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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

६२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तर्जयन्त्यपरे वाग्भिः स्तेनोऽयमिति वादिनः।
बध्नन्ति रज्ज्वा तं केचिद् बध्यतां बध्यतामिति ॥ ३७ ॥
कोई दूर से वाग्बाण छोड़ने लगा। बोला, "इसके इस वेष का कारण हमने अच्छी तरह जान लिया है।
इसके वेष का मर्म यही है कि यह एक बड़ा ठग, नीच और बड़ा ढोंगी है, भिक्षा माँगने के भेष में यह जासूस
घर-घर घूम रहा है। इस चोर को पकड़िये। " इन निंदास्पद भाषण के साथ वे सब जोर-जोर से चिल्लाने लगे।
कुछ लोग उसे नीचे गिरा कर रस्सी से बाँधने लगे।
क्षिपन्त्येकेऽवजानन्त एष धर्मध्वजः शठः।
क्षीणवित्त इमां वृत्तिमग्रहीत् स्वजनोज्झितः ॥ ३८ ॥
उसकी पहले की स्थिति जो जानते थे, वे उसका अपमान कर उसकी निन्दा करने लगे। वे बोले, "पहले
यह कदर्यू नाम से प्रसिद्ध था और आज यह हमारे सामने संन्यासी का भेष बनाकर घूम रहा है। इसने शुभ-
अशुभ कर्मों से द्रव्य एकत्र किया और अधर्म के कारण वह द्रव्य नष्ट हो गया। इसलिये स्वजनों ने इसे घर से
बाहर निकाल दिया। इस पेट के लिये अन्न मिलना मुश्किल हो गया इसलिये यह कपटी भेष बदल कर संन्यासी
बन गया है। हमारे सामने अपनी प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करने में इसे लज्जा नहीं आती। पहले से ही यह धोखेबाज
था और अब ढोंगी संन्यासी बन गया है। यह सोचता था कि ये लोग भोले-भाले हैं, इन्हें कुछ मालूम नहीं है।
अब इस महाठग ने मौन धारण कर लिया है। जिस प्रकार बहुरूपिया स्वांग रचते हैं, उसी प्रकार यह उत्तम वेष में
संन्यासी बनकर हमें धोखा देने आया है। इसे मारने से दोष नहीं लगेगा।"
अहो एष महासारो धृतिमान् गिरिराडिव।
मौनेन सधयत्यर्थं बकवद् दृढनिश्चयः॥ ३९ ॥
यह प्रबल ढोंगी है। अपना स्वांग अच्छी तरह निभाता है। जिस प्रकार तूफान में महामेरू अडिग रहता है,
उसी प्रकार हमारे कष्ट देने से वह विचलित नहीं होता। अन्न और वस्त्र प्राप्त करने के लिये ही इसने धैर्य कायम
रखा है। स्वार्थ पर दृष्टि रख कर ही इसने बगुले की तरह मौनव्रत धारण किया है। मछली निकलने के लिये
जिस प्रकार बगुला मौन धारण करता है, उसी प्रकार इसका ध्यान अपने लक्ष्य पर रहता है। यह भोले भोले लोगों
को लूटेगा। अब द्रव्यलोभ के लिये यह पुराने कष्टों का ख्याल नहीं करता। उसकी यह आदत अब दृढ़ हो गयी
है। किसी ने कहा, "कैसा धैर्यवान है!" और इतना कहकर उसे लतियाने लगे। कोई उसके कान में सींक
घुसेड़ने लगा और बोला, "अब देखें इसकी शान्ति।" फिर भी उसके मन में द्वेष नहीं उत्पन्न हुआ। उसकी
शान्ति अटल थी। उसकी शान्ति की परीक्षा लेते-लेते वे दुष्ट लोग और भी अधिक क्रुद्ध हो गये और उसे नाना
प्रकार के कष्ट देने लगे। श्रीकृष्ण यही वर्णन करते हैं।
इत्येके विहसन्त्येनमेके दुर्वातयन्ति च।
तं बबन्धुर्निरुरुधुर्यथा क्रीडनकं द्विजम् ॥ ४० ॥
कोई उसकी खिल्ली उड़ाने लगा, कदर्यू को तो पूर्ण शान्ति प्राप्त हो गयी। किसी ने उसके नाक पर चूना
लगाया, किसी ने तो उसके मुँह में काजल पोत दिया। कुछ तो और भी निर्लज्ज थे। वे उसके सामने पीठ करके
खड़े हो गये और अपानवायु छोड़ने लगे। वह दुर्गन्ध उसके नाक और मुँह में भर गयी। फिर भी उसकी

तेईसवाँ अध्याय ६२५
आत्मरूप स्थिति के कारण उसके चित्त में जरा भी क्षोभ नहीं हुआ। क्रोध लाने का प्रयत्न करने पर भी जिस की
शान्ति नहीं ढलती वही त्रिभुवन में संन्यासी है। सारांश, उसका मन क्षुब्ध नहीं हो रहा है यह देखकर दुष्ट लोग
और भी अधिक तैश में आ गये। उन्होंने उस संन्यासी के गले में लोहे का सिक्कड़ बाँध दिया और उसे चौरस्ते
पर ले आये। "अरे! आप में से कोई तो इसे पहचानो। जो निंद्य कर्म किया करता था वही यह द्रव्यलोभी है।
उसे हमने आज पकड़ लिया। यह अत्यन्त अधर्मी और ढोंगी है। जिस प्रकार मदारी बन्दर को बाँध कर रखता है
उसी प्रकार उन्होंने संन्यासी को बाँध कर रखा था और फिर सब मिलकर उसे आगे-पीछे खींचने लगे। कोई पूर्व
की ओर खींच रहा था तो कोई पश्चिम की ओर। इसमें सबको संतोष प्राप्त हो रहा है यह देखकर संन्यासी भी
मन ही मन हँसने लगा। देह प्रारब्ध भोग रहा है। मेरा उससे क्या सम्बन्ध है ? इस विवेक से वह क्षमा से परिपूर्ण
हो गया था। वह किसी का मन दुखा नहीं रहा था। जिन्होंने कभी उसका सम्मान किया था उन भाईयों, रिश्ते नाते
वालों के सामने वह अपमान सहन कर रहा था। उद्धव! जिसका मन लौकिक प्रतिष्ठा के कारण लज्जित होता है
उसके मन में शान्ति नहीं रहती। जरा देखो! जिसे इतना कष्ट दिया उसके मन में क्रोध नहीं आया। उस संन्यास
का हृद्गत देवाधिदेव स्वयं बता रहे हैं।"
एवं स भौतिकं दुःखं दैविकं दैहिकं च यत्।
भोक्तव्यमात्मना दिष्टं प्राप्तं प्राप्तमबुध्यत ॥ ४१ ॥
भिक्षु ने अपना विचार बतलाया। उसने कहा, सारे लोग तीन प्रकार के प्रारब्ध से बँधे हुए हैं। इसलिये उन्हें
भोगना आवश्यक है। राजा और रंक भी उससे नहीं छूट पाते। पंचमहाभूतों से होने वाली पीड़ा 'भौतिक' होती
है। देवताओं से होने वाली पीड़ा 'दैविक' होती है और देह में ही ज्वर आदि होने वाली पीड़ा 'दैहिक' होती है।
इस प्रकार यह जो तीन प्रकार का दुःख है वह प्रारब्ध से उत्पन्न होता है। उसको भोगते समय जो कष्ट का
अनुभव करता है वह मंदबुद्धि और मूर्ख है। प्रारब्ध से हमारे भाग्य में जो भोग आये हैं, वे हरिहर को वश में
करने पर भी भोगने ही पड़ते हैं, उससे प्राणी बच नहीं पाता यह जानकर ही वह संन्यासी क्षमाशील हो गया था।
श्रीकृष्ण पाण्डवों की सहायता कर रहा था, फिर भी उन्हें भोग भोगने ही पड़े। ऐसे में विष्णु और शंकर इन दोनों
को वश में कर लेने पर भी, प्रारब्ध से कोई नहीं बच पाता।
परिभूत इमां गाथामगायत् नराधमैः।
पातयद्भिःस्वधर्मस्थोधृतिमास्थायसात्त्विकीम् ॥ ४२ ॥
दुष्ट लोगों के उपद्रव से भी वह संन्यासी शान्ति नहीं छोड़ रहा था। सात्त्विक धैर्य धारण करने के कारण
उसकी धर्मस्थिति ढली ही नहीं। उस भिक्षु ने जिस गाथा का गायन किया, उसे मैं अब सुनाऊँगा। उद्धव! चित्त
को अत्यन्त सावधान रखकर श्रवण करो। वह उपदेश मन में धारण करने से मन में द्वंद्व की समता दिखायी देने
लगती है, आत्मशान्ति सहज प्रकट होती है और सायुज्यमुक्ति घर में प्रवेश करती है। जिसे श्रीकृष्ण ने स्वस्थचित्त
किया उस उद्धव का भाग्य इस संसार में बहुत बड़ा था। श्रीकृष्ण ने कहा—भिक्षु ने स्वयं जो कहा, उसे सुनो।
द्विज उवाच
नायं जनो मे सुखदुःखहेतुर्न देवतात्मा ग्रहकर्मकालाः।
मनः परं कारणमामनन्ति संसारचक्रं परिवर्तयेद् यत् ॥ ४३ ॥

६२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वह भिक्षु बोला, सज्जन, दुर्जन और साधारण ये जो तीन प्रकार के लोग होते हैं, वे मेरे सुख या दुःख के
लिये बिलकुल कारणीभूत नहीं होते। जितने भी प्रकार के लोग हैं वे सब पंचमहाभूतों से ही उत्पन्न हुए हैं। मेरा
भी देह वैसा ही है। इसलिये सारे लोगों में और मुझमें एक प्रकार का ऐक्य है। सुख-दुःख केवल मन में ही
उत्पन्न होता है। सुख-दुःख देने वाले देवता हैं, यदि ऐसा कहा जाय तो देवता मन की कल्पना हैं। अतः उनके
सुख-दुःख का भी मुझ पर कोई प्रभाव नहीं होगा। देवता रूप हमारा मन ही है और उस मन ने ही समस्त
देवताओं की कल्पना की है। अर्थात् देवता जब सुख-दुःख देते हैं तो इसका कारण मन ही रहता है। जैसा मन
का सद्भाव होता है, वहीं उसी के अनुसार उस स्वरूप में देवी या देवता का आभास होता है। जहाँ मन में
अश्रद्धा रहती है वहाँ देव भी नहीं दिखाई देता। इसलिये जो समस्त देवतागण हैं, वे मन से कल्पित ही हैं। अतः
यदि उनसे सुख-दुःख की व्यथा होती है तो वह मन के कारण ही है, यह जान लो और यदि आत्मा का सुख या
दुःख का कारण मान लें तो वह भी गलत है। आत्मा में द्वैत की भावना बिलकुल नहीं होती। मैं सुख-दुःख देने
वाला हूँ और यह सुख-दुःख का भोक्ता है ऐसी भावना आत्मा में नहीं होती। जन्म के समय के क्रूर ग्रह सुख-
दुःख का कारण है ऐसा यदि कहें तो वास्तव में हमारा मन ही सारे ग्रहों का ग्रह है। वह जन्म-मरण का भोग
कराता है। ग्रहों की ग्रहदशा देह रहने तक होती है, लेकिन मन की ग्रहदशा उससे भी अधिक है। वह नाना
प्रकार का भोग कराती है और जन्म जन्मान्तर में भी नहीं छोड़ती। दुष्ट ग्रह थोड़े ही समय के लिये पीड़ा देता है
लेकिन मन की पीड़ा कोटि-कोटि जन्मों तक रहती है। दुष्ट ग्रह अपनी भोगदशा पूरी होने के बाद छोड़ देता है
लेकिन मन कल्पांत में भी नहीं छोड़ता। मन यदि देहाभिमान धारणा न करे तो ग्रहों की पीड़ा की कौन चिन्ता
करता है? इसलिये सुख-दुःख के लिये कारणीभूत होने वाला मन, यही एक महाग्रह है। अब हम अपने कर्म
को ही दुखदायक नहीं कह सकते क्योंकि कर्म ही कर्मबन्धन से छुड़ाता है। वह दुःखदायक कैसे हो सकता है?
अपना कर्म स्वाभाविक और पवित्र होने पर मन ही उसे सकाम बनाता है और उसे अनेक प्रकार के दुःख देकर
उसे अनेक योनियों का भोग भोगने को बाध्य करता है। जब कर्म की क्रिया के सम्बन्ध में मन का संकल्प कर्म
पर लागू नहीं होता तो सुख-दुःख कितने ही क्यों न हो, लेकिन अपना कर्म ही उनका नाश करता है। देह को
सुख-दुःख का क्या ज्ञान होगा? आत्मा तो सुख-दुःख बिलकुल नहीं जानता। इसलिये सुख-दुःखों का खजाना
बनाना और फिर उसे भोगना यह सब मन के आदेश से ही होता है। सुख-दुःख देने वाला काल है यह कहना
भी सर्वथा सच नहीं है। मन का संकल्प जैसा संकेत देता है, उसी प्रकार काल की सत्ता चलती है। अजर-अमर
रहते हुए यदि कोई अपने लिये मृत्यु की कल्पना कर ले तो काल उसके पीछे लग जाता है और क्षण-प्रतिक्षण
उसकी आयु कम करता है। जैसे बिस्तर में कोई सुआ चुभो कर रख दे और रात को सोने पर वह शरीर में घुसते
ही, साँप ने काटा इस भय से मर जाय। वास्तव में साँप ने उसे काटा ही नहीं था फिर उस पर विष का असर
कैसे होगा? वह केवल शंका से ही मर गया। उसी प्रकार काल लोगों के पीछे लगा हुआ है। एक आदमी की
पीठ में साँप ने काट लिया था। उसने अपने मित्र से पूछा, "मेरी पीठ में क्या घुस गया था?" उसने कहा,
"कुछ नहीं। एक काँटा गड़ गया था, जिसे मैंने खींच कर निकाल दिया।" इससे उसे साँप की शंका ही नहीं हुई
और विष की बाधा भी नहीं हुई। बहुत दिनों के बाद जब मित्र ने बताया कि उसे साँप ने ही काटा था और उसे
पीठ पर साँप को काटने का निशान भी दिखाया तो पुरानी याद आते ही तत्काल विष का प्रभाव हो गया और
उसने प्राण त्याग दिये। उसी प्रकार निर्विकल्प पुरुष को संकल्प की शंका होती है, उसी समय उसके विनाश के
लिये काल तैयार हो जाता है। लेकिन जिसका मन निःसंकोच 'मैं अमर हूँ' कहता है, उसका घर काल छोड़ देता

