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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

तेईसवाँ अध्याय ६०७
कहता है, "हाय रे मेरा भाग्य ! आखिर, मुझे भिखारी बना दिया। हे दुष्ट ब्रह्मदेव ! मेरे भाग्य में यह क्या लिख
दिया ? मुझे कहीं ठौर नहीं और क्या किया जाय यह भी समझ में नहीं आता।" इस प्रकार जो बड़ा दुःख सामने
आ गया है, उसके विचार से वह महादुःखी होकर रोने लगता है। "यह दुःख तो कम है लेकिन मुझे आगे बहुत
बड़ा दुःख भोगना है। यम जब निर्दयता से मुझे प्रताड़ित करेगा, उस समय मुझे वहाँ कौन छुड़ाएगा ? मैंने कभी
दानधर्म नहीं किया, नारायण का स्मरण भी नहीं किया, इसलिये मेरे भाग्य में नरक ही आयेगा वहाँ मुझे कौन
छुड़ायेगा? मैंने पंचमहायज्ञ नहीं किये, अतिथियों को अन्न नहीं दिया, पितरों का तर्पण नहीं किया, अब मेरे
दुःखों का निवारण कौन करेगा ? मैंने ब्राह्मण की पूजा नहीं की, परमेश्वर का भजन नहीं किया, भगवद्भक्तों की
चरणधूलि का वंदन नहीं किया, अब मेरे दुःखों का नाश कौन करेगा ? सदा अकर्म करने के कारण मैं अघोर
नरक में डूब रहा हूँ। हे श्रीहरि ! दौड़कर मेरे पास आओ और मेरा उद्धार करो। हे कृष्ण ! हे माधव, हे मुरारी ! हे
अच्युत ! हे अनंत ! हे श्रीहरि ! हे गरुड़ध्वज ! हे गोवर्धनधारी ! मुझ गरीब का उद्धार करो। तुमने प्रह्लाद की रक्षा
की, अम्बरीष को गर्भवास से मुक्त किया, उदर में परीक्षित का संरक्षण किया, उसी प्रकार मुझ गरीब का उद्धार
करो। तुमने अहिल्या को तारा, पातकी अजामिल का उद्धार किया और गजेन्द्र को संकट से बचाया, उतनी ही
शीघ्रता से मुझे उबारो। सारे पापों की खान, उस वेश्या को भी तुमने नामस्मरण से मुक्त किया। हे चक्रपाणि !
उतने ही चातुर्य से मुझ दुष्ट का भी उद्धार करो। इस धनेच्छा को आग लगे जिसके कारण मेरा जन्म व्यर्थ गया।
मुझ जैसे अधम ने राम का नाम भी नहीं लिया जिसके लिये धन की आवश्यकता नहीं होती। रामनाम के प्रभाव
से महान पापों की राशियाँ जल जाती हैं। फिर भी मैं मुख से राम का नाम नहीं लेता।" इस प्रकार जब वह
अपने अपराधों का स्मरण कर पश्चात्ताप कर रहा था, तभी उसके अंतःकरण में तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ। उसी
का वर्णन श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
स चाहेदमहो कष्टं वृथाऽऽत्मा मेऽनुतापितः।
न धर्माय न कामाय यस्यार्थायास् ईदृशः ॥ १४॥
वह ब्राह्मण हाथ मल कर कहता है—"हाय ! ब्राह्मण देह तो मोक्ष प्राप्ति का ही साधन है। वह प्राप्त होने
पर भी मैं कैसा कंगाल रह गया और धन लोभ के कारण व्यर्थ नष्ट हो गया। जिस देह के योग से मोक्ष का सुख
मिलता है उसी देह को मैंने दुःख दिया। मैं धन का लोभी अत्यन्त मूर्ख आदमी हूँ। मुझ जैसा मूर्ख और कोई नहीं
होगा। धर्म के नाम पर धन न खर्च कर मैंने बड़े प्रयास से धन जमा कर रखा, और उस धन की तो ऐसी अवस्था
हुई कि उसने मुझे दुःख का फल दिया। द्रव्य लोभ का आश्चर्य बड़ा विलक्षण है। उसके आगे न इहलोक है न
परलोक है। जो सुलभ मोक्षसुख था, उससे भी हाथ धो बैठा। वह लोभ मुझे नरक तक पहुँचा गया। जहाँ नरक
में कल्प तक डूबने पर भी ठौर नहीं मिलता वहाँ यह धनलोभ जीव को ले जाता है। वही मैंने इस नरदेह में
पाया। जो ब्राह्मणदेह में जन्म लेता है, वह तीनों लोकों में पूज्य होता है। मोक्ष उसके चरणों पर होता है। ऐसा
ब्राह्मणदेह का मैंने दुर्भाग्य से नाश कर दिया। लोभ से मैंने जिस धन का संग्रह किया, वह सब तो नष्ट हुआ ही
लेकिन उसने मुझे अत्यन्त दुःखी किया और मुझे घोर नरक में डाल दिया। धीरे-धीरे जीवन बीतता गया और मैं
पश्चात्ताप से संतप्त हो गया। धन लोभ में मेरे सारे प्रयास व्यर्थ गये लेकिन विवेक के साथ मुझमें अत्यन्त पवित्र
वैराग्य उत्पन्न हुआ। द्रव्यलोभी व्यक्ति दुःख का भण्डार ही है।" जो धन के बन्धन में रहता है, वह पापी है। इस
प्रकार वह अपने ही मुँह से अपनी निन्दा करने लगा।

६०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रायेणार्थं कदर्याणां न सुखाय कदाचन।
इह चात्मोपतापाय मृतस्य नरकाय च॥ १५॥
सम्भवतः जो धन के लोभी होते हैं, उन्हें इहलोक का सुख रहता ही नहीं है क्योंकि उस धन का संरक्षण
करने में ही उन्हें अत्यधिक दुःख होता है और वह धन चले जाने पर मरणान्त दुःख ही आ जाता है। धन अर्जित
करने में नितांत कष्ट होते हैं, उसे सँभालने में कलह हो जाते हैं और उस धन का नाश होने पर सीना फट जाता
है। इहलोक में इस प्रकार का दुःख होता है और अधर्म होता है इसलिये परलोक भी दूर हो जाता है। इसलिये
मरते समय धन के लोभी को नरक का सामना करना पड़ता है। जो धर्म नहीं करता और स्वयं भी कुछ नहीं
खाता और जो मुझ जैसा कृपण हो जाता है उसे सर्वाधिक दुःख होता है। जहाँ लोभ की बस्ती रहती है वहाँ
स्वप्न में भी सुख का निवास नहीं होता। देखो! लोभ अत्यन्त निंद्य है। वह ब्राह्मण ही अपने मुख से यह कह
रहा है।
यशो यशस्विनां शुद्धं श्लाघ्या ये गुणिनां गुणाः।
लोभः स्वल्पोऽपि तान् हन्तिश्वित्रो रूपमिवेप्सितम् ॥ १६ ॥
समरभूमि में आगे का योद्धा धराशायी होने पर जो योद्धा स्वयं आगे बढ़कर शत्रु का सामना करता है और
शत्रु के घेरे में फँसे राजा को कन्धे पर डाल कर ले आता है, ऐसा यश प्राप्त करने के बाद यदि उसके अन्तःकरण
में उस वीरता के बदले कुछ पुरस्कार का लोभ होता है तो इससे उसका अपयश होता है और सारा संसार उसकी
मूर्खता का उपहास करता है क्योंकि राजा उसके कुछ कहे बिना ही उसे अपने समकक्ष लाने का विचार करता
रहता है। राजा के इस विचार में इस लोभ के कारण रुकावट आ गयी और उस लोभ के कारण उसकी मूर्खता
प्रस्थापित हो गयी। स्वयं कन्यादान करने से सारा कुल पवित्र हो जाता है लेकिन यदि उस कन्या के ऐवज में
उसने धन लिया तो उस धन के लोभी का अधःपतन हो जाता है। इस प्रकार लोभ दान में भी लांछनास्पद है।
वेदशास्त्रों का अध्ययन कर जो बड़े ज्ञान सम्पन्न हो गये उनका भी धन के लोभ के कारण बहुत छल होता है
क्योंकि उनमें ज्ञान का दृढ़ अभिमान रहता है। देह की सत्यता सिद्ध करने के लिये पण्डितों में विवाद शुरू हो
जाता है और उनमें विरोध होने पर वे छलवादी भाषण करने लगते हैं। इस प्रकार ज्ञाता भी लोभ के चक्कर में आ
जाते हैं। विचारसम्पन्न एवं ज्ञानसम्पन्न पण्डित को भी लोभ निन्दा का पात्र बना देता है फिर औरों की क्या
बिसात ? लोभ पवित्र मनुष्य को भी अपवित्र बना देता है। जहाँ लोभ रहता है वहीं निंदा का बसेरा रहता है। वही
प्रसिद्ध दृष्टांत इस ब्राह्मण ने स्पष्ट करके बतलाया। कन्या कुलवान हो, सुशील हो, सुकुमार हो, स्वरूप से सर्वांग
मनोहर हो और फिर यदि उसके नाक पर कोढ़ का हल्का-सा भी दाग हो तो इतनी सुन्दर होने पर भी वह निंद्य
है। उसी प्रकार मन में जरा सी भी लोभ की बस्ती हो तो वह सारे गुण, औदार्य, यश, कीर्ति आदि सबका नाश
करती है। इसलिये लोभ जैसा अपयश देने वाला, त्रिभुवन में और कोई नहीं है। धन के लोभ के कारण सदा
एक-दूसरे में विरोध रहता है। धन का लोभ इष्टमित्रों में भी दूरी उत्पन्न करता है। इतना बाधक और ऐसा
अमंगल दूसरा कोई भी नहीं है।
अर्थस्य साधने सिद्धे उत्कर्षे रक्षणे व्यये।
नाशोपभोग आयासस्त्रासश्चिन्ता भ्रमो नृणाम् ॥ १७ ॥
पहले धन प्राप्त करने के लिये प्रयास करो, फिर उसे बढ़ाने के लिये परिश्रम करो और इतना करके वह

तेईसवाँ अध्याय ६०९
धन कितना ही क्यों न बढ़ जाए लेकिन लोभ उसे 'अब बस' कहने के लिये नहीं कहता। धन के लिये जिस
मनोयोग से लोग परिश्रम करते हैं, वैसा ही प्रयास यदि कोई परमार्थ के लिये करे तो सचमुच ब्रह्म उसके हाथ
का खिलौना बन जाएगा। इतने कष्ट से धन का सम्पादन किया किन्तु उसे सँभालने में कितनी चिन्ता लगी रहती
है। इसके कारण दिन-रात प्राणों का भी भय लगा रहता है। चाहे स्त्री हो, पुत्र हो या माता-पिता हों लेकिन
किसी पर विश्वास नहीं करता। धन के सम्बन्ध में वह अपने से अधिक किसी पर भी विश्वास नहीं करता।
अपने प्राणों की चिन्ता न कर चोर से अपने धन की रक्षा करता है। धन की रक्षा के सम्बन्ध में जब उसे चिन्ता
होती है तो जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में वह उसी चिन्ता को एकाग्र करके बैठ जाता है।
ऐसी एकाग्रता यदि उसने भगवद्भजन में लगायी होती तो एक क्षण में भगवान उसके वश में हो गया होता।
शादी में योग्य-अयोग्य कोई खर्च हो जाय या खाने-पीने में अधिक खर्च हो जाय तो वह घबरा उठता है। इस
प्रकार धन का खर्च होने से उसे कष्ट होता है। धन के लोभी इस प्रकार धन के पागलपन में बँध जाते हैं। धन
प्राप्त करने में प्रयास करने पड़ते हैं। उसे सुरक्षित रखने की चिन्ता लगी रहती है और वह खर्च हो जाने पर भ्रम
की स्थिति हो जाती है। देखो! पहले, मध्य में और अन्त में भी धन पूरी तरह नुकसान देह है। उसका रत्तीभर
भी सुख नहीं है। मेरा यही अनुभव है। प्रयास, कष्ट और चिन्ता इनके साथ-साथ भ्रम भी इस धन के पास
भटकता रहता है। इसलिये धन में जितना अर्थ है उतना ही अनर्थ भी है। इसी बात का वर्णन वह ब्राह्मण स्वयं
करने लगा।
स्तेयं हिंसानृतं दम्भः कामः क्रोधः स्मयो मदः।
भेदो वैरमविश्वासः संस्पर्धा व्यसनानि च॥ १८॥
अर्थ सभी दृष्टियों से अनर्थकारी ही है। मेरा यह कहना त्रिवार सत्य है। पृथ्वी पर जो भी अनर्थ हैं, वे सब
अर्थ से ही उत्पन्न होते हैं। उनकी संख्या असंख्य और अनंत है। फिर भी अर्थ से उत्पन्न होने वाले पन्द्रह अनर्थ
यहाँ संक्षेप में बताऊँगा। पहला अर्थ यह है कि अर्थ के पास चोरी रहती है। जिसके पास धन नहीं है, उसे चोरों
से भय नहीं है। जिसके हाथ में पैसा नहीं है, उससे चोर ही भय खाते हैं। कहीं यह कुछ माँग न ले इस भय से
उससे छिप कर बैठते हैं। किसी का धन या वस्तु उसकी आँख बचाकर अचानक ले जाना, या जादू के नाम
धोखा देना, भोलेपन का लाभ उठाना या जंगल में सर्वस्व लूट लेना, या रास्ते में पड़ा हुआ धन उठाना और वह
किसका है यह जानने पर भी उसे न देना, यह भी चोरी का लक्षण है। सुवर्ण चुराने वाले को नरक प्राप्ति होती है
यह जानने वाले भी सुवर्ण की चोरी करते हैं। फिर औरों की क्या बात की जाय? सारांश, धन की बात आते ही
चोरी जो रहेगी ही। संसार में चोरी करना पाप है। उसे कोई अपने द्वार तक लाना नहीं चाहता, इसलिये वह
सुवर्ण के पास रहती है। धन देखते ही संन्यासी के मन में भी विकल्प आता है। सारांश, धन से होने वाले पहले
अनर्थ का लक्षण यह है कि धन के पास चोरी रहती है और धन हिंसा का स्थान क्यों है, यह भी सुनो। धन के
लिये कई बार मारपीट होती है। पुत्र, पौत्र भी धन के लिये अपने बड़ों को मारते हैं। सम्बन्धों का विचार न कर
लोग धन के लिये एक-दूसरे के प्राण ले लेते हैं। धन के लोभ का यह चमत्कार है कि उस लोभ से कन्या भी
पिता को विष खिलाती है। पितृघात का उसे दुःख नहीं होता, धन का लोभ इतना निष्ठुर है। धन का लोभी
व्यक्ति अपने माँ-बाप को छोड़ देता है। अपनी पत्नी को लेकर अलग रहता है लेकिन वहाँ भी धन का लोभ
रहता ही है। धनलोभ का प्रभाव इतना विचित्र है कि पुत्र पिता को जान से मारता है। द्रव्यलोभ महाकठिन है।

