ति संसार के भ्रम से भ्रमित करती है।
अहंकार से किस प्रकार विकार उत्पन्न होते हैं, उसके बारे में श्रीकृष्ण बताते हैं।
वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिवृत्।
तन्मात्रेन्द्रियमनसां कारणं चिदचिन्मयः ॥७॥
अहंकार अत्यन्त असाध्य है। सत्त्वादि गुणों के अनुसार उसके तीन प्रकार हैं। गुण और अहंता यही बड़ा
संसार है। गुणों का विकार ऐसा है कि पहले सात्त्विक अहंकार उत्पन्न होकर, वह अंतःकरण को प्रकाशित करता
है। वही अनेक देवताओं में विकार उत्पन्न करने वाला है, इसलिये उसे 'वैकारिक' कहते हैं। राजस अहंकार
ज्ञानेन्द्रियों का तथा कर्मेन्द्रियों का प्रकाशक रहता है। राजस तेज का विलास उसे अच्छा लगता है इसलिये उसे
'तैजस' कहते हैं। तामस अहंकार का परिणाम यह होता है कि वह सूक्ष्म परमाणुरूप भूतों को उत्पन्न करता है।
इसीलिये, हे उद्धव! उसे 'भूतादि' कहते हैं। अहंकार का प्रभाव विचित्र है। वह सचेतन को अचेतन (माया) से
जोड़ता है और ज्ञान-अज्ञान से पक्का मेल कराकर बड़े प्रेम से अपना ब्याह रचाता है। जीव ज्ञानस्वरूप है,
उसका जड़ देह के साथ ब्याह करा देता है। अभिमान ही 'ॐ पुण्याहं' कहकर उसे एक करने वाला ज्योतिषी
है। जीव विशुद्ध ज्ञानस्वरूप है तथा उसे हड्डियों के ढाँचे में जकड़ देता है। इस प्रकार अहंकार अत्यन्त उत्पाती
है। वही सात्त्विक, राजस और तामस का चारों ओर विस्तार कर संसार की वृद्धि करता है।
अर्थस्तन्मात्रिकाज्जज्ञे तामसादिन्द्रियाणि च।
तैजसाद् देवता आसन्नेकादश च वैकृतात् ॥८॥
विषय ही महाभूत हैं। तामसगुण ने उन पंचमहाभूतों का एक-दूसरे से मिले बिना अलग-अलग निर्माण
किया है। वे पंचमहाभूत विषयों से उत्पन्न होते हैं। अब उनके ही बारे में बताता हूँ, सुनो। शब्द से आकाश उत्पन्न
होता है, स्पर्श से वायु उत्पन्न होता है, रूप से तेज उत्पन्न होता है और रस से जल उत्पन्न होता है। गंध से कठोर
पृथ्वी का जल में निर्माण हुआ है। इस प्रकार इनका निर्माण अलग-अलग होता दिखायी देने पर भी उनकी परस्पर
एकता भंग नहीं होती। उसका कारण इस प्रकार है—निःशब्द (परब्रह्म) से शब्द का निर्माण हुआ और उसने
आकाश उत्पन्न किया। आकाश में सूक्ष्म स्पर्श उत्पन्न हुआ और उस स्पर्श ने वायु का निर्माण किया। इस प्रकार वायु
में शब्द और स्पर्श इन दोनों का वास रहता है। उस वायु ने रूप उत्पन्न किया और उस रूप से तेज का उदय हुआ।
उत्पन्न हुए उस तेज में शब्द, स्पर्श और रूप इन तीनों का वास रहता है। रूप से रस उत्पन्न हुआ और उस रस से
जल का उद्भव हुआ। इस प्रकार जन्म लेनेवाले जल में शब्द, स्पर्श, रूप और रस का वास रहता है। इस प्रकार
विषयों में विषय मिलकर एक साथ रहते हैं। जल में गंध उत्पन्न होता है और उस गन्ध से शुद्ध पृथ्वी का निर्माण
होता है। ऐसी यह पृथ्वी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच विषयों से युक्त है। ऐसे ये विषययुक्त विविध
पंचमहाभूत जो पहले सूक्ष्म रीति से विलीन हुए रहते हैं, वे ही अब स्थूल रूप लेकर पंचमहाभूत के नाम से प्रसिद्ध
हो जाते हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और कान आदि दस इन्द्रिय राजस अहंकार से अपने आप ही उत्पन्न होते
हैं। सत्त्वाहंकार के विकारों से मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार आदि चित्तचातुष्ट्य का चमत्कार उत्पन्न होता है और
प्रजापति-इंद्रादि ग्यारह देवतागण इन्द्रियों के अधिष्ठाता बन जाते हैं। वास्तव में महाभूत अत्यन्त जड़ हैं। इन्द्रियाँ
उनकी प्रवर्त्तक हैं, अंतःकरण उनका चालक है तथा देवता कर्म के प्रकाशक हैं। तीन प्रकार की अहंकार वृत्ति
गुणक्षोभ से क्षोभक शक्ति बन जाती है। इस प्रकार सारे ब्रह्माण्ड की रचना हुई है।
चौबीसवाँ अध्याय ६५१
मया संचोदिता भावाः सर्वे संहत्यकारिणः।
अण्डमुत्पादयामासुर्मायातनमुत्तमम् ॥९॥
भूतों में एक-दूसरे के प्रति वैरभाव रहता है। जल, पृथ्वी को निगलने के लिये दौड़ता रहता है; तेज
(अग्नि) निश्चित रूप से उस जल का विनाश करता है, तेज को वायु निगल लेता है, वायु को आकाश निगल
जाता है। इस प्रकार भूतों में भी परस्पर प्रेम भाव नहीं होता। उसमें मैं अंतःकरणस्वरूप से स्वयं प्रवेश कर सभी
भूतों को एकत्र लाकर उनकी मर्यादा की रक्षा करता हूँ। मैंने मर्यादा की सीमारेखा बना दी है इसलिये जल पृथ्वी
को घुला नहीं सकता। तेज ही शोषण क्रिया का नख उदक को नहीं लगा पाता। उसी प्रकार वायु भी तेज को
नहीं निगलता और वायु कितनी भी स्वेच्छाचारिता क्यों न करे लेकिन उसे आकाश कभी नहीं निगलता और न
उसकी गति पर ही प्रतिबन्ध लगाता है। इस प्रकार इन सारे महाभूतों ने मिलकर मुझ महापुरुष के रहने के लिये
इस ब्रह्माण्ड का निर्माण किया है। विशाल सप्त आवरणों के साथ विस्तीर्ण स्थान व्याप कर मयूर के अण्डे के
आकार का ब्रह्माण्ड निर्मित किया है।
तस्मिन्नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थितौ।
मम नाभ्यामभूत् पद्मं विश्वाख्यं तत्र चात्मभूः ॥१०॥
इस प्रकार आज जो ब्रह्माण्ड अस्तित्व में है; उसमें स्वयंभू विश्वात्मा रहने वाला मैं नारायण अपनी लीला
से देहधारी बन गया। मेरी उस नाभि में विश्व का आधारभूत नाभिकमल उत्पन्न हुआ और उसमें उत्तम 'आत्मभू'
नामक ब्रह्मदेव का जन्म हुआ। वह उदर में गर्भस्थ रहकर योनिद्वार से इस संसार में नहीं आया था, बल्कि वह
मेरे आत्मा से स्वयंभू ही उत्पन्न हुआ था। इसीलिये ब्रह्मदेव को 'आत्मभू' कहते हैं। ब्रह्माण्ड स्वयं ही विराट् देह
