श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
और दुःख का भण्डार है। वह जब ब्रह्मदेव और शंकर जैसों का भी पीछा नहीं छोड़ती तो फिर अन्य की क्या
बिसात है ? उस महामाया की निवृत्ति करने के लिए केवल भगवद्भक्ति ही समर्थ है। गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने
अर्जुन से यही बात कही है। भगवद्गीता का वह वचन—"मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते" (माया
भगवान की शक्ति है, उसकी निवृत्ति करने के लिए भगवद्भजन ही चाहिए, वहाँ अन्य उपाय नही चलेंगे। जो
भगवान के भक्त होते हैं वही हरि की माया सुख से तर जाते हैं। अपने अन्तर की यही गुप्त बात श्रीकृष्ण ने
अर्जुन के सामने प्रकट की। माया का यह सबसे बड़ा गुण है कि वह प्राणि की दृष्टि को स्वस्वरूप से विन्मुख
करती है और द्वैतभाव से बलवान होकर हमेशा भ्रम के त्रिगुट (दृश्य, दर्शन, द्रष्टा यह भावना) को बढ़ाती रहती
है। द्वैत का भान ही भय का जनक तथा माया द्वैत की जननी है, यह जान लो। ऐसी उस माया का निवर्तक
ब्रह्मज्ञान है, ऐसा ज्ञान सम्पन्न साधु संत बताते हैं। लेकिन यह श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञान, भक्ति का ही पोष्यपुत्र है यह जान
लो। यदि भगवद्भजन नहीं किया तो ब्रह्मज्ञान कभी प्राप्त नहीं होगा। भले ही वेदशास्त्र सम्पन्न हों लेकिन यदि
उन्होंने भगवद्भजन नहीं किया तो माया को परावृत्त करने वाला ब्रह्मज्ञान उन्हें भी कभी प्राप्त नहीं होगा।
शब्दज्ञान की व्युत्पत्ति लौकिक ज्ञान बढ़ाने में भले ही समर्थ हो लेकिन माया की निवृत्ति करनेवाला ज्ञान
हरिभक्ति के सिवाए कभी प्राप्त नहीं होगा। हरिगुण की रसाल कथा ही ब्रह्मज्ञान की जननी है। हरिनाम का गजर
सुनते ही माया प्राण बचाकर वहाँ से भागती है लेकिन वह भाग नहीं सकती क्योंकि हरिनाम के भय से वह
अपने ही स्थान पर घुल जाती है। इसलिए हरि की माया हरिभक्तों के लिए बाधक नहीं होती। हरिनाम की शक्ति
विचित्र है, उसके आगे माया की कुछ नहीं चलती इसलिए हरिभक्त सुख से माया को तर जाते हैं ऐसा स्वयं
श्रीपतिजी ने कहा है। सलोकता, समीपता, सरूपता तथा सायुज्यता इन चारों मुक्तियों को भगवद्भक्ति अपनी गोद
में खिलाती है। इस प्रकार यदि अनन्यभाव से भक्ति नहीं की गयी तो शास्त्रज्ञ लोगों को कभी भी मुक्ति नहीं मिल
सकेगी। जो हरिभजन से विमुख होते हैं उनके सामने द्वैत सर्वदा खड़ा रहता है। उनका महाभयंकर तथा
दुःखदायी प्रपंच बढ़ता ही जाता है। जिस प्रकार अचानक दिशा भूलने वाला व्यक्ति पश्चिम को ही पूर्व .कहता है
उसी प्रकार परब्रह्म से विमुख होने पर मिथ्या अद्वैत का बोलबाला हो जाता है। द्वैत के भेदरूपी कुएँ में से
संकल्प-विकल्प के सोते फूटते हैं और जन्म-मरण की बाढ़ में सारा ब्रह्माण्ड डूब जाता है। जन्म मरण के
आकर्षण से अनेक प्रकार के दुःखों की राशि और संकटों का सामना अभक्त लोगों को ही करना होता है क्योंकि
हरिभक्तों को स्वप्न में भी जन्म-मरण का आकर्षण नहीं होता। भक्ति की महिमा अगाध है, उसमें संसार बन्धन
प्रवेश नहीं करता। ऐसे भगवद्भजन को साधने के लिए सद्गुरु के चरणों की सेवा करनी पड़ती है। अपने शिष्य
की मृत्यु की चिन्ता का जो निवारण करता है, वही सच्चा सद्गुरु है। इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार के गुरु केवल
मंत्र-तंत्र उपदेश तक ही सीमित समझने चाहिए। मंत्र-तंत्र का उपदेश करने वाले गुरु घर-घर में दिखाई देते हैं
लेकिन जो शिष्य को सद्वस्तु दिलाते हैं उसी को श्रीकृष्ण सद्गुरु मानते हैं। गुरु ही देव है, गुरु ही माता-पिता है,
गुरु ही आत्मा है और गुरु ही ईश्वर है। गुरु सभी दृष्टियों से परमात्मा ही है। तात्विक दृष्टि से देखा जाए तो गुरु
परब्रह्म ही है। गुरु की उपमा देने लायक संसार में अन्य कुछ मिलने वाला नहीं है। गुरु की महिमा अगाध है।
भाग्य के बिना उसकी भेंट नहीं हो सकती। निष्काम पुण्यराशि तथा असीम वैराग्य का साथ हो, तथा नित्यानित्य
विवेक की चाह हो तभी सद्गुरु कृपा प्राप्त होती है। सद्गुरु कृपा प्राप्त हो जाए तो भक्ति के भण्डार खुल जाते
हैं, फिर उसके सामने जहाँ कलिकाल भी भागने लगता है तो वहाँ संसारभय क्या कर लेगा ? गुरु को माता-पिता
भी नहीं कह सकते क्योंकि उनका साथ तो केवल एक ही जन्म का होता है लेकिन गुरु तो हर जन्म में माँ-बाप