तेईसवाँ अध्याय ६२७
है। मन की शंका से ही काल प्रबल हो उठता है। जो स्वयं निर्विकल्प है, उसके पास काल कभी नहीं आता
क्योंकि उसके पास नश्वर कुछ भी नहीं होता। अतः काल कहाँ जायेगा? इस प्रकार काल सुख-दुःख देने वाला
नहीं है, इसे ध्यान में रखो। सुख-दुःख उत्पन्न करने वाला एक मन ही है, इसे निश्चित जान लो। संसार भी मनः
कल्पित ही है यह समझ लो। मन ने ही जन्म-मरण की कल्पना की है। संसार चक्र में बार-बार जो परिक्रमा
करनी पड़ती है वह भी मन के ही कारण। ये छह प्रकार ही सुख-दुःख का कारण है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं।
विचार करने पर यह भी असत्य मालूम होता है क्योंकि सुख-दुःख मन से ही उत्पन्न होते हैं। वह मन कितने
आश्चर्यकारक ढंग से मोहित करने वाला है कि वह 'मैं' का भान उत्पन्न कर तथा शुद्ध ब्रह्मस्वरूप आत्मा की ओर
प्रीति लगाकर सुख-दुःख भोगने को बाध्य करता है। आँख में छोटा-सा भी कण क्यों न चला जाय लेकिन वह
बहुत कष्ट देता है। उसी प्रकार मन भी वासना के बहाने भयंकर सुख-दुःख देता है। अब शायद आप यह कहेंगे
कि अविद्या ही सुख-दुःख देने वाली है। लेकिन अविद्या ब्रह्मस्वरूप होने के कारण, मन के सिवा सुख-दुःख
कभी नहीं होगा। अविद्या ब्रह्मस्वरूप होने के कारण मन सुषुप्ति में लीन रहता है। उस समय तो सुख-दुःख
रहता ही नहीं है। इसलिये किसी को वहाँ भोग दिखायी ही नहीं देता। मन जब निश्चित नहीं रहता तभी देह का
सुख-दुःख हमें नहीं मालूम होता। यह अनुभव हमें स्वयं अपने देह में अनुभव करना चाहिये। इसलिये हमारे
सुख-दुःख का कारण स्वयं हमारा मन ही है। उसी ने जन्म-मरण का चक्र मनुष्य के पीछे लगा दिया है और
मन उसे उस चक्र में घुमाता रहता है। वह कैसे घुमाता है उसी का निरूपण भिक्षु स्वयं सुना रहा है।
मनो गुणान् वै सृजते बलीयस्ततश्च कर्माणि विलक्षणानि।
शुक्लानि कृष्णान्यथ लोहितानि तेभ्यः सवर्णाः सृतयो भवन्ति ॥ ४४ ॥
मन ही अपनी सत्ता से कल्पना कर अनेक प्रकार की वृत्ति उत्पन्न करता है। यही वृत्ति बाद में त्रिगुणात्मक
हो जाती हैं और गुणों के प्रकारों के अनुसार उनकी वृत्ति बनती हैं। उन्हीं सत्त्व, रज, तमादि गुणों से देवता,
मनुष्य और पशु-पक्षी आदि योनि, मन से ही त्रिभुवन की सृष्टि उत्पन्न कर संसार सदन में विचरण करते हैं। उस
मन का सामर्थ्य विचित्र है। वह एक क्षण में कोई व्यूह रचना करता है और दूसरे ही क्षण उसे गिरा देता है। मन
ब्रह्मादि देवताओं पर भी अपनी मोहिनी चलाता है फिर औरों की क्या बिसात है? मन का प्रभाव इतना विचित्र है
कि वह निर्गुण को गुणों के पाश में फँसाता है। उसे जीवन की तंद्रा में लगा कर संसार के चक्र में घूमने के लिये
छोड़ देता है। विचार करने पर मालूम होता है कि मन, जड़, मूढ़ और अचेतन है। उसकी उत्पत्ति कैसे होगी?
उसी का वर्णन श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
अनीह आत्मा मनसा समीहता हिरण्मयो मत्सख उद्द्विचष्टे।
मनः स्वलिङ्गं परिगृह्य कामान् जुषन् निबद्धो गुणसङ्गतोऽसौ ॥ ४५ ॥
आत्मा ज्ञानस्वरूप होने के कारण परिपूर्ण है। वह निःसंग, निर्विकार और निर्गुण है। उसे संसारबन्धन की
बाधा नहीं होती। जो आत्मा स्वयं प्रकाश से ही प्रकाशित है, स्वतेज से ही सुशोभित है और जो आत्मा परिपूर्ण
है, उसे क्रियाचरण कभी नहीं घटता। अपनी कल्पना से विचार करने से मन जड़ मालूम होता है, अतः उसे भी
संसार घटना सम्भव नहीं है। अब, यह संसार का बन्धन किसे होता है, सुनिये। मन का कौशल आश्चर्यजनक
है। वह शुद्ध आत्मा में 'मैं' का भाव उत्पन्न करता है और उसी ब्रह्म में जीवभाव लाकर स्वयं ही उसे सगुण
स्वरूप में ले आता है। मन के संकल्प का सामर्थ्य इतना अधिक है कि वह शुद्ध ब्रह्म को अविद्यात्मक कर देता

६२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत

है और त्रिगुणों की माला से स्वयं ही संसाररूपी जाल तैयार करता है। जिस प्रकार घट का पानी अलिप्त
चन्द्रबिम्ब का अपने में आकलन कराता है, उसी प्रकार केवल मन के संकल्प ने ज्ञानस्वरूप आत्मा को
अविद्यात्मक बनाया है। घट का पानी हिलने पर चन्द्रबिम्ब को भी कंपित करता है, उसी प्रकार मन के कारण
शुद्ध ब्रह्म को जन्म-मरण और सुख-दुःख उत्पन्न हुए हैं। आत्मा स्वयंप्रकाश और ज्ञानस्वरूप है। मन जड़ है तथा
कल्पनारूप है। लेकिन उसी को अपना स्वरूप मानकर यह जीवात्मा उसका पाप-पुण्य भोगता है। जीव का
सच्चा आत्मीय, सुहृद और मित्र केवल परमात्मा है। वही मन का और जीव का नियामक तथा साक्षी के रूप में
प्रेक्षक है। जो जीव अविद्या के रोग से स्पष्ट रूप से प्रतिबिम्बित होता है वही मेरा मित्र है। वही मन के भ्रम से
भ्रमण कर मन से उत्पन्न होने वाले सुख-दुःख भोग रहा है। मन की एकात्मता विलक्षण है। इससे जीव भ्रम में
पड़ जाता है और स्वयं निष्कर्म होते हुए भी कर्माकर्म भोगता है। वास्तव में देखा जाय तो जीव मन का नियंता है
लेकिन वह मन से एकरूप होकर मन के व्यर्थ के सुख-दुःखों को सहन करता है। जिस प्रकार पड़ोस का
रिश्तेदार यदि राजा का प्रधान हो तो वह राजा को ही अपनी मुट्ठी में रखता है और राजा गरीब हो जाता है और
प्रधान की इच्छा से सुख-दुःख भोगता रहता है। वही स्थिति जीव की है। मन ने उसे सांसारिक बना दिया है
इसलिये वह अनेक जन्म-मरण तथा दिन-रात अनेक सुख-दुःख भोगता रहता है। उस मन का यदि निग्रह न
किया जाय तो जीव का दुःख भी नहीं टलेगा। मन की इच्छा से ही चलने पर सारे साधन व्यर्थ हो जाते हैं।
दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि।
सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ताः परो हि योगो मनसः समाधिः ॥ ४६ ॥
मनोनिग्रह पर ध्यान न देकर यदि सर्वस्व का भी दान कर दिया जाय तो 'मैं ही एक दाता हूँ' यह अहंभाव
उत्पन्न होता है और मन गर्व से उन्मत्त हो जाता है अथवा मनोनिग्रह को भूलकर वर्णाश्रम धर्म का आचरण किया
जाय तो उससे मनोधर्म आनन्द से प्रबल हो उठता है और 'मेरा स्वकर्म ही अत्यन्त श्रेष्ठ है' ऐसा लगने लगता
है। त्रिभुवन में एक मैं ही आचारसम्पन्न, मैं ही अपना स्वयं पाकी हूँ, इस प्रकार स्वधर्म का आचरण करने से मन
और भी क्षुब्ध हो उठता है। मन पर नियंत्रण करने की बुद्धि न हो तो यम-नियम भी एक विकार ही है क्योंकि
उसके कारण 'सच्चा साधक मैं ही हूँ' यही मनोधर्म बताता रहता है। वेदशास्त्र श्रवण करने से घमण्ड बढ़ जाता
है, पांडित्य के प्रति अभिमान बढ़ने लगता है। फिर मन पर नियंत्रण कैसे होगा? अपना ही कर्म करने जाओ तो
कर्मक्रिया अत्यन्त कठिन है। उस कर्मठता का ही भ्रम जब बढ़ता जाता है तो मन का नियमन कैसे होगा? कर्म
केवल देह में है। आत्मा देह में होने पर भी विदेह स्थिति में है। कर्म से उसे कर्मबद्धता प्राप्त होती है, ऐसा
कर्मठ लोग मूर्खतावश मानते हैं। असंख्य व्रत कर व्रतस्थ होते हुए वे उसके बदले धनधान्य की अपेक्षा करते हैं
क्योंकि उनके मन में मनोनिग्रह नहीं होता। अच्छे-अच्छे व्रत भी इस प्रकार व्यर्थ हो जाते हैं। व्रत, दान, स्वधर्म
आदि जो सब है उनके लिये मनोनिग्रह ही सबसे बड़ा फल है। उसके बिना सारे साधक दुर्बल और साधकों के
लिये निष्फल हैं। दान आदि सात साधन ज्ञान के ही अन्तर्गत हैं, वे सभी साधन निष्फल हैं यह कैसे कह सकते
हैं? इसका उत्तर यह है कि यहाँ दानादिक जो साधन हैं, उन्हें इस लोक में और परलोक में फल आता है,
लेकिन वह फल ही यहाँ निष्फल होता है और जन्म-मरण को बढ़ाता है। इसमें यदि साधक ज्ञानसम्पन्न हो तो
वह फल की आशा पूरी तरह त्याग कर दान आदि स्वधर्म का आचरण करेगा और वह केवल उसकी चित्तशुद्धि
के लिये उपयोगी होगा। लेकिन चित्तशुद्धि होने के लिये पहले भगवान की कृपा होनी चाहिये। सभी साधनों में