है और विग्रह उसका प्रमुख भाग है। इस प्रकार ब्रह्मदेव मेरे नाभिकमल से उत्पन्न हुआ है। सृष्टि का निर्माण
करने के लिये पद्मनाभ के नाभिकमल में रजोगुण की प्रधानता बढ़ाकर ब्रह्मदेव ने स्वयं ही जन्म लिया।
सोऽसृजत्तपसा युक्तो रजसा मदनुग्रहात्।
लोकान् सपालान् विश्वात्मा भूर्भुवःस्वरिति त्रिधा ॥११॥
इस प्रकार रजोगुण प्रधान ब्रह्मदेव, जन्म से लेकर नाभिकमल में बैठ गया लेकिन वह उसके जन्म का
कारण जो मैं नारायण हूँ, उसे नहीं देख सका। वह स्वयं कमल में बैठा था, इसलिये कमल का मूल नहीं देख
सका। वह रजोगुण में लीन था इसलिये उसे सर्वत्र एकरूप समुद्र का जल ही दिखायी देने लगा। उस कमल का
मूल देखने के लिये उसने समुद्र में डुबकी ली और कितने ही दिन तक वह पानी में ही था फिर भी उसे कमल
के मूल का पता नहीं चला। अन्त में वह पानी के भय से घबरा गया और पानी के बाहर आकर लम्बी साँस लेने
लगा। फिर वह पुनः कमल पर आकर बैठ गया, लेकिन आगे क्या किया जाय, उसकी समझ में नहीं आ रहा
था। वह बोला, “हे अच्युत! दौड़कर आ जाओ और मुझ पर प्रसन्न हो। मुझ पर संसार के प्रति आया अंधत्व दूर
करो। तुम्हारे सिवा मेरा पूरी तरह संरक्षण करने वाला कोई नहीं है।” ब्रह्मदेव आखिर मेरी ही सृष्टि था। बेचारा
रज से अन्धा हो गया था। वह जब नाभिकमल से ही चिपक कर बैठ गया तो मुझे तत्काल उस पर दया आ
गयी। मुझ विश्वात्मा का ही वह पुत्र था लेकिन केवल जड़त्त्व के कारण स्तब्ध होकर रह गया। तब मैंने उस
तपोनिष्ठ को सृष्टि का निर्माण करने का उपदेश दिया। महाकल्पादिक के प्रारम्भ में मैंने अपनी आकाशवाणी से
'तप तव' इन दो शब्दों से श्रेष्ठ ब्रह्मदेव को उपदेश दिया। मेरे उपदेश के अनुसार तप करने के कारण उसके
६५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सत्त्वगुण में वृद्धि हुई और उसके पहले के उस सत्त्वगुण के कारण ही मैं साक्षात नारायण बन गया।
"त्रिकालाबाधित विश्वात्मा सचमुच तुम ही हो" इस आशय के चतुःश्लोकी भागवत का मैंने उसे उपदेश किया।
मेरे उपदेश से वह समबुद्धि होकर रह गया और इतने कल्प बीतने पर भी उसे मोह स्पर्श नहीं कर पाता। इस
प्रकार कल्प के प्रारम्भ में ब्रह्मदेव ने जब समाधि धारण की तो उसे आत्मबुद्धि प्राप्त होकर उसने यह सारी
उत्पत्ति करने का कार्य पूर्ण किया। देवता, राक्षस, मनुष्य, सर्प आदि के बस्ती वाले तीनों लोक, सात पाताल तथा
विलक्षण सात गोपुरों का भी उन्होंने निर्माण किया। 'भूः' अर्थात् पाताल लोक, 'भुवः' अर्थात् मृत्युलोक और
'स्वः' अर्थात् स्वर्गलोक इन्हीं को मिलाकर त्रिभुवन कहा गया है। कुल मिलाकर चौदह लोक हैं और वहाँ रहने
वाले लोकपालों का स्पष्ट वर्णन श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
देवानामोक आसीत् स्वभूतानां च भुवः पदम्।
मर्त्यादीनां च भूर्लोकः सिद्धानां त्रितयात् परम्॥ १२॥
अधोऽसुराणां नागानां भूमेरोकोऽसृजत् प्रभुः।
त्रिलोक्यां गतयः सर्वाः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम्॥ १३॥
पिछले श्लोक के अन्त में भूः, भुवः, स्वः इस प्रकार तीन लोकों का श्रीकृष्ण ने स्पष्ट वर्णन किया है।
उसी प्रकार अगले श्लोक में पाताल लोक का अर्थ बताया है और उसका मृत्युलोक से ऐक्य है इसका भी
यथातथ्य निरूपण किया है। इन्द्रादि समस्त देवताओं के रहने के लिये स्वर्ग ही एक स्थान है। यक्ष, राक्षस, भूत
और गन्धर्वों के रहने के लिय आकाश है और जहाँ से मोक्ष जा सकते हैं, परलोक जा सकते हैं, वह कर्मभूमि
अथवा अतल सप्त पाताल के साथ पृथ्वी बड़े भाग्य से मनुष्य को रहने के लिये मिली है। सिद्ध पुरुष त्रैलोक्य
के ऊपर रहते हैं। वह सिद्धों के रहने का सिद्धस्थान है। अतल, वितल, सुतल, रसातल, महातल, तलातल और
पाताल ये पृथ्वी के नीचे रहने वाले पाताल हैं। अब सप्त पाताल के अधिकारियों के भी नाम सुन लो। तो अतल
में मयासुर का पुत्र बल रहता है। वह पराक्रम में प्रबल है। उसके पास राक्षसों का बड़ा समुदाय है। वितल में
हाटकेश्वर है। कर्पूर की तरह गौरवर्ण जो उमाकांत है वही हाटकेश्वर है। वहाँ हाटक नाम की नदी बहती है
जिसमें सुवर्ण की राशियाँ बहती हैं। सुतल में महान भगवद्भक्त बली राजा है और उसका द्वारपाल विष्णु है।
प्रह्लाद भी उसके पास विष्णु भक्तों के साथ रहता है। शंकर ने त्रिपुरासुर का वध करने के उपरान्त रसातल में
मयासुर की स्थापना की। वह मायावी तथा महान पराक्रमी वीर सपरिवार वहीं रहता है। विष धारण करने वाले
क्रोध कद्रू कु पुत्र सर्प, वे सारे महातल में निवास करते हैं। तलातल में दानव रहते हैं, जिन्हें 'निवातकवची' वीर
कहते हैं। (वे प्रह्लाद के भाई संह्लाद के पुत्र हैं) वहाँ का राजा नाग है जो उन्हें पूज्य है। उस स्थान की रचना
अपूर्व है। सातवें पातल में नाग रहते हैं। जहाँ एक लाख नागों का समुदाय जिसकी सेवा में तत्पर है, ऐसे
वासुकि आदि अनेक महान नाग पद्मिनीयों के साथ विलास करते रहते हैं। जिस प्रकार स्वर्ग में रंभा, उर्वशी आदि
सुन्दर स्त्रियाँ हैं, उसी प्रकार पाताल में पद्मिनी नाम की स्त्रियाँ हैं। उनके सौन्दर्य का वर्णन परलोक में भी होता
रहता है। उसके नीचे तीन सौ योजन नीचे सहस्रमुख का शेषनाग रहता है। उसके शरीर पर ही मैं भगवान शयन
करता हूँ। इसके भी काफी नीचे अंधतामिस्रादि बड़े-बड़े नरक हैं। उससे भी नीचे कूर्म है तथा उसके नीचे
आवरणोदक है। जिनका स्वर्ग का भोग क्षीण होने लगता है और केवल अधोभाग का ही भोग भोगने का पुण्य
शेष रह जाता है उस पुण्य के क्रम से ही वे लोक सप्तपाताल में जन्म लेते हैं। जिसकी गाँठ में केवल पाप ही
