श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 671, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय ६५५
बन्धनों से कष्ट पाने वाले लोगों को बन्धनमुक्त करने के लिये जो कृपालु बने, जो सत्य बोलने वाले तथा
सात्त्विक प्रवृत्ति के होते हैं, वही सत्यलोक के निवासी हैं। जो परनिन्दा के प्रति मूक, परस्त्री के प्रति नपुंसक,
पराये धन के प्रति उदासीन होते हैं, वही सत्यलोक के रहिवासी हैं। वहाँ का अधिपति ब्रह्मदेव है। उद्धव! इसके
ऊपर ब्रह्मवेद की कोई सृष्टि नहीं है, इसे ध्यान में रखो। भोले शंकर ने ब्रह्माण्ड से अलग अपने कैलास का
निर्माण किया है और मेघश्याम विष्णुने वैकुण्ठ का निर्माण किया है। ये लोक उन्होंने अपनी-अपनी लीला से ही
तैयार किये हैं। ब्रह्माण्ड में परिवर्तन होते रहते हैं लेकिन उसकी आँच वैकुण्ठ और कैलास पर नहीं आती। वहाँ
रहने का आनन्द विष्णुभक्त और शंकरभक्त अच्छी तरह जानते हैं। वहाँ न काल का प्रवेश हो पाता है, न कर्म का
कर्मबन्धन है और न जन्म-मरण है। जो अनन्य भक्त हैं उन्हें ही यह स्थल प्राप्त होता है। वैकुण्ठ और कैलास
की रचना का वर्णन करते समय मन का मनपन समाप्त हो जाता है। हे बुद्धिवान उद्धव! अब वहाँ के लोगों के
लक्षण बताता हूँ, सुनो। ब्रह्माण्ड से बिलकुल बाहर और माया-आवरण के भीतर शिव ने कैलास तथा विष्णु ने
वैकुण्ठ ये लोक अपनी लीला से निर्मित किये। समस्त जीवों को सुख प्रदान करने वाला, पार्वती का परमेश्वर,
योगियों का योगेश्वर वह शंकर कैलास में रहता है। वह मस्तक पर जटा धारण करता है, मस्तक पर गंगा धारण
करता है, पिनाक नाम का धनुष हाथ में धारण करता है, जिसका वर्ण पंचमुखी, कर्पूर अथवा गोरस की तरह
शुभ्र है और जो अपने भक्तों को सदा अभय देता है और वरदायक है, अकार, उकार और मकार इन तीन मात्राओं
के परे का है, जो त्रैलोक्य का नेत्र है, त्रिपुर का नाश करने वाला, त्रिविध तापों का शमन करने वाला और तीनों
लोकों को सुखी करने वाला है। नागभूषण धारण करने के कारण उसकी शोभा विशेष रूप से खिल जाती है,
जिसने रुद्राक्ष और रुंडमाला धारण की है, जिसका कंठ नीलरत्न की तरह है, भस्म का लेप करने के कारण
उसका शरीर धुएँ की तरह दिखाई दे रहा है। उसके हाथ में त्रिशूल और डमरू है, उसे तीन नेत्र हैं, उसके शरीर
पर वस्त्र के नाम पर केवल व्याघ्रांबर है। उसके हाथ की जपमाला सदा रामनामजप में तत्पर रहती है। बली का
पुत्र सहस्रबाहु बाणासुर, श्रृंगी, भृंगी, चंडी ये जिसके सेवक हैं, इसके अलावा साठ हजार रुद्रगण चमचमाते
हँसिया और त्रिशूल लेकर सदा तैयार रहते हैं। गणपति, कार्तिक स्वामी, नंदी, पंचमुख, षण्मुख और जिसने दक्ष
को शिक्षा दी थी वह वीर सेनापति वीरभद्र, भूत, प्रेत, पिशाच और बड़े-बड़े देवतागण यही जिसकी सेना है,
ऐसा वह शंकर है और शेष सब उसके आज्ञाधारी हैं। वे सदा शिवनाम की गर्जना करते रहते हैं। शंभु, शिव,,
शूली, शंकर, उमाकांत, कर्पूरगौर, भव, भर्ग, भवानीपति, कपर्दी, ईश्वर, महादेव अथवा 'हर हर शंकर' इस
नामोच्चार के भय से ही कलिकाल दूर भाग जाता है। कैलास पर्वत सदा शिवनाम की ही गर्जना करता रहता है
और वहाँ का राजकाज शंकर देखता है। जहाँ शिवनाम का उच्चार होता है, वहाँ शंकर आनन्दपूर्वक रहता है। वह
ईश्वर भक्तों के प्रति अत्यन्त कृपालु है तथा सदा भोले भाव से भक्तों के वश में होने वाला है। तीन गुण यही मेरे
भक्तों के शत्रु हैं इसलिये उन त्रिगुणों का संहार करने के लिये ही उसने हाथ में सदा त्रिशूल धारण किया हुआ
है। वह अपने डमरू के घोष से पापों का पूरी तरह संहार करता है। कैलास पर्वत पर की घास, पेड़, पशु, पक्षी
अथवा और जो भी कुछ है वे सब शंकर के आज्ञाधारक हैं। बल्कि यह कहें कि वे सब शंकर के ही रूप में वहाँ
रहते हैं। इस प्रकार शंकर ने ब्रह्माण्ड के बाहर अपनी लीला से ही कैलास पर्वत निर्माण कर उसकी स्थापना की
और वहाँ भवानी के साथ मिलकर राज्य का कारबार देखते हैं। अब तुम्हें वैकुण्ठ की भी स्थिति बताता हूँ।
उसकी स्थिति ऐसी है कि उसे सुनते समय चित्तवृत्ति आनन्द स्फूर्ति से लबालब भर कर बाहर बहने लगती है।
ऊख का रस निकाल कर उसकी शक्कर बनाते हैं और अत्यन्त कुशल लोग उसके विविध व्यंजन तैयार करते हैं।