मेरी भक्ति प्रमुख है। उसमें भी नाम की विशेष कीर्ति है। नाम से चित्त की शुद्धि होती है और साधकों को
स्वस्वरूप स्थिति प्राप्त होती है। नाम से श्रेष्ठ कोई साधन नहीं है। उद्धव! नाम से सचमुच ही संसार बन्धन
टूटता है, इसे ध्यान में रखो। स्वस्वरूप में रहकर मन जब निश्चल हो जाता है, उस समय जहाँ साधन लज्जित
हो जाता है, वहाँ दान आदि का साधन अपने आप ही व्यर्थ हो जाता है।
समाहितं यस्य मनः प्रशान्तं दानदिभिः किं वद तस्य कृत्यम्।
असंयतं यस्य मनो विनश्यद् दानादिभिश्चेदपरं किमेभिः॥ ४७॥
जिस पुरुष का मन अपने मूल स्वरूप में प्रविष्ट होता है, उसे दानादि साधनों की क्या आवश्यकता है?
पूरी तरह तृप्त व्यक्ति के सामने यदि पंच पकवान परोसा गया हो तो जिस प्रकार वह उसकी ओर देखना भी नहीं
चाहता उसी प्रकार जिसका मनोविकार नष्ट हो गया है उसके लिये साधन व्यर्थ है। बाढ़ में गंगा नदी पार करने
के लिये कोई मनुष्य बड़े कष्ट से नौका तैयार करता है लेकिन बाढ़ जब पूरी तरह उतर जाती है तो वह नौका
हटा देता है। उसी प्रकार काम, क्रोध आदि उर्मियों से जिसका मन निर्विकल्प में स्थिर हो गया है, उसे सचमुच
दानादिक साधनों की आवश्यकता नहीं है। जिस प्रकार सूर्योदय होने पर लाखों मशालें भी उपयोगी नहीं होतीं,
उसी प्रकार मन में निर्विकल्पता उत्पन्न होने पर कोटि-कोटि साधन निष्फल हो जाते हैं। इस प्रकार जिसका मन
शान्त हो गया है, उसके लिये दानादि नाना प्रकार के साधन करने की आवश्यकता नहीं है। उसके विचारों का
पूर्ण रूप से विलय हुआ रहता है। जिसका मन किसी भी प्रकार के नियमों का पालन नहीं करता, जिसका मन
सदा विचारशून्य रहता है, जो विषयों के प्रति सदा आसक्त रहता है उसके लिये भी साधन व्यर्थ हैं। जिस प्रकार
उन्मत्त हाथियों के झुण्ड के कारण सेना अनेक दिशाओं से भागने लगती है, उसी प्रकार विषयासक्त पुरुष के पास
साधन व्यर्थ हो जाते हैं। जो मन से विषयासक्त है, वह साधनों का जरा भी आचरण नहीं करता क्योंकि यदि वह
साधन करे भी तो उसके मन में विषयों की ही कल्पनाएँ रहती हैं। स्वयं साधना करते समय वासना जिस फल
की इच्छा करती है वही फल उसे प्राप्त होता है और वह दानादि का नाश करती है। जिस प्रकार किसी बलशाली
घोड़े पर कोई निर्बल पुरुष सवारी करे तो वह घोड़ा बेकाबू हो जाता है और क्षणभर के लिये भी शान्त नहीं
रहता, उसी प्रकार जिसका मन अत्यन्त दुर्बल रहता है और पूरी तरह कामक्रोध से भरा रहता है, जो स्वयं ही मन
का दास बना रहता है, जिसका मन सदा महामोह में ही डूबता उतराता रहता है, वह साधन क्या करेगा? वह
कभी साधन करता भी है तो वह महामोह के कारण। इससे तमोगुण बढ़ता है, लेकिन मन पर नियंत्रण नहीं
होता। मान लो, यदि श्रवणादि इन्द्रियों का नियमन कर साधन किया जाय तो उसके मन का आकलन नहीं होता,
क्योंकि इन्द्रियाँ मन के अधीन होती हैं।
मनोवशेऽन्ये ह्यभवन् स्म देवा मनश्च नान्यस्य वशं समेति।
भीष्मो हि देवः सहसः सहीयान् युञ्ज्याद् वशे तं स हि देवदेवः॥ ४८॥
मन ने सबको अपने वश में किया है किन्तु मन किसी के वश में नहीं रहता। मन ने देवताओं का भी छल
किया है, फिर इन्द्रियों के वह किस प्रकार वश में रहेगा? मन पर नियंत्रण करने वाला चन्द्र है। लेकिन मन ने
उस चन्द्रमा को भी छला। मन ने ही चन्द्रमा को गुरु पत्नी से व्यभिचार करा कर उसे क्षयरोगी बनाया। ब्रह्मदेव
बुद्धि का नियंता है। लेकिन मन ने उस ब्रह्मदेव की बुद्धि भी भ्रष्ट की इसलिये उसकी कन्या उसका निवारण कर
रही थी, फिर भी ब्रह्मदेव ने अपनी उस लड़की की ही अभिलाषा की। अंतःकरण में वासुदेव का अधिष्ठान है

६३० श्रीमद् एकनाथी भागवत

लेकिन उस वासुदेव को भी मन ने फँसाया। उसे वृन्दा का ध्यान लगाकर, मानों उसे श्मशान में गिरा दिया। रुद्र
(महादेव) अहंकार का नियंता है लेकिन मन ने उसे भी फँसाया। उसने ऋषि पत्नी की अभिलाषा की तो महर्षि
ने उसे शाप देकर उसका लिंगघात कराया। इस प्रकार देवतागण भी जिस मन को नहीं जीत सके उसे और कोई
कैसे नियंत्रित कर सकता है ? आप कहेंगे कि इन्द्रियाँ मन पर नियंत्रण करेंगी। लेकिन वे इन्द्रियाँ भी मन के
अधीन होती हैं। जब इन्द्रियों को स्वतंत्र रख कर मन ही किसी विषय में एकाग्र रहता है, तब इन्द्रियों का सामर्थ्य
सचमुच निष्फल हो जाता है। इन्द्रियाँ और विषय यदि एक हो जाएँ और उस समय मन की वृत्ति बदल जाय तो
उन विषयों का भोग नहीं हो पाता क्योंकि इन्द्रियों में उपभोग की स्फूर्ति ही नहीं रह पाती। मन के धर्म आसक्ति
रहित हो जाते हैं तो इन्द्रियों की इच्छा कुछ नहीं कर पाती। इन्द्रियों का पूरा समुदाय मन के अधीन होता है।
इसलिये इन्द्रियों के द्वारा मन पर नियंत्रण कभी नहीं हो पाता। मन इन्द्रियों का राजा है। इन्द्रियाँ मन के बिना
नहीं चल पातीं। पुरुष को भी मन ही अपने वश में करता है। मन प्रबल में प्रबलतम है। मन का दमन करने में
बड़ों-बड़ों को भी साहस नहीं होता। काल अपने सामर्थ्य से सबका भक्षण करता है लेकिन मन का रोम भी वह
नहीं उखाड़ पाता। उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने में भी काल मन को काबू में नहीं रख पाता। मन शस्त्र से
नहीं टूट सकता, पानी भी उसे नहीं घोल सकता; अग्नि भी उसे नहीं जला सकता है अथवा आकाश भी मन को
शून्य नहीं कर सकता है। मन को कोई रोग नहीं लगता, कोई रोग उसे दुर्बल नहीं कर सकता, मन को काबू में
रख सके ऐसी कोई भी सिद्धि नहीं दिखायी देती। मन करोड़ों ब्रह्मदेव उत्पन्न करता है, मन ब्रह्माण्ड उत्पन्न करता
है और उन्हें नष्ट कर देता है; मन अपनी कल्पना की उड़ान से सारे त्रैलोक्य को जबर्दस्ती नचाता है। मन
कलिकाल को भी छलता है। मन प्रलयानल को भी निगल लेता है। मन बलाढ्यों में महाबली है। मन को काबू
में रख सके ऐसा कोई नहीं है। मन देवताओं को भी असह्य है। मन भयंकरों में भी भयंकर है। मन ने हरिहर को
भी नियंत्रण में रखा है। ऐसे इस मन के सामने कौन टिक पायेगा ? मन के प्रहार को निवारण करना कठिन है।
मन को जो जीत सके ऐसा पराक्रमी देवता, मानव, राक्षस कोई भी नहीं दिखायी देता। मन के साथ दो हाथ कर
सके ऐसा बलवान पूरे त्रिभुवन में नहीं है। मन कलिकाल को भी अपने काबू में रखता है। प्रलयरुद्र दाँत लगाये
बिना निगल लेता है। मन की महिमा ऐसी अगाध है इसलिये उसे 'देव' कहते हैं। जो भयंकर हैं उन्हें भी मन
का भय लगता है, इसलिये उसे 'भीष्मदेव' कहते हैं। मन की स्थिति अत्यन्त बेकाबू है। उसे नियंत्रित करने की
युक्ति और उसका मर्म तुम्हें सचमुच बताऊँगा, ध्यानपूर्वक श्रवण करें। जिस प्रकार हीरा से ही हीरा काटते हैं,
उसी प्रकार मन से ही मन को नियंत्रित करना चाहिये। लेकिन जब स्वयं गुरु की ही कृपा होती है, तभी यह भी
प्राप्त होता है। मन गुरु कृपा की क्रीतदासी है। मन सद्गुरु से सदा भयभीत रहता है। उसे गुरु के चरणों पर रखने
से ही साधकों को संतोष होता है। यह मन का उत्तम गुण है कि यदि वह परमार्थ की ओर लग जाय तो चारों
मुक्तियों को अपने पास दासी बनाकर रखता है और परब्रह्म हाथ में दे देता है। मन ही मन का प्रकाशक है, मन
ही मन का साधक है, मन ही मन का बाधक है और मन ही मन के लिये घातक है। जिस प्रकार बाँस अपना
जंगल बढ़ाता है और एक बाँस दूसरे से रगड़ने पर जो चिनगारी निकलती है उससे स्वयं ही अपने को जला
डालता है। उसी प्रकार मन ही जब मन की मृत्यु की चिन्ता करता है तभी वह सद्गुरु की शरण में ले आता है
और उसका वचन मानकर, अभिमान रहित होकर गुरुभजन कराता है। सद्गुरु की पूर्ण कृपा होने पर मन ही मन
को संकेत देता है अपने सुख से सुखी होकर मन ही मन पर प्रसन्न होता है। जब मन ही मन पर प्रसन्न हो जाता
है तो वृत्ति अभिमानरहित हो जाती है। मानों, मन स्वयं ही साधकों को निजसमाधान साध्य करा रहा हो। गुरुकृपा

तेईसवाँ अध्याय ६३१
का प्रसाद मिलने पर मन स्वयं ही मनोजय की पताका फहराता है और साक्षात साधक के हाथ में देता है। इस
प्रकार साधक का मन स्वयं ही अपनी जय करा कर देता है और अन्त में सद्गुरु के आत्मज्ञान में मन स्वयं
आत्मस्वरूप से पूर्णरूप से लीन हो जाता है। जिस प्रकार नमक का ठोंका समुद्र के जल में घुलमिलकर स्वयं
समुद्र जैसा हो जाता है उसी प्रकार साधक भी अभिमानरहित होते ही 'मैं' 'तू' का अहंभाव नष्ट कर स्वयं
पूर्णब्रह्म हो जाते हैं, यह ध्यान में रखो। फिर उसकी आत्मदृष्टि को सारी सृष्टि एक मैं ही दिखायी देने लगती है,
द्वंद्व की त्रिपुटी नष्ट हो जाती है और सुख-दुःख का पीछा करना छूट जाता है। फिर कैसा सुख और कैसा दुख !
कैसा बन्धन और कैसा मोक्ष ? पण्डित कौन और मूर्ख कौन ? चारों ओर केवल एक ब्रह्म ही दिखायी देता है।
वहाँ कौन देवता है और कौन भक्त है ? कौन शान्त है और कौन अशान्त है ? द्वैत-अद्वैत विलीन हो जाता है और
केवल एक परब्रह्म ही सदा आनन्दरूप से रहता है। वहाँ क्रिया और कर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म और अधर्म लज्जा
से ही नष्ट हो जाते हैं, वहाँ कनिष्ट उत्तम और मध्यम भी कैसे ? परिपूर्ण ब्रह्म ही सर्वत्र भर जाता है। फिर शास्त्र
और वेद, बुद्धि और बोध का भेद समाप्त हो जाता है और केवल आनन्दस्वरूप परब्रह्म ही सर्वत्र भर जाता है।
इस प्रकार मनोविजय से इस स्थिति को भाव पहुँचता है। स्वयं भगवान ने यह बताया इसलिये इसमें कोई सन्देह
नहीं है। मनोजय की स्थिति ब्रह्मदेव आदि देवताओं को भी अगम्य है। ऐसी स्थिति में जो इसे स्वयं अपने आप
प्राप्त कर लेता है, वह आत्मज्ञान से देवाधिदेव हो गया ऐसा समझना चाहिये। इस प्रकार जो अपने मन को जीत
कर इस लोक में ही जनता से एकरूप हो गया वह त्रिभुवन में धन्य है। उसके कारण पृथ्वी पावन होती है। उसी
ने पूर्वजों को तारा, सारे कुल का उद्धार किया। जिसने मन को जीत लिया, समझो कि उसने परब्रह्म को अपना
बना लिया। मनोजय से जो अत्यन्त समर्थ हो जाते हैं, वहीं शान्ति सर्वस्व बिकती है। उन्हें आत्मबोध के कारण
सुख-दुःख के भँवर बिना मिले निकल जाते हैं। स्वयं भिक्षु द्वारा किया गया यह भाषण भगवान श्रीकृष्ण ने
अत्यन्त उल्हास से उद्धव को सुनाया और कहा, मनोजय त्रिभुवन में धन्य है। जिसने मन को जीत लिया उसने
मुझे अपना दास बना लिया, मुझे खरीद लिया। मुझ आनन्दस्वरूप को उससे आनन्द प्राप्त होता है, मुझ नित्य
तृप्त को उससे तृप्ति मिलती है। मुझ अनंत का उसी के पास निवास रहता है, उसके ही कारण मैं त्रिभुवन में
बलवान हुआ। 'मैं' और 'वह' कहने का जो कौशल है वह भी हमसे परे है। यदि आप अपने अंतःकरण से
विचार करें तो आत्मैक्य के साथ सचमुच मैं ही हूँ। मनोजय से इतना अधिकार प्राप्त होता है। जो मनोजय न कर
इस लोक के साधारण शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेने के कारण अहंकार से फूल जाते हैं उनकी भर्त्सना स्वयं
भिक्षु कर रहे हैं।
तं दुर्जयं शत्रुमसह्यवेगमरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित्।
कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यैर्मित्रान्युदासीनरिपून् विमूढाः ॥ ४९ ॥
बड़े-बड़े शक्तिशाली राजा शत्रु के रूप में आते हैं, उस समय साम, दाम आदि उपायों से उनका दमन
होता है या उन्हें पराक्रम से जीता जा सकता है। लेकिन ये उपाय मन के सन्दर्भ में काम नहीं आते। किसी की
मध्यस्थता की जाय तो मन किसी की सुनता ही नहीं। मन को विषयों का दान दिया जाय तो उससे भी मन तृप्त
नहीं होता। इसके विपरीत वह और भी भयप्रद हो जाता है। उसे कौन सँभाल पायेगा ? शमदम आदि उपाय उस
पर चलते नहीं हैं, अतः ऐसे मन को मार ही डालने की सोचें तो उस पर कोई शस्त्र काम नहीं करता और मारने
का विचार मन में नहीं आता। इस प्रकार यह मनरूपी शत्रु अजेय होने के कारण अत्यन्त कठिन हो गया है। वही