चौबीसवाँ अध्याय ६५३
रहता है वह अनेक प्रकार के नरकों का भोग भोगता है। ऐसी यह सृष्टि त्रिलोकी ब्रह्मदेव की ही रचना है। हे
उद्धव ! जिसका मन इच्छारहित नहीं है, जिसने स्वप्न में भी विरक्ति का दर्शन नहीं किया है, उन्हें निश्चित रूप
से त्रैलोक्य से ऊपर गति नहीं है। जो मेरी भक्ति नहीं करते, जो मेरी कीर्ति नहीं सुनते, जो संसारबन्धन को तोड़ने
वाले मेरे रामनाम का उच्चार नहीं करते, उन्हें बार-बार स्वर्ग तथा नरक का भोग भोगना पड़ता है और वे बार-
बार पाताल लोक तथा मृत्युलोक में अनेक प्रकार की योनि में जन्म लेकर दुःख भोगते हैं। जो इन तीन गुणों में
लिप्त रहते हैं तथा सदैव लोभी बने रहते हैं, वे निरन्तर सकाम कर्म ही करते रहते हैं, उन्हें उनका त्रिगुणात्मक
धर्म कभी त्रैलोक्य के बाहर नहीं जाने देता। यह पाताल का वर्णन हुआ अब स्वर्ग की रचना सुनो। फिर अन्य
लोकों की रचना भी सुनाऊँगा। जहाँ तक सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश पहुँचता है वहीं तक पृथ्वी का महत्त्व है।
लेकिन लोगों की बस्ती नीचे पाताल से लेकर ऊपर स्वर्गलोक तक अनेक लोकों में है ही। जहाँ पैरों से चलते हैं,
वह भूलोक है। वहाँ से सूर्य तक भुवलोकों का विस्तार है। उस भुवलोक में यक्ष, रक्ष और गन्धर्वों की बस्ती है।
भुवलोक से भी ऊपर सूर्यलोक का विस्तार होता है। पृथ्वी से लक्ष योजन दूर सूर्यलोक है, यह ध्यान में रखो।
कालरूपी, सूत्रधार वायु निर्मित चक्र पर सूर्य, चन्द्रमा और तारागण इन्हें बड़े कौशल से सजाकर उन्हें गोल-गोल
घुमाता रहता है। लेकिन उस काल पर भी मेरा नियंत्रण है। मेरे भय से ही क्षण, लव, निमिष आदि विभागों में
आधिक्य या कमी नहीं आ पाती। इस कालचक्र की गति बड़ी आश्चर्यजनक है। एक महीने में सूर्य और चन्द्रमा
एक साथ आते हैं। नक्षत्रचक्र में चन्द्रमा का एक परिभ्रमण पूर्ण होने के दो दिन के बाद कुल मिलाकर २९ दिन
के बाद चन्द्र सूर्य के आड़े आता है। अमावस्या और प्रतिपदा के संधिकाल में जब चन्द्रमा अपने भ्रमण मार्ग में
यथावकाश चलता रहता है उस समय उसका राशि अंशादि स्थान सूर्य के जितना ही होता है। सूर्य के तेज के
कारण वह लोगों को दिखायी नहीं देता। इतनी-सी बात पर ज्योतिषी लोग उन दिन सजीव रहने वाले (आकाश
पर उपस्थित) चन्द्रमा को मृत कह देते हैं और सब लोग उसे सच मान लेते हैं। सूर्य और चन्द्रमा अपने अलग-
अलग रास्तों पर चलते हुए कभी एक-दूसरे से नहीं टकरायेंगे। किन्तु महीने के अन्त में (अमावस्या के दिन)
उनकी गति से उनके बिम्ब लक्षान्तर पर समान दूरी पर आ जाते हैं। जो ग्रह अपनी गति से सूर्य के आड़े आता है
(सूर्य के निकट होने के कारण नहीं दिखायी देता) उसके अस्त होने की सूचना ज्योतिषी देते हैं और लोगों को
उनकी बात सच लगती है क्योंकि उस समय वह ग्रह दिखायी भी नहीं देता। वेदांत में जो दृष्टि सृष्टि का
सिद्धान्त है वह ज्योतिषशास्त्र में भी सत्य है क्योंकि जो नहीं दिखायी देता उसका ज्योतिषी लोग अस्त मानते हैं
और जो दिखायी देता है, उसकी पूजा करते हैं। ग्रहण लगने के बाद वह कुछ समय तक बादलों के पीछे रहता
है, फिर भी यदि बादल न होते तो उन्हें ग्रहण दिखायी देता है। वे लोग उस काल को पर्वकाल मानते हैं लेकिन
वही ग्रहण जिस देश में दृश्य आकाश में नहीं होता (चन्द्रग्रहण यदि दिन में हो जाय तो उस समय चन्द्र दृश्य
आकाश में नहीं होता, उसी प्रकार रात्रि का सूर्यग्रहण भी दृश्य आकाश में नहीं होता) वहाँ के लोग ग्रहण लगा
हो ऐसा मानते ही नहीं हैं। सूर्य और चन्द्र के एक ओर राहुकेतु की बस्ती है। वे राहु केतु जब सूर्यचन्द्र के बिम्ब
के आड़े आते हैं तो उन्होंने सूर्य-चन्द्र को ग्रस लिया ऐसा कहा जाता है। वास्तव में यदि राहु सूर्य को निगलने
का प्रयास करे तो उसका मुँह ही जल गया होता है। एक बिम्ब के आड़े दूसरा बिम्ब आता है, यही उस ग्रहण
के सर्वग्रासों का सामान्य तत्त्व है। वास्तव में सूर्य अपने 'सूर्यमण्डल' में राजकाज करता है किन्तु सूर्यग्रहण के
समय उसके सर्वग्रास का माहात्म्य ज्योतिषी घर-घर में बताता रहता है और वह ग्रहण देखकर साधारण जनता
भी कोलाहल करने लगती है। सूर्य के खग्रास ग्रहण की बात सुनकर संसार में अपूर्व कोलाहल मच जाता है।
६५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किन्तु वास्तव में सूर्य और राहु की भेंट भी नहीं होती और अन्त तक उनका परस्पर स्पर्श भी नहीं होता।
ग्रहमण्डल भले ही तीव्र गति से पूर्व से पश्चिम की ओर जाता दिखायी दे लेकिन सूर्य चन्द्रादि की वास्तविक
गति वैसी नहीं होती। वे अपनी मर्यादा के अनुसार ही चलते रहते हैं (नक्षत्रमण्डल के क्रम के अनुसार पश्चिम
से पूर्व की ओर जाते रहते हैं। वास्तव में वे पूर्व से पश्चिम की ओर नहीं चलते लेकिन केवल वैसा आभास होता
है। सूर्यलोक से लक्ष-लक्ष योजन ऊपर चन्द्रलोक है (तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण और श्रीमद्भागवत की
ऐसी कल्पना है)। चन्द्रलोक से लक्ष-लक्ष योजन की दूरी पर नक्षत्रलोक है। उसके ऊपर दो लक्ष योजन के
अन्तर पर बुधलोक है। उसके ऊपर दो लक्ष योजन के अन्तर पर शुक्र लोक है। सारे दैत्य एक साथ मिलकर
जिसकी नित्य शरण में आते हैं वही दैत्यों का गुरु शुक्राचार्य है। शुक्र लोक से ऊपर दो लक्ष योजन के अन्तर पर
मंगल लोक आकाश में है। उससे ऊपर दो लाख योजन के अन्तर पर देवगुरु निवास करते हैं। इन्द्र, चन्द्र, वरुण,
