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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 623, कुल 869 में से

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पृष्ठ 623

तेईसवाँ अध्याय ६०७
कहता है, "हाय रे मेरा भाग्य ! आखिर, मुझे भिखारी बना दिया। हे दुष्ट ब्रह्मदेव ! मेरे भाग्य में यह क्या लिख
दिया ? मुझे कहीं ठौर नहीं और क्या किया जाय यह भी समझ में नहीं आता।" इस प्रकार जो बड़ा दुःख सामने
आ गया है, उसके विचार से वह महादुःखी होकर रोने लगता है। "यह दुःख तो कम है लेकिन मुझे आगे बहुत
बड़ा दुःख भोगना है। यम जब निर्दयता से मुझे प्रताड़ित करेगा, उस समय मुझे वहाँ कौन छुड़ाएगा ? मैंने कभी
दानधर्म नहीं किया, नारायण का स्मरण भी नहीं किया, इसलिये मेरे भाग्य में नरक ही आयेगा वहाँ मुझे कौन
छुड़ायेगा? मैंने पंचमहायज्ञ नहीं किये, अतिथियों को अन्न नहीं दिया, पितरों का तर्पण नहीं किया, अब मेरे
दुःखों का निवारण कौन करेगा ? मैंने ब्राह्मण की पूजा नहीं की, परमेश्वर का भजन नहीं किया, भगवद्भक्तों की
चरणधूलि का वंदन नहीं किया, अब मेरे दुःखों का नाश कौन करेगा ? सदा अकर्म करने के कारण मैं अघोर
नरक में डूब रहा हूँ। हे श्रीहरि ! दौड़कर मेरे पास आओ और मेरा उद्धार करो। हे कृष्ण ! हे माधव, हे मुरारी ! हे
अच्युत ! हे अनंत ! हे श्रीहरि ! हे गरुड़ध्वज ! हे गोवर्धनधारी ! मुझ गरीब का उद्धार करो। तुमने प्रह्लाद की रक्षा
की, अम्बरीष को गर्भवास से मुक्त किया, उदर में परीक्षित का संरक्षण किया, उसी प्रकार मुझ गरीब का उद्धार
करो। तुमने अहिल्या को तारा, पातकी अजामिल का उद्धार किया और गजेन्द्र को संकट से बचाया, उतनी ही
शीघ्रता से मुझे उबारो। सारे पापों की खान, उस वेश्या को भी तुमने नामस्मरण से मुक्त किया। हे चक्रपाणि !
उतने ही चातुर्य से मुझ दुष्ट का भी उद्धार करो। इस धनेच्छा को आग लगे जिसके कारण मेरा जन्म व्यर्थ गया।
मुझ जैसे अधम ने राम का नाम भी नहीं लिया जिसके लिये धन की आवश्यकता नहीं होती। रामनाम के प्रभाव
से महान पापों की राशियाँ जल जाती हैं। फिर भी मैं मुख से राम का नाम नहीं लेता।" इस प्रकार जब वह
अपने अपराधों का स्मरण कर पश्चात्ताप कर रहा था, तभी उसके अंतःकरण में तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ। उसी
का वर्णन श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
स चाहेदमहो कष्टं वृथाऽऽत्मा मेऽनुतापितः।
न धर्माय न कामाय यस्यार्थायास् ईदृशः ॥ १४॥
वह ब्राह्मण हाथ मल कर कहता है—"हाय ! ब्राह्मण देह तो मोक्ष प्राप्ति का ही साधन है। वह प्राप्त होने
पर भी मैं कैसा कंगाल रह गया और धन लोभ के कारण व्यर्थ नष्ट हो गया। जिस देह के योग से मोक्ष का सुख
मिलता है उसी देह को मैंने दुःख दिया। मैं धन का लोभी अत्यन्त मूर्ख आदमी हूँ। मुझ जैसा मूर्ख और कोई नहीं
होगा। धर्म के नाम पर धन न खर्च कर मैंने बड़े प्रयास से धन जमा कर रखा, और उस धन की तो ऐसी अवस्था
हुई कि उसने मुझे दुःख का फल दिया। द्रव्य लोभ का आश्चर्य बड़ा विलक्षण है। उसके आगे न इहलोक है न
परलोक है। जो सुलभ मोक्षसुख था, उससे भी हाथ धो बैठा। वह लोभ मुझे नरक तक पहुँचा गया। जहाँ नरक
में कल्प तक डूबने पर भी ठौर नहीं मिलता वहाँ यह धनलोभ जीव को ले जाता है। वही मैंने इस नरदेह में
पाया। जो ब्राह्मणदेह में जन्म लेता है, वह तीनों लोकों में पूज्य होता है। मोक्ष उसके चरणों पर होता है। ऐसा
ब्राह्मणदेह का मैंने दुर्भाग्य से नाश कर दिया। लोभ से मैंने जिस धन का संग्रह किया, वह सब तो नष्ट हुआ ही
लेकिन उसने मुझे अत्यन्त दुःखी किया और मुझे घोर नरक में डाल दिया। धीरे-धीरे जीवन बीतता गया और मैं
पश्चात्ताप से संतप्त हो गया। धन लोभ में मेरे सारे प्रयास व्यर्थ गये लेकिन विवेक के साथ मुझमें अत्यन्त पवित्र
वैराग्य उत्पन्न हुआ। द्रव्यलोभी व्यक्ति दुःख का भण्डार ही है।" जो धन के बन्धन में रहता है, वह पापी है। इस
प्रकार वह अपने ही मुँह से अपनी निन्दा करने लगा।