६३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत

सुख-दुःख की सामग्री से क्षण-प्रतिक्षण जन्म-मरण से मारता है। अन्य शत्रु यदि काबू से बाहर हो जाएँ तो कोई
तत्काल भाग सकता है। पहाड़ पर के किले पर अपनी सुरक्षा की जा सकती है लेकिन मन से आगे भागने पर
त्रिभुवन भी कम पड़ जाता है। जिस गुप्त स्थान पर छिपने का प्रयास करो वो मन वहाँ भी उपस्थित रहता है।
काम-क्रोध आदि महान वीर मन के पराक्रमी सेनापति हैं और उनकी मार असह्य है। वे एक ही झटके में बड़े-
बड़ों को धराशायी कर देते हैं। बाहर के शत्रु दूर देशों में रहते हैं। उन्हें हमारे पास आने में काफी समय लगता
है। किन्तु मनोरूपी शत्रु हमारे पास ही सदा चिपका रहता है। आसन पर भोजन के समय, एकान्त में, जप करते
समय अथवा ध्यान करते समय मन एकाएक कूद पड़ता है और शत्रु बनकर पूर्ण रूप से पराजित करता है। बाहर
के शत्रु का दुःख बहुत कम होता है, लेकिन मन की पीड़ा विशाल रहती है। मन जन्म-मरण के आवर्त भोगने
को बाध्य करता है। बाह्य शत्रु मरणाधीन होते हैं किन्तु मन मृत्यु में भी विघ्न लाता है। इस मनरूपी शत्रु पर यदि
विजय न प्राप्त की जाय तो जीव का बड़ा दुःख नहीं टल पायेगा। मन की तीव्र गति को देवता या मनुष्य भी
सहन नहीं कर सकते। कोई कितना भी परिश्रम क्यों न करे लेकिन वह मन को नहीं जीत सकता। इसीलिये मन
अजेय हो गया है। ऐसे इस मन को न जीत कर जो अन्य बाह्य शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर गर्व से फूल जाते हैं,
उन्हें महामूर्ख ही समझो। मन से मन को जीतें यह पिछले श्लोक में यथार्थ रीति से बताया ही गया है। वही
मनोजय का उपाय है। सारांश यदि इस प्रकार मन को शत्रु बना कर मन को जीतना सम्भव नहीं है तो मन से
मैत्री कर मित्रभाव से ही मन को सुखी करना चाहिये। सामान्यतः मित्रों की मैत्री ऐसी होती है कि यदि एक-
दूसरे पर उपकार करता है तो दूसरा भी उसका उपकार करता है, लेकिन वह सारी मैत्री विषयसुख की होती है
और उचित प्रसंगों पर वे एक-दूसरे के घर जाते भी हैं। मन की मैत्री वैसी नहीं होती। वह किसी के उपकार
किये बिना ही उस पर उपकार करता है और सारे दुःखों का निवारण कर सुखसागर में विचरण कराता है।
सामान्यतः जिससे हमारी मित्रता रहती है उससे अपना दुःख कहने पर वे उसे पूरी तरह दूर नहीं कर पाता। वह
कहता है, "मेरे लिये यह असाध्य है।" मन की मैत्री ऐसी नहीं होती। मन को स्थिर कर यदि उससे अपना
दुःख कहा जाय तो वह जन्म-मरण की बड़ी पीड़ा भी दूर करता है। मृत्यु का भय मन में होते हुए भी उसे
कनक और कांता से आसक्ति रहती है। स्त्रियाँ भर्त्सना करती हैं लेकिन निर्लज्ज को लज्जा नहीं होती। परस्त्री,
परधन, परद्रोह और परनिन्दा की लत लग जाने पर वे व्यसन उसे क्षणभर के लिये भी खाली नहीं बैठने देते और
भयंकर नरकवास का भोग करने को बाध्य करते हैं। क्षुधा के सामने तो जरा सा भी विलम्ब सम्भव नहीं है। द्वंद्व
के दुःख तो एक के बाद एक आने शुरू हो जाते हैं। इन्द्रियों की वृत्ति तो संभाले नहीं संभलती। ऐसा मन से
कहने पर मन स्वयं वैराग्य से बिफर उठता है और विवेक के सहारे दुःख का नाश करने के लिये तत्पर हो उठता
है। यदि चोर को ही भंडारी बना दिया जाय तो वह स्वयं ही चोरों का निवारण करता है। उसी प्रकार, मन से
मैत्री करने पर वह स्वयं ही दुर्गुणों का नाश कर देता है। हम अधर्म कृत्यों की ओर प्रवृत्त होने लगते हैं तो मन
ही उसका निवारण करता है। मन स्वयं ही वाणी को असत्य न बोलने की शपथ दिलाता है। मन की मैत्री इतनी
श्रेष्ठ है। कर्माकर्म को समूल नष्ट करने के लिये तथा चित्तशुद्धि का मर्म जानने के लिये वह रात-दिन हरिनाम
का स्मरण करता है। 'श्रीराम जयराम' में से केवल 'राम' इन दो अक्षरों से ही महापातकों का नाश होता है। वह
मन उस नाम को छोड़ कर एकक्षण का भी विश्राम नहीं करता। अखण्ड हरि का ही स्मरण करता है। उस समय
वह असत्य का शिरच्छेद करता है, अधर्म की खाल उधेड़ता है, कल्पना के पैर तोड़ता है और आशा की उमंग
समाप्त करता है। विकल्प का घर ही उजाड़ देता है प्रपंच के दाँत तोड़ देता है, अविश्वास के टुकड़े-टुकड़े कर

तेईसवाँ अध्याय ६३३
देता है और अन्त में मन विश्वास के टुकड़े-टुकड़े कर देता है और अन्त में वह मन विश्वास की पताका
फहराता है। ऐसे परिपक्व विश्वास से सद्गुरु के चरणों पर शरीर, मन और धन आदि सर्वस्व अर्पण कर
गुरुवचन पर विश्वास करता है। पूर्ण विश्वास का यही लक्षण है कि गुरु का उपदेश श्रवण करते ही, जिस प्रकार
पारस के स्पर्श से लोहे का स्वरूप बदल कर वह सोना बन जाता है, उसी प्रकार उसका अंतःकरण भी बदलता
है। गुरु का उपदेश सुनाने के बाद समाप्त हो जाता है लेकिन मन का मनन समाप्त नहीं होता। भृंगी की लगन से
रूप बदलने वाले कीट की तरह वह मन तद्रूप होता है। उस समय वह मन सौन्दर्यसम्पन्न स्त्री अथवा द्रव्य को
विष्ठा के समान समझता है। निन्दा, द्वेष, मान, अभिमान आदि मन के दुर्गुणों को मन ही समाप्त कर देता है। मन
की मित्रता धन्य है। पूरे विश्वास के साथ वह जन्म-मरण का संहार करता है और जीव को युवा और अमर कर
डालता है। इस प्रकार मन से मैत्री करने से मन बहुत उपकार करता है और जीव का हाथ पकड़ कर उसे
आत्मानंद सागर में गोता लगवाता है। उस समय मन का मनपन नष्ट हो जाता है, जीव का जीवपन पिघल जाता
है, बन्ध-मोक्ष की दौड़ समाप्त हो जाती है और संसार का भय पूर्णरूप से समाप्त हो जाता है। ऐसी मन की
स्थिति है। वह मन अपने वंश को स्वयं मार डालता है और मित्र पर उपकार करने के लिये स्वयं भी मर जाता
है। मन मित्रता में धोखेबाजी नहीं करता। इस प्रकार सदा आदरपूर्वक वश में होने वाले मन के रहते क्षुद्र लोग
साधारण मनुष्य से मैत्री करते हैं। मन से शत्रुता करके उसे या तो मार ही दे या फिर उससे मित्रता कर उसे
अपनी ओर मोड़े और यह दोनों ही यदि सम्भव न हो तो मन को बिलकुल छोड़ देना चाहिये। मन के कहने पर
न चलें, मन को साथ न रखें और जीवभाव से मन को बिलकुल स्पर्श न करें। मन जिसे सुख कहे उसे अवश्य
छोड़ देना चाहिये और जिसे वह दुःख कहे उसे भी पूरी तरह छोड़ देना चाहिये। इस प्रकार जो पुरुष अपने मन
के प्रति उदासीन रहेगा वह मनरहित हो गया ऐसा समझना चाहिये। वहाँ अलौकिक शान्ति प्राप्त होती है। शत्रुत्त्व
से मित्रता से अथवा उदासीन होकर जो मन को वश में नहीं करेगा और देहाभिमान लेकर बैठा रहेगा उसका
संसारचक्र का भ्रमण नहीं टलेगा।
देहं मनोमात्रमिमं गृहीत्वा ममाहमित्यन्धधियो मनुष्या।
एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति॥५०॥
आत्मा विदेही है और ज्ञानस्वरूप है। ऐसा होते हुए भी मन अपने को देहधारी मानता है। उस देह के साथ
ही 'मैं' और 'मेरा' यह भाव उत्पन्न होकर जन्म-मरण और सुख-दुःख भोगने पड़ते हैं। आत्मा नित्यमुक्त और
विदेही है। मन से एकरूप हो जाने के कारण वह मूलतः विदेही होते हुए भी स्वयं को देही कहता है और अन्त
में देह के प्रति ही आत्मीय हो जाता है। मन कहता है कि 'मैं देह हूँ', इससे देहाभिमान प्रबल हो उठता है और
वह आत्मा स्वयं ही देहरूप होकर उस देह के प्रति अपनत्व दिखाने लगता है। मैं सच्चिदानंद और परिपूर्ण हूँ यह
अपना लक्षण आत्मा स्वयं भूल जाता है और मैं वैश्य, शूद्र, क्षत्रिय, ब्राह्मण हूँ अथवा मैं ही एक मूर्ख अथवा
ज्ञाता हूँ, ऐसा मानने लगता है। मैं दुबला, पतला, काना, कुब्जा हूँ, मैं अत्यन्त धीर और चतुर हूँ; आदि देह के
मिथ्या गुण स्वयं से जोड़ कर वह स्वयं मानव देहधारी बन जाता है। कोई संन्यासी जिस प्रकार स्वप्न में अपने
को अंत्यज वंश में जन्मा देखता है और ब्राह्मण को स्पर्श करने में डरता है, उसी प्रकार जीव की दशा हो जाती
है। परमात्मा स्वयं भेदरहित होते हुए भी वह मैं, मेरी स्त्री, मेरा पुत्र, मेरा द्रव्य आदि मानता है और अपने
इष्टमित्र, दुर्जन, उदासीन आदि जो त्रिविध भेद हैं उन्हें सच समझने लगता है। इस प्रकार देहात्मभाव सिद्ध होने