सूर्य आदि देवता आदरपूर्वक नित्य आकर जिनके चरणों का वन्दन करते हैं, उसी गुरु का वह वृहस्पति लोक है।
उससे भी ऊपर दो लाख योजन के अन्तर पर सूर्यपुत्र शनि का वास है। उससे ऊपर एक लाख योजन के अन्तर
पर सप्तऋषि का निवासस्थान है। जहाँ सप्तऋषियों का समुदाय रहता है, वहीं अरुंधती भी रहती है और उससे
भी ऊपर इन्द्र के वैभव से सुशोभित अमरावती बसी हुई है। वहीं इन्द्र रहता है, ऐरावत पर आरोहण करता है,
मरुद्गण जिसके सभासद हैं, देवतागण ही जिसकी सेना है, जहाँ उच्चैःश्रवा नामक अश्व है, कल्पतरु का मनोहर
बगीचा है। कामधेनुओं के झुण्ड हैं और क्रीड़ा करने के लिये नंदनवन है। जहाँ की सीढ़ियाँ चिन्तामणि की बनी
हुई हैं जहाँ रंभा-उर्वशी सरीखी विलासिनी स्त्रियाँ हैं, जहाँ अष्टनायिकायें नृत्यांगना बनकर रंगसभा में नृत्य
प्रस्तुत करती हैं, ऐसे उस इन्द्र के वैभव से सजी हुई अमरावती का अधिपति इन्द्र है। यहीं स्वर्ग की सीमा
समाप्त होती है। यही सचमुच त्रैलोक्य है। अब इस त्रैलोक्य के बाहर एक लाख योजन के अन्तर पर
भक्तवत्सल श्रीहरि ने अपनी कृपा से ध्रुवमण्डल का निर्माण किया है। त्रैलोक्य में प्रलय ही क्यों न आ जाय
लेकिन ध्रुव को कभी भी अपने स्थान से नहीं हटना पड़ता। वह सदा अटल रहता है। इसीलिये ध्रुवपद को
अटल कहा जाता है। पृथ्वी से एक करोड़ योजन के अन्तर पर महर्लोक है, यह ध्यान में रखो। वहाँ कल्पांत तक
की आयु के लोग रहते हैं। वही उनका वसतिस्थान है और देखो। वहाँ से एक कोटि योजन के अन्तर पर
जनोलोक है। वहाँ जितेन्द्रिय तथा महोयोगी जैसे सनकादिक वास करते हैं। वहाँ से आगे जाने पर दो कोटि
योजन के अन्तर पर तपोलोक है। तपस्वी वैराजदेव ही वहाँ के सच्चे निवासी हैं। वहाँ से ऊपर चार कोटि योजन
के अन्तर पर जो प्रदेश है, वहाँ सत्यलोक है। वहाँ के अधिपति ब्रह्मदेव हैं। वहाँ चारों वेद मूर्तिमंत हैं, सुप्रसिद्ध
सर्व धर्ममूर्तिमंत है। शुद्ध ब्रह्मचर्य मूर्तिमंत है और साक्षात तप भी मूर्तिमंत है। वहाँ गायत्री मूर्तिमंत रहती है, वाणी
मूर्तिमंत रहती है, दया मूर्तिमंत रहती है और उस ब्रह्मदेव के घर में योग भी मूर्तिमंत रहता है। दक्षिणाग्नि,
गार्हपरय तथा आहवनीय इस प्रकार जो तीन अग्नि वास्तव में एकरूप होते हुए भी भिन्न-भिन्न मालूम होते हैं, वे
वहाँ मूर्तिमंत रहते हैं। सत्यलोक में सत्य मूर्तिमंत रहता है, वहाँ असत्य रहता ही नहीं है। वहाँ रहने वाले लोग
कौन हैं, बताता हूँ। गायत्री मंत्र का जाप करने वाले, ब्राह्मणों का चरणतीर्थ प्राशन करने वाले और यज्ञयाग के
निष्काम उपासक वहीं रहते हैं। जिन्होंने ब्राह्मणों का कार्य करते मृत्यु प्राप्त की, जिन्होंने गौरक्षा के लिये अपने
प्राणों की बलि चढ़ा दी जो परोपकार करते-करते दरिद्र बन गये, वही लोग सत्यलोक में गये हैं। जिन्होंने
निष्काम बुद्धि से ब्राह्मणों की सेवा की, जिन्होंने निष्काम बुद्धि से ब्राह्मणों की पूजा की, जिन्होंने निष्काम बुद्धि
से ब्राह्मणों को भोजन कराया, वे सत्यलोक पहुँच गये। जो दीनजनों पर उपकार करने के लिये कृपालु बने, संसार
चौबीसवाँ अध्याय ६५५
बन्धनों से कष्ट पाने वाले लोगों को बन्धनमुक्त करने के लिये जो कृपालु बने, जो सत्य बोलने वाले तथा
सात्त्विक प्रवृत्ति के होते हैं, वही सत्यलोक के निवासी हैं। जो परनिन्दा के प्रति मूक, परस्त्री के प्रति नपुंसक,
पराये धन के प्रति उदासीन होते हैं, वही सत्यलोक के रहिवासी हैं। वहाँ का अधिपति ब्रह्मदेव है। उद्धव! इसके
ऊपर ब्रह्मवेद की कोई सृष्टि नहीं है, इसे ध्यान में रखो। भोले शंकर ने ब्रह्माण्ड से अलग अपने कैलास का
निर्माण किया है और मेघश्याम विष्णुने वैकुण्ठ का निर्माण किया है। ये लोक उन्होंने अपनी-अपनी लीला से ही
तैयार किये हैं। ब्रह्माण्ड में परिवर्तन होते रहते हैं लेकिन उसकी आँच वैकुण्ठ और कैलास पर नहीं आती। वहाँ
रहने का आनन्द विष्णुभक्त और शंकरभक्त अच्छी तरह जानते हैं। वहाँ न काल का प्रवेश हो पाता है, न कर्म का
कर्मबन्धन है और न जन्म-मरण है। जो अनन्य भक्त हैं उन्हें ही यह स्थल प्राप्त होता है। वैकुण्ठ और कैलास
की रचना का वर्णन करते समय मन का मनपन समाप्त हो जाता है। हे बुद्धिवान उद्धव! अब वहाँ के लोगों के
लक्षण बताता हूँ, सुनो। ब्रह्माण्ड से बिलकुल बाहर और माया-आवरण के भीतर शिव ने कैलास तथा विष्णु ने
वैकुण्ठ ये लोक अपनी लीला से निर्मित किये। समस्त जीवों को सुख प्रदान करने वाला, पार्वती का परमेश्वर,
योगियों का योगेश्वर वह शंकर कैलास में रहता है। वह मस्तक पर जटा धारण करता है, मस्तक पर गंगा धारण
करता है, पिनाक नाम का धनुष हाथ में धारण करता है, जिसका वर्ण पंचमुखी, कर्पूर अथवा गोरस की तरह
शुभ्र है और जो अपने भक्तों को सदा अभय देता है और वरदायक है, अकार, उकार और मकार इन तीन मात्राओं
के परे का है, जो त्रैलोक्य का नेत्र है, त्रिपुर का नाश करने वाला, त्रिविध तापों का शमन करने वाला और तीनों
लोकों को सुखी करने वाला है। नागभूषण धारण करने के कारण उसकी शोभा विशेष रूप से खिल जाती है,
जिसने रुद्राक्ष और रुंडमाला धारण की है, जिसका कंठ नीलरत्न की तरह है, भस्म का लेप करने के कारण
उसका शरीर धुएँ की तरह दिखाई दे रहा है। उसके हाथ में त्रिशूल और डमरू है, उसे तीन नेत्र हैं, उसके शरीर
पर वस्त्र के नाम पर केवल व्याघ्रांबर है। उसके हाथ की जपमाला सदा रामनामजप में तत्पर रहती है। बली का
पुत्र सहस्रबाहु बाणासुर, श्रृंगी, भृंगी, चंडी ये जिसके सेवक हैं, इसके अलावा साठ हजार रुद्रगण चमचमाते
