श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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उसी प्रकार भगवान ने अपने निवास के लिए सारे चैतन्य का रस निकाल कर तथा उसे गाढ़ा बनाकर उससे
वैकुण्ठ की रचना की है। अपनी ही लीला से निर्मित सगुण, साकार, सुकुमार, अत्यन्त सुन्दर, घनश्याम, मनोहर
तथा ज्ञानमय सुन्दर मूर्ति, शंख, चक्र, पद्म, गदा आदि चार आयुधों से युक्त चार भुजावाले सगुणस्वरूपी गोविन्द
को देखकर होने वाले आनन्द से आँखें लुब्ध हो जाती हैं। मुकुट, कुण्डल, करधनी तथा पीत पीताम्बर परिधान
किये हुए, गले में कौस्तुभ मणि शोभा दे रहा है, गले में पड़ी हुई वनमाला पैरों तक लटक रही है। चरणों से
निकली हुई गंगा तो अत्यन्त पवित्र है जो सारे संसार को ही पवित्र कर देती है। यह देखकर शंकर ने गंगा को
अपने मस्तक पर ही धारण किया। उस हरि के दोनों चरणों का वर्णन करने वेद भी मूक हो गये क्योंकि वह
श्रीहरि का पद दुर्गम है। श्रीहरि के चरणों की महिमा अपार है। श्रीहरि का अत्यन्त सुन्दर मुख देखकर अमृत भी
उसके आगे फीका मालूम होता है और आँखों को अप्रतिम सुख की अनुभूति होती है। जिसके मुख का क्षण भर
के लिये अवलोकन करने से कोटि-कोटि जन्मों का दुःख समाप्त हो जाता है और उससे मुखचन्द्र देखने से
सुख-दुःख के द्वंद्व की बाधा जरा भी पीड़ा नहीं दे सकती, बल्कि अधिक से अधिक परमानन्द ही प्राप्त होता है।
ऐसा वह सारे जग का आत्मा आनन्द का मूल स्रोत है। जिसके किंचित दृष्टिक्षेप से तत्काल कितने ही ब्रह्माण्डों
की उत्पत्ति होती है, जिसके प्रत्येक रोमरन्ध्र में करोड़ों ब्रह्माण्डों का वास रहता है। ऐसा वह श्रीहरि वैकुण्ठ में
निवास करता है। जिसकी जरा सी कृपादृष्टि से अहंकार की गाँठ टूट जाती है और सृष्टि में अन्य कुछ दिखायी
ही नहीं दे सकता। वह श्रीहरि वहाँ रहता है। जिस प्रभु का नामस्मरण ही जन्म-मरण को नष्ट कर देता है,
कर्माकर्म को समूल नष्ट करता है, वह पुरुषोत्तम वैकुण्ठ में रह रहा है। उस वैकुण्ठ में सभी लोग चतुर्भुज हैं।
सभी मेघ जैसे श्यामरंग के, पीताम्बर धारण करने वाले तथा सभी के हाथ में शंख-चक्र आदि शस्त्र रहते हैं।
सबका स्वरूप एक जैसा, सब एक जैसे दिखायी देते हैं। जहाँ स्वयं सौन्दर्यशाली श्रीहरि रहते हैं, वहाँ कोई
विद्रूप नहीं दिखायी देता। वहाँ आधिदैविक अथवा आधिभौतिक पीड़ा नहीं होती, विषय वार्ता की गन्ध नहीं
होती। वहाँ स्त्री-पुरुषों की बुद्धि एक जैसी होती है। वहाँ भूख-प्यास का नाम नहीं है, काम-क्रोध नहीं है,
सुख-दुःख के द्वंद्वों का दुःख नहीं है, जन्म-मरण तो बिलकुल नहीं है। लक्ष्मी एक बार दर्शन दे दे इसके लिये
देवतागण सदा प्रयासरत रहते हैं लेकिन लक्ष्मी स्वयं वैकुण्ठ में सफाई के काम में लगी रहती है। उस वैकुण्ठ में
दीनदयाल और उदार जगन्नाथ अपने भक्तों का उद्धार करने के लिये अपनी ही लीला से विचरण करते रहते हैं।
मृत्यु के समय उसका नामस्मरण करने से ही करोड़ों जीवों का उद्धार हुआ है। वह प्रभु श्रीविष्णु दीनजनों पर
कृपा दृष्टि रखते हुए वैकुण्ठ में निवास करता है। जिसकी जैसी भावना रहती है उसके अनुसार वह उसका
मनोरथ पूर्ण करता है और पाँचवें पुरुषार्थ से प्रीति करता है। ऐसा वह श्रीहरि वैकुण्ठ में रहता है। अब तक
विविध लोकों की गणना, समस्त ब्रह्माण्डों की संख्या, वैकुण्ठ और कैलाश की रचना के सम्बन्ध में बताया।
भिन्न-भिन्न लोक बताये लेकिन उसे प्राप्त करने वाले लोग कौन हैं ऐसी कल्पना तुम करोगे इसलिये उसका भी
निरूपण सुनो। महर्लोक, जनोलोक, तपोलोक, सत्यलोक और जिनकी रचना आश्चर्यजनक है ऐसे वैकुण्ठ को
प्राप्त करने वाले लोग कौन हैं उसके बारे में यदुनायक श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
योगस्य तपसश्चैव न्यासस्य गतयोऽमलाः ।
महर्जनस्तपः सत्यं भक्तियोगस्य मद्गतिः ॥ १४॥
अपने अंतःकरण को स्थिर करने के लिये प्राणापान समान करने की कुशलता साध्य करने पर षडचक्रों को
भेद कर आत्मस्वरूप में पहुँचे और यदि इसी बीच आयु समाप्त होकर मृत्यु आ जाय तो ऐसे योगी लोगों को