६१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
जो माँ नौ महीने अपने उदर में रखती है, सदा नरकमूत्र का कष्ट सहती है, उस माँ की भी उसके पुत्र धन के
लिये हत्या कर देते हैं। इस द्रव्यलोभ का प्रहार बड़ा विचित्र है। उसका मैं कहाँ तक वर्णन करूँ ? माँ भी अपनी
कोख से जन्म को मार डालती है। सारांश, यह जो सारी हिंसा है, वह धन से होने वाले अनर्थ का दूसरा लक्षण
है। अब द्रव्य असत्य का कारण कैसे बनता है, उसका निरूपण स्वयं कर रहे हैं। असत्य धन के ही पेट से जन्मा
है और वह धन के बल पर ही संसार में इतना प्रबल हो गया है। द्रव्य के साथ ही असत्य उत्पन्न होता है।
असत्य का और द्रव्य का हमेशा का साथ है। वह द्रव्य जिसके पास होता है अथवा जिसे द्रव्य की अपेक्षा रहती
है, उसके पास असत्य सपरिवार रहता है। द्रव्य, असत्य की पैतृक सम्पत्ति है। असत्य को द्रव्य का बहुत बड़ा
सहारा रहता है। वह बाप से भी झूठ बोलता है। द्रव्य के लोभ से माँ को भी फँसाता है क्योंकि सत्य द्रव्य के
पास रहता ही नहीं है। धन के लोभ से साधारण लोग क्रय, विक्रय करते समय तो झूठ बोलते ही हैं, लेकिन
वेदशास्त्र सम्पन्न और विद्वान लोग भी द्रव्य के लिये झूठ बोलते हैं। जिसने वेद पूरा पढ़ा भी नहीं है, वह मनुष्य
धन के लालच में नीच व्यक्ति के घर अपने को चारों शास्त्रों में पारंगत पण्डित बताकर, जो वास्तव में पण्डित हैं
उनका छल करता है। जो परमार्थी हैं वे अपने को विरक्त कहते हैं लेकिन वहाँ भी असत्य का ही बसेरा रहता
है। वहाँ भी लोग द्रव्यप्राप्ति के लिये झूठी सिद्धि का ढोंग करते हैं। द्रव्य के पास असत्य का बड़ा महत्त्व होता
है। भक्तिभाव से जिसे सद्गुरु माना है उसे ही वह अकेले में नास्तिकता के विचार प्रतिपादित करता है। लेकिन
जिसके पास धन नहीं है या जिसे धन की कल्पना ही नहीं है उसे कल्पांत में भी असत्य स्पर्श नहीं कर सकता।
अब द्रव्य के पास दंभ (ढोंग) रहता है, उसका भी वर्णन सुनो। अंतःकरण में परमार्थ न होते हुए भी, केवल
द्रव्यलोभ के कारण स्वयं को हरिभक्त कहते हैं। इसी का नाम है भजन का ढोंग। द्रव्य प्राप्त करने के लिये
टीका, माला, मुद्रा आदि धारण कर उपदेश देने का ही नाम है दीक्षा का ढोंग। कोई गुरु किसी बड़े सज्जन व्यक्ति
को उपदेश करने में आदर अनुभव करता है तो कोई गुरुपूजा के लिये इतना धन लगेगा ऐसा करार कर उसे मंत्र
देता है, वह ढोंगी है। जिनसे द्रव्य प्राप्ति होती है, ऐसे धनी शिष्य अच्छे लगते हैं और जो गरीब शिष्य होते हैं,
उनका वह धिःकार करता है। यह भी गुरु का नाम लेकर ढोंग ही करना है। तन, मन, धन गुरु को ही अर्पण
करना चाहिये, ऐसा शिष्य को उपदेश देकर जो गुरु स्वयं धन का संग्रह करता है, वह गुरु के नाम पर ढोंग ही
है। जो गुरु स्वयं ही धन का लोभी है, वह शिष्य को कैसे तारेगा ? द्रव्यलोभ चीज ही ऐसी है कि जो गुरु को
ढोंगी बनाती है जो बदमाश शिष्य व्यक्ति गुरु का धन लूटने के लिये अपनी गरीबी का बहाना कर उपदेश लेने
जाता है, वह शिष्य भी ढोंगी और शठ है। गुरु के उपदेश से जिसे ज्ञान प्राप्त होता है, उस अहंकार से जो गुरु
को क्षुद्र मानने लगता है और उसका उपहास करता है, वह भी ढोंग का ही लक्षण है। 'ब्रह्मरूप' की सच्ची प्राप्ति
होने पर 'अहं ब्रह्म' 'मैं ही ब्रह्मस्वरूप हूँ', यह स्फूर्ति भी सहन नहीं होती। फिर वहाँ 'मैं ज्ञाता हूँ' यह कहना
भी कपट की बात है। वह अलंकरण के गुप्त दंभ से ही उत्पन्न होती है। जीव का स्थान देह के मध्यभाग में है,
जहाँ दंभ का अधिष्ठान रहता है। मन उसमें सहायक होकर ज्ञान का अभिमान उत्पन्न करता है। इस दंभ का
जितना कौतुक किया जाता है, वह आश्चर्यजनक है। जो स्वयं को अग्निहोत्री और याज्ञिक कह कर घूमते हैं, वे
ही भिक्षा माँग कर निर्वाह करते हैं। इस प्रकार द्रव्यलोभ में वेदपाठ करने वाले भी फँस गये हैं। परमार्थ की पोथी
छोड़ कर जो नाना प्रकार से ब्रह्मज्ञान पढ़ाते हैं, वे ज्ञाता भी दंभ के कारण द्रव्य की आसक्ति तथा धनलोभ में फँसे
हुए हैं। मंत्र-तंत्र की कथा का क्या वर्णन करें ? मुख्य जो गायत्री मंत्र है उसका भी ब्राह्मण विक्रय करते हैं और
स्वयं को स्वधर्म निष्ठा के कारण पावन कहते हैं। उन्हें ढोंगी समझो। ढोंग के कारण संन्यासी भी चक्कर में आ

तेईसवाँ अध्याय ६११
जाते हैं क्योंकि उन्हें भी लौकिक व्यवहार का पालन करना पड़ता है। जिस उद्देश्य से उन्होंने मस्तक का मुण्डन
किया है, उस (ब्रह्मचिंतन) को वे भूल ही जाते हैं। मिष्ठान्न तथा सुस्वादु भोजन और मानसम्मान को ध्यान में
रखकर संन्यासी स्नान आदि की पवित्रता का पालन करते हैं किन्तु अपने मन को शुद्ध कर ही नहीं पाते।
दांभिकता के चलते वाद-विवाद युक्त व्याख्यान भी देते हैं। दूसरे का द्रव्य और अन्न प्राप्त करने के लिये अथवा
अपने देह की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये झूठी सात्विकता का प्रदर्शन करते हैं। अर्थ के कारण होने वाले चौथे अनर्थ
दंभ का यह लक्षण है। द्रव्य के पास काम भी बस्ती करके रहता है। वह अत्यन्त प्रबल होने के कारण उसे
जीतना बहुत कठिन है। जहाँ द्रव्य रहता है, वहाँ उसके साथ अत्यन्त कष्टकारी कामासक्ति रहती है। जब पास में
द्रव्य नहीं रहता तब अपेक्षाकाम (द्रव्य प्राप्त करने की इच्छा) रहता है, वह अंतर्बाह्य अत्यन्त कष्ट देता है और
अनेक दुःसह भोग भोगने के लिये बाध्य करता है। द्रव्य प्राप्त होने पर उन्मादकाम (मदोन्मत्तता) आता है और
वह मनचाही स्त्री से समागम कराकर नाना प्रकार के अधर्म उत्पन्न करता है। धनी लोगों से ऐसे प्रकार के निंद्य
कर्म होते हैं। काम द्रव्य के पास बिलकुल चिपका रहता है इसलिये वह सदा धनवानों का छल करता रहता है।
जहाँ द्रव्य रहता है वहाँ काम उफनता रहता है और रात-दिन विषय की इच्छा जोर मारती रहती है। इस प्रकार
द्रव्य से होने वाला पाँचवाँ अनर्थ उद्दाम काम है जो सदा द्रव्य के पास रहता है। जहाँ काम हो वहाँ क्रोध का
अपनी फौज के साथ रहना आवश्यक बात है। इच्छित वस्तु प्राप्त होने के मार्ग में कोई अड़चन हो तो वहाँ क्रोध
कूद पड़ता है। वह पगलाकर ऐसा तांडव करता है कि तपों की राशियाँ स्वाहा हो जाती हैं। जप, तप, नियम, धर्म
आदि कर जो भी अलभ्य साधन किया रहता है वह सब क्रोध एक बार बिफरने पर क्षणार्ध में स्वाहा हो जाता
है। धन का उल्लेख करने की देर है कि तत्काल प्रचण्ड क्रोध उत्पन्न हो जाता है जो जान की नौबत ले आता है।
इस प्रकार द्रव्य के साथ यह अतिक्रोध रहता है। द्रव्य प्राप्ति में कोई प्रतिबन्ध लग जाय या द्रव्य खर्च करने की
बात आ जाय तो उस समय क्रोध संतप्त हो जाता है और उन्मत्त होकर बैर रखता है। द्रव्य के पास प्रबल क्रोध
रहता है यही छठवाँ अनर्थ है। द्रव्य के पास अहंकार भी विचित्र परिस्थिति में रहता है। उसके बारे में भी बताता
हूँ। द्रव्य के कारण जब मनुष्य अहंकार से फूल जाता है तो उसे अपना बाप भी नहीं दिखाई देता। माँ को भी
बदनसीब कहता है। सिद्ध, साधक अथवा तपस्वी को देखकर उनका उपहास करता है और कहता है, "जो
दरिद्र होते हैं, वही संन्यासी बन जाते हैं। हरि भजन करने वालों का मखौल उड़ाता है। वैसे भी अमीरी का बल,
तिस पर यदि ज्ञान भी प्राप्त हो जाय तो फिर उसमें ऐसा अहंकार चढ़ जाता है मानों अजगर ने बच्चा निगल लिया
हो। द्रव्य और ज्ञान के अहंकार का यह लक्षण ही है कि वह सद्गुरु से ही द्वेष करने लगता है, उसके भाषण की
अवहेलना करता है और अन्त में उसका धिःकार कर उसकी अवहेलना करता है। वह गुरु के दोष देखता है,
उसे मूर्ख सिद्ध करता है और स्वयं को ज्ञानी मानता है। वह सद्गुरु को भ्रान्त कहता है और जो उसका सम्मान
करता है उससे वह द्वेष करता है। यह अहंकार कैसा विचित्र है। वह सबके गुणदोष ही देखता है। वह किसी
गुण को सही नहीं मानता। दोष सुनते ही उसे वह सच मान लेता है। अहंकारी व्यक्ति सामने यदि कोई सात्त्विक
पुरुष आता है तो उसे वह बिलकुल खराब मानता है और उस वृत्ति के मनुष्य को पागल और आर्ष मानता है।
चक्कर आकर जमीन पर गिरने से भले ही सिर झुक जाय अन्यथा अहंकारी पुरुष किसी व्यक्ति को उसके सामने
सिर झुकाने के योग्य नहीं समझता। फिर लोगों को सम्मान देने की बात कौन करे? और पिता की क्या प्रतिष्ठा
है? धन का उसे इतना अधिक अहंकार रहता है कि सारे ब्रह्माण्ड में वह अपने को ही बड़ा आदमी मानता है।
कोई गुरु की सेवा करने में ही एकनिष्ठ रहता है लेकिन उसे भी अपनी गुरु सेवा के बारे में अहंकार रहता है।