६३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पर और भेदभाव सच हैं वह विश्वास होने पर जीव की अपनी आत्मबुद्धि अन्धी हो गयी ऐसा समझना चाहिये।
जिस प्रकार स्वप्न की बातें मिथ्या होती हैं, उसी प्रकार मन का कल्पित संसार भी मिथ्या है। उसे सत्य मानने से
देह का अन्धकार बढ़ता है। देहाभिमान प्रबल हो जाने पर पुनः जन्म और पुनः मरण इस प्रकार संसार चक्र का
परिभ्रमण जीव को उसके ही भ्रम के कारण भोगना पड़ता है। जिस प्रकार केवल अग्नि को हथौड़े के घाव कभी
नहीं लगते लेकिन लोहे की संगति से वह अपने शरीर पर हथौड़े का प्रहार सह लेता है, उसी प्रकार नित्यमुक्त
और परिपूर्ण आत्मा जब देहाभिमान धारण करता है, तब उसमें जीवत्व आ जाता है और वह जन्म-मरण का
दुःख भोगने लगता है। जिस प्रकार घानी का बैल आँखों में पट्टी बँधी होने के कारण अन्धेपन से गोल-गोल
घूमता रहता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अहंकार के कारण अन्धा होकर विराट संसार चक्र में घूमता रहता है। वहाँ
जन्म-मरण का भोग भोगते हुए वह अत्यन्त दुःखी होता है किन्तु देहाभिमान नहीं छोड़ता। अन्त में वह अभिमान
उसे अंधतम नरक में ढकेल देता है। ऐसा नरक जिसका दुःख अपार है और दुस्तर होने के कारण उसे पार भी
नहीं किया जा सकता। जो अघोर भोग भोगने को बाध्य करता है वह संसार मन की कल्पना ही है। मन ही
सुख-दुःख का कारण है यह बात आठवें श्लोक में भिक्षु ने स्वयं ही बतायी है। अब दुःखों का कारण लोग हैं,
ऐसा जो कहा जाता है वह मिथ्या है यह भी वह बताता है।
जनस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनश्चात्र ह भौमयोस्तत्।
जिह्वा क्वचित् संदशति स्वदद्भिस्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत्॥५१॥
जिसे जननी के उदर में जन्म लेना पड़ता है उसे 'जन' कहते हैं। वे जन मेरे सुख-दुःख के लिये बिलकुल
कारण नहीं होते। लोग लोगों को ही दुःख पीड़ा देते हैं, उसका आत्मा से क्या सम्बन्ध है? आत्मा देह से स्वतंत्र
एवं शुद्ध है। उसे सुख-दुःख की बाधा नहीं होती। देह से देह को दुःख होता है ऐसा कहें, तो देह तो
पंचभूतात्मक है। अतः उनमें परस्पर एकता है। अर्थात् उन्हें भी सुख-दुःख नहीं होगा। जल में जल उड़ेलने से
जिस प्रकार जल को कोई कष्ट नहीं होता अथवा दीपक की ज्योति से ज्योति मिलाने पर दीपक को कोई कष्ट
नहीं होता, उसी प्रकार देह को (पार्थिव = पृथ्वी से उत्पन्न हुआ) देह से स्पर्श करने पर बिलकुल पीड़ा नहीं
होती और आत्मा देह को स्पर्श भी नहीं करता इसलिये वह सुख-दुःख को भी स्पर्श नहीं करता। अब आप यह
कहेंगे कि जो जीव देहाभिमानी है, उसी को सुख-दुःख होते हैं क्योंकि दुख का भोक्ता कोई और तो खोजने से
भी नहीं मिलता। हमारी जीभ यदि दाँत के नीचे आ गयी तो उसका गुस्सा किस पर निकाला जाय? क्या वह
क्रोध के आवेग में दाँत तोड़ता है या जीभ को काटकर फेंकता है? उसी प्रकार संसार में जब सर्वत्र एकता
दिखायी दे रही है तो क्रोध करने का कोई कारण नहीं है। दूसरे का धक्का लगने से जो गिरता है वह धक्का देने
वाले पर गुस्से में हाथ उठाता है, लेकिन जो स्वयं ही गिर कर जमीन पर लोटने लगता है, वह शरमा कर, किसी
पर गुस्सा किये बिना चला जाता है। उसी प्रकार प्राणीमात्र मैं ही हूँ और भोग भोगनेवाला भी मैं ही हूँ; मेरा दुःख
देने वाला भी मैं ही हूँ; संसार में ऐक्यरूप में मैं ही भरा हुआ हूँ। ऐसी स्थिति में क्रोध किस पर करें? इस प्रकार
मेरे सुख-दुःख के लिये अन्य लोग कारण नहीं हैं। अब यदि उसके लिये देवताओं को कारण समझा जाय तो
वैसा भी नहीं लगता।
दुःखस्य हेतुर्यदि देवतास्तु किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत्।
यदङ्गमङ्गेन निहन्यते क्वचित् क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे॥५२॥

तेईसवाँ अध्याय ६३५
अब जो लोग दूसरा ही कारण मानते हैं, वे कहते हैं कि देवताओं के कारण ही दुःख प्राप्ति होती है। किन्तु
देवताओं का वास देह में ही होता है और आत्मा आत्मस्वरूप में रहकर विदेही ही रहता है। देह के इन्द्रियों के
विकारों का नियंता देवता ही है। आत्मा अखण्ड अविकारी ही होता है। वह सुख-दुःख से अलिप्त रहता है।
भूमि स्वाभाविक रूप से निर्विकार ही है। किन्तु उस पर बनी हुई दीवारें सविकार होती हैं। उसके अनुसार ब्रह्म
नित्य और निर्विकार ही है। उसमें जो नियामक देवता हैं वे सविकार होने का आभास देते हैं। दीवार जब जमीन
पर गिर पड़ती है तो भूमि उसे अपने में एकरूप करती है, उसी प्रकार निर्गुण और निर्विकार ब्रह्म में इन्द्रियों के
नियामक देवता एक हो जाते हैं। हमारे देह में या दूसरों के देह में इन्द्रियों का नियंत्रण करने वाले देवता एक
समान हैं। इसलिये इन्द्रियों का सुख-दुःख देवता स्वयं भोगते हैं। हाथ से मुँह पर मारने पर वहाँ क्रमानुसार इन्द्र
और अग्नि यही नियामक देवता हैं, इसलिये एक तरह से इन्द्र ही अग्नि को मारता है। आत्मा अविकारी होने के
कारण वह दुःख से अलिप्त ही है अथवा यदि मुँह हाथ को काट खाता है तो इसका यह अर्थ हुआ कि अग्नि ने
इन्द्र को घायल कर दिया। आत्मा इन्द्रादि देवताओं से भिन्न होने के कारण उसे सुख-दुःख स्पर्श नहीं करते।
दूसरे के मुख से हमारे मुँह पर थूक गिरती है तो दोनों ही मुखों में अग्नि का ही वास होने के कारण कौन किस
पर क्रोध करेगा? आत्मस्वरूप में दूसरा कोई नहीं होता। चाहे थूक हो या पेशाब हो दोनों देह से ही उत्पन्न हैं
अर्थात् देह के ही बच्चे हैं। देह के ही होने के कारण वे देह पर ही लोटते हैं, तो कौन किस पर नाराज हो?
अपने मुख से दूसरे के मुख को चुम्बन दे तो अग्नि ने ही अग्नि का चुम्बन लिया। उस आनन्द से कौन फूलेगा?
क्योंकि आत्मस्वरूप में दूसरा कोई नहीं होता या अपनी देह से दूसरे की देह को आलिंगन दे तो उन दोनों के
स्पर्श के बीच केवल वायु ही रहता है। उस आनन्द से प्रफुल्लित कौन होगा? क्योंकि वहाँ कोई 'दूजा' नहीं
होता। इसका अर्थ यह हुआ कि देवताओं का समुदाय सुख-दुःख के लिये कारण नहीं है क्योंकि आत्मा में ही
सभी देवताओं का बिना किसी भेदभाव के विलय होता है। देवताओं द्वारा देह को प्रताड़ित करने से देहाभिमानी
को दुःख होगा ऐसा जो मानते हैं, वे मूर्ख हैं क्योंकि वैसा भी कभी घटता नहीं है। पुर अर्थात् देह, उस देह में जो
निवास करता है, वह सभी की देह में एक ही पुरुष है। ऐसा होने पर किसके लिये कौन दुःख मनायेगा? तैश में
आकर मारा गया अपना ही हाथ अपने ही शरीर पर नहीं लग जाय तो उस दुःख के जिम्मेदार हम ही होते हैं
तथा क्रोध करने का कारण हम ही होते हैं। जब सर्वत्र अपना ही एकपन हो तो कौन किसका दुःख मानेगा और
कौन किस पर गुस्सा करेगा? क्योंकि चारों ओर तो अपने आप ही अकेला है। उसी प्रकार मैं ही एक विश्वात्मा
हूँ, मैं ही देवता हूँ, मैं ही जनता हूँ, फिर कौन किसे दुःख देता है? और मैं क्रोध करूँ भी तो किस पर? इस
प्रकार मन में विचार करने पर, मन में विश्वास हो जाता है कि देवताओं से सुख या दुःख बिलकुल नहीं होता।
आत्मा को सुख-दुःख का कारण माना जाय तो यह बात मुझे स्वीकार नहीं है क्योंकि आत्मा में कार्य का कारण
और सुख-दुःख होते ही नहीं हैं।
आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः किमन्यतस्तत्र निजस्वभावः।
न ह्यात्मनोऽन्यत् यदि तन्मृषा स्यात् क्रुध्येत कस्मान्न सुखं न दुःखम्॥ ५३ ॥
आत्मा तो केवल अकेला है, उसे सुख कैसा और दुःख कैसा? जो आत्मा को सुख-दुःख देने वाला कहते
हैं, वे मूर्ख और अविचारी हैं। जिस प्रकार पतले घी को कोई आकार नहीं होता और रंग भी नहीं होता, लेकिन
गाढ़ा होने पर उसके कण-कण में आकार और श्वेत वर्ण दिखायी देता है, और उन कणों के परस्पर मिलने से

६३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उन्हें परस्पर कोई सुख या दुःख नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा एक ही होते हुए अनेक रूप धारण करता है। जल
में जल की लहरें एक-दूसरे पर गिरती रहती हैं, फिर भी उनमें सुख-दुःख उत्पन्न नहीं होता। उसी प्रकार चराचर
में परमात्मा का वास होता है। परमात्मा एक अकेला होते हुए अनेक रूप धारण करता है फिर भी उसमें
विविधता नहीं है। फिर सुख और दुःख किसका होगा ? आत्मा आनन्दस्वरूप होकर सर्वत्र एक ही है। उसमें
अनेकत्व का जो आभास होता है वह मायामय होकर काल्पनिक है। वह मिथ्या होने के कारण स्वप्न की तरह
है। मृगजल में जल ही दिखायी देता है लेकिन वह पूरी तरह शुष्क रहता है। उसी प्रकार यह जो संसार फैला
हुआ दिखायी देता है वह मिथ्या है तथा समूल माया के कारण है। जहाँ मायामय मिथ्या भेद विभेद रहता है वहाँ
एक अकेला परमात्मा ही रहता है। अर्थात् तब सुख-दुःख नष्ट हो जाते हैं और गुस्सा होने की कोई व्यथा ही
नहीं रह गयी है। जहाँ हमारे आत्मा के कारण ही सर्वत्र एकता है, वहाँ सुख-दुःख नहीं हैं यह ध्यान में रखो।
जहाँ आत्मा को अपना ही अनुभव होता है वहाँ द्वैत का अभाव होता है और जब सुख-दुःख ही मिथ्या हो जाते
हैं वहाँ क्रोध के लिये कोई स्थान नहीं रह जाता। इस आत्मस्वरूपता को न जान जो सुख-दुःख को वास्तविक
मानते हैं, वे भले ही वेद शास्त्र के ज्ञाता क्यों न हों, लेकिन क्रोध उन्हें समाप्त कर देता है। जब समस्त प्राणिमात्र
में आत्मभाव दिखायी देता है वहाँ कौन किसे दुःख देगा? और कौन किस पर नाराज होगा? क्योंकि सर्वत्र
केवल एक आत्मस्वरूप ही रहता है। इस प्रकार वास्तव में आत्मा सुख-दुःख का प्रदाता नहीं है क्योंकि कोई
कितना भी बड़ा मूर्ख क्यों न हो, लेकिन वह स्वयं को दुःख नहीं देता। अब इसमें से चौथे मत के अनुसार ग्रहों
को दुःख का कारण मानें तो वह भी सच नहीं है। सुनो। तुम्हें निश्चित रूप से बताता हूँ।
ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै।
ग्रहैर्ग्रहस्यैव वदन्ति पीडां क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥ ५४ ॥
देह जननी के उदर में जन्म लेता है, इसलिये उस देह को 'जन' कहते हैं। उस जन्म के समय जो 'लग्न'
रहता है, उस जन्म लग्न के लिये जन्मकाल से ही ग्रहों का परिभ्रमण शुरू हो जाता है। उसमें बारहवें, आठवें,
जन्मस्थ आदि विभिन्न स्थानों पर जो शुभाशुभ ग्रह उपस्थित रहते हैं, वही सुख-दुःख के प्रणेता हैं। किन्तु आत्मा
ग्रहों की गति से अलिप्त ही रहता है। आत्मा का जन्म ही नहीं होता फिर उसे ग्रह की व्यथा कैसे होगी? जहाँ
खेत में बीज डाला ही नहीं गया है वहाँ चूहे क्या खायेंगे? जब घर ही नहीं बना है, तो उसकी छत कैसे जलेगी?
उसी प्रकार जब आत्मा जन्म ही नहीं लेता तो उसे ग्रहों के शुभाशुभ फल कैसे लगेंगे? ग्रहों की ग्रहदशा देह के
पास होती है और आत्मा देहभाव से अलिप्त ही रहता है। जिस प्रकार काक कैलास पर नहीं चढ़ता उसी प्रकार
ग्रह भी आत्मा को स्पर्श नहीं करते। जिस प्रकार मक्खी अग्नि का स्वाद नहीं लेती अथवा चील चन्द्रमा पर झपट्टा
नहीं मारती, उसी प्रकार आत्मा को व्यथा देने का सामर्थ्य ग्रहों के पास नहीं होता। आत्मा सभी का एक ही है
अर्थात् ग्रहों का आत्मा भी वही है। ग्रह यदि अपने ही आत्मा को दुःख दें तो यही होगा कि ग्रहों ने स्वयं ही
अपने को पीड़ा पहुँचायी है। देह, जड़, मूढ़ और अज्ञानी है। उस देह को सुख-दुःख का कोई ज्ञान नहीं होता।
कोई स्वयं ही अपने को दुःख नहीं पहुँचाता। इसलिये आत्मा को ग्रहों की पीड़ा कल्पांत में भी नहीं हो सकती।
ग्रहों में वैरभावना है ही। ग्रह ग्रहों को पीड़ा देते हैं। उस सम्बन्ध में भी विवेचन ध्यान से सुनें। ज्योतिष शास्त्र के
अनुसार शनि का मंगल और सूर्य से बैर है। गुरु और शुक्र एक-दूसरे के शत्रु हैं। उसी प्रकार बुध और चन्द्रमा में
भी बड़ा बैर है। इन ग्रहों में कुछ की गति तीव्र रहती है तो कुछ मंद गति से चलते हैं। कुछ अत्यन्त तीव्र गति से