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की तरह होता है। अधोद्वार से जन्म देने वाले लौकिक दृष्टि से माता-पिता होते हैं किन्तु अधोद्वार का स्पर्श न
होने देने वाले जो गुरु हैं वही सच्चे अर्थ में माता-पिता हैं। गुरु को कुलदेवता कहा जाय तो उसकी पूजनीयता
केवल कुलधर्म के कर्मों में ही होती है, लेकिन गुरु सभी कर्मों में अकर्ता होने के कारण सदासर्वदा और सभी
दृष्टियों से पूजनीय है। गुरु को देवतातुल्य कहा जाय तो देवता को देवत्व भी उसी के कारण आता है, इसलिए
देवता की भी तुलना सद्गुरु के साथ नहीं हो सकती। इसे ध्यान में रखो। गुरु और ब्रह्म को यदि समान कहा
जाए तो वह उपमा भी कुछ कम ही होगी क्योंकि ब्रह्म को ब्रह्मत्व गुरुवाक्य से ही आता है। अद्वय रूप में वह
अवश्य सद्गुरु के समान होगा। इसलिए गुरु की महत्ता अगाध है। वह अनुपम है। ब्रह्मा के सम्बन्ध में ब्रह्मत्व-
प्रमाण-प्रमा-प्रमेय आदि वाक्य-महिमा सद्गुरु की है। ब्रह्म सबका प्रकाशक है लेकिन सद्गुरु उसका भी
प्रकाशक है। इसलिए गुरु से पूज्य और कुछ भी नहीं है। इसलिए हे राजा! सद्गुरु को कभी भी मनुष्य भावना से
नहीं देखना चाहिए। ऐसी भावार्थ बुद्धि से रहने से अच्छे शिष्य की सहज ही चित्तशुद्धि होती है। जिसकी गुरु
चरणों पर असीम भक्ति रहती है, उसके मनोरथ भगवान पूरे करते हैं क्योंकि सद्गुरु की आज्ञा का पालन भगवान
भी करते हैं। गुरु के कहने से वह जड़, मूढों का भी उद्धार करता है। ब्रह्म भावना से जो गुरु की सेवा करते हैं,
उनकी आज्ञा का पालन भगवान भी करते हैं। उन्हें वह सदा सर्वदा निज स्वरूप का सुख प्रदान करता है। इस
गुरु मर्यादा का भगवान कभी उल्लंघन नहीं करता। गुरु की आज्ञा का पालन भगवान स्वयं करते हैं और गुरु भी
भगवान को महानता प्रदान करता है। इसलिए वे दोनों ही अभिन्न भाव से भावार्थी लोगों के तारनहार होते हैं।
अन्तःकरण में सद्भाव न होते हुए भी जो भक्ति का ढोंग करते हैं वे अपनी भावना के अनुसार संसार सागर में
अनेक प्रकार से डूबते-उतराते रहते हैं। वे मानवता से हाथ धोते हैं, आत्मत्व को खो देते हैं और ब्रह्मप्राप्ति में भी
ठगे जाते हैं। हरिभक्ति कभी भी दंभ से नहीं उत्पन्न होती। यहाँ शुद्ध भाव के बिना परमार्थ कभी हाथ नहीं आता।
यह बात तुम ध्यान में रखो कि समस्त साधनों में सद्भाव ही एक श्रेष्ठ साधन है। सूखे खम्भे के पास सद्भाव
रखते ही वहाँ देवाधिदेव प्रकट हो गया, फिर सद्गुरु तो स्वयं साक्षात परब्रह्म हैं। इसलिए गुरुभजन जैसा भजने
के लिए सरल मार्ग नहीं है। सचमुच जिसे ज्ञान-भक्ति कहते हैं वह वास्तव में गुरुभक्ति ही है। गुरु की अपेक्षा
ब्रह्म श्रेष्ठ है, यदि ऐसा कहें तो गुरुत्व की महिमा कम होती है। ऐसा विषम भाव रखने से शिष्य के मन में
ब्रह्मसाम्य का उद्गम नहीं होगा। हमारे लिए सद्गुरु ही परब्रह्म है, ऐसी सप्रेम भावना रखना ही उत्तम गुरुसेवा
है। ऐसी सेवा से अर्थात् ऐसे निजभाव से शिष्य स्वयं परब्रह्म हो जाता है। ऐसी ही गुरुसेवा से प्रह्लाद द्वंद्वातीत हो
गया और नारद परब्रह्म से ऐक्य प्राप्त कर निजानन्द से नाचते-गाते देवदानवों के बीच विचरण करता रहता है।
ऐसी ही गुरु सेवा करने से अम्बरीष की गर्भव्यथा समाप्त हो गयी। उस गर्भव्यथा को भगवान ने सहन किया।
अपने भक्त को उसने संसार की व्यथा नहीं होने दी। ऐसी अभिन्न भावना से जो सुबुद्धिमंत गुरुचरणों का भजन
करते हैं वे जनार्दन के प्रिय बन जाते हैं। वे उन्हें संसार भावना का स्पर्श नहीं होने देते। गुरु और ब्रह्म ये दोनों
एक हैं, उसी प्रकार शिष्य भी तत्स्वरूप ही है। जो कोई भेद भावना से भिन्नता मानते हैं वे माया के कारण ऐसा
करते हैं, ऐसा कवि का कहना है।
अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयोर्ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथौ यथा।
तत् कर्मसङ्कल्पविकल्पकं मनो बुधो निरुन्ध्यादभयं ततः स्यात्॥ ३८॥
जिस प्रकार कोई व्यक्ति सोते समय स्वप्न में संसार की कल्पना करता है, उसी प्रकार पुरुष को जो प्रपंच
दिखाई देता है वह वास्तव में न होते हुए मिथ्या भासित होता है। मनुष्य जब नींद में रहता है, उस समय उसे
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स्वप्न दिखाई देता है, वही जब जागृत हो जाता है तो मनोरथ का चिन्तन करने लगता है, और उसे अवास्तव जन
वन दिखाई देने लगता है। अथवा जो आसन लगाकर मूर्ति का चिन्तन करता है उसे ध्येय, ध्याता, ध्यान, उपचार