६१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वही अहंकार उसके लिये बाधक होता है। इस प्रकार मनुष्य का अति अहंकार से उन्मत्त होना, द्रव्य के कारण
होने वाला सातवाँ अनर्थ है। अब द्रव्य के पास मद रहता है, उसका भी सम्बन्ध ब्राह्मण बता रहा है। जिसकी
आँखों में धन का नशा चढ़ता है वह खुली आँखों से ही अन्धा हो जाता है। वह शब्दों का उपदेश कानों से नहीं
सुनता। हमेशा द्रव्य के ही नशे में रहता है। द्रव्य के मद से अहंता बढ़ती है, द्रव्य के मद से औद्धत्य आता है
और द्रव्य के मद से मनुष्य चाहे जैसे अधर्म करता रहता है। धन का मद अत्यन्त अमंगल है। वह चढ़ने पर
उतरने में कष्टकारी हो जाता है। ऐसा मनुष्य योग्य-अयोग्य का विचार न कर विचित्र योनि में विहार करता रहता
है। जो द्रव्य के मद के वश में होता है, किसी से नहीं डरता। जहाँ नहीं जाना चाहिये वहाँ स्वयं जाता है, जो
नहीं खाना चाहिये वह खूब खाता है। जिसकी संगत नहीं करनी चाहिये, उसकी संगत करता है, जो कर्म नहीं
करना चाहिये वह करता है, जो नहीं बोलना चाहिये वह बोलता है और लोगों में उन्मत्त बनकर आचरण करता
है। स्वयं क्या कर रहा है, इसे नहीं देखता और दूसरों के दोष गिनाता है। बाप की बात भी नहीं सुनता। द्रव्य के
मद ने उसे इतना पागल कर दिया होता है। जो सिखलाओ वह नहीं सुनता और जिसे नहीं करने के लिये कहा
जाय वह अवश्य करता है। उसी प्रकार अपने मुँह से साधु की चाहे जैसी निन्दा करता रहता है। अपनी जाति का
आचार भी नहीं करता। दोषपूर्ण आचरण और अनाचार नहीं मानता और बड़ों का विचार भी नहीं सुनता। यौवन
के जोर से वैसे ही बलवान रहता है तिस पर धन का मद, इससे वह अत्यधिक उन्मत्त हो जाता है और सीधे
रास्ते पर नहीं चलता। वह स्त्री की इच्छा से व्याकुल हो जाता है, कुल और शील का विचार ही नहीं करता,
सुबह और शाम का विचार नहीं करता और गधे जैसा आचरण करने लगता है। परस्त्री की अभिलाषा कर दिन
में ही उसके साथ रममाण होता है। विकेशा स्त्री का भी अंगीकार करता है। पाप से जरा भी नहीं डरता। मद्य का
नशा शीघ्र उतर जाता है लेकिन धन का नशा उससे भी भयंकर है। मृत्यु आने पर भी वह नहीं उतरता। धन का
नशा अत्यन्त अनर्थकारी है। यही आठवें अनर्थ का लक्षण है। अब द्रव्य के पास भेद भी किस पूर्णता के साथ
रहता है, इसका वर्णन ब्राह्मण स्वयं कर रहा है। भेद द्रव्य की कोख से ही पैदा हुआ है। जहाँ धन रहता है वहाँ
मानों भेद का ही शासन रहता है। वह धन के पास दिन-रात पहरा देता है। हाथ में काफी धन आने के बाद वह
माँ से अलग रखता है, बाप को फँसाता है और पत्नी को भी मालूम नहीं होने देता। बाप के पास कितना धन है
इसका अन्दाजा लड़के को भी नहीं होने पाता, फिर औरों की क्या बात की जाय? द्रव्य के पास जो भेद है वह
संसार में अन्य कहीं भी नहीं होता। शस्त्र का प्रहार सहन कर भाई रणभूमि में अपने भाई की सहायता करता है
लेकिन वही भाई जब प्राप्त द्रव्य को बाँटने लगते हैं तो भाई-भाई का नाता ही मानों भूल जाते हैं। मित्र अपने
मित्र के लिये प्राण दे देता है लेकिन द्रव्य उसमें प्रवेश कर मैत्री को ही संशयास्पद बना देता है। ऐसे द्रव्य में
भयंकर भेद है। जो धन गाँठ में बाँध कर रखा है उसे भी वह बार-बार देखता रहता है। इस प्रकार द्रव्य के पास
भेद रहता है, वही नौवे अनर्थ का लक्षण है। द्रव्य के साथ कमाल का बैर भी रहता है। ब्राह्मण अपने अनुभव से
उस बैर का लक्षण बता रहा है। द्रव्य का सम्बन्ध पिता-पुत्र में विरोध उत्पन्न करता है। सगे भाइयों को भी बैरी
बनाता है। अपने निकट के इष्ट मित्रों में भी द्रव्य लोभ कलह उत्पन्न करता है। प्राणों से भी प्रिय मित्रों को भी
द्रव्यलोभ शत्रु बना देता है। द्रव्यलोभ अत्यन्त अमंगल और दुस्तर शत्रु है। भाई-भाई में कलह उत्पन्न हो जाने के
कारण, धन के बँटवारे में उसे अधिक राशि नहीं मिलती इसलिये जो लोग न्यायपूर्वक बँटवारा करते हैं उनसे बैर
करता है। जिस माँ के गर्भ से जन्म लिया, जिसका स्तनपान किया उसी माँ से धन के लोभ में बैर करता है।
द्रव्य माँ को ही वैरन बना देता है। उसे घर से बाहर निकाल देता है और फिर कभी उसका मुँह नहीं देखता।

तेईसवाँ अध्याय ६१३

जिसके योग से सांसारिक बन्धन से मुक्त होता है और जिसके शब्दों के योग से पावन होता है उस सद्गुरु के
साथ भी द्रव्यलोभ बांतचीत बन्द करा देता है। उस द्रव्य के अभिमान का महत्त्व जरा देखिये। वह सद्गुरु में भी
बैर उत्पन्न कर देता है। जो द्रव्य का अभिमानी है वह किसी के साथ भी निर्वैर नहीं रहता। यही निरूपण दसवें
अनर्थ का लक्षण है। अब द्रव्य अविश्वासी कैसे होता है, सुनो। द्रव्य के अभिमान का ऐसा प्रताप है कि जिसके
कारण पुत्र अपने पिता पर भी विश्वास नहीं करता। भाई के प्रति भी पूर्ण अविश्वास रहता है, फिर औरों के प्रति
विश्वास की क्या बात की जाय ? 'आत्मा वै पुत्रनामासि', पुत्र अपना आत्मा ही है, ऐसा श्रुतिवचन है। ऐसा पुत्र
जो मेरे सर्वस्व का मालिक है, उस पर भी जो विश्वास नहीं करता ऐसा द्रव्यलोभ अत्यन्त अविश्वासी है। धर्म,
अर्थ और काम में पूर्णरूप से साथ देने की जो शपथ विवाह के समय ली थी और जिसका विश्वास सम्पादन
करने के लिये पूर्वजों की प्रतिष्ठा का विश्वास दिला कर जिससे विवाह किया था और जिसने अपना तन-मन
अपने पति को ही अर्पण किया था, ऐसी धर्मपत्नी के साथ भी यह द्रव्यलोभ अविश्वास करता है। नौ महीना जो
अपने उदर में सँभालती है, सदासर्वदा विष्ठामूत्र साफ करती है, उस माँ पर भी वह विश्वास नहीं करता। जिसे
द्रव्य का अहंकार होता है वह सद्गुरु पर भी विश्वास नहीं करता। द्रव्य को सम्मान देने वाला मनुष्य पूर्ण
अविश्वासी रहता है। अविश्वास का मुख्य कारण एक द्रव्य है और दूसरी स्त्री, इसे स्मरण रखो। इनमें जिसका
मन लिप्त रहता है वह पूर्णरूप से अविश्वास से भरा रहता है। जो द्रव्य को ही सम्मान देने वाला तथा पत्नी के
पीछे पागल रहता है उसके हृदय में रहने वाला आत्मा विन्मुख होता है। सद्गुरु भी उसकी उपेक्षा करते हैं।
अविश्वास से ऐसा अनर्थ होता है। पुराणों में भी अविश्वास को सारे दोषों का मुकुटमणि कहा गया है। वह
अविश्वास प्रकट होते ही तत्काल वृत्ति का नाश कर देता है। अविश्वास से जब अभिमान की भेंट होती है तो
मुक्त की मुक्तता समाप्त होती है। फिर वह अविश्वास विकल्प की प्रेरणा से उसे उलटे देह के बन्धन में डालता
है। अविश्वास जब चित्त में भरा हुआ है और उसी समय वह बड़े अभिमान से 'मैं ज्ञाता' हूँ, कहता है तब
आस्तिवृत्ति देखते ही पलायन कर जाती है और चारों ओर नास्तिकता ही नास्तिकता दिखायी देती है। अविश्वास
के आगमन के साथ ही सद्भाव सपरिवार भाग जाता है और सारे त्रिभुवन में सद्भाव का अभाव हो जाता है।
फिर अविश्वास विकल्प के सहारे ही सारे व्यवहार चलाता है। अविश्वास के साथ विकल्प रात-दिन
आनन्दपूर्वक रहता है और जहाँ अविश्वास को प्रवेश मिलता है, वहाँ विकल्प ही उसे लूट कर नष्ट कर देता है।
यह अविश्वास एक बार मन में घर करते ही परमार्थ के राज्य को उजाड़ कर देता है और सद्गुरु के भी दोष
दिखाता है। साक्षात ब्रह्मदेव का भी विश्वास नहीं करता। इसलिये सारे दोषों का राजा अविश्वास के अतिरिक्त
अन्य कोई नहीं है। वह स्वयं महासिद्धियों को पूरी तरह नष्ट कर देता है और जहाँ अविश्वास हमला करता है
वहाँ से परमार्थ भाग गया ऐसा समझ लो। विकल्प का हमला होते ही, वह समय व्यर्थ ही हो जाता है। सिद्ध की
सिद्धियाँ नष्ट हो गयीं, साधक तो बेचारे बड़ी सफाई से मारे गये और जो साधारण होश में थे वे भी जंगल की
ओर भाग गये क्योंकि अविश्वास ने श्रद्धा का उद्यान ही नष्ट कर दिया। क्रोध यमनियमों के शहर ध्वस्त कर देता
है और तपस्वी लोगों की होली जला देता है। मोहरूपी हाथी मोक्षरूपी फलों से लदी बेलों को उखाड़ देता है
और शमदम का झोंपड़ा खन कर चौराहे पर फेंक देता है। विचारों के रास्ते सूने हो जाते हैं, उस रास्ते पर कोई
पैर नहीं रखता। व्रत, उपवास आदि के जो नन्हे कोमल उपवन थे उन्हें विकल्प ने देखते-देखते जला कर स्वाहा
कर दिया। ज्ञान के अभिमानी जब ऐसे अविश्वास से मिलने गये तो विकल्प ने उन्हें अभय देकर अपने पास रख
लिया। ऐसे विकल्प के आगे परमार्थ की क्या हस्ती है ? विकल्प का बल बड़ा होता है, वह तत्काल अनर्थ कर