हँसिया और त्रिशूल लेकर सदा तैयार रहते हैं। गणपति, कार्तिक स्वामी, नंदी, पंचमुख, षण्मुख और जिसने दक्ष
को शिक्षा दी थी वह वीर सेनापति वीरभद्र, भूत, प्रेत, पिशाच और बड़े-बड़े देवतागण यही जिसकी सेना है,
ऐसा वह शंकर है और शेष सब उसके आज्ञाधारी हैं। वे सदा शिवनाम की गर्जना करते रहते हैं। शंभु, शिव,,
शूली, शंकर, उमाकांत, कर्पूरगौर, भव, भर्ग, भवानीपति, कपर्दी, ईश्वर, महादेव अथवा 'हर हर शंकर' इस
नामोच्चार के भय से ही कलिकाल दूर भाग जाता है। कैलास पर्वत सदा शिवनाम की ही गर्जना करता रहता है
और वहाँ का राजकाज शंकर देखता है। जहाँ शिवनाम का उच्चार होता है, वहाँ शंकर आनन्दपूर्वक रहता है। वह
ईश्वर भक्तों के प्रति अत्यन्त कृपालु है तथा सदा भोले भाव से भक्तों के वश में होने वाला है। तीन गुण यही मेरे
भक्तों के शत्रु हैं इसलिये उन त्रिगुणों का संहार करने के लिये ही उसने हाथ में सदा त्रिशूल धारण किया हुआ
है। वह अपने डमरू के घोष से पापों का पूरी तरह संहार करता है। कैलास पर्वत पर की घास, पेड़, पशु, पक्षी
अथवा और जो भी कुछ है वे सब शंकर के आज्ञाधारक हैं। बल्कि यह कहें कि वे सब शंकर के ही रूप में वहाँ
रहते हैं। इस प्रकार शंकर ने ब्रह्माण्ड के बाहर अपनी लीला से ही कैलास पर्वत निर्माण कर उसकी स्थापना की
और वहाँ भवानी के साथ मिलकर राज्य का कारबार देखते हैं। अब तुम्हें वैकुण्ठ की भी स्थिति बताता हूँ।
उसकी स्थिति ऐसी है कि उसे सुनते समय चित्तवृत्ति आनन्द स्फूर्ति से लबालब भर कर बाहर बहने लगती है।
ऊख का रस निकाल कर उसकी शक्कर बनाते हैं और अत्यन्त कुशल लोग उसके विविध व्यंजन तैयार करते हैं।
६५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसी प्रकार भगवान ने अपने निवास के लिए सारे चैतन्य का रस निकाल कर तथा उसे गाढ़ा बनाकर उससे
वैकुण्ठ की रचना की है। अपनी ही लीला से निर्मित सगुण, साकार, सुकुमार, अत्यन्त सुन्दर, घनश्याम, मनोहर
तथा ज्ञानमय सुन्दर मूर्ति, शंख, चक्र, पद्म, गदा आदि चार आयुधों से युक्त चार भुजावाले सगुणस्वरूपी गोविन्द
को देखकर होने वाले आनन्द से आँखें लुब्ध हो जाती हैं। मुकुट, कुण्डल, करधनी तथा पीत पीताम्बर परिधान
किये हुए, गले में कौस्तुभ मणि शोभा दे रहा है, गले में पड़ी हुई वनमाला पैरों तक लटक रही है। चरणों से
निकली हुई गंगा तो अत्यन्त पवित्र है जो सारे संसार को ही पवित्र कर देती है। यह देखकर शंकर ने गंगा को
अपने मस्तक पर ही धारण किया। उस हरि के दोनों चरणों का वर्णन करने वेद भी मूक हो गये क्योंकि वह
श्रीहरि का पद दुर्गम है। श्रीहरि के चरणों की महिमा अपार है। श्रीहरि का अत्यन्त सुन्दर मुख देखकर अमृत भी
उसके आगे फीका मालूम होता है और आँखों को अप्रतिम सुख की अनुभूति होती है। जिसके मुख का क्षण भर
के लिये अवलोकन करने से कोटि-कोटि जन्मों का दुःख समाप्त हो जाता है और उससे मुखचन्द्र देखने से
सुख-दुःख के द्वंद्व की बाधा जरा भी पीड़ा नहीं दे सकती, बल्कि अधिक से अधिक परमानन्द ही प्राप्त होता है।
ऐसा वह सारे जग का आत्मा आनन्द का मूल स्रोत है। जिसके किंचित दृष्टिक्षेप से तत्काल कितने ही ब्रह्माण्डों
की उत्पत्ति होती है, जिसके प्रत्येक रोमरन्ध्र में करोड़ों ब्रह्माण्डों का वास रहता है। ऐसा वह श्रीहरि वैकुण्ठ में
निवास करता है। जिसकी जरा सी कृपादृष्टि से अहंकार की गाँठ टूट जाती है और सृष्टि में अन्य कुछ दिखायी
ही नहीं दे सकता। वह श्रीहरि वहाँ रहता है। जिस प्रभु का नामस्मरण ही जन्म-मरण को नष्ट कर देता है,
कर्माकर्म को समूल नष्ट करता है, वह पुरुषोत्तम वैकुण्ठ में रह रहा है। उस वैकुण्ठ में सभी लोग चतुर्भुज हैं।
सभी मेघ जैसे श्यामरंग के, पीताम्बर धारण करने वाले तथा सभी के हाथ में शंख-चक्र आदि शस्त्र रहते हैं।
सबका स्वरूप एक जैसा, सब एक जैसे दिखायी देते हैं। जहाँ स्वयं सौन्दर्यशाली श्रीहरि रहते हैं, वहाँ कोई
विद्रूप नहीं दिखायी देता। वहाँ आधिदैविक अथवा आधिभौतिक पीड़ा नहीं होती, विषय वार्ता की गन्ध नहीं
होती। वहाँ स्त्री-पुरुषों की बुद्धि एक जैसी होती है। वहाँ भूख-प्यास का नाम नहीं है, काम-क्रोध नहीं है,
सुख-दुःख के द्वंद्वों का दुःख नहीं है, जन्म-मरण तो बिलकुल नहीं है। लक्ष्मी एक बार दर्शन दे दे इसके लिये
देवतागण सदा प्रयासरत रहते हैं लेकिन लक्ष्मी स्वयं वैकुण्ठ में सफाई के काम में लगी रहती है। उस वैकुण्ठ में
दीनदयाल और उदार जगन्नाथ अपने भक्तों का उद्धार करने के लिये अपनी ही लीला से विचरण करते रहते हैं।
मृत्यु के समय उसका नामस्मरण करने से ही करोड़ों जीवों का उद्धार हुआ है। वह प्रभु श्रीविष्णु दीनजनों पर
कृपा दृष्टि रखते हुए वैकुण्ठ में निवास करता है। जिसकी जैसी भावना रहती है उसके अनुसार वह उसका
मनोरथ पूर्ण करता है और पाँचवें पुरुषार्थ से प्रीति करता है। ऐसा वह श्रीहरि वैकुण्ठ में रहता है। अब तक
विविध लोकों की गणना, समस्त ब्रह्माण्डों की संख्या, वैकुण्ठ और कैलाश की रचना के सम्बन्ध में बताया।
भिन्न-भिन्न लोक बताये लेकिन उसे प्राप्त करने वाले लोग कौन हैं ऐसी कल्पना तुम करोगे इसलिये उसका भी
निरूपण सुनो। महर्लोक, जनोलोक, तपोलोक, सत्यलोक और जिनकी रचना आश्चर्यजनक है ऐसे वैकुण्ठ को
प्राप्त करने वाले लोग कौन हैं उसके बारे में यदुनायक श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
योगस्य तपसश्चैव न्यासस्य गतयोऽमलाः ।
महर्जनस्तपः सत्यं भक्तियोगस्य मद्गतिः ॥ १४॥