तेईसवाँ अध्याय ६३७
चलते हैं, तो कुछ वक्र गति से पीछे लौटते रहते हैं। कुछ दूसरे ग्रह मण्डल को भेदकर एक साथ आते हैं। परस्पर
वैरी ग्रह जब एक राशि में एकत्र हो जाते हैं एक ही नक्षत्रचरण में साथ रहने लगते हैं, तो उसमें राहु सूर्य को ग्रस
लेता है और सूर्य चन्द्र का लोप कराकर अमावस्या (काली रात) करा देता है। इस प्रकार ग्रह स्वयं ही परस्पर
पीड़ा देते रहते हैं। किन्तु मैं आत्मस्वरूपी हूँ तथा उनसे भिन्न हूँ अतः मुझे उनके सुख-दुःख से कोई सरोकार नहीं
है। अलंकार यदि तोड़ भी दिये जाएँ तो इससे सुवर्ण को कोई कष्ट नहीं होता। उसी प्रकार ग्रह यदि ग्रहों को
पीड़ा देने लगें तो उसमें आत्मा को सुख या दुःख क्यों होगा? समरभूमि में युद्ध होता है तो उससे भूमि घायल
नहीं होती। उसी प्रकार मैं आत्मस्वरूपी होने के कारण ग्रहपीड़ा से अलिप्त रहता हूँ। रजस्वला स्त्री धरती पर
चलती रहती है उससे धरती को अस्पृश्यता की बाधा नहीं होती। उसी प्रकार ग्रह अन्य ग्रहों को पीड़ा पहुँचाते हैं,
फिर भी मैं सुख-दुःख से अलिप्त हूँ। सारांश, ग्रहों के कारण जो भी सुख-दुःख देहों में उत्पन्न होता है, उससे
मुझ आत्मा को कोई बाधा नहीं होती। जिसे सुख या दुःख का कोई अनुभव ही नहीं होता, उसे कभी क्रोध नहीं
आता। इसीलिये ग्रहों के कारण कोई दुःख नहीं होता। अगर यह कहें कि सुख-दुःख देने वाला कर्म है तो इससे
लोग भ्रम में पड़ जाते हैं। लेकिन वास्तव में आत्मा केवल निष्कर्म है, उसे जड़ कर्म की बाधा कैसे होगी ?
कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तद्वि जडाजडत्वे ।
देहस्त्वचित् पुरुषोऽयं सुपर्णः क्रुध्येत कस्मै न हि कर्ममूलम् ॥ ५५ ॥
कर्म जड़ होने के कारण अत्यन्त बाधक है और आत्मा ज्ञानस्वरूप होने के कारण अत्यन्त शुद्ध है। उसे
कर्म का दोष बिलकुल नहीं लगता। सूर्य अगर अन्धकार में छिप कर बैठ सके, दावाग्नि को यदि घास में ही
टोका जा सके, अथवा किलनी अपने मुख से दीपक का स्पर्श कर सके, चक्रवाक पर यदि घास का नियंत्रण हो
सके, गड्ढे के कीचड़ से यदि चन्द्रमा पर लेप लगाया जा सके तो कर्म से उत्पन्न होने वाले सुख-दुःख का
बन्धन आत्मा भी स्वीकार कर लेगा। आत्मा कर्माकर्म का संहार करता है और सुख-दुःख की होली जलाता है।
वह कर्मफलों का उपभोग करता है, ऐसा मूर्ख लोग अवश्य मान सकते हैं। स्वप्न में प्राप्त संतति यदि जागृत
अवस्था में किसी से भेंट कर सके तभी कर्म से प्राप्त होने वाले सुख-दुःख आत्मा के लिये भी बाधक होंगे।
जिस प्रकार चींटी अग्नि पर नहीं चलती, उसी प्रकार आत्मा कर्म के फल में लिप्त नहीं होता। जिस प्रकार
आकाश में शस्त्र से छिद्र नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा भी कर्म के फल को स्पर्श नहीं करता। कर्म जो भी कुछ
है वह सब अविद्यात्मक है और आत्मा विद्या-अविद्या से परे है तथा अत्यन्त निर्मल है। उसे कर्म का सुख-दुःख
होता है, ऐसा मूर्ख लोग देह के मोह के कारण मानते हैं। कर्म नितांत जड़ है और आत्मा शुद्ध है। कर्म सीमित है
तथा आत्मा अनंत है। कर्म अपनी कर्मठता के चलते नित्य बन्धनमुक्त है और आत्मा चिदानंदस्वरूप है। कर्म
मिथ्या तथा मायिक है और आत्मा नित्य होकर अमायिक है। कर्म का ब्रह्म से परिचय नहीं है इसलिये जहाँ ब्रह्म
है वहाँ कर्म नहीं रहता। रस्सी को सर्प मान लेने से, जब उसमें सर्प का अंश ही नहीं है तो उसके डसने से विष
कैसे फैलेगा ? उसी प्रकार स्वस्वरूप में कर्म मिथ्या ही है। वह आत्मा के लिये बाधक कैसे हो सकता है ? बाँझ
रानी का लाडला पोता जिस प्रकार राजसत्ता से संसार पर शासन करता है, उसी प्रकार कर्म के सुख-दुःख की
कथाएँ कर्मठों में ही अधिक प्रचलित रहती हैं। सारांश, यहाँ कर्म ही मिथ्या है। वह सुख-दुःख कैसे देगा? यह
निश्चित रूप से जान लेने पर कौन किस पर कोप करेगा? इस प्रकार कर्म सुख-दुःख तो नहीं ही देता, इसलिये
सुख-दुःख काल देता है, ऐसा कहें तो वह भी ठीक नहीं है।

६३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कालस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तत्र तदात्मकोऽसौ।
नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात् क्रुध्येत कस्मै न परस्य द्वन्द्वम् ॥ ५६ ॥
काल शीतकाल में ठंडक की पीड़ा देता है, गर्मियों में गर्मी से त्रस्त रहता है, वर्षाऋतु में जल बरसाता है
और तीन-तीन मंजिल वाले मकानों को ध्वस्त कर देता है। सात-सात दिन तक लगातार अखण्ड वर्षा के कारण
आँख भी खोलने नहीं देता। इसलिये सभी प्राणियों को पीड़ा होती है और खाद्यान्न की समस्या उत्पन्न हो जाती
है। खाद्यान्न के अभाव के कारण पशु, पक्षी तथा प्राणी व्याकुल हो जाते हैं। उस समय कोई भी सुख-दुःख की
बात नहीं करता क्योंकि उस समय काल ही दुःख देनेवाला होता है। भीषण गर्मी, भीषण सर्दी अथवा अत्यधिक
वायु के साथ काल संसार को खाता रहता है। इसलिये संसार भी काल से थर-थर काँपता रहता है। काल के
पराक्रम की बात सुनकर देवता भी तत्काल काँप उठते हैं। औरों की क्या बात की जाय? साक्षात् ब्रह्मदेव भी
अंतःकरण में काल से भयभीत रहते हैं। अतिवृष्टि और अनावृष्टि के साथ काल अनेक प्रकार के संकटों से लोगों
को पीड़ा देता है और अन्त में प्रलय कर देता है। ऐसा यह महाकाल सृष्टि को दुःख देने वाला है ऐसे बड़े-बड़े
ज्ञानी लोग कहते हैं लेकिन वे अपने ज्ञानी होने के कारण ही मूर्ख बने रहते हैं क्योंकि काल ही ईश्वर है और वह
सबके लिये सुखदायी है। ईश्वर से जो काल को अलग कहता है वह जड़, मूर्ख और अज्ञानी है। काल ही ईश्वर
है, यह जान लो। वह विश्वात्मा है तथा पूर्णरूप से दयालु है। काल योग्य समय पर बारिश करता है तथा संतप्त
हुए लोगों को सुखी करता है और धरती को गीली बनाकर उसे खेती करने के लिये बीज डालने लायक बनाता
है। उस समय यदि शीतल हवा नहीं बहेगी तो बोया हुआ बीज जल कर राख हो जायेगा। इसलिये उस समय
पानी बरसा कर अनाज फलद्रूप करता है। पका हुआ अनाज गीला रहता है और उसे उसी प्रकार संग्रह करना
सम्भव नहीं है, इसलिये ग्रीष्म की गर्मी लाकर अनाज का गीलापन सोख लेता है। इस प्रकार प्राणियों के हित में
जाड़ा, धूप, वर्षा आदि की योजना काल करता है। किन्तु देह स्वयं ही 'मैं' के भ्रम में होने के कारण वही उसे
दुःखदायक मालूम होता है। पुराने वस्त्रों को बदलकर जो आस्थापूर्वक नये वस्त्र पहनाता है, उसी कल्याणकर्ता
काल को मूर्ख लोग शत्रु कहते हैं। उसी प्रकार वृद्धावस्था से जर्जर होकर जो देह विगलित हो जाता है, उसे काल
योग्य समय पर नष्ट कर देता है और तत्काल नया देह देता है। इस प्रकार काल लोगों पर उपकार करता है।
पुराना लेकर जो बदले में नया देता है ऐसे उपकार कर्ता को देह के लोभ से लोभी बने लोग अपकार कर्ता कहते
हैं। मनुष्य जिस भावना से जो भी दृढ़ वासना मन में रखता है, उसी के अनुरूप देह उसे कृपालु काल तत्काल
देता है। पिता आनन्दपूर्वक पुत्र के पुराने वस्त्र उतार कर उसे पहनने के लिये नये वस्त्र देता है, उसी प्रकार
प्रलयकाल संसार को भी नये-नये रूप देता है। काल प्रलयकाल में संसार के सभी पुराने देहों का विनाश कर,
फिर उन सबको कृपापूर्वक नया देह देकर उनका गौरव करता है। इस प्रकार काल कृपालु है। मूर्ख लोग उसे बैरी
कहते हैं। काल स्वयं ही संसार का वास्तविक आत्मा है। वह किसी को भी दुःख देकर छल नहीं करता। देखो!
लोगों की देह पर ही भक्ति रहती है, इसलिये काल भी लोगों की भक्ति के अनुसार एक के बाद एक देह उत्पन्न
करता है और इसीलिये यह जन्म-मरण का झगड़ा बढ़ता है। जो सचमुच ही विदेह भावना की ही इच्छा करता
है, उसका अहम्भाव काल नष्ट करता है और स्वयं आत्मानन्द से तृप्त कर जन्म-मरण का ठिकाना ही तोड़
देता है। जिसकी जैसी बुद्धि होती है, उसके ही अनुरूप काल उसे सिद्धि देता है। किन्तु काल सचमुच ही कृपालु
है, यह बात देह के मोह से अन्धे हुए लोग नहीं जानते। संसार में काल ही हमारा आत्मा है। यह बात जो
आत्मज्ञानी जानता है वहाँ कौन किसका दुःख मानेगा? क्योंकि दूसरा कोई होता ही नहीं है। यहाँ मैं दुःख देने