६१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
छोड़ता है। जो हृदय से ही अविश्वासी रहता है वह सदा गुणदोषों का ही विचार करता रहता है और सदा परमार्थ
से द्वेष करता है। उसका यह स्वभाव ही है। इस प्रकार अविश्वासी पुरुष परमार्थ से दृढ़ बैर रखकर रहता है।
इसलिए जो अंतःकरण से अविश्वासी ही है, वह यदि हँस कर भी सामने आ जाय तो गरीब को उसके पास नहीं
जाना चाहिये। सारे दोषों में प्रबल, सारे दोषों का राज्य जिसे प्राप्त है, वह यह 'अविश्वास' नाम का ग्यारहवाँ
अनर्थ द्रव्य के साथ रहता है। यह अविश्वास ग्यारहों इन्द्रियों पर पूरी तरह अविश्वास करता है इसलिये उसे
ग्यारहवाँ स्थान दिया गया है। इस अविश्वास को मन में स्थान रहता है। मुख्य रूप से स्पर्धा का स्थान, अर्थात्
अधिक विद्या या अधिक धन ! स्पर्धा का जन्मस्थान यही है। यहीं से वह आगे बढ़ती है। विद्या प्राप्त होने पर
पण्डितों में एक-दूसरे की निन्दा शुरू हो जाती है, वह मुख्य गुरु से ही स्पर्धा करता है, यही विद्या का स्पर्धा
लक्षण है। पास में द्रव्य हो तो स्पर्धा और भी जोर मारती है। वह कहता है "कुबेर दूसरे के धन से अमीर हुआ
है। लेकिन मैं अपने सत्ता के बल पर ही धनी हुआ हूँ। मेरे धन के आगे गिनती में गंगा नदी के कंकड़ भी कम
पड़ेंगे। मेरी सम्पत्ति के सामने भला कौन खड़ा रह पायेगा?" फिर जिन-जिन अमीरों को वहाँ देखता है उन
सबकी वहाँ अप्रतिष्ठा कर देता है। इस प्रकार द्रव्य का आश्रय पा कर 'स्पर्धा' यह बारहवाँ अनर्थ उस द्रव्य में
सदा रहता है। अब एक शब्द में ('व्यसनानि' इस पद में) तीन अर्थों का मेला एकत्र हुआ है, वह भी द्रव्य के
पास ही रहता है। उसके भी विविध प्रकार सुनो। स्त्री, द्यूत और मद्यपान इन तीनों को द्रव्य बढ़ाता है। ये तीन
अनर्थ अमीर व्यक्ति पर एक साथ गहराते हैं। निर्धन पुरुष को पत्नी भी पत्थर के समान समझती है। ऐसे पुरुष
का मुँह देखकर उसकी स्त्री भी मुँह पर थूकती है। निर्धन पुरुष के घर में स्त्री-पुरुषों में सदा कलह रहता है।
उसकी स्त्री अनेक प्रकार से उसकी भर्त्सना कर उस पुरुष को घर से बाहर निकाल देती है। धनवान पुरुष के
पास उसकी स्त्री कैसे आगे-पीछे घूमती है ? उसी प्रकार जैसे कुतिया भाकरी का टुकड़ा देखकर 'कूँकूँ' करते
हुए दुम हिलाती है। लेकिन वह धन नष्ट होते ही वह स्त्री गुस्से में पति पर बरसती है, "मुझे आपकी बातें नहीं
सुहातीं। दिन-रात बच्चों से परेशान रहती हूँ और रात को आप अपने पास खींचते हैं। मुझसे नहीं सहन होता।
हाथ में फूटी कौड़ी भी नहीं है। क्या सुख रखा है, ऐसे जीने में?" इस प्रकार जोर-जोर से उसकी भर्त्सना कर
पति को दूर धकेल देती है। इस प्रकार निर्धन पुरुष को उसकी स्त्री भी अनुकूल नहीं होती, किन्तु अमीर व्यक्ति
को स्त्री की पीड़ा दिन-रात होती रहती है। अमीर व्यक्ति को देखकर वेश्या उसके आगे-पीछे घूमती है। उसके
हावभाव से लोग फँस जाते हैं। एक बार वेश्या से कामसंग होने के बाद उनमें निरन्तर काम-लिप्सा जगती है
और उसके नशे में वे सेठ-साहुकार मद्यपान करने लगते हैं। जो मद्यपान से उन्मत्त हो जाता है, वह स्वेच्छा से
जुआ खेलने लगता है। इस प्रकार ये तीनों अनर्थ द्रव्य के पास ही रहते हैं, इसे निश्चित जान लो। इस प्रकार
द्रव्य के पन्द्रह अनर्थों का साद्यंत वर्णन किया। इस प्रकार अमीर व्यक्ति को धन के पास नाममात्र का भी सुख
नहीं मिलता।
एते पञ्चदशानर्था ह्यर्थमूला मता नृणाम्।
तस्मादनर्थमर्थाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत् ॥ १९॥
सारांश, मूर्ख हो या पण्डित हो, जो भी धनसंचय करते हैं उनमें ये पन्द्रहों अनर्थ उत्पन्न होते हैं। पैसा
अथवा द्रव्य केवल नाम के लिये 'अर्थ' है अन्यथा वह साक्षात अनर्थ है। इसलिये जो स्वहितेच्छु हरिभक्त हों,
उन्हें निश्चित रूप से 'अर्थ' का त्याग करना चाहिये। जिस प्रकार मक्खी मकड़ी को नहीं सूँघती, या जैसे

तेईसवाँ अध्याय ६१५
खटमल तेल के पास नहीं जाता, अथवा दीमक अग्नि को नहीं लगती, उसी प्रकार वह द्रव्य को स्पर्श नहीं
करता अथवा जिस प्रकार अग्नि में पड़ा लवण तड़तड़ कर बाहर आ जाता है, उसी प्रकार मोक्ष की इच्छा से
जो अपना द्रव्य तत्काल फेंक देता है वही स्वहितेच्छु हरिभक्त है। बचनाग विष क्षण भर के लिये मधुर लगता
है लेकिन उसका परिणाम मृत्यु ही होता है। उसी प्रकार अर्थ अनर्थ का कारण बनता है। इसलिये जो मोक्ष की
आकांक्षा करता है उसे हाथ में धन नहीं लेना चाहिये। काया, वाचा तथा मन से सचमुच ही द्रव्य का त्याग
करें। सारे भेद अर्थ के कारण उत्पन्न होते हैं यह पहले भी बताया गया है। किन्तु श्रीकृष्ण वही बात बार-बार
स्पष्ट करके बताते हैं।
भिद्यन्ते भ्रातरो दारा पितरः सुहृदस्तथा।
एका स्निग्धाःकाकिणिना सद्यः सर्वेऽरयःकृताः ॥ २० ॥
एक कौड़ी भी इष्टमित्रों की मित्रता तोड़ देती है। भाइयों का स्नेह बिगाड़ती है और सहृदों का सौजन्य नष्ट
करती है। पितापुत्र में जो विरोध, स्त्री पुत्र में जो कलह होता है उसका सम्बन्ध इस अर्थ से है, यह जान लो। वह
इष्टमित्रों का प्रेम ही नष्ट करता है। 'काकिनी', यानी बीस कौड़ी लेकिन वह आप्तों का सम्बन्ध तोड़ देती हैं।
इतना ही नहीं, उनमें से एक फूटी कौड़ी भी इष्टमित्रों में भेद उत्पन्न करती है।
अर्थेनाल्पीयसा ह्येते संरब्धा दीप्तमन्यवः।
त्यजन्त्याशु स्पृधो घ्नन्ति सहसोत्सृज्य सौहृदम् ॥ २१॥
द्रव्य का लोभी मनुष्य अल्प द्रव्य के लिये भी अंतःकरण का मित्रत्त्व छोड़कर क्रोध से संतप्त होकर एक-
दूसरे से धोखा करते हैं। अर्थ मनुष्य को अनर्थ में डालकर उसका प्राणान्त भी कराता है। इस प्रकार अर्थ अपने
स्वार्थ पर भी आघात करता है। जब तक मनुष्य जीवित है, तब तक यह द्रव्य अनर्थ करता है और मृत्यु के बाद
नरक के द्वार पर ले जाता है। अब यह द्रव्य किस प्रकार उत्तम देह को नष्ट कर देता है, यह भी सुनो।
लब्ध्वा जन्मामरप्रार्थ्यं मानुष्यं तद् द्विजाग्यताम्।
तदनादृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम् ॥ २२ ॥
कोटि-कोटि जन्मों का पुण्य हो, तभी इस कर्मभूमि में ( भरतखण्ड में) मनुष्यदेह प्राप्त होता है। उसमें भी
सारे वर्णों में अग्रगण्य, सामर्थ्यवान् ब्राह्मण वर्ण में जन्म और ब्राह्मणों में भी उत्तम कुल में जन्म इस मृत्युलोक में
प्राप्त करने के लिये देवता भी मृत्यु की कामना करते हैं। स्वर्ग के इन्द्रादि जो देवता हैं वे भी ऐसे जन्म की इच्छा
करते हैं। सत्यलोक तक का अद्भुत ऐश्वर्य जिन्हें प्राप्त हुआ है वे भी इस जन्म की इच्छा करते हैं। इतना ही
नहीं, बल्कि दिन-रात उसकी उत्कंठा करते रहते हैं। ऐसे इस जन्म में यदि भगवद्भक्ति करें तो चारों मुक्तियाँ
कदमों पर गिरती हैं इसलिये देवता भी ऐसे जन्म प्राप्ति की कामना करते हैं। ऐसा उत्तम जन्म प्राप्त होने पर भी,
मैं त्रिभुवन में अत्यन्त अभागा रहा और अपने स्वार्थ की उपेक्षा कर द्रव्यलोभ में द्रव्य के ही मोह में फँस गया।
द्रव्यलोभ से भ्रान्त होकर अथवा लोगों में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिये जो भगवद्भक्ति की उपेक्षा करता है, उसे
दुर्गति प्राप्त होती है। वह दुर्गति कैसी ? तो द्रव्यलोभियों को नरकवास प्राप्त होता है और वे चौरासी लाख
योनियों में अत्यन्त दुःख से गर्भवास भोगते रहते हैं। जिस ब्राह्मण जन्म में स्वर्ग और मोक्ष सहज प्राप्त होते हैं,
उसी अर्थ का रहस्य वह द्रव्यलोभी स्वयं बता रहा है।

६१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं प्राप्य लोकमिमं पुमान्।
द्रविणे कोऽनुषज्जेत मर्त्योऽनर्थस्य धामनि॥ २३॥
अपने धर्म के अनुसार आचरण करने पर ब्राह्मण को स्वर्गप्राप्ति की इच्छा होती है। उस समय वह ब्राह्मण
श्रेष्ठ इन्द्र चन्द्रादि का स्थान भी सरलता से प्राप्त कर सकता है। जिसके यज्ञकर्म से औरों को भी स्वर्गप्राप्ति होती
है, ऐसा स्वर्ग ब्राह्मणों के हाथ की चीज होने के कारण वह सहज ही प्राप्त होता है। लोकेषणा, पुत्रेषणा और
दारैषणा इन तीन ईषणाओं को छोड़ कर जिस ब्राह्मण से निष्काम स्वधर्माचरण होता है, उसके चरणों पर मोक्ष भी
गिरता है और रात-दिन उसका आज्ञाधारी सेवक बनकर रहता है। वह जिस पर कृपा कर दे वे भी मोक्ष पद प्राप्त
कर लें इतना सामर्थ्य उस ब्राह्मण के पास सहज ही होता है। स्वर्ग जिसके पैर के नीचे की सीढ़ी है, मोक्ष
जिसका आज्ञाकारी सेवक है, ऐसे ब्राह्मणत्व की महत्ता होने पर भी द्रव्य के लोभी ब्राह्मणजन्म का नाश कर देते
हैं। ब्राह्मण जन्म प्राप्त होने पर जन्म-मरण पूरी तरह समाप्त हो जाता है लेकिन द्रव्य के लोभ में द्रव्य प्राप्त कर
मैं फँस गया। इस संसार में मनुष्य का जन्म दुर्लभ है तिस पर ब्राह्मण का जन्म तो और भी दुर्लभ है। लेकिन वह
प्राप्त होने पर भी मैं स्वयं द्रव्य लोभ के कारण फँस गया। ब्राह्मण का देह प्राप्त कर द्रव्य के कारण बड़े-बड़े
लोग भी नष्ट हो गये हैं। अर्थ सचमुच अनर्थ का घर है और वह दुर्धर दुःखों को अवश्य बढ़ाता है। द्रव्य अनर्थ
का ही स्थान है, इसलिये उसका पूर्णरूप से त्याग करना चाहिये। इस प्रकार वैराग्य से पूरी तरह तपा हुआ वह
ब्राह्मण स्वयं बताने लगा। (आशंका) दैवयोग से यदि सम्पत्ति प्राप्त हो तो क्या उसे घूरे पर फेंक दिया जाय ? या
पानी में डुबो दिया जाय ? द्रव्य का त्याग कैसे किया जाय ? उस द्रव्यत्याग का वर्णन वह ब्राह्मण स्वयं कर रहा
है। जो धनसम्पन्न हों उन्हें ध्यानपूर्वक सुनना चाहिये।
देवर्षिपितृभूतानि ज्ञातीन् बन्धूंश्च भागिनः।
असंविभज्य चात्मानं यक्षवित्तः पतत्यधः ॥ २४॥
दैवयोग से यदि धन मिले तो पंचमहायज्ञ (भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ और मनुष्ययज्ञ) करना
चाहिये। उत्साहपूर्वक बड़े उत्सव के साथ भगवान का पूजन करना चाहिये। स्वयं पितृतर्पण करना चाहिये।
प्रतिवर्ष छानबे श्राद्ध करने चाहिये। (अमावस्या १२, युगादितिथि ४, मन्वादितिथि १४, सूर्यसंक्रान्ति १२, वैधृति
१२, व्यतिपात १२, महालय १५, अष्टैका ५, अन्वष्टका ५ तथा पुर्वेद्यु ५ कुल ९६) स्वयं गया यात्रा कर पितरों
का उद्धार करना चाहिये। जीवित बड़े लोगों को त्रिकाल नमस्कार करना चाहिये। उनका कभी अपमान नहीं
करना चाहिये। उनका गौरव करना चाहिये। उन्हें उनकी इच्छानुसार भोजन देना चाहिये। यथाशक्ति धन देना
चाहिये और उनकी सेवा कर उन्हें सुखी करना चाहिये। पिता साक्षात् नारायण स्वरूप है और माँ लक्ष्मीस्वरूप है।
ऐसी भावना से जिसके हाथ से पितृ-मातृ सेवा घटती है वह एक सत्पुत्र है। जिसकी सेवा से पितर संतुष्ट होते हैं,
वही सच्चा पितृतर्पण है और जीवित अवस्था में उनकी अवज्ञा करना अनाचार है। मृत्यु के बाद श्राद्ध करना तो
केवल लोकाचार है। बड़ों के वचन पर जो विश्वास नहीं करता वह पाप की राशियाँ एकत्र कर रहा है, यह जान
लो और जो पिता के वचन पर विश्वास करता है उसके पास मोक्ष भी सेवक बन कर रहता है। जीवित पितरों को
और मृत पितरों को किस प्रकार तृप्त करना चाहिये, इसका रहस्य तुम्हें बताया। इसी का नाम है, पितृभजन ! अब
ऋषिपूजन कैसे किया जाता है, यह भी सुनो। सम्मान के साथ ब्राह्मण को लाकर श्रद्धापूर्वक उसके चरण धोये।
उसके चरणों के तीर्थ का वन्दन कर उसका कुछ भाग प्राशन करें और कुछ का अपने शरीर पर अभिषिंचन करें।

