श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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छोड़ता है। जो हृदय से ही अविश्वासी रहता है वह सदा गुणदोषों का ही विचार करता रहता है और सदा परमार्थ
से द्वेष करता है। उसका यह स्वभाव ही है। इस प्रकार अविश्वासी पुरुष परमार्थ से दृढ़ बैर रखकर रहता है।
इसलिए जो अंतःकरण से अविश्वासी ही है, वह यदि हँस कर भी सामने आ जाय तो गरीब को उसके पास नहीं
जाना चाहिये। सारे दोषों में प्रबल, सारे दोषों का राज्य जिसे प्राप्त है, वह यह 'अविश्वास' नाम का ग्यारहवाँ
अनर्थ द्रव्य के साथ रहता है। यह अविश्वास ग्यारहों इन्द्रियों पर पूरी तरह अविश्वास करता है इसलिये उसे
ग्यारहवाँ स्थान दिया गया है। इस अविश्वास को मन में स्थान रहता है। मुख्य रूप से स्पर्धा का स्थान, अर्थात्
अधिक विद्या या अधिक धन ! स्पर्धा का जन्मस्थान यही है। यहीं से वह आगे बढ़ती है। विद्या प्राप्त होने पर
पण्डितों में एक-दूसरे की निन्दा शुरू हो जाती है, वह मुख्य गुरु से ही स्पर्धा करता है, यही विद्या का स्पर्धा
लक्षण है। पास में द्रव्य हो तो स्पर्धा और भी जोर मारती है। वह कहता है "कुबेर दूसरे के धन से अमीर हुआ
है। लेकिन मैं अपने सत्ता के बल पर ही धनी हुआ हूँ। मेरे धन के आगे गिनती में गंगा नदी के कंकड़ भी कम
पड़ेंगे। मेरी सम्पत्ति के सामने भला कौन खड़ा रह पायेगा?" फिर जिन-जिन अमीरों को वहाँ देखता है उन
सबकी वहाँ अप्रतिष्ठा कर देता है। इस प्रकार द्रव्य का आश्रय पा कर 'स्पर्धा' यह बारहवाँ अनर्थ उस द्रव्य में
सदा रहता है। अब एक शब्द में ('व्यसनानि' इस पद में) तीन अर्थों का मेला एकत्र हुआ है, वह भी द्रव्य के
पास ही रहता है। उसके भी विविध प्रकार सुनो। स्त्री, द्यूत और मद्यपान इन तीनों को द्रव्य बढ़ाता है। ये तीन
अनर्थ अमीर व्यक्ति पर एक साथ गहराते हैं। निर्धन पुरुष को पत्नी भी पत्थर के समान समझती है। ऐसे पुरुष
का मुँह देखकर उसकी स्त्री भी मुँह पर थूकती है। निर्धन पुरुष के घर में स्त्री-पुरुषों में सदा कलह रहता है।
उसकी स्त्री अनेक प्रकार से उसकी भर्त्सना कर उस पुरुष को घर से बाहर निकाल देती है। धनवान पुरुष के
पास उसकी स्त्री कैसे आगे-पीछे घूमती है ? उसी प्रकार जैसे कुतिया भाकरी का टुकड़ा देखकर 'कूँकूँ' करते
हुए दुम हिलाती है। लेकिन वह धन नष्ट होते ही वह स्त्री गुस्से में पति पर बरसती है, "मुझे आपकी बातें नहीं
सुहातीं। दिन-रात बच्चों से परेशान रहती हूँ और रात को आप अपने पास खींचते हैं। मुझसे नहीं सहन होता।
हाथ में फूटी कौड़ी भी नहीं है। क्या सुख रखा है, ऐसे जीने में?" इस प्रकार जोर-जोर से उसकी भर्त्सना कर
पति को दूर धकेल देती है। इस प्रकार निर्धन पुरुष को उसकी स्त्री भी अनुकूल नहीं होती, किन्तु अमीर व्यक्ति
को स्त्री की पीड़ा दिन-रात होती रहती है। अमीर व्यक्ति को देखकर वेश्या उसके आगे-पीछे घूमती है। उसके
हावभाव से लोग फँस जाते हैं। एक बार वेश्या से कामसंग होने के बाद उनमें निरन्तर काम-लिप्सा जगती है
और उसके नशे में वे सेठ-साहुकार मद्यपान करने लगते हैं। जो मद्यपान से उन्मत्त हो जाता है, वह स्वेच्छा से
जुआ खेलने लगता है। इस प्रकार ये तीनों अनर्थ द्रव्य के पास ही रहते हैं, इसे निश्चित जान लो। इस प्रकार
द्रव्य के पन्द्रह अनर्थों का साद्यंत वर्णन किया। इस प्रकार अमीर व्यक्ति को धन के पास नाममात्र का भी सुख
नहीं मिलता।
एते पञ्चदशानर्था ह्यर्थमूला मता नृणाम्।
तस्मादनर्थमर्थाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत् ॥ १९॥
सारांश, मूर्ख हो या पण्डित हो, जो भी धनसंचय करते हैं उनमें ये पन्द्रहों अनर्थ उत्पन्न होते हैं। पैसा
अथवा द्रव्य केवल नाम के लिये 'अर्थ' है अन्यथा वह साक्षात अनर्थ है। इसलिये जो स्वहितेच्छु हरिभक्त हों,
उन्हें निश्चित रूप से 'अर्थ' का त्याग करना चाहिये। जिस प्रकार मक्खी मकड़ी को नहीं सूँघती, या जैसे