सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 625, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 625

तेईसवाँ अध्याय ६०९
धन कितना ही क्यों न बढ़ जाए लेकिन लोभ उसे 'अब बस' कहने के लिये नहीं कहता। धन के लिये जिस
मनोयोग से लोग परिश्रम करते हैं, वैसा ही प्रयास यदि कोई परमार्थ के लिये करे तो सचमुच ब्रह्म उसके हाथ
का खिलौना बन जाएगा। इतने कष्ट से धन का सम्पादन किया किन्तु उसे सँभालने में कितनी चिन्ता लगी रहती
है। इसके कारण दिन-रात प्राणों का भी भय लगा रहता है। चाहे स्त्री हो, पुत्र हो या माता-पिता हों लेकिन
किसी पर विश्वास नहीं करता। धन के सम्बन्ध में वह अपने से अधिक किसी पर भी विश्वास नहीं करता।
अपने प्राणों की चिन्ता न कर चोर से अपने धन की रक्षा करता है। धन की रक्षा के सम्बन्ध में जब उसे चिन्ता
होती है तो जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में वह उसी चिन्ता को एकाग्र करके बैठ जाता है।
ऐसी एकाग्रता यदि उसने भगवद्भजन में लगायी होती तो एक क्षण में भगवान उसके वश में हो गया होता।
शादी में योग्य-अयोग्य कोई खर्च हो जाय या खाने-पीने में अधिक खर्च हो जाय तो वह घबरा उठता है। इस
प्रकार धन का खर्च होने से उसे कष्ट होता है। धन के लोभी इस प्रकार धन के पागलपन में बँध जाते हैं। धन
प्राप्त करने में प्रयास करने पड़ते हैं। उसे सुरक्षित रखने की चिन्ता लगी रहती है और वह खर्च हो जाने पर भ्रम
की स्थिति हो जाती है। देखो! पहले, मध्य में और अन्त में भी धन पूरी तरह नुकसान देह है। उसका रत्तीभर
भी सुख नहीं है। मेरा यही अनुभव है। प्रयास, कष्ट और चिन्ता इनके साथ-साथ भ्रम भी इस धन के पास
भटकता रहता है। इसलिये धन में जितना अर्थ है उतना ही अनर्थ भी है। इसी बात का वर्णन वह ब्राह्मण स्वयं
करने लगा।
स्तेयं हिंसानृतं दम्भः कामः क्रोधः स्मयो मदः।
भेदो वैरमविश्वासः संस्पर्धा व्यसनानि च॥ १८॥
अर्थ सभी दृष्टियों से अनर्थकारी ही है। मेरा यह कहना त्रिवार सत्य है। पृथ्वी पर जो भी अनर्थ हैं, वे सब
अर्थ से ही उत्पन्न होते हैं। उनकी संख्या असंख्य और अनंत है। फिर भी अर्थ से उत्पन्न होने वाले पन्द्रह अनर्थ
यहाँ संक्षेप में बताऊँगा। पहला अर्थ यह है कि अर्थ के पास चोरी रहती है। जिसके पास धन नहीं है, उसे चोरों
से भय नहीं है। जिसके हाथ में पैसा नहीं है, उससे चोर ही भय खाते हैं। कहीं यह कुछ माँग न ले इस भय से
उससे छिप कर बैठते हैं। किसी का धन या वस्तु उसकी आँख बचाकर अचानक ले जाना, या जादू के नाम
धोखा देना, भोलेपन का लाभ उठाना या जंगल में सर्वस्व लूट लेना, या रास्ते में पड़ा हुआ धन उठाना और वह
किसका है यह जानने पर भी उसे न देना, यह भी चोरी का लक्षण है। सुवर्ण चुराने वाले को नरक प्राप्ति होती है
यह जानने वाले भी सुवर्ण की चोरी करते हैं। फिर औरों की क्या बात की जाय? सारांश, धन की बात आते ही
चोरी जो रहेगी ही। संसार में चोरी करना पाप है। उसे कोई अपने द्वार तक लाना नहीं चाहता, इसलिये वह
सुवर्ण के पास रहती है। धन देखते ही संन्यासी के मन में भी विकल्प आता है। सारांश, धन से होने वाले पहले
अनर्थ का लक्षण यह है कि धन के पास चोरी रहती है और धन हिंसा का स्थान क्यों है, यह भी सुनो। धन के
लिये कई बार मारपीट होती है। पुत्र, पौत्र भी धन के लिये अपने बड़ों को मारते हैं। सम्बन्धों का विचार न कर
लोग धन के लिये एक-दूसरे के प्राण ले लेते हैं। धन के लोभ का यह चमत्कार है कि उस लोभ से कन्या भी
पिता को विष खिलाती है। पितृघात का उसे दुःख नहीं होता, धन का लोभ इतना निष्ठुर है। धन का लोभी
व्यक्ति अपने माँ-बाप को छोड़ देता है। अपनी पत्नी को लेकर अलग रहता है लेकिन वहाँ भी धन का लोभ
रहता ही है। धनलोभ का प्रभाव इतना विचित्र है कि पुत्र पिता को जान से मारता है। द्रव्यलोभ महाकठिन है।