तेईसवाँ अध्याय ६१७
धूप, दीप आदि से यथासांग पूजा करें और उसकी रुचि का उत्तम अन्न उसे तृप्त होने तक खिलायें। उसे
यथाशक्ति द्रव्य दें। इसी का नाम है ऋषिपूजन। ब्राह्मण स्वयं ही महर्षि है। ब्राह्मण के योग से सनत्कुमार तृप्त
होकर ढकार देता है। भाई, सगे-सम्बन्धी, इष्टमित्र आदि की भयंकर दारिद्र्य पीड़ा उन्हें द्रव्य देकर कम करें,
यही मुख्य रूप से श्रेष्ठ धर्म है। अपने परिवार को पीड़ा देकर दूसरे को अन्न धन देना पूरी तरह अधर्म है। वह
पुण्य शुद्ध नहीं है। अपने कुटुम्ब के सभी लोगों को पूरी तरह सुखी कर, फिर जो धन बचे उसे परोपकार में खर्च
करना चाहिये। यदि कोई अतिथि आ जाय तो उसे अवश्य अन्न देना चाहिये। वह यदि विन्मुख होकर जायेगा तो
अपना सारा पुण्य नष्ट हो जाता है। सभी दानों में अन्नदान श्रेष्ठ है। दीन-गरीबों को सम्मान कर उन्हें अत्यन्त
भक्तिभाव से सुरुचि वाला भोजन देना चाहिये। जो कुटुम्ब को सुखी करता है, गरीबों को पेटभर भोजन कराता है,
लेकिन स्वयं भूखा रहता है, यह भी अधर्म है। जैसे हम गरीबों को भोजन कराते हैं, उनमें खुद को भी एक गरीब
समझ कर सबके साथ भोजन करें। पंक्ति प्रपंच (पंगत में खाना परोसने में भेदभाव करना) यह भी अन्नदान में
आने वाली बाधा है। इसलिये सबके साथ ही भोजन करें। द्रव्य का उचित व्यय अनाथों के प्रेतसंस्कार में करें,
गरीबों के उद्धार में करें अथवा अयाचित के घर भिजवा देना चाहिये। अन्धे, विकलांग, गूँगे, दीन, दुर्बल इनका
जो स्वयं संरक्षण करता है उसका ही धन सार्थक होता है और उसका ही पुण्य शुद्ध समझना चाहिये। साधु और
सज्जन की राह में आने वाले संकट को जो धनवान पुरुष नष्ट करता है, उसकी धर्मशीलता की पताका साक्षात
वैकुण्ठ में लहराती है। दुर्बल भक्त का संरक्षण जो धनवान पुरुष करता है उससे भगवान सन्तुष्ट होता है और उस
भक्त से पहले उसका उद्धार करता है। सद्गुरु के पवित्र चरण सभी मंगलों से परिपूर्ण और सभी कल्याणों में
कल्याणकारी हैं। वहाँ जिसका द्रव्य अर्पण होता है, उसके औदार्यधर्म की ध्वजा सत्यलोक में फहराती है और
वैकुण्ठ तथा कैलास में सर्वत्र उसके यश की भेरी बजती रहती है। स्वधर्म से प्राप्त किया हुआ धन जो सद्गुरु को
अर्पण करता है, वही कर्म करके भी निष्कर्मी है। परमपवित्र एक वही है जो अधिकाधिक भगवद्भक्ति से गुरु
को अपनी सम्पत्ति अर्पण करता है उसे अंगीकार कर लक्ष्मीपति तो अपनी भक्ति से उसे देता है। जिसे एकनिष्ठ
गुरुभक्ति प्राप्त होती है उसके द्वार पर चारों मुक्तियाँ दासी बनकर खड़ी रहती हैं। लक्ष्मीपति तो उससे दूर ही नहीं
होते। जिसका शरीर, मन और धन पूरी तरह गुरुचरणों में अर्पित होता है, उसे संसारभय का स्मरण कल्पांत में भी
नहीं होगा। भाग्य से जो सम्पत्ति मिली है, उसे इस प्रकार खर्च कर भाग्यवान पुरुष उस द्रव्य से निष्ठापूर्वक
परमार्थ प्राप्त कर लेते हैं। जो इस प्रकार द्रव्य खर्च न कर स्वजाति और कुटुम्ब को पीड़ा देता है और स्वयं भी
पेटभर नहीं खाता, उसका संग्रह किया हुआ धन 'यक्षधन' है। इस ढंग से अपने को कष्ट देकर जो 'यक्षधन'
एकत्र किया रहता है, वह अधःपतन का कारण होता है और उस द्रव्यलोभी को भयंकर दुःख प्राप्त होता है। उस
ब्राह्मण ने कहा, मैं भी इसी प्रकार 'यक्षधन' से कंगाल हो गया। हाथ आया हुआ लाभ व्यर्थ चला गया और हाय !
मैं मोक्ष से वंचित रह गया। यक्षवित्त एकत्र कर मैंने अपना ही अहित किया। इस प्रकार दुःखी होकर वह बड़े
कष्ट से अपना दुःख बताने लगा।
व्यर्थयार्थेहया वित्तं प्रमत्तस्य वयो बलम्।
कुशला येन सिध्यन्ति जरठः किं नु साधये॥ २५॥
स्वयं विलास का भोग न कर मैं वाणी और मन इन दोनों को कष्ट देकर उन्मत्त और अविचारी बन गया।
द्रव्यप्राप्ति के लिये प्रयास करने में यौवन, बल और आयु निकल गयी। शरीर पूरी तरह क्षीण हो गया। फिर भी

६१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
द्रव्य की लालच कम नहीं होती। धन की वृद्धि करने में चिन्ता असीम बढ़ गयी। इससे मैं अपना हित भूल गया
और द्रव्यलोभ में कंजूस बन गया। जिस द्रव्य से और जिस जन्म से विवेकशील लोग भूतदया और परोपकार कर
संसार सागर तर गये, वहाँ मुझ अभागे का द्रव्य व्यर्थ गया, जीवन व्यर्थ हुआ, आयु व्यर्थ गयी और मेरा स्वार्थ
डूब गया। आप शायद यह कहेंगे कि जब तक जान में जान है तब तक अपना स्वार्थ सिद्ध कर लिया जाय।
लेकिन अब ऐसी स्थिति में वह भी नहीं हो पायेगा क्योंकि अब द्रव्य और सामर्थ्य दोनों ही नहीं रहे। अधर्म के
कारण सारा धन नष्ट हो गया और वृद्धावस्था ने शक्ति छीन ली। अब मैं केवल जीर्ण-शीर्ण वृद्ध और अभागा
होकर रह गया हूँ। हाय! पैसा प्राप्त करने में सब लोग फँस गये, यह बात कंजूस ब्राह्मण स्वयं बता रहा है।
कस्मात् संक्लिश्यते विद्वान् व्यर्थयार्थेहयासकृत्।
कस्यचिन्मायया नूनं लोकोऽयं सुविमोहितः॥ २६॥
ऐसे द्रव्यलोभ के सम्बन्ध में अज्ञानी लोगों की दशा का क्या वर्णन किया जाय? जो अर्थ को अनर्थकारी
कहते हैं, वे भी द्रव्यलोभी हो जाते हैं इस भ्रम में जो ज्ञाता रहते हैं, वे भी द्रव्य प्राप्त करने के लिये अच्छे-बुरे प्रयास
स्वयं करते रहते हैं इसे याद रखो। ज्ञाताओं के भ्रम के कारण, पूर्णरूप से ईश्वर की माया ही है। अघटित घटना
जिसका लक्षण है उस माया के मोह में सज्ञान धनिक फँस गये। विद्वान लोग कृष्ण की माया में मुग्ध हो गये ऐसा
कहोगे तो यह वस्तुस्थिति का वर्णन नहीं है। वास्तव में वे अपने सुख और विलास के लिये धन कमाते हैं। लेकिन
जो लोग कहते हैं कि विषयोपभोग में सुख है, वे निहायत मूर्ख हैं। यही बात कंजूस ब्राह्मण बता रहे हैं।
किं धनैर्धनदैर्वा किं कामैर्वा कामदैरूत।
मृत्युना ग्रस्यमानस्य कर्मभिर्वोत जन्मदैः॥ २७॥
हाय, हाय! जरा देखिये। सभी वर्गों में पूज्य वह ब्राह्मण भी माया के मोह में फँस जाता है। लेकिन जो देह
नाना प्रकार के उपभोगों से सजाया जाता है, वही नश्वर है। जिस देह को नाना प्रकार के उपभोग लेने हैं उसे
क्षयरोग हो जाता है और अधिक धन प्राप्त करना ही दारिद्र्य का मार्ग है। द्रव्य अनायास मिलता है, इसलिये
श्रीमान् गृहस्थ उसकी उपासना करता है। लेकिन अत्यन्त कष्ट से द्रव्य प्राप्त कर कामवासना का उपभोग लेने में
क्या सचमुच सुख है? कामसुख स्त्री की संगत में लिया जाता है इसलिये वह स्त्री को पालता-पोसता है। लेकिन
वह स्त्री नाना प्रकार से उसका छल करने लगती है और किसी तरह नहीं छूटती है। स्त्री, पुत्र, कामभोग आदि से
देह को सुख दें तो वह देह ही मृत्यु की ओर अग्रसर है। उसका पीछा काल कर रहा है। हर पल काल आयु को
कम करता रहता है। ऐसी स्थिति में सुख की मिठास भी क्या है? लेकिन द्रव्य की इच्छा ने ज्ञाताओं को भी
पागल बना दिया। मेंढ़क साँप के मुँह में जा रहा है, फिर भी वह मछली खाता रहता है और इससे उसका साँप
के मुँह से छुटकारा होता है, उसी प्रकार नाना प्रकार के भोग भोगने से मृत्यु पीछे नहीं हटता। यह सब जानकर
भी ज्ञानी लोग द्रव्य के पीछे अन्धे हो जाते हैं। जो स्वयं कर्त्ता है, उसी के पीछे मृत्यु लगा हुआ है। उसका
समाधान किस भोग से हो पायेगा? यह केवल माया का भ्रम है। उस भ्रम से बड़े-बड़े सिद्ध भी भ्रमित हो गये
हैं। द्रव्य के योग ने यज्ञायाग कर स्वर्गलोक प्राप्त होगा, लेकिन वह स्वर्गभोग भी दुःखदायी है। कर्म से अज्ञानी
बने हुए लोगों का उस भोग का क्षय होने के बाद अधःपतन होता है या, भोग भेजने के लिये सकाम कर्म करो तो
पुनः मरण और पुनः जन्म यही अखण्ड भोगना पड़ता है। द्रव्यलोभी का यह बहुत बड़ा दुःख है, उसे सुख है ही
नहीं। मैं भी ऐसा ही मूर्ख था। लेकिन सौभाग्य से मेरा द्रव्य चला गया।