आदि का व्यर्थ का आभास होने लगता है। जिस प्रकार धन के लोभी का धन गायब होने पर भी उसकी वासना
धन धान्य को नहीं छोड़ पाती उसी प्रकार उसका मन धन का स्मरण करने से द्रव्य लोभ से पागल हो जाता है।
मन स्वयं भले ही धन न हो लेकिन वह धन के खजाने का स्मरण करता है और स्मृति लोप होकर धन लोभ से
पूरी तरह पागल हो जाता है। उसी प्रकार मोह द्वारा पूरी तरह ग्रस्त होने पर मिथ्या देहादि के द्वैत का आभास होने
लगता है, उसे अहंभाव से सच मान लेने पर संसार का भय शरीर पर अचूक प्रहार करता है। यह बात ध्यान में
रखो कि भवभय का प्रमुख कारण हमारे मन की कल्पना ही है। उस मन का निरोध करने के लिए सद्गुरु के
वचन तथा उनके प्रति दृढ़ निष्ठा रखनी चाहिए। यह जानकर जो सच्छिष्य ज्ञाता होते हैं, वे गुरु की बात पर
विश्वास रखकर विवेक और वैराग्य के बल से अपने मन को सँभाल कर रखते हैं। राजा ! उस नियंत्रण की क्या
युक्ति है, उसे मैं संक्षेप में तुम्हें बताता हूँ। सद्गुरुवचन आत्मबोध से मन को सावधान करता रहता है। सद्गुरु पर
तथा उसके वचन पर दृढ़ निष्ठा रखने से चंचलता से विषयचिन्तन करते हुए मन जो देखता है वह सब ब्रह्मार्पण
होता जाता है। गुरुकृपा का ऐसा सामर्थ्य है कि विषय का जो भी स्वार्थ मन में रखो वह सब परमार्थ रूप ही हो
जाता है। भूमि भय से जो भागता है उसे सब जगह भूमि ही दिखाई देती है। ऐसा होने से आना-जाना अपने
आप ही बन्द हो जाता है और वह एक ही स्थान पर ठहर जाता है। इस प्रकार मन को एक मर्म दिखला देना
चाहिए और वह यह है कि वह जिसे भी देखता है वह सब ब्रह्म ही है। ऐसा करने से वह जो भी कर्म करने
लगेगा, वहाँ पुरुषोत्तम सहज प्रकट हो जाएगा। इस प्रकार गुरुपदेश के अनुभव के प्रभाव से इन्द्रियों की वृत्तियों
पर नियन्त्रण हो जाता है और ब्रह्मरूप अधिष्ठान से ऐक्य मिलाकर बाह्य प्रवृत्तियों पर लगाम कस जाती है। इस
प्रकार बाह्य कर्मों पर नियन्त्रण होकर मन का द्वैतभाव टूटता है और बाहर भी परब्रह्मरूप चिदाकाश चारों ओर भर
जाता है। इस प्रकार के भजन से मन पर नियन्त्रण करने से, उन भक्तों को कल्पांत काल में भी भय नहीं रहता।
वे निर्भय होकर विचरण करते रहते हैं। लेकिन यह अगाध निष्ठा भोले भाले लोगों से नहीं सध पाती, इसलिए
एक और सरल साधन बताता हूँ।
शृण्वन् सुभद्राणि रथाङ्गपाणेर्जन्मानि कर्माणि च यानि लोके।
गीतानि नामानि तदर्थकानि गायन्विलज्जो विचरेदसङ्गः ॥ ३९॥
भोले-भाले लोगों के लिए तरने का प्रमुख साधन चित्तशुद्धि ही है। हरि के जन्म, कर्म और गुण के सम्बन्ध
में अत्यन्त आदर से श्रवण करना चाहिए। खोये हुए पुत्र के मिलने की वार्त्ता माँ जितनी उत्कंठा से सुनती है,
उतनी ही उत्कंठा से जीवन को सार्थक करने वाली हरिकथा सुननी चाहिए। हरि के जन्म-कर्म तथा गुण अनन्त
हैं, वह सब कहाँ सुनने को मिलेगा? तो इसका उपाय यह है कि जो भी प्रसिद्ध पुराण हो, उसे पूरी श्रद्धा से
सुनना चाहिए। पुराणों में अनेक देवताओं का उल्लेख है वे सब भी जिसका चरणस्पर्श करते हैं, वेदों और पुराणों
ने भी जिसका वन्दन किया है वह चक्रपाणि श्रीकृष्ण ही एक समर्थ अर्थात् श्रेष्ठ है। उसके अत्यन्त अद्भुत जन्म
तथा परमार्थ युक्त जो भी कर्म भगवान ने स्वमुख से सुनाये हैं, उन सबका ज्ञानप्राप्ति के लिए श्रवण करना
चाहिए। लेकिन जिस किसी पुराण का भी वह श्रवण करे यदि वह उसका मनन नहीं करता तो सब व्यर्थ है।
इसलिए श्रवण की हुई बात का अच्छी तरह मनन करते रहना चाहिए। पैसा देकर गाय खरीदी जाए और उसके
दूध का सेवन स्वयं किया जाए तो वह विषयभोग होता है लेकिन यदि उसी गाय को दान में दिया जाए तो वह
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परमामृत का दूध अर्थात् मोक्ष प्रदान करती है। उसी प्रकार जो श्रवण किया जाए वह मनन से ही परमपावन होता
है। अगर श्रवण की उपेक्षा की जाए तो वह निष्फल होता है। हरि का नाम कान में पड़ते ही कितने ही लोगों के
मुख से वह बाहर निकलता है तो कितनों के इस कान से दूसरे कान में से निकल पड़ता है। परन्तु हरि का नाम
कान में पड़ते ही, जिसके अन्तःकरण में प्रवेश करता है उसका सारा पाप धुल जाता है और वह हरि के चरणों में
लिपट जाता है। इस प्रकार हमेशा श्रवण के प्रति मननयुक्त श्रद्धा रखने से, विकल्प की कभी भी बाधा नहीं
उत्पन्न होती और चित्तवृत्ति अपने आप शुद्ध हो जाती है। इस प्रकार मननयुक्त श्रवण करने से पूर्णानन्द उफनने
