श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
जो माँ नौ महीने अपने उदर में रखती है, सदा नरकमूत्र का कष्ट सहती है, उस माँ की भी उसके पुत्र धन के
लिये हत्या कर देते हैं। इस द्रव्यलोभ का प्रहार बड़ा विचित्र है। उसका मैं कहाँ तक वर्णन करूँ ? माँ भी अपनी
कोख से जन्म को मार डालती है। सारांश, यह जो सारी हिंसा है, वह धन से होने वाले अनर्थ का दूसरा लक्षण
है। अब द्रव्य असत्य का कारण कैसे बनता है, उसका निरूपण स्वयं कर रहे हैं। असत्य धन के ही पेट से जन्मा
है और वह धन के बल पर ही संसार में इतना प्रबल हो गया है। द्रव्य के साथ ही असत्य उत्पन्न होता है।
असत्य का और द्रव्य का हमेशा का साथ है। वह द्रव्य जिसके पास होता है अथवा जिसे द्रव्य की अपेक्षा रहती
है, उसके पास असत्य सपरिवार रहता है। द्रव्य, असत्य की पैतृक सम्पत्ति है। असत्य को द्रव्य का बहुत बड़ा
सहारा रहता है। वह बाप से भी झूठ बोलता है। द्रव्य के लोभ से माँ को भी फँसाता है क्योंकि सत्य द्रव्य के
पास रहता ही नहीं है। धन के लोभ से साधारण लोग क्रय, विक्रय करते समय तो झूठ बोलते ही हैं, लेकिन
वेदशास्त्र सम्पन्न और विद्वान लोग भी द्रव्य के लिये झूठ बोलते हैं। जिसने वेद पूरा पढ़ा भी नहीं है, वह मनुष्य
धन के लालच में नीच व्यक्ति के घर अपने को चारों शास्त्रों में पारंगत पण्डित बताकर, जो वास्तव में पण्डित हैं
उनका छल करता है। जो परमार्थी हैं वे अपने को विरक्त कहते हैं लेकिन वहाँ भी असत्य का ही बसेरा रहता
है। वहाँ भी लोग द्रव्यप्राप्ति के लिये झूठी सिद्धि का ढोंग करते हैं। द्रव्य के पास असत्य का बड़ा महत्त्व होता
है। भक्तिभाव से जिसे सद्गुरु माना है उसे ही वह अकेले में नास्तिकता के विचार प्रतिपादित करता है। लेकिन
जिसके पास धन नहीं है या जिसे धन की कल्पना ही नहीं है उसे कल्पांत में भी असत्य स्पर्श नहीं कर सकता।
अब द्रव्य के पास दंभ (ढोंग) रहता है, उसका भी वर्णन सुनो। अंतःकरण में परमार्थ न होते हुए भी, केवल
द्रव्यलोभ के कारण स्वयं को हरिभक्त कहते हैं। इसी का नाम है भजन का ढोंग। द्रव्य प्राप्त करने के लिये
टीका, माला, मुद्रा आदि धारण कर उपदेश देने का ही नाम है दीक्षा का ढोंग। कोई गुरु किसी बड़े सज्जन व्यक्ति
को उपदेश करने में आदर अनुभव करता है तो कोई गुरुपूजा के लिये इतना धन लगेगा ऐसा करार कर उसे मंत्र
देता है, वह ढोंगी है। जिनसे द्रव्य प्राप्ति होती है, ऐसे धनी शिष्य अच्छे लगते हैं और जो गरीब शिष्य होते हैं,
उनका वह धिःकार करता है। यह भी गुरु का नाम लेकर ढोंग ही करना है। तन, मन, धन गुरु को ही अर्पण
करना चाहिये, ऐसा शिष्य को उपदेश देकर जो गुरु स्वयं धन का संग्रह करता है, वह गुरु के नाम पर ढोंग ही
है। जो गुरु स्वयं ही धन का लोभी है, वह शिष्य को कैसे तारेगा ? द्रव्यलोभ चीज ही ऐसी है कि जो गुरु को
ढोंगी बनाती है जो बदमाश शिष्य व्यक्ति गुरु का धन लूटने के लिये अपनी गरीबी का बहाना कर उपदेश लेने
जाता है, वह शिष्य भी ढोंगी और शठ है। गुरु के उपदेश से जिसे ज्ञान प्राप्त होता है, उस अहंकार से जो गुरु
को क्षुद्र मानने लगता है और उसका उपहास करता है, वह भी ढोंग का ही लक्षण है। 'ब्रह्मरूप' की सच्ची प्राप्ति
होने पर 'अहं ब्रह्म' 'मैं ही ब्रह्मस्वरूप हूँ', यह स्फूर्ति भी सहन नहीं होती। फिर वहाँ 'मैं ज्ञाता हूँ' यह कहना
भी कपट की बात है। वह अलंकरण के गुप्त दंभ से ही उत्पन्न होती है। जीव का स्थान देह के मध्यभाग में है,
जहाँ दंभ का अधिष्ठान रहता है। मन उसमें सहायक होकर ज्ञान का अभिमान उत्पन्न करता है। इस दंभ का
जितना कौतुक किया जाता है, वह आश्चर्यजनक है। जो स्वयं को अग्निहोत्री और याज्ञिक कह कर घूमते हैं, वे
ही भिक्षा माँग कर निर्वाह करते हैं। इस प्रकार द्रव्यलोभ में वेदपाठ करने वाले भी फँस गये हैं। परमार्थ की पोथी
छोड़ कर जो नाना प्रकार से ब्रह्मज्ञान पढ़ाते हैं, वे ज्ञाता भी दंभ के कारण द्रव्य की आसक्ति तथा धनलोभ में फँसे
हुए हैं। मंत्र-तंत्र की कथा का क्या वर्णन करें ? मुख्य जो गायत्री मंत्र है उसका भी ब्राह्मण विक्रय करते हैं और
स्वयं को स्वधर्म निष्ठा के कारण पावन कहते हैं। उन्हें ढोंगी समझो। ढोंग के कारण संन्यासी भी चक्कर में आ