तेईसवाँ अध्याय ६१९
नूनं मे भगवांस्तुष्टः सर्वदेवमयो हरिः।
येन नोतो दशामेतां निर्वेदश्चात्मनः प्लवः ॥ २८ ॥
पहले मैं बहुत अभागा था लेकिन अब बहुत भाग्यवान हो गया हूँ। मुझ पर श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गये, मुझे
विवेक और वैराग्य प्राप्त हो गया। मैंने एकत्र किया हुआ धन ही मेरा एकमात्र अज्ञान था। उसे पूरी तरह नष्ट कर
श्रीहरि ने मुझ पर बहुत बड़ी कृपा की है। वह भक्तों का अज्ञान हरण करता है इसीलिये उसका नाम श्रीहरि है।
उसने ही मुझ पर पूर्ण कृपा कर मेरे अंतःकरण में विवेक उत्पन्न किया। वैराग्य विवेक के बिना अन्धा रहता है
और विवेक वैराग्य के बिना लंगड़ा रहता है। मैंने अपने हृदय में ये दोनों एक ही साथ उत्पन्न किये। श्रीहरि ने
कृपा की और द्रव्य के साथ मेरा अज्ञान हरण किया और वैराग्य और विवेक इन दोनों को मेरे हृदय मन्दिर में
प्रकाशित किया। लेकिन कब, कहाँ और किस प्रसंग में श्रीहरि ऐसी कृपा करते हैं, यह किसी को नहीं मालूम
होता। भक्तों का चित्त हरण करने के लिये श्रीहरि पहले उनका द्रव्य हरण करता है और द्रव्यनाश से उनका चित्त
शुद्ध कर उन्हें विवेक युक्त वैराग्य प्रदान करता है। इस प्रकार के लेनदेन की कला ब्रह्मादिकों के लिये भी अतर्क्य
है, ऐसा समझ लो। इसलिये वह भगवंत-पूर्ण भाग्यवान है। छह गुण उसके वश में रहते हैं। उसका स्वरूप
अचिंत्य और अनंत है। लेकिन मेरे लिये वह कृपालु बन गया और मेरे लिये मेरे पाप द्रव्य के साथ नष्ट कर
ज्ञानदीप जलाया। भगवान की कृपा हुई यह सच है, लेकिन मैंने यज्ञदेवताओं को फँसाया है, वे नाराज हो जाएँ
तो मुझ पर आघात करेंगे ऐसा कहें तो वह कभी नहीं होगा। हाथ में देदीप्यमान चक्र धारण करने वाला श्रीहरि
जिसका रखवाला है उसके पास विघ्न की हवा भी नहीं आ पायेगी। भगवान उसका वंदन करेंगे। भगवान ने ही
प्रह्लाद को वन्दन कर नृसिंह को शान्त कराया। वह नरहरि ही जिसका रखवाला है, उसके पास विघ्न कैसे
आयेगा। उसने कोटि-कोटि देवताओं को क्षणमात्र में बंदिवास से छुड़ाया है, उसके भक्त का बाल यज्ञादि
देवतागण कैसे टेढ़ा कर पायेंगे? जो समस्त देवताओं का नियामक है जिसके चरण देवतागण भी वंदन करते हैं,
वह भगवान ही जब सहायक है तो उसे विघ्नों की कोई पीड़ा नहीं होगी। जिसके बल से देवता इतने महान हुए
हैं, देवता ही जिसके अवयव हैं, वह श्रीहरि ही जब प्रसन्न हो जाय तो किस विघ्न का वहाँ आना सम्भव है?
श्रीहरि सर्वदेवस्वरूप ही हैं। इन्द्र और चन्द्र मेरे श्रीहरि ही हैं। मुझ दीन पर संसार में कोई विघ्न नहीं आयेगा।
भगवान की इस कृपा का कारण यदि देखा जाय तो मैंने तो कोई साधन नहीं किया। समझ लो कि यह मेरा
पूर्वजन्मों का ऋण भगवान के पास सुरक्षित था। पहले किस जन्म में, किस देश में, किस तीर्थक्षेत्र में, किस वंश
में, मैंने सत्कर्म किया था कि जिसके योग से परमेश्वर मुझ पर प्रसन्न हुआ? या मुझे दुःखी देखकर कृपासागर
श्रीहरि मुझ पर सन्तुष्ट हुए और मुझ पर कृपा की जिससे मैं विवेकसम्पन्न हो गया। जरा देखिये! मुझे दुःख हुआ
जिससे मुझे आत्मसुख का लाभ हुआ। इस संसार सागर को पार करने के लिये वैराग्ययुक्त विवेक यही मजबूत
जहाज है। इस प्रकार वह ब्राह्मण हर्ष से बोला— अब शेष जीवन में मैं एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने दूँगा। सुख-
दुःखों का निर्मूलन कर डालूँगा।
सोऽहं कालावशेषेण शोषयिष्येऽङ्गमात्मनः।
अप्रमत्तोऽखिलस्वार्थे यदि स्यात् सिद्ध आत्मनि ॥ २९ ॥
संसारभय की किसे परवाह है? कोटि-कोटि जन्मों का बदला लूँगा। जो जीवन व्यर्थ गया है उसकी इसी
देह से पूर्ति करूँगा। शरीर अवश्य वृद्ध हो गया है लेकिन मेरा अंतःकरण वृद्ध नहीं हुआ है। इसलिये इसी

६२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अंतःकरण से भगवान का चिन्तन कर संसार बन्धन तोड़ डालूँगा। अब शेष जीवन में कलिकाल के दाँत तोड़
डालूँगा। गर्भवास के दुःख की परत फाड़ कर मृत्यु को मार डालूँगा। जिस देह ने सच्चे, झूठे सभी कर्मों का
आचरण किया, उस देह को ही यहाँ विदेह स्थिति की आत्मभावना से सुखा डालूँगा। आत्मज्ञान का प्रहार कर
देह की बाड़ ही तोड़ डालूँगा और सुख-दुःख का बन्धन तोड़ कर सायुज्य की पताका फहराऊँगा। आज मैं
वैराग्य और विवेक से युक्त होकर अपने स्वार्थ के प्रति सचेत हो गया हूँ। अब मैं जिस परमार्थ को भी साधने का
प्रयास करूँगा, वह मुझे प्राप्त होगा। मेरा ही स्वार्थ सधेगा ऐसा कोई विशेष नियम नहीं है। तो जो भी कोई
वैराग्य विवेक होगा उसे अपने आप ही परमार्थ प्राप्त होने वाला है। वैराग्य विवेक का यही लक्षण है कि देह,
घर, स्त्रियाँ आदि वैभव के होते हुए उसका मन उनमें आसक्त नहीं होता। इसी का नाम है पूर्ण वैराग्य। अस्तु!
मैंने जिस बात की शुरुआत की है उसे देव और देवी इनके साथ पूरे समुदाय के साथ देवाधिदेव मुझे सहायक हों
ऐसी मैं प्रार्थना करता हूँ।
तत्र मामनुमोदेरन् देवास्त्रिभुवनेश्वरः।
मुहूर्तेन ब्रह्मलोकं खट्वाङ्गः समसाधयत्॥ ३०॥
इन्द्रियों में अधिष्ठित समस्त देवताएँ मुझे सहायक हों। परमार्थ सिद्धि तक पहुँचने में वे मेरे इन्द्रियों को
विजय प्रदान करें। जो त्रिभुवनेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है वह भगवान यदि सहायक हो तो सारे देवता मुझे साध्य
होंगे क्योंकि वे सारे श्रीहरि के स्वरूप में ही अंतर्भूत हैं। सारे देवताओं में श्रीहरि का ही स्वरूप है ऐसी भावना
मन में रखकर मैं सारे देवताओं की सेवा करता हूँ। मुझ दीन का उद्धार करने में सहायक होकर वे मुझे भवसागर
से तारें। इस पर आप शायद कहेंगे कि "तुम्हारे जीवन का अब अन्तिम काल आया है। तुम वयोवृद्ध हो गये हो।
अब वृद्धावस्था में यह प्रयास करने का कष्ट क्यों कर रहे हो?" लेकिन ऐसा विचार मन में न आने दें। खटाङ्ग
राजा का नाम प्रसिद्ध ही है। उसने क्षणमात्र में परमार्थ साधा। मेरी आयु तो उससे अधिक ही होगी। सारे देवता
मुझे सहायक हों तो मैं क्षणमात्र में परमार्थ साध लूँगा। आज जैसा विवेक वैराग्य प्राप्त हुआ है, वही जब तक
अटल रहेगा, तब तक दोबारा कलिकाल क्या करेगा? मैं तो संसार पर विजय प्राप्त कर लूँगा। यह पहले कैसा
था? अब इसकी वृत्ति में परिवर्तन हो गया। वह विवेक वैराग्ययुक्त हो गया। श्रीकृष्ण यह बात आश्चर्यपूर्वक
वर्णन करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
इत्यभिप्रेत्य मनसा ह्यावन्त्यो द्विजसत्तमः।
उन्मुच्य हृदयग्रन्थीन् शान्तोभिक्षुरभून्मुनिः॥ ३१॥
ऐसा वह अवंती का ब्राह्मण अत्यन्त कृपण था। लेकिन उसके हाथ से द्रव्य निकल जाते ही उसका स्वभाव
बदल गया और उसे वैराग्यलक्षण प्राप्त हो गया। इसलिये मन में वैराग्य विवेक उत्पन्न होने पर उसे अपने आप
ही ब्रह्मप्राप्ति होती है। आत्मस्वरूप की स्थिति साध्य करने के लिये श्रीकृष्ण उद्धव को बताते हैं। वह पहले
अधम ब्राह्मण था। वह द्रव्यलोभी था तथा निंद्यकर्म करता था। लेकिन विवेक से वह परम वैरागशाली उत्तम
ब्राह्मण बन गया। मैंने पहले किया हुआ निश्चय पूरी तरह साध्य करूँगा, ऐसे उल्हास से वह अपने परमार्थ का
साधक बना। अपने दुःख का कारण मैं स्वयं ही बना। काम, लोभ और द्रव्य का अभिमान करने के कारण मुझे
स्वयं ही अत्यन्त दुःख भोगना पड़ा। द्रव्य ही मुझे दुःख दे गया इसलिये द्रव्य ही दुःखों का घर है। पत्नी और

तेईसवाँ अध्याय ६२१
बच्चों का मोह मैंने ही किया था लेकिन देखो, उन्होंने ही मुझे घर से बाहर निकाला। जाति का अभिमान करूँ तो
मैं अपने जाति भाइयों से भी दूर हो गया। मेरे सगे-सम्बन्धी भी मुझसे विमुख हो गये। इसलिये उनका भी लोभ
मैं क्यों करूँ? पत्नी, बच्चे, सगे-संबंधी, धन आदि के लोभ का मुख्य कारण मुझे हुआ मेरा देहाभिमान ही है।
उस देहाभिमान को ही मैं अब साष्टांग नमस्कार करता हूँ। पत्नी, बच्चे और द्रव्य को नमस्कार करता हूँ। जाति
भाइयों और सगे-संबंधियों को नमस्कार करता हूँ। अब मेरा आप से कोई संबंध नहीं रहा। पानी और उसमें
प्रतिबिम्बित होने वाला चन्द्रमा ये दोनों एक साथ रहते दिखायी देते हैं, लेकिन चन्द्रमा पानी से बिलकुल अलग
रहता है। उसी प्रकार तुमसे अब मेरा कोई संबंध नहीं है। जिस प्रकार छाया दिन-रात लगी रहती है, फिर भी
पदार्थ छाया से चिपक कर नहीं रहता, उसी प्रकार मेरा आपसे कोई संबंध नहीं है अथवा जिस प्रकार देह के
पास यौवन आता है और उस यौवन से देह खिल उठता है, लेकिन अन्त में यौवन देह को छोड़कर चला जाता
है, उसी प्रकार मैंने आपका त्याग किया है। वन में बसन्त ऋतु का प्रवेश होने पर वनश्री की शोभा निखर उठती
है। लेकिन जब वसन्त अपना काल समाप्त होते ही वन को छोड़कर चला जाता है, उसी प्रकार मैं ममता का
अहंकार छोड़ रहा हूँ। वैराग्य के साथ विवेक का सामर्थ्य आश्चर्यजनक है। उसने मुझसे कैसा अलौकिक त्याग
कराया इससे मैंने देहाभिमान और ममता को तिलांजलि दे दी। जिस प्रकार पिता अपने भ्रष्ट पुत्र से सम्बन्ध
विच्छेद कर देता है, उसी प्रकार देहाभिमान त्याग कर वह संन्यासी बन गया। फल जब पक जाता है तो वह
अपने पूर्वदेह का त्याग करता है, डंठल भी फल को पकड़कर नहीं रखता और फल भी डंठल से चिपका नहीं
रहता, उसीप्रकार यह अहंता के पास नहीं रहता और अहंता भी इसके पास नहीं आती। यह भी सद्भावना से
देहाभिमान का स्पर्श नहीं करता। जिस प्रकार पानी में रहते हुए भी कमलपत्र उससे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार
देहाभिमान का स्पर्श किये बिना उसने विधिपूर्वक संन्यास ग्रहण किया। अन्य संन्यासी होम करते हैं और क्रोध
और काम को जलाने की बात करते हैं लेकिन अंत में तिल और घी का तो भस्म हो जाता है और काम-क्रोध
जैसे के तैसे रह जाते हैं। इसका होम उस प्रकार का नहीं था। उसने विकल्प की वृत्तियाँ जला डाली थीं और
अहंकार के साथ कामक्रोध की पूर्णाहुति कर दी थी। अपने मूल स्वभाव का होम कर वह त्रिदंडी स्वामी हो गया
और गुरु से आज्ञा लेकर सुखपूर्वक विचरण करने लगा।
स चचार महीमेतां संयतात्मेन्द्रियानिलः ।
भिक्षार्थं नगरग्रामानसङ्गोऽलक्षितोऽविशत् ॥ ३२॥
मन और प्राण को जीत कर, मानाभिमान छोड़कर परमानन्द से परिपूर्ण होकर वह पृथ्‍वी पर संचार करने
लगा। देह की संगति जिसे नहीं भाती, उसे साथ में किसी को रखना कैसे अच्छा लगेगा? वह आत्मज्ञान से
आत्मास्वरूप में मग्न होकर पृथ्‍वी पर अकेला ही घूम रहा था। निरन्तर अरण्य में रहता था। भिक्षा के लिये
अवश्य गाँव में आता था और जहाँ बाजार लगता था ऐसी शहर या गाँव से जो भी भिक्षा मिलती थी, उसे ग्रहण
करता था। मैं भिक्षा के लिये आने वाला हूँ, ऐसा कोई नियम वह नहीं बनाता था। गाँव में बिना किसी के देखे
चला जाता था और हाथ में जो भी आ जाये उसमें संतोष मानता था। पाँच सात घरों में जाकर भिक्षा माँगने का
उसने कोई नियम नहीं बनाया था। किसी भी बात का थोड़ा भी अहंकार उसके मन में नहीं था।
तं वै प्रवयसं भिक्षुमवधूतमसज्जनाः ।
दृष्ट्वा पर्यभवन् भद्र बह्वीभिः परिभूतिभिः ॥ ३३ ॥