लगता है और आनन्द के उस आवेग में वह हरिकीर्तन करने लगता है। तानमुद्रा-पदबंधयुक्त हरि का अगाध
चरित्र कीर्तन के माध्यम से गाकर जब वे उनका विवेचन करने लगते हैं तो परमानन्द मानों बहने लगता है।
जिसका जन्म नहीं है उसके जन्मों का वर्णन करते हैं, जिसका कोई कर्म नहीं है उसके कर्म अर्थात् लीलाओं को
गाते हैं और जिसका कोई नाम नहीं है उसके नाम का संकीर्तन कर प्रेम से गर्दन हिलाते हैं। अपना हित साधने
के लिए लौकिक की लज्जा छोड़ प्रसन्नता से नाचते रहते हैं। कीर्तन के योग से दोषों का निर्दलन होता है, जप,
तप निराश हो जाते हैं, यमलोक उजाड़ हो जाता है और तीर्थों की आशा निष्फल हो जाती है, यम नियमों का
उपवास हो जाता है, योगाभ्यास की मरने जैसी अवस्था हो जाती है, कीर्तन का गजर शुरु होते ही, परमात्मा
श्रीकृष्ण नाममात्र से ही सारे दोष नष्ट कर देता है। कीर्तन की घड़घड़ाहट शुरु होते ही चारों ओर आनन्द छा
जाता है। श्रीविष्णु आनन्द से गर्दन हिलाने लगते हैं और आनन्द के उस आवेग में शंकर तो ताण्डव नृत्य करने
लगते हैं। इस प्रकार हरिकीर्तन मन को अत्यन्त आनन्द प्रदान करता है। यह भक्ति का राजमार्ग है। इस मार्ग में
स्वयं चक्रपाणि सुरक्षा करता रहता है। वह चक्र लेकर उससे कहता है, "भक्त के स्थान पर तुम्हारी क्या
आवश्यकता है ? संसार में मेरा तो कोई शत्रु नहीं है लेकिन जो भक्तों से द्वेष करता है, उसका मैं अपने शस्त्र से
विनाश करता हूँ।" चक्र से अहंकार की लुगदी बना देता हूँ। गदा तो मोहमाया का विनाश करती है, शंख से
आत्मबोध को जागृत करता हूँ, और कमल से हमेशा अपने भक्तों की पूजा करता हूँ। जहाँ चक्रपाणी ही सुरक्षा
कर रहे हैं, वहाँ संसारभय की कथावार्ता भी नहीं सुनाई पड़ती। श्रीहरि स्वयं कीर्ति गाने वाले की सुरक्षा करते
रहते हैं। जो कथा श्रवण नहीं कर सकते हों, उन्हें 'राम, कृष्ण, गोविन्द' का नामस्मरण करना चाहिए। 'अच्युत'
नाम की महिमा ही कुछ ऐसी है कि उसकी गर्जना करने से कल्पांत में भी 'च्युति' अर्थात् अधोगति नहीं हो
सकती। इस नाम का जो नित्य स्मरण करते हैं वे सचमुच अच्युत के ही अवतार हैं। जिनकी वाणी रामकृष्णादि
नामों का अखण्ड जप करती है, गर्जना करती है, उनके चरणों को साक्षात तीर्थ दण्डवत करते हैं और बड़े-बड़े
देवतागण भी उनके चरण छूते हैं। नाम का तेज ही विलक्षण है। उसे लेने वाले की चरण रज यमराज भी अपने
मस्तक पर धारण करते हैं। नाम के पास चतुर्भुज श्रीकृष्ण सदासर्वदा खड़े रहते हैं। नाम के प्रभाव के सामने
संसारभय नगण्य है। नाम का सामना करने का साहस कलिकाल में भी नहीं है। नाम में जितनी शक्ति है उतना
पाप पूरे त्रैलोक्य में नहीं है। हे जनकराजा! चारों भक्तियाँ नाम के पास ही रहती हैं, यह ध्यान में रखो। नाम से
सुगम अन्य कोई साधन नहीं है। श्रीधर के नाम का, उसके जन्मों का तथा कर्मों का श्रवण करने से पापी का भी
उद्धार होता है। इसलिए शास्त्रों के पण्डित हरि की लीला कल्याणकारी है इस प्रकार वर्णन करते हैं। ऐसा
भक्तियोग जिनके अंतःकरण में रहता है, उनमें ज्ञान का अहंकार नहीं रहने पाता। अहंकार की ममता छोड़ वे
निःसंग होकर हरिकीर्तन करते रहते हैं। हरिकीर्ति का श्रवण और हरिनाम का स्मरण करने से सप्रेम भक्ति की
वृद्धि होती है और भक्त को देह का भान ही नहीं रहता। राजा! उस स्थिति का भी वर्णन करता हूँ।
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एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः ।
हसत्यथो रोदिति रौति गायत्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ ४० ॥
हरिनाम का तथा गुण-कीर्तनों का वर्णन जागृति में तो उत्तम है ही, लेकिन जब स्वप्न में भी वही स्थिति
होती है तो यह समझना चाहिए कि हरिभक्ति मन में अच्छी तरह रच-बस गयी है। इस रीति से भक्तियुक्त
होकर, जिसका व्रत धीरे-धीरे दृढ़तर होता जाता है, वैसे-वैसे उसका चित्त अधिकाधिक द्रवित होकर हरिनाम
कीर्त्ति की प्रीति विचित्र ढंग से बढ़ने लगती है। परमप्रिय जो आत्मा है वही हरि है। उसकी नामकीर्तिका हर्ष
अपार, नित्य नयी चाह उभरे, इस योग से अंतर्बाह्य हरि ही प्रकट होता है। किसी संकट में माँ से बेटा बिछड़
जाता है और काफी अन्तराल के बाद दोनों की भेंट होती है उस समय लड़का फुक्का फाड़कर रोने लगता है
और माँ से लिपट जाता है। उसी प्रकार भक्ति मार्ग पर जब जीव की शिव से भेंट होती है और दोनों में