अपने अंतःकरण को स्थिर करने के लिये प्राणापान समान करने की कुशलता साध्य करने पर षडचक्रों को
भेद कर आत्मस्वरूप में पहुँचे और यदि इसी बीच आयु समाप्त होकर मृत्यु आ जाय तो ऐसे योगी लोगों को
चौबीसवाँ अध्याय ६५७
महर्लोक, जनोलोक आदि ऊपर के लोकों में जाने को मिलता है। जो गृहस्थाश्रम में रहकर ब्रह्मचारी रहता है,
नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करता है, जो स्वप्न में भी स्त्री का स्पर्श नहीं करता जो सदा भिक्षा माँग कर
खाता है, जो निरन्तर कठोर वैराग्य धारण करता है अथवा भिक्षा को भी स्पर्श नहीं करता और आत्मज्ञान की
प्राप्ति के लिये सद्गुरु की सेवा करता है उसे उस प्रसंग में जो आत्मज्ञान होता है, उसी समय यदि उसे मृत्यु
प्राप्त हो जाय तो ऐसा ब्रह्मचारी ऊपर महर्जनादि लोक में जाता है। जो गृहस्थाश्रम में ही तत्पर हैं जो अग्निसेवा
के लिये अग्निहोत्र स्वीकार करते हैं, जो स्वधर्म से ही चित्त शुद्ध करते हैं और जो ब्राह्मणों की और देवताओं की
सेवा करते हैं, जो भक्त होकर प्राणिमात्र पर दया करते हैं, जो सत्यभाषण करने वाले तथा सात्त्विक प्रवृत्ति के
होते हैं, जो आत्मज्ञान साध्य करने वाले, गुरुभजन की प्रवंचना न करने वाले होते हैं, ऐसे लोगों को गुरुकृपा से
आत्मज्ञान साध्य करने के बाद सनातन ब्रह्म की प्राप्ति होते समय यदि उनकी आयुसम्पत्ति समाप्त होकर उन्हें
मृत्यु आ जाय तो उससे ब्रह्मप्राप्ति होने में अड़चन आ जाती है फिर भी वे ऊपर पहुँचते ही हैं और जिसकी जैसी
विरक्ति और उपासना रहती है, उसके अनुसार वे महर्जनादि लोक में पहुँचते हैं। जो वन में रह कर वानप्रस्थाश्रम
का आचरण करते हैं, जो वैराग्य के कारण अत्यन्त विरक्त रहते हैं, जो कंद-मूल खाकर ही तृप्त रहते हैं और जो
सदा आश्रमधर्म का नियमपूर्वक पालन करते हैं, ऐसे साधक पर्जन्यकाल में पर्जन्यवृष्टि में बैठते हैं, जाड़े में पानी
में बैठते हैं, गरमी में पंचाग्निसाधन करते हैं, इस प्रकार जो निष्ठापूर्वक तपश्चर्या करते हैं, जिन्हें शरीर के क्षीण
होने का भय नहीं होता, आत्महित साधन की उत्कंठा से जो दारुण तप सहन करता है अथवा पूर्ण वैराग्य साध
कर ब्रह्मज्ञान प्राप्ति के लिये संन्यास लेने लगता है और तभी मृत्यु पास आ जाता है तो उसे अंतकाल के बाद
ऊर्ध्वलोक गमन होता है और उसकी उपासना के अनुसार उसे महर्जनतपोलोक की प्राप्ति होती है। जो समूल
संकल्पों का ही संन्यास करता है उसे लोकांतर सम्भव नहीं होता। वह मुक्त होता है। जिससे यह नहीं हो पाता
और जो विधिपूर्वक संन्यासी होते हैं, जो अंतःकरण से अत्यन्त विरक्त रहते हैं, स्वप्न में भी सुवर्ण या चाँदी का
स्पर्श नहीं करते, जो सदा संन्यास धर्म में लीन रहते हैं और जो निरन्तर ओंकार का जप करते हैं, आश्रमविधि
स्वीकार करने के बाद जो उससे ऊबते नहीं हैं, मृत्यु के समय जिसकी बुद्धि चंचल नहीं होती वह सत्यलोक में
जाता है। ऐसे जो लोग सत्यलोक में जाते हैं लेकिन वहाँ के सुख विलास आदि भोगों से भी जिन्हें विरक्ति रहती
है वे ब्रह्मदेव के साथ ही मुक्त होते हैं और शेष वापस आ जाते हैं। जिन्हें सत्यलोक के भोग भोगने में रुचि रहती
है वे भी वहाँ से थक कर वापस आ जाते हैं, फिर औरों की गति के बारे में क्या कहा जाय? उन्हें जन्म और
मरण छोड़ते ही नहीं हैं। जहाँ तक भोगासक्ति है वहाँ तक जन्म-मरण का कष्ट है ही। लेकिन जहाँ भोग की
इच्छा समाप्त हो जाती है, वहाँ चारों मुक्ति दासी बनकर सेवा के लिये तत्पर रहती हैं, जिस लोक में उन्हें भोग से
विरक्ति होती है, वहाँ से वे आगे बढ़ जाते हैं और जिस लोक में उनमें भोगासक्ति उत्पन्न होती है वहाँ से वे थक
कर भूलोक में गिर पड़ते हैं। किन्तु मेरी भक्ति वैसी नहीं है। भक्तों को अन्य किसी वस्तु की प्राप्ति नहीं होती।
उद्धव! मेरे भक्तों को निश्चय ही मेरी ही गति प्राप्त होती है जो मन में इच्छा रखकर मेरी सेवा करते हैं, उन्हें
वासना का ही फल खाना पड़ता है लेकिन जिन्हें मेरे प्रति निष्काम भक्ति रहती है उन्हें मेरी अनन्य भक्ति ही प्राप्त
होती है। सकाम भक्तों की वासना पूर्ण कर, मैं उन्हें सदा निष्काम करता रहता हूँ। मैं पुरुषोत्तम अपने भक्तों को
मेरे निजधाम ले जाता हूँ। उद्धव! इसीलिये मैंने गोपियों की कामासक्ति को निष्काम स्थिति में ला कर उन्हें
सचमुच ही सायुक्त मुक्ति दिलायी। मैंने गोपियों के साथ कामविलास किया या उन्हें पूर्ण रूप से कामयुक्त किया
इसका विचार न कर मूर्ख लोग कृष्ण ने व्यभिचार किया ऐसा आरोप लगाते हैं। भक्तों को यदि सालोकता प्रिय
६५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हो तो मैं उन्हें रहने के लिये वैकुण्ठ में ले जाता हूँ। भक्त यदि सामिप्य चाहते हैं तो मैं उन्हें अपना प्रिय बनाता
हूँ। जिस प्रकार तुमसे मन की बात करने में मुझे अच्छा लगता है, उसी प्रकार हे उद्धव ! तुम मुझे जिस प्रकार
अच्छे लगते हो, उसी प्रकार मैं उससे प्रीति करता हूँ। भक्ति यदि सरूप माँगे तो मैं उसे चतुर्भुज बनाता हूँ और
शंख, चक्र आदि आयुध देकर उसे मेघ जैसा सुन्दर साँवला वर्ण देता हूँ। मुकुट, कुण्डल, करधनी पहनने के
लिये पीला पीताम्बर, बाजूबंद, पैर में पायल और गले में मेरे ही जैसा कौस्तुभमणि। आकारस्वरूप, गुणलक्षण,
वीर्य, शौर्य, पूर्ण गाम्भीर्य, रूप-लक्षण ठीक एक जैसे। लक्ष्मी यदि दोनों को एक साथ देख ले तो वह भी नहीं
जान पायेगी कि इनमें भगवान कौन हैं? सेवकों का सेवाकर्म रुक जाता है क्योंकि वे सेवा करें तो किसकी?
