श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रायेणार्थं कदर्याणां न सुखाय कदाचन।
इह चात्मोपतापाय मृतस्य नरकाय च॥ १५॥
सम्भवतः जो धन के लोभी होते हैं, उन्हें इहलोक का सुख रहता ही नहीं है क्योंकि उस धन का संरक्षण
करने में ही उन्हें अत्यधिक दुःख होता है और वह धन चले जाने पर मरणान्त दुःख ही आ जाता है। धन अर्जित
करने में नितांत कष्ट होते हैं, उसे सँभालने में कलह हो जाते हैं और उस धन का नाश होने पर सीना फट जाता
है। इहलोक में इस प्रकार का दुःख होता है और अधर्म होता है इसलिये परलोक भी दूर हो जाता है। इसलिये
मरते समय धन के लोभी को नरक का सामना करना पड़ता है। जो धर्म नहीं करता और स्वयं भी कुछ नहीं
खाता और जो मुझ जैसा कृपण हो जाता है उसे सर्वाधिक दुःख होता है। जहाँ लोभ की बस्ती रहती है वहाँ
स्वप्न में भी सुख का निवास नहीं होता। देखो! लोभ अत्यन्त निंद्य है। वह ब्राह्मण ही अपने मुख से यह कह
रहा है।
यशो यशस्विनां शुद्धं श्लाघ्या ये गुणिनां गुणाः।
लोभः स्वल्पोऽपि तान् हन्तिश्वित्रो रूपमिवेप्सितम् ॥ १६ ॥
समरभूमि में आगे का योद्धा धराशायी होने पर जो योद्धा स्वयं आगे बढ़कर शत्रु का सामना करता है और
शत्रु के घेरे में फँसे राजा को कन्धे पर डाल कर ले आता है, ऐसा यश प्राप्त करने के बाद यदि उसके अन्तःकरण
में उस वीरता के बदले कुछ पुरस्कार का लोभ होता है तो इससे उसका अपयश होता है और सारा संसार उसकी
मूर्खता का उपहास करता है क्योंकि राजा उसके कुछ कहे बिना ही उसे अपने समकक्ष लाने का विचार करता
रहता है। राजा के इस विचार में इस लोभ के कारण रुकावट आ गयी और उस लोभ के कारण उसकी मूर्खता
प्रस्थापित हो गयी। स्वयं कन्यादान करने से सारा कुल पवित्र हो जाता है लेकिन यदि उस कन्या के ऐवज में
उसने धन लिया तो उस धन के लोभी का अधःपतन हो जाता है। इस प्रकार लोभ दान में भी लांछनास्पद है।
वेदशास्त्रों का अध्ययन कर जो बड़े ज्ञान सम्पन्न हो गये उनका भी धन के लोभ के कारण बहुत छल होता है
क्योंकि उनमें ज्ञान का दृढ़ अभिमान रहता है। देह की सत्यता सिद्ध करने के लिये पण्डितों में विवाद शुरू हो
जाता है और उनमें विरोध होने पर वे छलवादी भाषण करने लगते हैं। इस प्रकार ज्ञाता भी लोभ के चक्कर में आ
जाते हैं। विचारसम्पन्न एवं ज्ञानसम्पन्न पण्डित को भी लोभ निन्दा का पात्र बना देता है फिर औरों की क्या
बिसात ? लोभ पवित्र मनुष्य को भी अपवित्र बना देता है। जहाँ लोभ रहता है वहीं निंदा का बसेरा रहता है। वही
प्रसिद्ध दृष्टांत इस ब्राह्मण ने स्पष्ट करके बतलाया। कन्या कुलवान हो, सुशील हो, सुकुमार हो, स्वरूप से सर्वांग
मनोहर हो और फिर यदि उसके नाक पर कोढ़ का हल्का-सा भी दाग हो तो इतनी सुन्दर होने पर भी वह निंद्य
है। उसी प्रकार मन में जरा सी भी लोभ की बस्ती हो तो वह सारे गुण, औदार्य, यश, कीर्ति आदि सबका नाश
करती है। इसलिये लोभ जैसा अपयश देने वाला, त्रिभुवन में और कोई नहीं है। धन के लोभ के कारण सदा
एक-दूसरे में विरोध रहता है। धन का लोभ इष्टमित्रों में भी दूरी उत्पन्न करता है। इतना बाधक और ऐसा
अमंगल दूसरा कोई भी नहीं है।
अर्थस्य साधने सिद्धे उत्कर्षे रक्षणे व्यये।
नाशोपभोग आयासस्त्रासश्चिन्ता भ्रमो नृणाम् ॥ १७ ॥
पहले धन प्राप्त करने के लिये प्रयास करो, फिर उसे बढ़ाने के लिये परिश्रम करो और इतना करके वह