६२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शरीर पर का मल भी कभी साफ नहीं करता था। मूसल की तरह स्नान करता था इसलिये उसका रंग भी
राख जैसा हो गया था। इसलिये उसे अवधूत कहते थे। इस प्रकार पृथ्वी पर संचार करते-करते वह अकस्मात
अवंती नगरी में आया। तो अत्यन्त वृद्ध संन्यासी हुए अवधूत वेष में लोगों ने उसे देखा। संन्यास लेने के बाद
एक बार मातृभूमि का दर्शन करने की पद्धति के बारे में बड़े-बड़े आचार्यों ने लिख रखा है। उसे देखते ही उस
गाँव के लोग कहने लगे, "अरे! यह तो कदर्यु ब्राह्मण है। इसका धन चला गया इसलिये अब संन्यासी बन गया
है।" यह सुनाते ही दुष्ट लोग उसके पास एकत्र होने लगे और उन्होंने एक-दूसरे को इशारा कर उसका छल
प्रारम्भ कर दिया। लेकिन कष्ट सहकर भी उसके चित्त में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। वह बिलकुल नाराज नहीं
हुआ। वह इतना अधिक विवेकी और धैर्यवान हो गया था। लोगों ने उसे दिये हुए कष्टों का वर्णन और उसकी
सहनशीलता के बारे में मैं तुम्हें अब बताऊँगा। ध्यान देकर सुनो। उसके तात्पर्य पर ध्यान देने से श्रोतागण विवेक
से चतुर बनेंगे और जो इसके अर्थ पर भक्ति करेगा, उसी सच्ची शान्ति प्राप्त होगी। हे विवेकयुक्त चित्तचकोर के
चंद्र! भगवद्भक्त के भाग्य से शुद्धस्वरूपा! हे शान्ति सौभाग्य के राजा! हे भाग्यवान उद्धव! सुनो। आत्मशान्ति
प्राप्त करने के लिये कृष्ण उद्धव की पुकार करने लगे और उसे स्वस्थचित्त कर बोले, शान्ति का स्वरूप ऐसा है।
कोई जीवन क्रम में बाधा लाये, सम्मान के बहाने अपमान करे तो भी जो नाराज नहीं होता, उसके ही पास शान्ति
रहती है। उसके बारे में सुनो।
केचित्त्रिवेणुं जगृहुरेके पात्रं कमण्डलुम्।
पीठं चैकेऽक्षसूत्रं च कन्थां चीराणि केचन॥ ३४॥
उन दुष्टों ने संन्यासी को घेर लिया और छलने के लिये उसके चरणों पर मस्तक रखने लगे। उद्देश्य यही
था कि पैरों पर मस्तक रखकर नमस्कार करने लगे सब लोग उसे छू लेंगे। किसी ने कहा- "यह बूढ़ा संन्यासी
है।" किसी ने कहा, "क्या उम्र है आपकी?" किसी ने पूछा, "आप किस सम्प्रदाय के हैं? किस गुरु ने
आपका मुण्डन किया?" किसी ने इशारा किया, "यह किस गाँव का है, यह पूछिये।" कोई बोला, "अरे, यह
पूछिये कि इसके पास कितना धन है?" किसी ने पूछा, "स्वामीजी! आप किस गाँव के हैं? आप व्यापारी हैं या
उद्यमी हैं?" कोई बोला, "इसके पास थोड़ा पैसा है। अब यह द्रव्यहीन हो गया है। इसे कष्ट न दें। वह पूर्ण
विरक्त संन्यासी है।" इस प्रकार उस पर नाना प्रकार की व्यंगोक्तियाँ कसने पर भी उस संन्यासी को जरा भी कष्ट
नहीं हुआ। मुँह से एक भी शब्द निकालने के बजाय उसने मौन रखा। किसी ने कहा, "यह त्रिदण्डी संन्यासी
मालूम होता है। उस त्रिदण्ड का कारण यह है कि यह पहले अत्यन्त धनसम्पन्न था, उसने सारा धन इस दण्ड में
भरकर रखा होगा। यही त्रिदण्ड का रहस्य है।" किसी ने कहा, "देखिये, इसने कितनी बड़ी कथरी तैयार की
है। उसमें ठूँस कर धन भरा हुआ है। उसके मुँह की ओर क्यों देख रहे हैं? इसने पूरा पाखण्ड मचा रखा है।"
इस प्रकार जब उसकी निन्दा चल रही थी, तभी किसी ने उसका दण्ड छीन लिया। किसी ने कमण्डल गायब
किया, तो किसी ने आसन पर हाथ साफ किया। एक ने रुद्राक्ष की माला गायब की और एक ने तो काषायवस्त्र
ही छीन लिया। एक ने कहा, "यह मेरा कर्जदार है। अच्छा हुआ यहाँ मिल गया।" यह कहकर उसने उसकी
कथरी में हाथ डाल और साथ ही लंगोटी भी ले ली। वे दुर्जन इस प्रकार उसका छल कर रहे थे तो भी उसका
मन विचलित नहीं हुआ। उसका धैर्य क्षमा से परिपूर्ण था। उसने मन ही मन कहा, "आना और जाना दोनों
प्रारब्ध के अधीन है।" इसलिये अपनी चीजें वापस माँगने के बजाए, वह संन्यासी आगे बढ़ गया। उसे जाता

तेईसवाँ अध्याय ६२३
देख उन दुष्टों का जो प्रमुख नेता था उसने संन्यासी को साष्टांग नमस्कार किया और अत्यन्त नम्र होकर उसकी
विनती करने लगे। उन्होंने कहा, "हर हर ! हमारे हाथ से बहुत बड़ा अपराध हुआ। ये दुष्ट लड़के उन्मत्त हो गये
हैं। योग्य और अयोग्य का विचार ही नहीं करते। स्वामी महाराज ! मन में किसी प्रकार का राग द्वेष न रखें।
कृपया अपने वस्त्र वापस ले लें।" इस प्रकार उसके चरणों पर गिर कर उसका पुनः छल करने के लिये उसे
वापस लाये।
प्रदाय च पुनस्तानी दर्शितान्याददुर्मुनेः ।
इस प्रकार संन्यासी को वापस लाकर उसके सामने सभ्यतापूर्वक दण्ड कमल लाकर रख दिया। कोई वस्त्र
लाने लगा तो कोई उसे छीनकर भागने लगा। कोई बोला, "यह संन्यासी बूढ़ा है। इसे उसके वस्त्र वापस
दीजिये।" तो कोई बोला, "इस बदमाश की पिटाई करने से हमें बहुत पुण्य लगने वाला है।" आखिर उसका
तिरस्कार कर किसी ने उसे वस्त्र वापस नहीं किये। तब वह संन्यासी स्वस्थ अन्तःकरण से वहाँ से चला गया।
तभी किसी ने आकर उसे कपड़े वापस किये और जाने के लिये कहा। इतने में एक आदमी दौड़ता हुआ आया
और उस संन्यासी के सिर पर जोर की चपत लगाकर तथा उसके कपड़े छीन कर चला गया। कोई बोला, "अब
दे भी दो। उस बूढ़े को अधिक न सताओ।" बाद में वह संन्यासी स्वयं ही अपने वस्त्र वहाँ छोड़कर, स्नान
संध्या तथा भिक्षा माँगने के लिये चला गया।
अन्नं च भैक्ष्यसम्पन्नं भुञ्जानस्य सरित्तटे ॥ ३५ ॥
मूत्रयन्ति च पापिष्ठाः ष्ठीवन्त्यस्य च मूर्धनि ।
यतवाचं वचयन्ति ताडयन्ति न वक्ति चेत् ॥ ३६ ॥
भिक्षा माँगने के बाद शास्त्रोक्त ढंग से उसके भाग करने के बाद, नदी के किनारे बैठ कर वह संन्यासी
भोजन कर रहा था यह देखकर आवारा लोग वहाँ इकट्ठा हो गये और बोले, "अरे! यह तो संन्यासी नहीं है।
हमारे गाँव में जो कृपण ब्राह्मण था, वह यही है। यह मुँह से 'हाँ' या 'ना' नहीं कहता। यह धोखाधड़ी की बात
है। इसलिये जो इसके मुँह से बिना कुछ उगलवाये जायेगा वह इसकी ही दासी का पुत्र कहलायेगा।" ऐसी
शपथ लेकर वे सब एकत्र होकर उसके पास आये। उनमें से एक ने कहा, "इसका मौन मैं क्षण भर में समाप्त
कर दूँगा। मैं उसका उपाय जानता हूँ।" इतना कह कर उस दुष्ट और महापातकी मनुष्य ने भोजन कर रहे
संन्यासी के मस्तक पर मूत दिया। फिर भी उस संन्यासी के मन में क्रोध नहीं हुआ। वह आत्मज्ञान से शांत रहा।
भले ही मन में क्रोध आया हो, लेकिन वह मनुष्य शांतिरहित हो ही गया। वह क्रोध के शब्द नहीं बोल रहा
इसका कारण यही है कि वह लोकलज्जा के लिये अथवा पेट के कारण डर गया। लेकिन वह संन्यासी वैसा नहीं
था। अपनी लज्जा उसने धोकर नष्ट कर डाली थी। आत्मशान्ति का स्वरूप कैसा होता है ? क्रोध मन में भी नहीं
आता। भीतर एक और बाहर कुछ दूसरा इसी का नाम है 'दांभिकता'। लेकिन यह वैसा संन्यासी नहीं है। यह
आत्मशांति से अंतर्बाह्य बिलकुल निर्मल था। तब वे आवारा किस्म के लोग कहने लगे, "अरे ! यह सचमुच ही
नहीं बोलता।" यह कहकर वे उसके सामने खड़े हो गये और उसके मुँह पर थूका। अत्यन्त दुःख देकर उसकी
बहुत निंदा करने लगे। कोई लात मारने लगा, कोई मस्तक पर प्रहार करने लगा और कोई कहने लगा कि "यदि
यह न बोले तो इसे छोड़िये मत।"