छत्रधारण करने वाला भी मन में विचार करता है कि मैं छत्र किसके ऊपर धारण करूँ? चँवरी हिलने वाला भी
चँवर किस पर हिलाये ? ब्रह्मादि देवतागण प्रणाम करने आते हैं, वे भी आश्चर्य करते हैं। दोनों में आदि देवता
कौन हैं, यह उनकी भी समझ में नहीं आता। जिस प्रकार एक दीप से दूसरा दीप जलाने के बाद यह समझ में
नहीं आता कि इनमें पहला दीप कौन-सा है, उसी प्रकार मेरी सरूपता प्राप्त होने के बाद दूसरे को वह भी नहीं
पहचान पाता। जिस प्रकार दर्पण में एक-सा प्रतिबिम्ब देखने पर वही असली बिम्ब मालूम होता है, उसी प्रकार
सरूपता की शोभा रहती है। दोनों का ठाठ एक जैसा। भगवान प्रसन्न होकर अपनी सारी सरूपता दे देता है लेकिन
हृदय पर अंकित वह ब्राह्मण का चरण वह अविनाशी श्रीवत्सलांछन कदापि नहीं देता। विष्णु स्वयं ही कहते हैं,
श्रीवत्सचरण देने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है। वह सामर्थ्य ब्राह्मणों के पैर में है। उन ब्राह्मणों के चरण हृदय में
धारण करने से ही वह मिलेगा। सरूपता में भगवान और भक्त को पहचानने की यही निशानी है। जिसके हृदय
पर श्रीवत्सलांछन रहता है, वही सबका स्वामी श्रीविष्णु है। इस प्रकार की सरूपता प्राप्त होने पर भी एक देवता
है तथा दूसरा भक्त है, यह भेदभाव उनमें रहता ही है। भगवान और भक्त इनमें जब तक भेद है तब तक सरूपता
करना भी उपयुक्त नहीं है क्योंकि जब तक अद्वयज्ञान नहीं होता, तब तक परमानन्द उत्पन्न नहीं होता। इसलिये
भिन्नत्व की बात न कर भक्त सायुज्यता ही माँगता है। उस निरूपण की कथा अत्यन्त मधुर है। वह कथा केवल
मैं ही जानता हूँ। सायुज्य की जो मिठास है, वह केवल मैं ही जानता हूँ। उद्धव ! उसे भी मैं तुम्हें विस्तारपूर्वक
बताऊँगा। सरूपता से देह की समानता भले ही प्राप्त हो जाय लेकिन हृदय में मैं और तुम वाला भेदभाव रहता
ही है। इसलिये ऐसी सरूपमुक्ति से भी ज्ञानी भक्त लुब्ध नहीं होते। मेरा स्वरूप प्राप्त कर मेरे भक्त मेरा स्वतः
सिद्ध भजन करना छोड़, मेरे भक्त मन से भी भेद का स्पर्श नहीं करते। देवता के साथ भक्त भी अनादि सिद्ध हैं।
वे मूलतया भेदरूप हैं। ऐसा होते हुए जो जान-बूझ कर भेद मानता है उसे भक्तिहीन तथा मायिक समझना
चाहिये। आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी ये सारे भेद मायिक भक्ति ने किये हुए हैं। किन्तु अभेदभाव से जो मेरा
भजन करते हैं, उन्हें सायुज्यता-मुक्ति प्राप्त होती है। राजा और रंक जिन्हें एक जैसे हैं, उनका मन किसी को वंद्य
और किसी को निंद्य नहीं मानता, जिनमें देहाभिमान नहीं होता, उन्हें सायुज्यता प्राप्त होती है। जिस प्रकार हमारी
परछाईं मिथ्या ही हमसे चिपकी रहती है, उसी प्रकार जो इस देहबुद्धि को मिथ्या समझता है, उसे ही सायुज्यता
प्राप्त होती है। छाया हमारे ही साथ जन्म लेकर हमारे ही साथ बड़ी होती है, फिर भी उसके प्रति मेरी जैसी
ममता किसी के मन में उत्पन्न नहीं होती। उसी प्रकार जिसे देह के दुःख की बाधा नहीं होती, उसे ही निश्चित
रूप से सायुज्यता प्राप्त होती है। देह की विषयासक्ति भूलकर जो मन से अभेदभक्ति करता है, उसे ही हे उद्धव!
सायुज्ययुक्ति प्राप्त होती है। अपनी देह में जिसमें 'मैं' पन उत्पन्न नहीं होता, किसी प्राणी में जो 'तू' के भाव से
नहीं देखता उसे पूर्णरूप से सायुज्ययुक्ति प्राप्त होती है। उद्धव ! जितना मेरे आत्मा का विस्तार है, उतनी ही उसे
चौबीसवाँ अध्याय ६५९
आत्मप्रतीति होती है। इसलिये उसे सहज ही सायुक्त मुक्ति प्राप्त होती है। मेरा देह विष्णुस्वरूप है ऐसा
देहाभिमान उसमें कदापि उत्पन्न नहीं होता। वह विष्णु के देह को और अपने देह को मिथ्या ही समझता है।
इसलिए वह सरूपता की कामना नहीं करता। अपनी ही जगह यदि विचार किया जाय तो देह के रूप में जो भी
कुछ है, वह सब मिथ्या है ऐसा लगता है। तो फिर सरूपता कहाँ रही ? सायुज्यता प्राप्त होने के बाद ब्रह्म के
सिवाय कोई रीता स्थान दिखाई ही नहीं देता। समस्त प्राणिमात्र में एकात्मता होना, इसी का नाम वास्तव में
सायुज्यता है। अनेक प्रकार के रूपों से संसार भरा है, उसे वह अपना ही अंग समझता है, मैं ही अभंग सर्वात्मा
हूँ, ऐसी जिसकी भावना होती है, उसी को पूर्ण सायुज्यता प्राप्त होती है। अंतर्बाह्य मैं ही व्याप्त हूँ, सभी स्थावर-
जंगम में मैं अकेला ही व्याप्त हूँ, चराचर का आत्मा मैं ही हूँ, ऐसा जो मानता है, उसके घर में सायुज्यता चाकरी
करती है। सर्वत्र मैं एक अकेला ही एकत्त्व से भरा हुआ हूँ, ऐसी जिसकी समझ रहती है, जिसका द्वैतभाव नष्ट
हुआ रहता है वही सचमुच सायुज्यता प्राप्त करता है। सारांश, भावपूर्वक जो मेरे भक्त जिस किसी भी वस्तु की
इच्छा करते हैं, उसकी आपूर्ति मैं श्रीपति करता हूँ। इस प्रकार भक्तों को चारों मुक्ति प्राप्त होती है। इसके
अतिरिक्त भी मेरे और प्रिय भक्त हैं। अपनी भक्ति के प्रताप से वे अत्यन्त प्रतापी रहते हैं। उनके भजन का शौर्य
विचित्र रहता है। वे निरन्तर इच्छारहित होकर मेरे भजन में ही मग्न रहते हैं। आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी इन बातों का
विचार न कर वे निरन्तर इच्छारहित होकर अत्यन्त प्रेमपूर्वक मेरा भजन करते हैं। वे सलोकता, समीपता और
सरूपता बिलकुल स्वीकार नहीं करते और सायुज्यता भी नहीं माँगते। वे इच्छारहित होकर भगवान का भजन
करते रहते हैं। इसी का नाम है सच्ची भक्ति। भजन के सामर्थ्य का एक बहुत बड़ा चमत्कार है। वह यह कि
चाह से ही चाह उत्पन्न होती है और अधिक से अधिक उत्कर्ष से क्षण-प्रतिक्षण प्रेम की नयी माधुरी उत्पन्न होती
है। सचमुच, मेरे प्रति रुचि के कारण वह अपना सर्वस्व मुझे अर्पण करता है, फिर भी उसके अंतःकरण में कोई
परिवर्तन नहीं होता। भक्तिभाव से वह भजन के प्रति इतना अधिक आश्वस्त रहता है। देवाधिदेव एक मैं हूँ,
समस्त प्राणियों में मेरा आत्मा है, ऐसी जिसकी भावना हो जाती है, उसके मन में कोई कितने ही विकल्प,
