श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 629, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेईसवाँ अध्याय ६१३
जिसके योग से सांसारिक बन्धन से मुक्त होता है और जिसके शब्दों के योग से पावन होता है उस सद्गुरु के
साथ भी द्रव्यलोभ बांतचीत बन्द करा देता है। उस द्रव्य के अभिमान का महत्त्व जरा देखिये। वह सद्गुरु में भी
बैर उत्पन्न कर देता है। जो द्रव्य का अभिमानी है वह किसी के साथ भी निर्वैर नहीं रहता। यही निरूपण दसवें
अनर्थ का लक्षण है। अब द्रव्य अविश्वासी कैसे होता है, सुनो। द्रव्य के अभिमान का ऐसा प्रताप है कि जिसके
कारण पुत्र अपने पिता पर भी विश्वास नहीं करता। भाई के प्रति भी पूर्ण अविश्वास रहता है, फिर औरों के प्रति
विश्वास की क्या बात की जाय ? 'आत्मा वै पुत्रनामासि', पुत्र अपना आत्मा ही है, ऐसा श्रुतिवचन है। ऐसा पुत्र
जो मेरे सर्वस्व का मालिक है, उस पर भी जो विश्वास नहीं करता ऐसा द्रव्यलोभ अत्यन्त अविश्वासी है। धर्म,
अर्थ और काम में पूर्णरूप से साथ देने की जो शपथ विवाह के समय ली थी और जिसका विश्वास सम्पादन
करने के लिये पूर्वजों की प्रतिष्ठा का विश्वास दिला कर जिससे विवाह किया था और जिसने अपना तन-मन
अपने पति को ही अर्पण किया था, ऐसी धर्मपत्नी के साथ भी यह द्रव्यलोभ अविश्वास करता है। नौ महीना जो
अपने उदर में सँभालती है, सदासर्वदा विष्ठामूत्र साफ करती है, उस माँ पर भी वह विश्वास नहीं करता। जिसे
द्रव्य का अहंकार होता है वह सद्गुरु पर भी विश्वास नहीं करता। द्रव्य को सम्मान देने वाला मनुष्य पूर्ण
अविश्वासी रहता है। अविश्वास का मुख्य कारण एक द्रव्य है और दूसरी स्त्री, इसे स्मरण रखो। इनमें जिसका
मन लिप्त रहता है वह पूर्णरूप से अविश्वास से भरा रहता है। जो द्रव्य को ही सम्मान देने वाला तथा पत्नी के
पीछे पागल रहता है उसके हृदय में रहने वाला आत्मा विन्मुख होता है। सद्गुरु भी उसकी उपेक्षा करते हैं।
अविश्वास से ऐसा अनर्थ होता है। पुराणों में भी अविश्वास को सारे दोषों का मुकुटमणि कहा गया है। वह
अविश्वास प्रकट होते ही तत्काल वृत्ति का नाश कर देता है। अविश्वास से जब अभिमान की भेंट होती है तो
मुक्त की मुक्तता समाप्त होती है। फिर वह अविश्वास विकल्प की प्रेरणा से उसे उलटे देह के बन्धन में डालता
है। अविश्वास जब चित्त में भरा हुआ है और उसी समय वह बड़े अभिमान से 'मैं ज्ञाता' हूँ, कहता है तब
आस्तिवृत्ति देखते ही पलायन कर जाती है और चारों ओर नास्तिकता ही नास्तिकता दिखायी देती है। अविश्वास
के आगमन के साथ ही सद्भाव सपरिवार भाग जाता है और सारे त्रिभुवन में सद्भाव का अभाव हो जाता है।
फिर अविश्वास विकल्प के सहारे ही सारे व्यवहार चलाता है। अविश्वास के साथ विकल्प रात-दिन
आनन्दपूर्वक रहता है और जहाँ अविश्वास को प्रवेश मिलता है, वहाँ विकल्प ही उसे लूट कर नष्ट कर देता है।
यह अविश्वास एक बार मन में घर करते ही परमार्थ के राज्य को उजाड़ कर देता है और सद्गुरु के भी दोष
दिखाता है। साक्षात ब्रह्मदेव का भी विश्वास नहीं करता। इसलिये सारे दोषों का राजा अविश्वास के अतिरिक्त
अन्य कोई नहीं है। वह स्वयं महासिद्धियों को पूरी तरह नष्ट कर देता है और जहाँ अविश्वास हमला करता है
वहाँ से परमार्थ भाग गया ऐसा समझ लो। विकल्प का हमला होते ही, वह समय व्यर्थ ही हो जाता है। सिद्ध की
सिद्धियाँ नष्ट हो गयीं, साधक तो बेचारे बड़ी सफाई से मारे गये और जो साधारण होश में थे वे भी जंगल की
ओर भाग गये क्योंकि अविश्वास ने श्रद्धा का उद्यान ही नष्ट कर दिया। क्रोध यमनियमों के शहर ध्वस्त कर देता
है और तपस्वी लोगों की होली जला देता है। मोहरूपी हाथी मोक्षरूपी फलों से लदी बेलों को उखाड़ देता है
और शमदम का झोंपड़ा खन कर चौराहे पर फेंक देता है। विचारों के रास्ते सूने हो जाते हैं, उस रास्ते पर कोई
पैर नहीं रखता। व्रत, उपवास आदि के जो नन्हे कोमल उपवन थे उन्हें विकल्प ने देखते-देखते जला कर स्वाहा
कर दिया। ज्ञान के अभिमानी जब ऐसे अविश्वास से मिलने गये तो विकल्प ने उन्हें अभय देकर अपने पास रख
लिया। ऐसे विकल्प के आगे परमार्थ की क्या हस्ती है ? विकल्प का बल बड़ा होता है, वह तत्काल अनर्थ कर