आत्मसाक्षात्कार का आलिंगन होता है उस समय अनिवार्य रूपसे रुदन शुरू हो जाता है। परमात्मा को आलिंगन
होता है, इसलिए जोर की सिसकियाँ आने लगती हैं और प्रेम से परिपूर्ण होने के कारण वह रोमांचित होकर
जोर-जोर से सिसकियाँ लेकर रोने लगता है। फिर दूसरे ही क्षण जोर-जोर से हँसने लगता है और कहता है,
अरे ! मैं तो मुझमें ही हूँ। गलती हो गयी, भेंट हुई यह कहना मेरा ही पागलपन था, यह सोच कर वह हँसने
लगता है। मैं तो स्वयं अखण्ड रूप से सर्वत्र व्याप्त हूँ, पूर्ण अभेद के कारण मैं अनादि जैसा था, वैसा ही हूँ।
उसी प्रकार मैं अव्यय होकर जनमा और मर गया इसका स्मरण होते ही वह गर्दन हिलाकर हँसने लगता है।
रस्सी को साँप समझ कर, घबरा कर भागते हुए लड़खड़ा कर गिर पड़ता है, तभी उस रस्सी को पहचान कर
अपने आप ही हँसने लगता है। उसी प्रकार संसार मिथ्या है तथा देहभाव पूरी तरह झूठा है, ऐसा होते हुए मैं
व्यर्थ की ममता और अहंभाव में था। धन्य है वह गुरुवचन जो मेरे लिए तारक बना। देह में होते हुए मैं विदेही
बना। मेरे चारों देह मिथ्या क्यों हो गये ? ऐसे अनुभवोद्गारों की गर्जना करने लगता है। वह कहता है, "धन्य है
वह भगवद्भक्ति। उसने चारों मुक्तियों को भी मिथ्या सिद्ध कर दिया। परमात्मा तो मैं ही हूँ यह निश्चित है।"
ऐसे उल्लासपूर्ण गर्जन से त्रिभुवन को निनादित कर देता है। धन्य है भगवान का नाम। उस नाम ने मुझे नित्य
निष्काम कर दिया। संसार भ्रम पूर्णतया मिथ्या सिद्ध हुआ। इस प्रकार जोर-जोर से गर्जना कर पुकारता है। अब
त्रिभुवन में अन्य कुछ भी नहीं है, जो कुछ भी दिखायी देता है, वह मैं ही हूँ, कहकर जोर की आवाज लगाता
है। जिसके कारण दुर्धर भवबन्ध नष्ट हो गया, उस सद्गुरु की स्तुति में ही, अपनी अलौकिक वाणी में गरजता
है। 'अरे ! यह संसार मिथ्या हो गया, जन्म-मरण का अभाव हो गया, कलिकाल का अस्तित्व ही समाप्त हो
गया' की रट लगाता है। इस प्रकार एक के बाद एक रट लगाने लगता है। उसी क्षण आत्म सुख का गीत गाता
है और स्वानन्द से डोलता रहता है। अपने प्रिय की मधुर कथा जब सुनाने लगता है तो उसका समाधान ही नहीं
होता, उसी प्रकार आत्मानुभव से जब हरिकथा गाने लगता है तो उसे संतोष ही नहीं होता। उसका गायन सुनते
समय ज्ञानी श्रोता सुस्वरूप होता है, मुमुक्षु को उसका गाना सुनकर प्रेम उमड़ आता है। इस प्रकार वह जब गाने
लगता है उस समय उसमें निजसुख का ज्वार उमड़ आता है और जब हर्ष पेट में नहीं समा पाता तो वह
अलौकिक भाव से नाचने लगता है। दूजेपन का काम छोड़कर लौकिक की लाज छोड़कर वह अहंभाव त्याग
कर सहज आनन्द से बड़े मजे से नाचता है। जो खरीद कर शराब पीता है, वह भी दारू की बेहोशी में गाता है
और नाचता है, फिर जिसने ब्रह्मानन्द रस का सेवन किया हो, वह होश में कैसे रह पायेगा ? इसलिए ब्रह्मानन्द
के उन्माद में लौकिक छोड़कर वह स्वयं नाचता-गाता रहता है। लोग उसे पागल कहते हैं। यह बात पण्डितों
की समझ में नहीं आती। राजा, उसे भगवान के सिवाए अन्य कोई लोकाचार दिखायी ही नहीं देता। उसके निज
बोध की कथा सुनाता हूँ। सुनो।
खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन् ।
सरित्समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत्किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यः ॥ ४१ ॥
स्वानन्द के बोध से तथा ब्रह्मोन्माद के परमानन्द से वह जिधर भी कहीं देखता है, उधर उसे सारा चराचर
पूर्णानन्द से भरा हुआ और स्वानन्द से सराबोर दिखाई देता है। पृथ्वी, आप, तेज, वायु, आकाश ये सब उसे
हरिस्वरूप ही दिखाई देने लगते हैं। भूतों अथवा महाभूतों की प्रतिभा के अंकुर उसे अभिन्न, एकरूप ही दिखाई
देने लगते हैं। जिस प्रकार केले का पेड़ बिना खाद के ही फल और पत्तों के रूप में विकसित होता है, उसी
प्रकार हे राजा परीक्षित ! परब्रह्म भूत-भौतिकात्मक रूप में प्रकट होता है। अथवा स्फटिक गृह की दीवार पर
उकेरे गये हाथी, घोड़े आदि के चित्र भीतर के दीपक के कारण ही वैसे के वैसे दिखाई पड़ते हैं, उसी प्रकार
तेजःपुंज सूर्यचन्द्र आदि में चमकने वाला अग्नि तथा नक्षत्रों में दिखाई देने वाली चमक तथा प्राणियों की आँखों
में दिखाई देने वाला तेज यह सब आत्मज्योति के ही कारण तेजस्वी दिखाई देता है। आतिशबाजी का सामान,
जैसे गन्धक, कोयला आदि वस्तुओं को युक्ति से मिलाया जाए तो अग्नि फूलों की तरह दिखाई देता है। उसी
