श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 628, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें६१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वही अहंकार उसके लिये बाधक होता है। इस प्रकार मनुष्य का अति अहंकार से उन्मत्त होना, द्रव्य के कारण
होने वाला सातवाँ अनर्थ है। अब द्रव्य के पास मद रहता है, उसका भी सम्बन्ध ब्राह्मण बता रहा है। जिसकी
आँखों में धन का नशा चढ़ता है वह खुली आँखों से ही अन्धा हो जाता है। वह शब्दों का उपदेश कानों से नहीं
सुनता। हमेशा द्रव्य के ही नशे में रहता है। द्रव्य के मद से अहंता बढ़ती है, द्रव्य के मद से औद्धत्य आता है
और द्रव्य के मद से मनुष्य चाहे जैसे अधर्म करता रहता है। धन का मद अत्यन्त अमंगल है। वह चढ़ने पर
उतरने में कष्टकारी हो जाता है। ऐसा मनुष्य योग्य-अयोग्य का विचार न कर विचित्र योनि में विहार करता रहता
है। जो द्रव्य के मद के वश में होता है, किसी से नहीं डरता। जहाँ नहीं जाना चाहिये वहाँ स्वयं जाता है, जो
नहीं खाना चाहिये वह खूब खाता है। जिसकी संगत नहीं करनी चाहिये, उसकी संगत करता है, जो कर्म नहीं
करना चाहिये वह करता है, जो नहीं बोलना चाहिये वह बोलता है और लोगों में उन्मत्त बनकर आचरण करता
है। स्वयं क्या कर रहा है, इसे नहीं देखता और दूसरों के दोष गिनाता है। बाप की बात भी नहीं सुनता। द्रव्य के
मद ने उसे इतना पागल कर दिया होता है। जो सिखलाओ वह नहीं सुनता और जिसे नहीं करने के लिये कहा
जाय वह अवश्य करता है। उसी प्रकार अपने मुँह से साधु की चाहे जैसी निन्दा करता रहता है। अपनी जाति का
आचार भी नहीं करता। दोषपूर्ण आचरण और अनाचार नहीं मानता और बड़ों का विचार भी नहीं सुनता। यौवन
के जोर से वैसे ही बलवान रहता है तिस पर धन का मद, इससे वह अत्यधिक उन्मत्त हो जाता है और सीधे
रास्ते पर नहीं चलता। वह स्त्री की इच्छा से व्याकुल हो जाता है, कुल और शील का विचार ही नहीं करता,
सुबह और शाम का विचार नहीं करता और गधे जैसा आचरण करने लगता है। परस्त्री की अभिलाषा कर दिन
में ही उसके साथ रममाण होता है। विकेशा स्त्री का भी अंगीकार करता है। पाप से जरा भी नहीं डरता। मद्य का
नशा शीघ्र उतर जाता है लेकिन धन का नशा उससे भी भयंकर है। मृत्यु आने पर भी वह नहीं उतरता। धन का
नशा अत्यन्त अनर्थकारी है। यही आठवें अनर्थ का लक्षण है। अब द्रव्य के पास भेद भी किस पूर्णता के साथ
रहता है, इसका वर्णन ब्राह्मण स्वयं कर रहा है। भेद द्रव्य की कोख से ही पैदा हुआ है। जहाँ धन रहता है वहाँ
मानों भेद का ही शासन रहता है। वह धन के पास दिन-रात पहरा देता है। हाथ में काफी धन आने के बाद वह
माँ से अलग रखता है, बाप को फँसाता है और पत्नी को भी मालूम नहीं होने देता। बाप के पास कितना धन है
इसका अन्दाजा लड़के को भी नहीं होने पाता, फिर औरों की क्या बात की जाय? द्रव्य के पास जो भेद है वह
संसार में अन्य कहीं भी नहीं होता। शस्त्र का प्रहार सहन कर भाई रणभूमि में अपने भाई की सहायता करता है
लेकिन वही भाई जब प्राप्त द्रव्य को बाँटने लगते हैं तो भाई-भाई का नाता ही मानों भूल जाते हैं। मित्र अपने
मित्र के लिये प्राण दे देता है लेकिन द्रव्य उसमें प्रवेश कर मैत्री को ही संशयास्पद बना देता है। ऐसे द्रव्य में
भयंकर भेद है। जो धन गाँठ में बाँध कर रखा है उसे भी वह बार-बार देखता रहता है। इस प्रकार द्रव्य के पास
भेद रहता है, वही नौवे अनर्थ का लक्षण है। द्रव्य के साथ कमाल का बैर भी रहता है। ब्राह्मण अपने अनुभव से
उस बैर का लक्षण बता रहा है। द्रव्य का सम्बन्ध पिता-पुत्र में विरोध उत्पन्न करता है। सगे भाइयों को भी बैरी
बनाता है। अपने निकट के इष्ट मित्रों में भी द्रव्य लोभ कलह उत्पन्न करता है। प्राणों से भी प्रिय मित्रों को भी
द्रव्यलोभ शत्रु बना देता है। द्रव्यलोभ अत्यन्त अमंगल और दुस्तर शत्रु है। भाई-भाई में कलह उत्पन्न हो जाने के
कारण, धन के बँटवारे में उसे अधिक राशि नहीं मिलती इसलिये जो लोग न्यायपूर्वक बँटवारा करते हैं उनसे बैर
करता है। जिस माँ के गर्भ से जन्म लिया, जिसका स्तनपान किया उसी माँ से धन के लोभ में बैर करता है।
द्रव्य माँ को ही वैरन बना देता है। उसे घर से बाहर निकाल देता है और फिर कभी उसका मुँह नहीं देखता।