६२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तर्जयन्त्यपरे वाग्भिः स्तेनोऽयमिति वादिनः।
बध्नन्ति रज्ज्वा तं केचिद् बध्यतां बध्यतामिति ॥ ३७ ॥
कोई दूर से वाग्बाण छोड़ने लगा। बोला, "इसके इस वेष का कारण हमने अच्छी तरह जान लिया है।
इसके वेष का मर्म यही है कि यह एक बड़ा ठग, नीच और बड़ा ढोंगी है, भिक्षा माँगने के भेष में यह जासूस
घर-घर घूम रहा है। इस चोर को पकड़िये। " इन निंदास्पद भाषण के साथ वे सब जोर-जोर से चिल्लाने लगे।
कुछ लोग उसे नीचे गिरा कर रस्सी से बाँधने लगे।
क्षिपन्त्येकेऽवजानन्त एष धर्मध्वजः शठः।
क्षीणवित्त इमां वृत्तिमग्रहीत् स्वजनोज्झितः ॥ ३८ ॥
उसकी पहले की स्थिति जो जानते थे, वे उसका अपमान कर उसकी निन्दा करने लगे। वे बोले, "पहले
यह कदर्यू नाम से प्रसिद्ध था और आज यह हमारे सामने संन्यासी का भेष बनाकर घूम रहा है। इसने शुभ-
अशुभ कर्मों से द्रव्य एकत्र किया और अधर्म के कारण वह द्रव्य नष्ट हो गया। इसलिये स्वजनों ने इसे घर से
बाहर निकाल दिया। इस पेट के लिये अन्न मिलना मुश्किल हो गया इसलिये यह कपटी भेष बदल कर संन्यासी
बन गया है। हमारे सामने अपनी प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करने में इसे लज्जा नहीं आती। पहले से ही यह धोखेबाज
था और अब ढोंगी संन्यासी बन गया है। यह सोचता था कि ये लोग भोले-भाले हैं, इन्हें कुछ मालूम नहीं है।
अब इस महाठग ने मौन धारण कर लिया है। जिस प्रकार बहुरूपिया स्वांग रचते हैं, उसी प्रकार यह उत्तम वेष में
संन्यासी बनकर हमें धोखा देने आया है। इसे मारने से दोष नहीं लगेगा।"
अहो एष महासारो धृतिमान् गिरिराडिव।
मौनेन सधयत्यर्थं बकवद् दृढनिश्चयः॥ ३९ ॥
यह प्रबल ढोंगी है। अपना स्वांग अच्छी तरह निभाता है। जिस प्रकार तूफान में महामेरू अडिग रहता है,
उसी प्रकार हमारे कष्ट देने से वह विचलित नहीं होता। अन्न और वस्त्र प्राप्त करने के लिये ही इसने धैर्य कायम
रखा है। स्वार्थ पर दृष्टि रख कर ही इसने बगुले की तरह मौनव्रत धारण किया है। मछली निकलने के लिये
जिस प्रकार बगुला मौन धारण करता है, उसी प्रकार इसका ध्यान अपने लक्ष्य पर रहता है। यह भोले भोले लोगों
को लूटेगा। अब द्रव्यलोभ के लिये यह पुराने कष्टों का ख्याल नहीं करता। उसकी यह आदत अब दृढ़ हो गयी
है। किसी ने कहा, "कैसा धैर्यवान है!" और इतना कहकर उसे लतियाने लगे। कोई उसके कान में सींक
घुसेड़ने लगा और बोला, "अब देखें इसकी शान्ति।" फिर भी उसके मन में द्वेष नहीं उत्पन्न हुआ। उसकी
शान्ति अटल थी। उसकी शान्ति की परीक्षा लेते-लेते वे दुष्ट लोग और भी अधिक क्रुद्ध हो गये और उसे नाना
प्रकार के कष्ट देने लगे। श्रीकृष्ण यही वर्णन करते हैं।
इत्येके विहसन्त्येनमेके दुर्वातयन्ति च।
तं बबन्धुर्निरुरुधुर्यथा क्रीडनकं द्विजम् ॥ ४० ॥
कोई उसकी खिल्ली उड़ाने लगा, कदर्यू को तो पूर्ण शान्ति प्राप्त हो गयी। किसी ने उसके नाक पर चूना
लगाया, किसी ने तो उसके मुँह में काजल पोत दिया। कुछ तो और भी निर्लज्ज थे। वे उसके सामने पीठ करके
खड़े हो गये और अपानवायु छोड़ने लगे। वह दुर्गन्ध उसके नाक और मुँह में भर गयी। फिर भी उसकी

तेईसवाँ अध्याय ६२५
आत्मरूप स्थिति के कारण उसके चित्त में जरा भी क्षोभ नहीं हुआ। क्रोध लाने का प्रयत्न करने पर भी जिस की
शान्ति नहीं ढलती वही त्रिभुवन में संन्यासी है। सारांश, उसका मन क्षुब्ध नहीं हो रहा है यह देखकर दुष्ट लोग
और भी अधिक तैश में आ गये। उन्होंने उस संन्यासी के गले में लोहे का सिक्कड़ बाँध दिया और उसे चौरस्ते
पर ले आये। "अरे! आप में से कोई तो इसे पहचानो। जो निंद्य कर्म किया करता था वही यह द्रव्यलोभी है।
उसे हमने आज पकड़ लिया। यह अत्यन्त अधर्मी और ढोंगी है। जिस प्रकार मदारी बन्दर को बाँध कर रखता है
उसी प्रकार उन्होंने संन्यासी को बाँध कर रखा था और फिर सब मिलकर उसे आगे-पीछे खींचने लगे। कोई पूर्व
की ओर खींच रहा था तो कोई पश्चिम की ओर। इसमें सबको संतोष प्राप्त हो रहा है यह देखकर संन्यासी भी
मन ही मन हँसने लगा। देह प्रारब्ध भोग रहा है। मेरा उससे क्या सम्बन्ध है ? इस विवेक से वह क्षमा से परिपूर्ण
हो गया था। वह किसी का मन दुखा नहीं रहा था। जिन्होंने कभी उसका सम्मान किया था उन भाईयों, रिश्ते नाते
वालों के सामने वह अपमान सहन कर रहा था। उद्धव! जिसका मन लौकिक प्रतिष्ठा के कारण लज्जित होता है
उसके मन में शान्ति नहीं रहती। जरा देखो! जिसे इतना कष्ट दिया उसके मन में क्रोध नहीं आया। उस संन्यास
का हृद्गत देवाधिदेव स्वयं बता रहे हैं।"
एवं स भौतिकं दुःखं दैविकं दैहिकं च यत्।
भोक्तव्यमात्मना दिष्टं प्राप्तं प्राप्तमबुध्यत ॥ ४१ ॥
भिक्षु ने अपना विचार बतलाया। उसने कहा, सारे लोग तीन प्रकार के प्रारब्ध से बँधे हुए हैं। इसलिये उन्हें
भोगना आवश्यक है। राजा और रंक भी उससे नहीं छूट पाते। पंचमहाभूतों से होने वाली पीड़ा 'भौतिक' होती
है। देवताओं से होने वाली पीड़ा 'दैविक' होती है और देह में ही ज्वर आदि होने वाली पीड़ा 'दैहिक' होती है।
इस प्रकार यह जो तीन प्रकार का दुःख है वह प्रारब्ध से उत्पन्न होता है। उसको भोगते समय जो कष्ट का
अनुभव करता है वह मंदबुद्धि और मूर्ख है। प्रारब्ध से हमारे भाग्य में जो भोग आये हैं, वे हरिहर को वश में
करने पर भी भोगने ही पड़ते हैं, उससे प्राणी बच नहीं पाता यह जानकर ही वह संन्यासी क्षमाशील हो गया था।
श्रीकृष्ण पाण्डवों की सहायता कर रहा था, फिर भी उन्हें भोग भोगने ही पड़े। ऐसे में विष्णु और शंकर इन दोनों
को वश में कर लेने पर भी, प्रारब्ध से कोई नहीं बच पाता।
परिभूत इमां गाथामगायत् नराधमैः।
पातयद्भिःस्वधर्मस्थोधृतिमास्थायसात्त्विकीम् ॥ ४२ ॥
दुष्ट लोगों के उपद्रव से भी वह संन्यासी शान्ति नहीं छोड़ रहा था। सात्त्विक धैर्य धारण करने के कारण
उसकी धर्मस्थिति ढली ही नहीं। उस भिक्षु ने जिस गाथा का गायन किया, उसे मैं अब सुनाऊँगा। उद्धव! चित्त
को अत्यन्त सावधान रखकर श्रवण करो। वह उपदेश मन में धारण करने से मन में द्वंद्व की समता दिखायी देने
लगती है, आत्मशान्ति सहज प्रकट होती है और सायुज्यमुक्ति घर में प्रवेश करती है। जिसे श्रीकृष्ण ने स्वस्थचित्त
किया उस उद्धव का भाग्य इस संसार में बहुत बड़ा था। श्रीकृष्ण ने कहा—भिक्षु ने स्वयं जो कहा, उसे सुनो।
द्विज उवाच
नायं जनो मे सुखदुःखहेतुर्न देवतात्मा ग्रहकर्मकालाः।
मनः परं कारणमामनन्ति संसारचक्रं परिवर्तयेद् यत् ॥ ४३ ॥

६२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वह भिक्षु बोला, सज्जन, दुर्जन और साधारण ये जो तीन प्रकार के लोग होते हैं, वे मेरे सुख या दुःख के
लिये बिलकुल कारणीभूत नहीं होते। जितने भी प्रकार के लोग हैं वे सब पंचमहाभूतों से ही उत्पन्न हुए हैं। मेरा
भी देह वैसा ही है। इसलिये सारे लोगों में और मुझमें एक प्रकार का ऐक्य है। सुख-दुःख केवल मन में ही
उत्पन्न होता है। सुख-दुःख देने वाले देवता हैं, यदि ऐसा कहा जाय तो देवता मन की कल्पना हैं। अतः उनके
सुख-दुःख का भी मुझ पर कोई प्रभाव नहीं होगा। देवता रूप हमारा मन ही है और उस मन ने ही समस्त
देवताओं की कल्पना की है। अर्थात् देवता जब सुख-दुःख देते हैं तो इसका कारण मन ही रहता है। जैसा मन
का सद्भाव होता है, वहीं उसी के अनुसार उस स्वरूप में देवी या देवता का आभास होता है। जहाँ मन में
अश्रद्धा रहती है वहाँ देव भी नहीं दिखाई देता। इसलिये जो समस्त देवतागण हैं, वे मन से कल्पित ही हैं। अतः
यदि उनसे सुख-दुःख की व्यथा होती है तो वह मन के कारण ही है, यह जान लो और यदि आत्मा का सुख या
दुःख का कारण मान लें तो वह भी गलत है। आत्मा में द्वैत की भावना बिलकुल नहीं होती। मैं सुख-दुःख देने
वाला हूँ और यह सुख-दुःख का भोक्ता है ऐसी भावना आत्मा में नहीं होती। जन्म के समय के क्रूर ग्रह सुख-
दुःख का कारण है ऐसा यदि कहें तो वास्तव में हमारा मन ही सारे ग्रहों का ग्रह है। वह जन्म-मरण का भोग
कराता है। ग्रहों की ग्रहदशा देह रहने तक होती है, लेकिन मन की ग्रहदशा उससे भी अधिक है। वह नाना
प्रकार का भोग कराती है और जन्म जन्मान्तर में भी नहीं छोड़ती। दुष्ट ग्रह थोड़े ही समय के लिये पीड़ा देता है
लेकिन मन की पीड़ा कोटि-कोटि जन्मों तक रहती है। दुष्ट ग्रह अपनी भोगदशा पूरी होने के बाद छोड़ देता है
लेकिन मन कल्पांत में भी नहीं छोड़ता। मन यदि देहाभिमान धारणा न करे तो ग्रहों की पीड़ा की कौन चिन्ता
करता है? इसलिये सुख-दुःख के लिये कारणीभूत होने वाला मन, यही एक महाग्रह है। अब हम अपने कर्म
को ही दुखदायक नहीं कह सकते क्योंकि कर्म ही कर्मबन्धन से छुड़ाता है। वह दुःखदायक कैसे हो सकता है?
अपना कर्म स्वाभाविक और पवित्र होने पर मन ही उसे सकाम बनाता है और उसे अनेक प्रकार के दुःख देकर
उसे अनेक योनियों का भोग भोगने को बाध्य करता है। जब कर्म की क्रिया के सम्बन्ध में मन का संकल्प कर्म
पर लागू नहीं होता तो सुख-दुःख कितने ही क्यों न हो, लेकिन अपना कर्म ही उनका नाश करता है। देह को
सुख-दुःख का क्या ज्ञान होगा? आत्मा तो सुख-दुःख बिलकुल नहीं जानता। इसलिये सुख-दुःखों का खजाना
बनाना और फिर उसे भोगना यह सब मन के आदेश से ही होता है। सुख-दुःख देने वाला काल है यह कहना
भी सर्वथा सच नहीं है। मन का संकल्प जैसा संकेत देता है, उसी प्रकार काल की सत्ता चलती है। अजर-अमर
रहते हुए यदि कोई अपने लिये मृत्यु की कल्पना कर ले तो काल उसके पीछे लग जाता है और क्षण-प्रतिक्षण
उसकी आयु कम करता है। जैसे बिस्तर में कोई सुआ चुभो कर रख दे और रात को सोने पर वह शरीर में घुसते
ही, साँप ने काटा इस भय से मर जाय। वास्तव में साँप ने उसे काटा ही नहीं था फिर उस पर विष का असर
कैसे होगा? वह केवल शंका से ही मर गया। उसी प्रकार काल लोगों के पीछे लगा हुआ है। एक आदमी की
पीठ में साँप ने काट लिया था। उसने अपने मित्र से पूछा, "मेरी पीठ में क्या घुस गया था?" उसने कहा,
"कुछ नहीं। एक काँटा गड़ गया था, जिसे मैंने खींच कर निकाल दिया।" इससे उसे साँप की शंका ही नहीं हुई
और विष की बाधा भी नहीं हुई। बहुत दिनों के बाद जब मित्र ने बताया कि उसे साँप ने ही काटा था और उसे
पीठ पर साँप को काटने का निशान भी दिखाया तो पुरानी याद आते ही तत्काल विष का प्रभाव हो गया और
उसने प्राण त्याग दिये। उसी प्रकार निर्विकल्प पुरुष को संकल्प की शंका होती है, उसी समय उसके विनाश के
लिये काल तैयार हो जाता है। लेकिन जिसका मन निःसंकोच 'मैं अमर हूँ' कहता है, उसका घर काल छोड़ देता