प्रकार परब्रह्म स्वलीला से सूर्यचन्द्राकार होकर विविध रूपों में परिभाषित होता है। पृथ्वी स्वयं गन्धरूप है,
लेकिन वह सुगन्ध कस्तूरी आदि पदार्थों में ही प्रकट होता है। उसी प्रकार भगवान की सत्ता सर्वत्र है लेकिन वह
सात्विक प्रवृत्ति के लोगों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसलिए सात्विक व्यक्ति में जो तत्त्व है, वह भगवत्तत्व
ही है, ऐसा समझ लो। सत्ववान लोगों को सत्व के ही कारण महत्त्व और हरिरूप से मान्यता प्राप्त होती है।
पृथ्वी के चारों ओर जल का आवरण है उसे 'चतुःसमुद्र' कहते हैं। उसी प्रकार दसों दिशाओं में होने वाला ईश्वर
का अंश ही 'दिशा' इस नाम से जाना जाता है। पूर्व-पश्चिम आदि जो प्रकार हैं वह दसदिशाओं के ही भाग हैं,
ईश्वर का ही अंग है। उस रूप में श्रीरंग ही मूर्तिमंत दिखाई देता है। घास, दूब, दर्भ, पेड़ आदि को देखकर वह
उन्हें श्रीहरि के केश ही कहता है। सबके शरीर में सम हरिरूप होते हुए भी, न पहचानने वाले के लिए वह सब
विषम ही दिखाई देता है। उँगलियाँ गिनने से वे अलग-अलग मालूम होती हैं लेकिन वे मूलतः हमारे शरीर के
एक ही अंग में चिपकी रहती हैं। इस प्रकार वन, बेलें, दर्भ, जंगल आदि को देखकर ये सब हरि का ही स्वरूप
है, ऐसा वह कहता है। यह सारा वह ऐक्य भाव से ही देखता है, उसमें उसे निराला अंश नहीं दिखाई देता। वह
कहता है, चाहे दूब हो, पेड़-पौधे हों या जंगल की लतर हों, यह अनन्त कोटि केशों की राशि श्रीहरि के ही
शरीर पर बढ़ी है, और उसे श्रीहरि के स्वरूप से शोभा आयी हुई है। वट की लटकने वाली जड़ें अलग-अलग
बढ़ती हैं, फिर भी वे वट के ही वृक्ष की होती हैं, वह अपने वटत्व से अलग नहीं हो जातीं। उसी प्रकार चैतन्य
से, नदियों के रूप में अनेक प्रवाह निकले हुए हैं, उसमें भी चैतन्य ही ओतप्रोत रहता है और वे चिद्रूप से ही
निरन्तर बहती रहती हैं। अथवा चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब का अमृत जिस प्रकार बिम्ब में बिम्बरूप होकर ही रहता है
उसी प्रकार भगवान में संसार का आभास होता है और वह भजन विश्वास से भगवद्रूप ही हो जाता है। उसी
प्रकार सृष्टि के अलग-अलग भाग देखते समय जिस प्रकार मन उल्लसित होता है, उसी प्रकार सारा संसार मानों
भगवान ही पूर्ण रूप से आभूषित हैं, ऐसा अनुभव उसे होने लगता है। इसलिए वह समस्त प्राणिमात्रों के हृदय में
इस प्रकार लीन हो जाता है मानो समुद्र के जल में नमक घुल-मिल गया है। उस अवस्था में वह चींटी को
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देखकर भी उसे हरिस्वरूप समझ कर प्रणाम करता है। यह तो कुछ भी नहीं, लेकिन किसी मक्खी को भी
भगवान का स्वरूप समझकर अनन्यभाव से शरणागत होकर दण्डवत करता है। गाय हो या गधा हो, चाण्डाल हो
या श्वान हो, लोक जिन्हें अत्यन्त निंद्य और कनिष्ट समझते हैं, उन्हें भी पूर्ण भगवद्रूप मानकर अनन्य भाव से
दण्डवत करता है। पाषाण को भी हरिरूप समझता है। तृण को भी भगवत्स्वरूप समझकर उसका वन्दन करता
है। स्थावरजंगमादिकों को भी चिदैक्य भाव से दण्डवत करता है। हरिनाम स्मरण की महिमा से इतना लाभ कैसे
होता है यह पूछोगे तो, ऐ राजा ! उसका मर्म सुनो। विधिपूर्वक पूजा, अथवा श्रवण, स्मरण, कीर्तन करते हुए
जिसकी सर्वकाल 'चिदैक्य भावना' रहती है, उसे ही 'पूर्णप्राप्ति' साध्य होती है।
भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र चैष त्रिक एककालः।
प्रपद्यमानस्य यथाश्नतः स्युस्तुष्टिः पुष्टिः क्षुदपायोऽनुघासम् ॥ ४२ ॥
हे चक्रवर्ती राजा जनक, सुनो ! जहाँ ऐसी भगवद्भक्ति रहती है, वहाँ गोवत्स न्याय के अनुसार विषय-
विरक्ति भी दौड़ कर आती है। जिस प्रकार जुड़वाँ फल एक दूसरे को नहीं छोड़ सकते उसी प्रकार भक्ति और
विरक्ति साथ-साथ ही उत्पन्न होती हैं और उनके सामर्थ्य से भक्त भी समर्थ हो जाते हैं। जहाँ भक्ति और विरक्ति
सहज स्थिति में एक साथ रह सकती हैं, वहीं पूर्ण-प्राप्ति भी सदा सर्वकाल दासी की तरह सेवा करती है। इस
प्रकार भगवद्भक्ति त्रिभुवन में अत्यन्त समर्थ है और भक्ति-विरक्ति की एकता के कारण भक्तों के घर प्राप्ति भी
रहने लगती है। अब भक्ति, विरक्ति और अनुभव प्राप्ति ये तीनों एक ही समय कैसे उत्पन्न होती हैं, वह स्थिति
भी तुम्हें विस्तार से बताता हूँ। जैसे-जैसे भगवद्भक्ति की जाती है, वैसे-वैसे विषयों के प्रति विरक्ति उत्पन्न होती
जाती है और उसी के अनुसार अनुभव स्थिति भी भक्तों को उसी समय प्राप्त होती है। भूखे व्यक्ति के सामने
