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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 627, कुल 869 में से

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पृष्ठ 627

तेईसवाँ अध्याय ६११
जाते हैं क्योंकि उन्हें भी लौकिक व्यवहार का पालन करना पड़ता है। जिस उद्देश्य से उन्होंने मस्तक का मुण्डन
किया है, उस (ब्रह्मचिंतन) को वे भूल ही जाते हैं। मिष्ठान्न तथा सुस्वादु भोजन और मानसम्मान को ध्यान में
रखकर संन्यासी स्नान आदि की पवित्रता का पालन करते हैं किन्तु अपने मन को शुद्ध कर ही नहीं पाते।
दांभिकता के चलते वाद-विवाद युक्त व्याख्यान भी देते हैं। दूसरे का द्रव्य और अन्न प्राप्त करने के लिये अथवा
अपने देह की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये झूठी सात्विकता का प्रदर्शन करते हैं। अर्थ के कारण होने वाले चौथे अनर्थ
दंभ का यह लक्षण है। द्रव्य के पास काम भी बस्ती करके रहता है। वह अत्यन्त प्रबल होने के कारण उसे
जीतना बहुत कठिन है। जहाँ द्रव्य रहता है, वहाँ उसके साथ अत्यन्त कष्टकारी कामासक्ति रहती है। जब पास में
द्रव्य नहीं रहता तब अपेक्षाकाम (द्रव्य प्राप्त करने की इच्छा) रहता है, वह अंतर्बाह्य अत्यन्त कष्ट देता है और
अनेक दुःसह भोग भोगने के लिये बाध्य करता है। द्रव्य प्राप्त होने पर उन्मादकाम (मदोन्मत्तता) आता है और
वह मनचाही स्त्री से समागम कराकर नाना प्रकार के अधर्म उत्पन्न करता है। धनी लोगों से ऐसे प्रकार के निंद्य
कर्म होते हैं। काम द्रव्य के पास बिलकुल चिपका रहता है इसलिये वह सदा धनवानों का छल करता रहता है।
जहाँ द्रव्य रहता है वहाँ काम उफनता रहता है और रात-दिन विषय की इच्छा जोर मारती रहती है। इस प्रकार
द्रव्य से होने वाला पाँचवाँ अनर्थ उद्दाम काम है जो सदा द्रव्य के पास रहता है। जहाँ काम हो वहाँ क्रोध का
अपनी फौज के साथ रहना आवश्यक बात है। इच्छित वस्तु प्राप्त होने के मार्ग में कोई अड़चन हो तो वहाँ क्रोध
कूद पड़ता है। वह पगलाकर ऐसा तांडव करता है कि तपों की राशियाँ स्वाहा हो जाती हैं। जप, तप, नियम, धर्म
आदि कर जो भी अलभ्य साधन किया रहता है वह सब क्रोध एक बार बिफरने पर क्षणार्ध में स्वाहा हो जाता
है। धन का उल्लेख करने की देर है कि तत्काल प्रचण्ड क्रोध उत्पन्न हो जाता है जो जान की नौबत ले आता है।
इस प्रकार द्रव्य के साथ यह अतिक्रोध रहता है। द्रव्य प्राप्ति में कोई प्रतिबन्ध लग जाय या द्रव्य खर्च करने की
बात आ जाय तो उस समय क्रोध संतप्त हो जाता है और उन्मत्त होकर बैर रखता है। द्रव्य के पास प्रबल क्रोध
रहता है यही छठवाँ अनर्थ है। द्रव्य के पास अहंकार भी विचित्र परिस्थिति में रहता है। उसके बारे में भी बताता
हूँ। द्रव्य के कारण जब मनुष्य अहंकार से फूल जाता है तो उसे अपना बाप भी नहीं दिखाई देता। माँ को भी
बदनसीब कहता है। सिद्ध, साधक अथवा तपस्वी को देखकर उनका उपहास करता है और कहता है, "जो
दरिद्र होते हैं, वही संन्यासी बन जाते हैं। हरि भजन करने वालों का मखौल उड़ाता है। वैसे भी अमीरी का बल,
तिस पर यदि ज्ञान भी प्राप्त हो जाय तो फिर उसमें ऐसा अहंकार चढ़ जाता है मानों अजगर ने बच्चा निगल लिया
हो। द्रव्य और ज्ञान के अहंकार का यह लक्षण ही है कि वह सद्गुरु से ही द्वेष करने लगता है, उसके भाषण की
अवहेलना करता है और अन्त में उसका धिःकार कर उसकी अवहेलना करता है। वह गुरु के दोष देखता है,
उसे मूर्ख सिद्ध करता है और स्वयं को ज्ञानी मानता है। वह सद्गुरु को भ्रान्त कहता है और जो उसका सम्मान
करता है उससे वह द्वेष करता है। यह अहंकार कैसा विचित्र है। वह सबके गुणदोष ही देखता है। वह किसी
गुण को सही नहीं मानता। दोष सुनते ही उसे वह सच मान लेता है। अहंकारी व्यक्ति सामने यदि कोई सात्त्विक
पुरुष आता है तो उसे वह बिलकुल खराब मानता है और उस वृत्ति के मनुष्य को पागल और आर्ष मानता है।
चक्कर आकर जमीन पर गिरने से भले ही सिर झुक जाय अन्यथा अहंकारी पुरुष किसी व्यक्ति को उसके सामने
सिर झुकाने के योग्य नहीं समझता। फिर लोगों को सम्मान देने की बात कौन करे? और पिता की क्या प्रतिष्ठा
है? धन का उसे इतना अधिक अहंकार रहता है कि सारे ब्रह्माण्ड में वह अपने को ही बड़ा आदमी मानता है।
कोई गुरु की सेवा करने में ही एकनिष्ठ रहता है लेकिन उसे भी अपनी गुरु सेवा के बारे में अहंकार रहता है।