तेईसवाँ अध्याय ६३९
वाला हूँ और दूसरी ओर कोई दुःख भोगने वाला है ऐसी द्वैत वाली बात ही नहीं है क्योंकि संसार का एकमेव
आत्मा वह काल ही है। काल और हमारा आत्मा ये दोनों एक ही हैं। ऐसी स्थिति मे किसका सुख किसे होगा
और कौन किसके लिये शोक मनायेगा ? यहाँ द्वंद्व का दुःख ही नहीं रहता। जिस प्रकार मृगजल केवल नाममात्र
का है, उसमें एक बूँद भी पानी नहीं है, उसी प्रकार आत्मस्वरूप में संसार का जो विस्तार है, वह केवल मन का
भ्रम है। आत्मा एक ही होने के कारण उसमें कोई भेद नहीं है। वही 'काल' के नाम से प्रसिद्ध है। जीव उसी का
अंश होने के कारण वह ज्ञानस्वरूप से शुद्ध है। इसलिये उसे काल आदि की बाधा नहीं है। क्या आग से अग्नि
जलता है, या धूप से सूर्य जलता है ? लहरों की उथल-पुथल से क्या समुद्र डूब जाता है ? या काजल ने अन्धकार
को और अधिक काला किया है ? या हिमालय पर्वत बर्फ से काँपने लगता है ? या घृत डालने से घृत टूटता है ?
यदि यह सब संभव हो तभी काल के प्रयास से आत्मा अनेक द्वंद्व भोगेगा ? कोई स्वयं ही अपने ऊपर कोई
आपत्ति नहीं लाता, उसी प्रकार काल भी आत्मा पर बाधा नहीं ला पाता। इस प्रकार जहाँ एकता के कारण अभेद
रहता है, वहाँ काल की भी पीड़ा नहीं हो पाती। अभेद में द्वंद्व बिलकुल नहीं है, फिर कोप किस पर किया जाय ?
जीव-शिवरूप में केवल मैं ही हूँ। मैं ही आत्मा हूँ और मैं ही काल हूँ। द्वंद्व दुःखों का झमेला मिथ्या है। तब
क्रोध किस पर करूँ ? इस प्रकार विचार करने से काल सुख-दुःख देने वाला सिद्ध नहीं होता क्योंकि सुख-दुःखों
की पीड़ा आत्मा को नहीं होती। 'नायंजनः' आदि श्लोकों में (अ २३ श्लोक ४३) सुख-दुःख के जो छः कारण
बताये गये हैं, उन पर ठीक तरह से विचार करने पर वे आत्मा के लिये बाधक सिद्ध नहीं होते, यह ज्ञात होता है।
इसके अलावा देशवास अथवा त्रिगुणों के गुण से बाधक बनकर आत्मा को पीड़ा देने वाला कोई दिखायी नहीं
देता। आत्मा को किसी से कभी भी पीड़ा होने की सम्भावना नहीं है। लोगों को देह का अहंकार ही बाधक होता
है। यही बात भिक्षु बता रहे हैं।
न केनचित् क्वापि कथंचनास्य द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य।
यथाहमः संसृतिरूपिणः स्यादेवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः ॥५७॥
आत्मा गुणों से भिन्न होते हुए शुद्ध है। वह माया से परे तथा आनन्दस्वरूप है। वह परिपूर्ण सच्चिदानंद है।
उसमें द्वंद्व की बाधा नहीं है। आत्ममन्दिर में द्वंद्व प्रवेश करने लायक बाधक हो सके इस प्रकार का कर्म, कार्य
अथवा क्रिया कैसी भी, कैसे भी और किसी से भी नहीं हो सकती। अभेद को द्वंद्व की बाधा नहीं होती, स्वानंद
का दुःख से सम्बन्ध नहीं है, फिर परिपूर्ण के विरुद्ध कौन रहेगा? परमानन्द एक अकेला ही रहता है।
(आशंका) आत्मा के द्वंद्व से संबंध नहीं होता और देह जड़ होने के कारण द्वंद्व नहीं जानता; तो फिर यह जो
सुख-दुःख की अत्यन्त प्रसिद्ध पीड़ा है, वह किसे होती है? (उत्तर) सुख-दुःख का भोग भोगने के लिये और
जन्म-मरण का भोग सहन करने का प्रमुख कारण देहाभिमान है। लेकिन उसका लक्षण भी समझ में नहीं आता।
जिस प्रकार पति के साथ रहकर सुवासिनी स्त्री व्यभिचार करे और उससे उसे गर्भ रह जाय तो वह किसी की
समझ में नहीं आता उसी प्रकार इस अभिमान का आश्चर्य है। वह ज्ञानस्वरूप से एकरूप होकर मिथ्या जीवत्व
दिखाकर अपनी इच्छा से सुख-दुःख भोगता है। जिस प्रकार राजा के आश्रय में रहने वाला कपटी प्रधान
राज्याधिकार के जोर पर अधर्म करता है, अनेक प्रकार से प्रजा का छल करता है, उसी प्रकार अहंकार भी शरीर
में अपने मन की करता रहता है। अग्नि की संगति से लोहा स्वयं अग्नि की ही तरह हो जाता है, उसे हाथ में
कौन पकड़ पायेगा? वह सबको आगे से झुलसा देता है। उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप का अहंकार जब देहात्मता के

६४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
योग से पूरी तरह उफन कर सुख-दुःखादिक जन्म-मरण बढ़ाने लगता है तो उसे काबू में कौन ला पायेगा ?
स्वप्न का देह केवल मन का खेल है। उस देह में भी मनपन रहता है। उसी प्रकार इस देह को भी मन ही
समझो। वह अभिमान के कारण कठिन और स्थूल बन गया है। इसे ध्यान में रखो कि कार्यकारण रूप में संसार
ही मन का अभिमान है। वह भयंकर सुख-दुःख बढ़ा कर जन्म-मरण का दुःख स्वयं भोगता है। बार-बार वही
भोग भोगते हुए कष्ट होता है लेकिन वह अपनी अहंता नहीं छोड़ता और देह का अपने ढंग से पोषण करता है।
चाहे ब्रह्मप्रलय ही क्यों न हो जाय लेकिन देह की अहंता नष्ट नहीं होती, प्रलय में भी अभिमान नष्ट नहीं होता।
वह सुख-दुःख भोगता रहता है। इस अभिमान में जीव की क्या स्थिति रहती है? वैसी ही, जिस प्रकार अड़हुल
के फूल पर स्फटिक रखने से वह स्फटिक फूल के ही रंग का दिखायी देता है लेकिन उसके जैसा नहीं होता।
आत्मस्वरूप में सुख-दुःख नहीं है। वह देह में स्पष्टरूप से दिखायी देता है। यह सुख-दुःख अविचार के कारण
मनोरम लगता है और कल्पना जैसा भासित होता है। वह देह मेरा ही है इस अभिमान से उसे मस्तक पर धारण
कर जन्म-मरण के चक्कर में फँस कर सुख-दुःख का स्वयं ही भोक्ता बनता है। इसी विचार से जो आत्मज्ञानी
होते हैं, उनके मन पर गुरुपदेश का तत्त्वज्ञान पूरी तरह अंकित होने के कारण वे जन में या वन में कहीं भी
देहाभिमानी नहीं रहते। इस प्रकार जो आत्मस्वरूप के अनुभव से बुद्धिमान हुए पुरुष रहते हैं उन्हें प्रारब्ध की
गति से, प्राणिमात्रों से कैसे भी दुःख क्यों न प्राप्त हो लेकिन उनकी आत्मस्वरूप स्थिति अटल रहती है। उनमें
प्राणिमात्र के प्रति न द्वेष उत्पन्न होता है और न उन पर क्रोध ही होता है। त्रिभुवन में वे स्वानंद में रहते हैं और
निश्चिंत होकर द्वंद्वरहित रहते हैं। ऐसा पुरुष संकट देखकर भयभीत नहीं होता और किसी को पराया नहीं
समझता। सभी आत्मस्वरूप होने के कारण वह सबके साथ अपनत्व का व्यवहार करता है। ज्ञाता सदा
भेदभावरहित होता है। उसमें समविषम भाव और भेदभाव नहीं होता। वह किसी से डरता भी नहीं है और किसी
से दुःख भी नहीं करता है। वह सदा सुख में और आत्मानंद में मगन रहता है। निन्दा हो या कष्ट हो वह बिना
उद्विग्न हुए, सब कुछ सहन कर सुखी पुरुष की तरह व्यवहार करता है, यही सिद्ध का प्रमुख लक्षण है, और
साधकों के लिये साधन भी वही है।
एतां स आस्थाय परात्मनिष्ठामध्यासितां पूर्वतमैर्महर्षिभिः ।
अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव ॥ ५८ ॥
देखो! मेरे पूर्व पुण्य के भाग्योदय से अद्वैत स्वरूप आत्मनिष्ठा मुझ में उत्पन्न हुई। उसी आत्मनिष्ठा के
आश्रय से मैं द्वंद्वरहित होकर अनेक प्रकार के दुःख सहन कर रहा हूँ। भेदभाव से दूर रहकर सुख-दुःख सहन
करने का गुण यही सिद्धों का स्वाभाविक लक्षण है। मेरा मुख्य रूप से यही साधन है। इसी के योग से मन पर
विजय होती है। यही परमार्थ का श्रेष्ठ साधन है। महान ऋषियों की यही आत्मनिष्ठा है। विष्णु का मुख्य भजन
यही है। इसी के योग से आत्मनिष्ठा साध्य होती है। इसके योग से द्वंद्व से होने वाले दुःख की बाधा नहीं होती।
इसी के योग से शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है। यही आत्मविवेक हमें दुस्तर संसार से पार कराने वाला है।
संसारसागर पार करना अत्यन्त कठिन है, उसे पार करने के लिए आत्मविवेक उत्तम नौका है। उसका सद्गुरु
नाविक बनकर माया के उस किनारे पर पहुँचाता है। यह आत्मविवेक कैसे प्राप्त हो? उसकी चिन्ता करने की
आवश्यकता नहीं है। आत्मभावना से एकाग्र होकर भगवान की शरण जायें। लौकिक की लज्जा त्याग कर तथा
अभिमान का बोझ फेंक कर भगवान की शरण में जाना चाहिये, तभी आत्मविवेक प्राप्त होता है। जिस प्रकार
नन्हा बालक माँ की अनन्य भाव से शरण जाता है, उसी प्रकार अनन्य भाव से दिन-रात श्रीहरि की शरण में

तेईसवाँ अध्याय ६४१
जायें। हरि की शरण में जाने से जन्म-मरण अपना मुँह भी नहीं दिखाते। जब हरि स्वयं ही अपने भक्तों की रक्षा
करता है तो फिर द्वंद्व की पीड़ा कौन दे सकेगा ? श्रीहरि पूर्णरूप से मोक्षदाता हैं। उसकी शरण में कैसे जायें ? वह
अनंतस्वरूप होते हुए भी स्वयं निर्गुण है। वहाँ कौन जायेगा ? किन्तु हरि का स्वरूप अत्यन्त निर्गुण होते हुए भी,
उसकी सगुण मूर्ति का चिन्तन करने से, यदि वही मूर्ति मन में बस जाय तो भी द्वंद्व से होने वाले सारे दुःखों का
लय हो जाता है। यदि श्रीहरि की सम्पूर्ण मूर्ति मन में न बसती हो तो उनके चरणों का ही ध्यान करना चाहिये।
इससे जन्म-मरण भाग जाता है और भेदभाव भी अपने ही भय से स्वयं भाग जाते हैं। अगर उनके चरणों का भी
ध्यान सम्भव न हो तो केवल नाम-स्मरण करना चाहिये। उस नामस्मरण से यम और काल थर-थर काँपते हैं।
जहाँ हरिनाम का नित्य घोष चलता है, वहाँ मरण का भी मरण हो जाता है। जन्म का मुँह काला पड़ जाता है
और वह शरमा कर भाग जाता है। रामनाम के घोष के आगे भेदाभेद का दुःख ही कितना होता है ? नाम माहात्म्य
की गर्जना करते समय संसार का सारा भय ही उड़ जाता है। जिसकी वाणी निरन्तर नाम की गर्जना करती है,
उसके शब्दों में श्रीहरि का वास रहता है। उसके घर ऋद्धि-सिद्धि पानी भरती हैं, मुक्ति उसकी दासी बनकर
रहती है। स्वयं विकल्परहित, शुद्ध भक्तिभाव से सगुण ध्यान, निर्गुण चिंतन अथवा नामस्मरण आदि में से भक्त
भक्ति भाव से जो भी स्वीकार करेगा, वह सब सद्‌भक्ति से परिपूर्ण होता है। भक्ति भाव से भगवान से प्रीति करने
का नाम ही सच्ची भक्ति है। भक्तिभाव से ही श्रीहरि प्रसन्न होकर साधकों को आत्मशान्ति प्रदान करता है। उस
आत्मशांति के साथ ही करोड़ों द्वंद्वों के दुःख समाप्त हो जाते हैं। सारी सृष्टि परमानन्द से भर जाती है और 'मैं',
'तू' दृष्टि को नहीं दिखायी देता। ऐसे अभेदभाव से श्रीहरि के चरणों की सेवा करने पर मैं स्वयं ही मुझे
भवसागर से तारूँगा। लेकिन जो सचमुच ही श्रीहरि का भक्त हो जाता है उसका संसार ही नहीं होता। इस प्रकार
भिक्षु ने जिस गाथा का वर्णन किया, वह भगवान को बहुत अच्छी लगी। उनका अंतःकरण आनन्द से भर आया
और उन्होंने उद्धव का मस्तक सहलाया। ऐसी जो यह आत्मशान्ति है वह मेरे उद्धव को प्राप्त हो ऐसी भाव
विह्वलता मन में उत्पन्न होकर श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा-
श्रीभगवानुवाच
निर्विद्य नष्टद्रविणो गतक्लमः प्रव्रज्य गां पर्यटमान इत्थम्।
निराकृतोऽसद्‌भिरपि स्वधर्मादकम्पितोऽमूं मुनिराह गाथाम् ॥ ५९ ॥
जिसके विश्वास से वेदों का निर्माण हुआ, जिसके चरणों से गंगा का उद्गम हुआ, जिसका नाम संसार का
बन्धन तोड़ डालता है वह श्रीकृष्ण अपने मुख से उद्धव को बताने लगा। इसलिये उद्धव के भाग्य की प्रशंसा करनी
चाहिये। श्रीकृष्ण उस पर सन्तुष्ट हुआ और उसने उसके शाश्वत निवास के लिये आत्मशांति का मन्दिर दिखलाया।
उद्धव ! अच्छी तरह ध्यान देकर सुनो। जो धन का लोभी था उसका धन नष्ट होकर वह धननाश ही उस धन लोभी
पर प्रसन्न हुआ और उसे विवेकसम्पन्न वैरागी बनाया। जो धन लोभी पूरा पेट खा भी नहीं रहा था, जिसका कोई नाम
नहीं ले रहा था, उसे ही वैराग्य ने सर्वश्रेष्ठ बनाया। उसकी बात सदा मेरे मुख में रहती है। उसका नाम मेरे मुख में
रहता है। उसकी कृति का स्वयं मैं ही वर्णन करता हूँ। जो विवेकसम्पन्न वैरागी रहता है वह मुझे अत्यन्त प्रिय रहता
है। वैराग्य जैसा महान भाग्य संसार में और कोई नहीं है। उद्धव ! जो सचमुच विवेक और वैराग्य से युक्त रहता है
वह मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है। विवेक और वैराग्य से जो सम्पन्न हो जाता है, वह मेरा हो जाता है, ऐसा समझ
लो। मैं उसकी बातों के वश में रहता हूँ और वह भी पूरी तरह मुझ पर समर्पित रहता है। लोभी का धन गया, धन