षड्रसयुक्त भोजन की थाली रखने से उसे प्रत्येक ग्रास में पुष्टि, तुष्टि तथा क्षुधानाश का अनुभव होता है। जितना
ग्रास खाया जाए उतना ही क्षुधा का नाश होता है और जितना अधिक पेट भरता है उसी के अनुसार सुख और
समाधान भी उतना ही बढ़ता जाता है। पुष्टि, तुष्टि तथा क्षुधानाश ये तीनों चीजें जिस प्रकार भोजन करने वाले
को एक साथ प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार भगवद्भजन में भक्ति का त्रिकूट अर्थात् भक्ति, विरक्ति और अनुभव
प्राप्ति ये तीनों एक साथ उत्पन्न होती है। हे राजा ! सद्भाव से भगवद्भक्ति करने से भक्ति, विरक्ति तथा अनुभव
प्राप्ति ये तीनों एक साथ उत्पन्न होते हैं। हे राजा ! सद्भाव से भगवद्भक्ति करने से भक्ति, विरक्ति और
भगवत्प्राप्ति ये तीनों उपर्युक्त न्याय से एक ही समय प्राप्त होती है। भक्ति का अर्थ है समस्त प्राणियों के प्रति
सप्रेम भावना और प्राप्ति का अर्थ है अपरोक्ष साक्षात्कार, अर्थात् भगवद्रूप की तीव्र स्फूर्ति अब विरक्ति ऐसी जैसे
मेरी स्त्री, मेरा पुत्र, मेरी देह आदि जो ममत्व और अहंकार होता है, वह जहाँ समूल मिथ्या हो जाता है उसी का
नाम राजा विरक्ति है। इस प्रकार भजन से भक्ति, विरक्ति और भगवत्प्राप्ति ये तीनों ऐक्यभाव से सद्भक्त में भजन
दृष्टि के कारण एक ही समय उत्पन्न होती है। इसलिए राजा ! स्वहित के लिए हरि की भक्ति अवश्य करनी
चाहिए। वहाँ निश्चय ही भगवत्प्राप्ति होती है।
इत्यच्युताङ्घ्रिं भजतोऽनुवृत्त्या भक्तिर्विरक्तिर्भगवत्प्रबोधः।
भवन्ति वै भागवतस्य राजंस्ततः परां शान्तिमुपैति साक्षात् ॥ ४३ ॥
इस प्रकार जो सदा समस्त भूतों के प्रति अनन्य भक्ति करते हैं, वे भक्ति, विरक्ति और भगवत्प्राप्ति
अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं। हे राजा ! हरिभक्ति यह एक उत्तम अंजन है। सद्भक्त अपने नेत्रों में यह अंजन
डालकर अपने भजनरूपी महायोग से भगवत्स्वरूप का खजाना अपना कर लेते हैं। ऐक्य भाव से निजभक्ति
करने से सर्वोत्तम पूर्ण शान्ति प्राप्त होती है, जिसके योग से असत् वस्तुओं की निवृत्ति हो कर भक्तों को
ब्रह्मानन्दरूपी भगवान की पूर्ण प्राप्ति होती है। इसलिए भगवद्भक्त धन्य हैं। वे इन्द्रियों से व्यवहार करते हुए भी
विषयों के प्रति विरक्त होते हैं, वे देहधारी होते हुए विदेही होते हैं और हरिभजन के योग से नित्यमुक्त होकर
रहते हैं। एकनिष्ठ होकर भक्ति करते समय वे मुक्ति की भी इच्छा नहीं करते, फिर भी चारों मुक्तियाँ सदा उनके
पास दासियों की तरह खड़ी रहती हैं। भगवद्भक्तों की यह महिमा अनुपम है। निष्ठा के साथ पुरुषोत्तम का
भजन कर वे श्रेष्ठ परम पद को प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार की भगवान की श्रेष्ठ भक्ति और भक्तों को होने
वाली भगवत्प्राप्ति के सम्बन्ध में सुनकर चक्रवर्ती राजा जनक को बड़ा आश्चर्य हुआ। 'धन्य धन्य भगवद्जन'
कहकर वह प्रसन्नता के मारे कवि को दण्डवत करने लगा उस समय उसका कण्ठ भर आया और उसकी
सिसकियाँ रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। शरीर पर रोमांच उभर आये और आँखें भर आयीं। आनन्द से उसे
पसीना चुहचुहा आया, शरीर थरथर काँपने लगा और क्षणभर के लिए वह स्तब्ध रह गया। लेकिन शीघ्र ही वह
होश में आ गया। क्योंकि उसे लगा कि कहीं ये महर्षि मुझसे बिना पूछे चले न जाएँ। राजा ने ऐसी व्याकुल
अवस्था में आँखें खोलीं वहाँ ऋषिमण्डली को बैठे देख उसे बड़ा आनन्द हुआ। उस आनन्द में वह डोलने लगा
और बोला कि जिन्हें पूर्ण प्राप्ति हुई रहती है ऐसे भगवद्भक्त संसार में कैसा-कैसा व्यवहार करते हैं, वे सारे
लक्षण इनसे पूछूँ।
राजोवाच
अथ भागवतं ब्रूत यद्धर्मो यादृशो नृणाम्।
यथा चरति यद्ब्रूते यैर्लिङ्गैर्भगवत्प्रियः ॥ ४४ ॥
भक्त को 'पूर्णप्राप्ति' होना सुगम है यह सुनकर राजा को अत्यन्त समाधान हुआ। इसलिए वह भक्तों के
लक्षणों का अनुक्रम और समूल मर्म पूछने लगा। राजा जनक ने कहा, "महाराज ! मुनिवर ! जो भगवद्भक्त 'पूर्ण
प्राप्ति' कर लेते हैं वे संसार में कैसा व्यवहार करते हैं? उनके वे सारे लक्षण मुझे बता कर मेरे कानों को
अलंकृत कीजिए। भक्तों के लक्षण एक प्रकार के अलंकार ही हैं, उन्हें पहना कर मेरा श्रवण भूषणयुक्त कीजिए।
उनके सारे लक्षणों का यदि ध्यानपूर्वक श्रवण किया जाए तो हम भी भगवान के प्रिय बनेंगे। उनका धर्म क्या है?