विकृति अथवा संशय उत्पन्न करने का प्रयत्न क्यों न करे लेकिन उनका प्रयास सार्थक नहीं होता। भक्ति की
महत्ता आश्चर्यजनक है। वह भक्त सारे पुरुषों-स्त्रियों में मुझे ही देखता है। श्वान, शूकर आदि में मेरा ही रूप
देखकर उनको प्रणाम करता है। उसके भजन की महत्ता आश्चर्यजनक है। ऐसे भक्त सायुज्यादि चारों मुक्ति मुझ
पर न्योछावर कर देते हैं। इतनी असीम उनकी भक्ति रहती है। कितना ही बड़ा संकट क्यों न आ जाय लेकिन वे
दूसरे के पास मिन्नत करने नहीं जाते। वे जानते हैं कि रामनाम के सामने वह विघ्न कुछ नहीं कर पायेगा। चाहे
बिजली की गर्जना से आकाश नीचे गिरता सा मालूम पड़े अथवा पृथ्वी उलटने लगे, लेकिन वह श्रीहरि का
नामस्मरण करता रहता है। ऐसी एकनिष्ठ प्रीति देखकर मैं लक्ष्मीपति उसके मोह में पड़ जाता हूँ और फिर कुल
और जाति का विचार न कर उसके घर की ओर दौड़ पड़ता हूँ। ऐसे भक्त वैकुण्ठ की राह नहीं खोजते, वरन्
उनके घर को ही मैं वैकुण्ठ बना देता हूँ। फिर वहाँ ज्ञान की भोर होती है, और संतों का समुदाय एकत्र होने
लगता है। उपनिषद उनके पास आते हैं; स्वधर्म आनन्दपूर्वक उनके पास रहने के लिये आता है और नारद,
सनकादिक आदि को उस घर से लगाव-सा हो जाता है। वे नाम के माहात्म्य का घोष करते हैं। बड़ी चाह से
मेरी यशोगाथा का गान करते हैं। मेरे रामनाम के आगे सुख-दुःख के द्वंद्वों की कष्टदायक स्थिति शेष ही नहीं
रहती। मेरी ऐसी भक्ति देखकर आत्मशान्ति अत्यन्त प्रेम से उनके पास दौड़ती चली आती है और वहाँ आकर
जब वह प्रसन्न हो जाती है तो जाने की बात ही भूल जाती है। जो भी दूषण उनका छल करने के लिये आते हैं,
वे सब उनके भूषण हो जाते हैं। इसी का नाम है मेरी भक्ति की प्रसन्नता। सायुज्यादि जो चार मुक्तियाँ हैं, वे सब
वहाँ उनकी सेवा में उपस्थित रहती हैं, वे जहाँ विषय सेवन करने लगते हैं, वहाँ सायुज्य मुक्ति ही उनकी सेवा
करती है। ऋद्धि-सिद्धि उसके घर की दासी बन कर रहती हैं, फिर भी वह उनकी इच्छा नहीं करता। उसकी
सारी दारोमदार मेरी भक्ति पर ही रहती है। निश्चयपूर्वक की हुई ऐसी भक्ति देखकर मैं भी उस पर अनन्य प्रीति
करता हूँ। भक्त जहाँ मेरी बाट जोहते हैं, वहाँ मैं लक्ष्मीकांत स्वयं ही प्रकट होता हूँ। भक्त सहज ही जो बात
करता है, वह बात मैं स्वयं ही बन जाता हूँ। उसकी बातों में अंतर्बाह्य मैं ही शब्दार्थरूप में रहता हूँ। वह मौज में
कंकड़ से खेलने लगता है तो वह कंकड़ भी मुझे ही बनना पड़ता है। वह कृपालु होकर जिसकी ओर देखता है,
उसके मजबूत सांसारिक बन्धन मैं तोड़ देता हूँ। वह जिधर दृष्टि घुमाता है, उधर मैं सुखों की सृष्टि बना देता हूँ।
वह जिसका उद्धार करने के लिये कहे, उसे मैं अपने पद पर आसीन कर देता हूँ। उस पर जरा सा भी संकट आ
जाय तो उसे समाप्त करने के लिये मैं दौड़ पड़ता हूँ। जो भी उसका नाम लेते हैं, उनका मैं पूर्णरूप से उद्धार
करता हूँ। नन्हे बालक की चिन्ता जिस प्रकार उसकी माँ को होती है, उसी प्रकार मुझे भक्तों की चिन्ता रहती है।
उनकी सेवाचाकरी करने में मैं जरा भी नहीं शरमाता। माँ जिस प्रकार अपने बच्चों का लाड़-प्यार करती है, उसी
प्रकार मैं उनसे लाड़-प्यार करता हूँ। उनका प्रेम ही मुझे प्यारा लगता है। अन्य उपचारों की मुझे इच्छा ही नहीं
है। मैं शरीर हूँ और वह मेरा आत्मा है। प्यारा भक्त ही हमें अच्छा लगता है। भक्ति की महिमा कितनी ही महान
क्यों न हो लेकिन प्रिय व्यक्ति पर उसकी मात्रा का प्रभाव नहीं होता। प्रेमी के पास ही भक्ति की मर्यादा समाप्त
होती है। शायद काल उसका संहार करेगा इसलिये उसके भीतर और बाहर मैं अपने शरीर का किला ही तैयार
करता हूँ। प्रेमियों का मुझ पर इतना अधिक प्रेम है। ऐसी स्थिति में काल के ही भय से मैं अपने भक्तों को
ब्रह्मस्वरूप के मार्ग पर लगाता हूँ और अत्यन्त ध्यानपूर्वक उन्हें अपने स्वरूप में पूर्णरूप से आत्मसुखी बनाकर
रखता हूँ। ऐसे भक्तों का जो स्वाभाविक कृत्य है, वही मेरी प्रीति की पूजा है। वह जो देखता है, वही मेरा दर्शन
है और वह जो कुछ बोलता है वही मेरा वास्तविक स्तोत्र है। वह स्वयं जो भोजन करता है, वही मेरे लिये नैवेद्य
समर्पण है। उसकी निद्रा ही मेरी पूर्ण समाधि है। उसकी आँखों का खुलना बन्द होना मुझे बड़ा अच्छा लगता है।
उसका श्वासोश्वास मुझे अत्यन्त सुख प्रदान करता है। भक्तों के शरीर की जो स्वाभाविक स्थिति रहती है उससे
मैं लक्ष्मीपति अत्यन्त आनन्दित होता हूँ। ऐसे प्रेमी भक्त मुझे बहुत भाते हैं। मेरे भक्तों पर मेरी एकनिष्ठ प्रीति
रहती है। जो भक्त चारों पुरुषार्थों का स्पर्श नहीं करते और चारों मुक्तियों को दूर कर प्रेम से मेरी ही भक्ति करते
हैं, वे मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त करते हैं। गंगा समुद्र में मिलकर एकरूप से उसमें ऐसे मिल जाती है कि वह गंगा
ऐक्य रूप से उसकी ही होकर उस पर लोटने लगती है। उसी प्रकार मेरा भक्त भक्ति के सामर्थ्य से मुझसे
मिलकर मेरी भक्ति का सुख मुझमें ही भोगता है। युवा स्त्री यौवन के मद से सर्वांग से उस यौवन का उपभोग
करती रहती है, उसी प्रकार भक्त मुझसे मिलकर मेरी भक्ति का वैभव भोगता रहता है अथवा सत्रहवीं कला का
माधुर्य चन्द्रमा स्वयं ही जानता है, उसी प्रकार मैं बन कर मेरा भजन किस प्रकार किया जाय यह सज्ञानी भक्त
जानते हैं। वैसे जाति, स्वभाव के अनुसार सभी स्थानों का जल एक जैसा होता है किन्तु वही जल गंगा, यमुना
इन नामों से प्रयाग में एकत्र होता है और उस संगम पर लोगों का उद्धार करता है। उसी प्रकार मुझसे ऐक्य होने
पर भाविक भक्त भी बड़ी योग्यता प्राप्त करता है। उसके अनुसार मेरे भक्त मुझसे मिलकर एकनिष्ठ होकर मेरा
भजन करते हैं। ऐसे भजन से, मेरे साथ ऐक्य होने के कारण भाविक, सात्त्विक और अत्यन्त दीन लोगों का
उद्धार होता है। पृथ्वी तो सम्पदा से भरी हुई है ही लेकिन भाग्यवान के बिना उस द्रव्य की प्राप्ति नहीं होती।