६४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
के साथ मान अभिमान गया और उस अभिमान के ही साथ द्वंद्व के कारण होने वाला दुःख भी समाप्त हो गया। धन
के जाते ही विरक्ति उत्पन्न हुई, जिससे वह नियमित एकनिष्ठ संन्यासी बन गया। भिक्षा के लिये भटकते समय दुष्ट
लोगों ने अपने दुर्भाषणों से उसकी भर्त्सना की। अनेक प्रकार के विकारों से पीड़ित होने पर तथा नाना प्रकार के
उपद्रवों के चलते भी वह अपने दृढ़ निश्चय से नहीं डिगा। स्वधर्म के धैर्य ने उसे पूर्णरूप से अभेदस्वरूप बना
दिया था। संन्यासी का पूर्ण स्वधर्म यही है कि मैं देह से भिन्न नारायण स्वरूप हूँ। इस भाव ज्ञान से उसके
देहाभिमान का त्याग किया रहता है इसीलिये वह आत्मस्वरूप से नहीं डिगता। जिस प्रकार छाया पर प्रहार करने से
उस पुरुष को जरा भी भय नहीं होता, उसी प्रकार दुर्जन जब उसके देह को प्रताड़ित करते हैं तो उस निरहंकारी
पुरुष को दुःख या भय नहीं होता। देह को नाना प्रकार की पीड़ा होने पर उसकी जो देहातीत स्थिति हुई थी, उसी
की गाथा उस भिक्षु ने गाकर सुनायी और वही अब मैंने तुम्हें सुनायी। इसमें हमें जो सुख-दुःख का अनुभव होता है
वह हमारा भ्रम ही है ऐसा समझो। इसी बात का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
सुखदुःखप्रदो नान्यः पुरुषस्यात्मविभ्रमः।
मित्रोदासीनरिपवः संसारस्तमसः कृतः॥६०॥
अविद्यात्मक जो हमारा अज्ञान है, उसमें मन के स्वरूप से मन ही उत्पन्न होता है और वही मन भेदभाव
उत्पन्न कर सुख-दुःख भोगने को बाध्य करता है। आत्मा भेदरहित है। उसमें शत्रु, मित्र, उदासीन आदि भेद की
मन ही कल्पना करता है और वह मन स्वयं चालित करता है। इस प्रकार भेदभाव में मन का उलझे रहना ही
पुरुष का अज्ञान है। ऐसे भ्रमित पुरुष के लिये द्वंद्व दुःख के कारण संसार भयावह हो जाता है। मन ही सुख-
दुःख का कारण है और संसार भी मन की ही कल्पना है, यह ध्यान में रखो। उस मन का निग्रह कैसे किया जाय
इसका उपाय स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
तस्मात् सर्वात्मना तात निगृहाण मनो धिया।
मय्यावेशितया युक्त एतावान् योगसंग्रहः ॥ ६१ ॥
जिसे संसार का दुःख नष्ट करना हो, उसे मन का नियंत्रण करना चाहिये क्योंकि त्रिभुवन में मन जैसा दुःख
देने वाला अन्य कोई नहीं है। मन अत्यन्त चंचल है, वह सहसा स्थिर नहीं हो पाता। इसलिये जिससे भेदभाव दूर
हो सके ऐसा दिन-रात विचार करने का उसे अवसर देना चाहिये। मन कहीं विवेक को धोखा देकर भाग न जाये
इसलिये इन दोनों के हाथों में बेड़ियाँ डाल कर इन्हें एक साथ रखना चाहिये ताकि यदि मन विकल्प उत्पन्न करने के
लिये भागना चाहे तो वहाँ विकल्प को नष्ट करने के लिये विवेक तत्पर होकर खड़ा रहे और जहाँ मन अधर्म की
ओर मुड़ना चाहे वहाँ विवेक उसे भगाने के लिये दौड़ कर आ जाये। मन यदि कामक्रोध के पास जाकर बैठता है तो
विवेक उसके केश पकड़ कर उसे पीछे खींचता है। मन यदि निन्दा के पास जाता है तो विवेक उसे चपत मारता है
मन विषय की ओर जाने की बात करता है तो विवेक उसके मस्तक में वैराग्य की लाठी से प्रहार करता है। मन
कल्पना के पीछे भागने लगता है तो विवेक उसे उससे परावृत्त करता है। परस्त्री और पराया धन की इच्छा कर यदि
मन उस ओर दौड़ने लगता है तो विवेक वहाँ जाकर भीषण युद्ध शुरु कर देता है। इस प्रकार मन और विवेक में
झगड़ा प्रारम्भ होकर शिकायत सद्गुरु के सामने आती है। उनका न्याय करने के लिये वह उन दोनों को अद्वैत के
बाड़े में बन्द कर देता है। उस स्थान को देखते ही मन का स्वभाव ही बदल जाता है और मन विवेक के साथ ऐक्य
स्थापित कर लेता है। वहाँ मन भी अपना मनपन भूल जाता है और विवेक मन का आकलन करना भूल जाता है।

तेईसवाँ अध्याय ६४३
जीव का जीवत्व नष्ट हो जाता है और अद्वय के योग से सम्पूर्ण परब्रह्म ही बन जाता है। सुवर्ण के सर्पाकार
अलंकार बनाने पर उस पर नाग के ही अनुरूप फन, पूँछ आदि सुशोभित रहते हैं, लेकिन यदि नाग के आकार का
वह अलंकार तोड़ा न जाय तो सुवर्ण सुवर्ण के ही रूप में होने के कारण आग को उसका भान ही नहीं रहता। उसी
प्रकार पूर्ण ब्रह्म जानकर संसार को तोड़े बिना ही जीव जीवत्व भूल जाता है और मन मनस्वरूप से वंचित हो उठता
है। विवेक की ऐसी युक्ति से मन मेरे स्वरूप में प्रवेश करता है। जहाँ मन मनस्वरूप से उद्वेलित नहीं होता, उसी का
नाम मनोनिग्रह है। हे चतुर चित्तचिंतामणि! हे विवेक चक्रवर्त्ति चूड़ामणि! हे भक्तशिरोमणि उद्धव! तुम मनोनिग्रह
करने का प्रयास करो। श्रीकृष्ण मानों प्रेम से पागल हो गया था। उसने कहा—"अरे भाई! तुम यहाँ आदरपूर्वक
मनोनिग्रह करो। जो आदरपूर्वक मन का निग्रह कर मन से उत्पन्न होने वाले भेद का त्याग करता है, उसे, जिस
प्रकार माँ अपने बच्चों को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार शान्ति उसे नहीं छोड़ती। सच्ची आत्मशान्ति यदि मन में रचबस
गयी हो तो उसे किसी प्रकार का भेदभाव पीड़ा नहीं पहुँचाता। जिसे बड़े-बड़े सिद्ध और योगी 'योगसंग्रह' कहते
हैं, वह यही है। संसार की स्फूर्ति छोड़कर चित्स्वरूप की ओर वृत्ति मुड़ती है और जीव-शिव एकसाथ आते हैं,
उसी का नाम है 'योगसंग्रह स्थिति'। ऐसे योगसंग्रह की शान्ति प्राप्त होने पर साधकों को द्वंद्व की बाधा नहीं होती।
लेकिन अब इतना ही पर्याप्त है। सारांश जिस किसी को भी यह भिक्षुगीत की भक्ति प्राप्त होगी उसे द्वंद्वों से मुक्ति
मिल जायेगी।"
य एतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहितः।
धारयञ्छ्रावयञ्छृण्वन् द्वन्द्वैर्नैवाभिभूयते॥६२॥
शान्ति प्राप्त करने के लिये कोटि-कोटि साधन करने पर भी वह नहीं प्राप्त होती। किन्तु इस भिक्षुगीत का
रहस्य मन में रखने से वह साधकों को अपने आप ही प्राप्त हो जाती है। वह योगनिष्ठा और ब्रह्मज्ञान ही
भिक्षुगीत का निरुपण है जो ध्यानपूर्वक इस मन में रखता है, उसके पास शान्ति दासी बनकर रहती है। इस
भिक्षुगीत का गूढार्थ जो शान्त चित्त से ध्यान में रखता है, उसे द्वंद्व की पीड़ा नहीं सताती और आत्मज्ञान से वह
बिलकुल शान्त हो जाता है। भिक्षुगीत के रहस्य के अनुरूप चलने से समाधान होगा इसमें आश्चर्य करने की
बात नहीं है। लेकिन जो केवल भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करेगा, उसे भी द्वंद्व पीड़ा नहीं पहुँचाएंगे। पति अधिक
समय तक दूसरे देश में गया हो तो उसका पत्र पत्नी जिस उत्कंठा से सुनती है, उसी एकाग्रता से भिक्षुगीत सुनना
चाहिये। लड़का घर से भाग गया हो और उसका पता लगने का समाचार जब कोई उसकी माँ को देता है तो भाग
जाने का कारण आदि सुनकर माँ मन ही मन छटपटाती है, विह्वल होती है। ऐसे समय उसके पास जो अन्य
स्त्रियाँ होती हैं वे भी स्नेह से विह्वल हो उठती हैं किन्तु माँ के मन में जो छटपटाहट होती है वह अन्य स्त्रियों में
नहीं होती। उसी प्रकार भिक्षुगीत का श्रवण करते समय जिसका मन द्रवित हो उठता है, जो सात्त्विक वृत्ति से
परिपूर्ण हो जाता है, वह द्वंद्वों के चक्कर में नहीं फँसता। अस्तु! इस प्रकार आदरपूर्वक श्रवण सम्भव न भी हो तो
भी इसका नित्य पठन करने से भिक्षुगीत के प्रभाव से द्वंद्व उसका स्पर्श भी नहीं करते। सिंह के शरीर के दर्प से
ही मदोन्मत्त हाथी भागना शुरु करते हैं, उसी प्रकार भिक्षुगीत के पठन से द्वंद्वों में भगदड़ प्रारम्भ हो जाती है। मन
में लोभरहित होकर, जो साधु-सन्तों के सान्निध्य में भिक्षुगीत सुनेगा, उसे द्वंद्व स्पर्श भी नहीं करेंगे। इस भिक्षुगीत
का अर्थ अथवा इस भिक्षुगीत पाठ का श्रवण करने से यह भिक्षुगीत द्वंद्वों का निवारण करता है। यह मर्म श्रीकृष्ण
को मालूम था। उसने उसे उद्धव के कल्याण के लिये बतलाया। जिस भिक्षु के गीत की फलश्रुति स्वयं श्रीकृष्ण
अपने मुख से सुना रहे हों, उस भिक्षु के भाग्य का क्या वर्णन किया जाय? त्रिभुवन में वही एक धन्य पुरुष है।