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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 673, कुल 869 में से

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पृष्ठ 673

चौबीसवाँ अध्याय ६५७
महर्लोक, जनोलोक आदि ऊपर के लोकों में जाने को मिलता है। जो गृहस्थाश्रम में रहकर ब्रह्मचारी रहता है,
नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करता है, जो स्वप्न में भी स्त्री का स्पर्श नहीं करता जो सदा भिक्षा माँग कर
खाता है, जो निरन्तर कठोर वैराग्य धारण करता है अथवा भिक्षा को भी स्पर्श नहीं करता और आत्मज्ञान की
प्राप्ति के लिये सद्गुरु की सेवा करता है उसे उस प्रसंग में जो आत्मज्ञान होता है, उसी समय यदि उसे मृत्यु
प्राप्त हो जाय तो ऐसा ब्रह्मचारी ऊपर महर्जनादि लोक में जाता है। जो गृहस्थाश्रम में ही तत्पर हैं जो अग्निसेवा
के लिये अग्निहोत्र स्वीकार करते हैं, जो स्वधर्म से ही चित्त शुद्ध करते हैं और जो ब्राह्मणों की और देवताओं की
सेवा करते हैं, जो भक्त होकर प्राणिमात्र पर दया करते हैं, जो सत्यभाषण करने वाले तथा सात्त्विक प्रवृत्ति के
होते हैं, जो आत्मज्ञान साध्य करने वाले, गुरुभजन की प्रवंचना न करने वाले होते हैं, ऐसे लोगों को गुरुकृपा से
आत्मज्ञान साध्य करने के बाद सनातन ब्रह्म की प्राप्ति होते समय यदि उनकी आयुसम्पत्ति समाप्त होकर उन्हें
मृत्यु आ जाय तो उससे ब्रह्मप्राप्ति होने में अड़चन आ जाती है फिर भी वे ऊपर पहुँचते ही हैं और जिसकी जैसी
विरक्ति और उपासना रहती है, उसके अनुसार वे महर्जनादि लोक में पहुँचते हैं। जो वन में रह कर वानप्रस्थाश्रम
का आचरण करते हैं, जो वैराग्य के कारण अत्यन्त विरक्त रहते हैं, जो कंद-मूल खाकर ही तृप्त रहते हैं और जो
सदा आश्रमधर्म का नियमपूर्वक पालन करते हैं, ऐसे साधक पर्जन्यकाल में पर्जन्यवृष्टि में बैठते हैं, जाड़े में पानी
में बैठते हैं, गरमी में पंचाग्निसाधन करते हैं, इस प्रकार जो निष्ठापूर्वक तपश्चर्या करते हैं, जिन्हें शरीर के क्षीण
होने का भय नहीं होता, आत्महित साधन की उत्कंठा से जो दारुण तप सहन करता है अथवा पूर्ण वैराग्य साध
कर ब्रह्मज्ञान प्राप्ति के लिये संन्यास लेने लगता है और तभी मृत्यु पास आ जाता है तो उसे अंतकाल के बाद
ऊर्ध्वलोक गमन होता है और उसकी उपासना के अनुसार उसे महर्जनतपोलोक की प्राप्ति होती है। जो समूल
संकल्पों का ही संन्यास करता है उसे लोकांतर सम्भव नहीं होता। वह मुक्त होता है। जिससे यह नहीं हो पाता
और जो विधिपूर्वक संन्यासी होते हैं, जो अंतःकरण से अत्यन्त विरक्त रहते हैं, स्वप्न में भी सुवर्ण या चाँदी का
स्पर्श नहीं करते, जो सदा संन्यास धर्म में लीन रहते हैं और जो निरन्तर ओंकार का जप करते हैं, आश्रमविधि
स्वीकार करने के बाद जो उससे ऊबते नहीं हैं, मृत्यु के समय जिसकी बुद्धि चंचल नहीं होती वह सत्यलोक में
जाता है। ऐसे जो लोग सत्यलोक में जाते हैं लेकिन वहाँ के सुख विलास आदि भोगों से भी जिन्हें विरक्ति रहती
है वे ब्रह्मदेव के साथ ही मुक्त होते हैं और शेष वापस आ जाते हैं। जिन्हें सत्यलोक के भोग भोगने में रुचि रहती
है वे भी वहाँ से थक कर वापस आ जाते हैं, फिर औरों की गति के बारे में क्या कहा जाय? उन्हें जन्म और
मरण छोड़ते ही नहीं हैं। जहाँ तक भोगासक्ति है वहाँ तक जन्म-मरण का कष्ट है ही। लेकिन जहाँ भोग की
इच्छा समाप्त हो जाती है, वहाँ चारों मुक्ति दासी बनकर सेवा के लिये तत्पर रहती हैं, जिस लोक में उन्हें भोग से
विरक्ति होती है, वहाँ से वे आगे बढ़ जाते हैं और जिस लोक में उनमें भोगासक्ति उत्पन्न होती है वहाँ से वे थक
कर भूलोक में गिर पड़ते हैं। किन्तु मेरी भक्ति वैसी नहीं है। भक्तों को अन्य किसी वस्तु की प्राप्ति नहीं होती।
उद्धव! मेरे भक्तों को निश्चय ही मेरी ही गति प्राप्त होती है जो मन में इच्छा रखकर मेरी सेवा करते हैं, उन्हें
वासना का ही फल खाना पड़ता है लेकिन जिन्हें मेरे प्रति निष्काम भक्ति रहती है उन्हें मेरी अनन्य भक्ति ही प्राप्त
होती है। सकाम भक्तों की वासना पूर्ण कर, मैं उन्हें सदा निष्काम करता रहता हूँ। मैं पुरुषोत्तम अपने भक्तों को
मेरे निजधाम ले जाता हूँ। उद्धव! इसीलिये मैंने गोपियों की कामासक्ति को निष्काम स्थिति में ला कर उन्हें
सचमुच ही सायुक्त मुक्ति दिलायी। मैंने गोपियों के साथ कामविलास किया या उन्हें पूर्ण रूप से कामयुक्त किया
इसका विचार न कर मूर्ख लोग कृष्ण ने व्यभिचार किया ऐसा आरोप लगाते हैं। भक्तों को यदि सालोकता प्रिय