उनका कर्म कैसा होता है? अन्तःकरण में पुरुषोत्तम को रखकर वे कैसा व्यवहार करते हैं? उनकी बोलने की
शैली कैसी है? किन स्थितियों में और किस रीति से हरि के भक्त हरि के प्रिय बनते हैं? स्वामी! ऐसे लक्षणों
की जितनी भी मालिकायें हों, वे सब मुझे बतलाइये।" राजा जनक के इस प्रश्न से सभी मुनीश्वरों को बड़ा
सन्तोष हुआ और कवि से छोटा हरिनाम का भाई उस प्रश्न का उत्तर देने के लिए आगे बढ़ा।
हरिरुवाच
सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ ४५ ॥
हरि ने राजा से कहा, "हे राजा! भक्तों के लक्षणों के अनेक प्रकार हैं। कुछ दिगम्बर अर्थात् नग्न अवस्था
में रहते हैं और कुछ अपने आश्रम धर्म का पालन कर अपने ही आचार से व्यवहार करते हैं। कुछ हमेशा लेटे ही
५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
रहते हैं तो कोई उन्माद जैसी स्थिति में रहते हैं। कोई हमेशा नाचते-गाते रहते हैं तो कोई मौन ही रहते हैं। कोई
हरिनाम का घोष करते रहते हैं तो कोई अपने कर्मों का ही त्याग करते हैं। कोई प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव
रखकर रहते हैं तो कोई नियमपूर्वक भजन करते रहते हैं। ऐसे भक्तों के अनेक लक्षण हैं। उन सबको बताना
सम्भव नहीं है। इसलिए हे राजा! उनमें से जो प्रमुख है, उनके ही सम्बन्ध में तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ। सभी
भूतों में भगवान व्याप्त हैं इस दृष्टि से देखना ही पूर्ण प्राप्ति का मुख्य स्वरूप एवं साधन है। यही पूर्ण भक्ति का
गौरव है। यही अभिप्राय हरि बताते हैं। मैं ही भगवद् स्वरूप हूँ और सर्वभूतों में मैं ही व्याप्त हूँ, समस्त भूत
मुझमें ही वास करते हैं और सभी भूतों में भूतात्मा मैं ही हूँ तथा परमात्मा मैं ही हूँ। यह तो पूर्णत्व का 'मैंपन' है,
उससे ही आत्माभिमान बढ़ता है और वह सहज ही सच्चा निरभिमानी होता है। राजा, वह शुद्ध लक्षण बताता हूँ,
सुनो। शुद्ध भक्तों का प्रमुख लक्षण यह है कि चैतन्य आत्मा का जो 'मैंपन' है उसे भी वे गौण मानते हैं और
उनकी भावना पूर्णतयः ऐसी हो जाती है कि सभी प्राणियों में भगवान हैं तथा सभी प्राणी भगवान में हैं। प्राणीमात्र
में वास करने वाला परमात्मा मैं हूँ यह कहने से 'मैं पन' आड़े नहीं आता। समस्त प्राणियों में भगवान हैं और
भगवान में समस्त प्राणिमात्र हैं यह जो मानता है और यह सब अपने ही देह में देखता है, वह स्वस्वरूप बन कर
रहता है। यह भक्तों में अत्यन्त श्रेष्ठ, वही भागवतों में भी वरिष्ठ, उसे ही उत्तमता का सम्मान देकर श्रेष्ठ अवतार
समझा जाता है। योगियों में वही अग्रगण्य है, ज्ञानियों का शिरोमणि वही है और सिद्धों का मुकुटमणि भी वही है
वह स्वयं श्रीकृष्ण का वचन है। घी का रवा जिस प्रकार घी से अलग नहीं रहता उसी प्रकार पंचमहाभूत और
भौतिक पदार्थ—यें सब सर्वव्यापी परमात्मा से कभी भिन्न नहीं होते। हे राजा! 'उत्तम' भक्तों की भावना इस
प्रकार की रहती है निश्चित जान लो। अब 'मध्यम' भक्तों की भजनपद्धति सुनो।
ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च।
प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥
ईश्वर उत्तमोत्तम है, उसके भक्त मध्यम हैं, अज्ञानी अधम हैं, और द्वेष करने वाले अत्यन्त पापी हैं ऐसा वह
मानता है। हाँ, ईश्वर के प्रति उसके मन में विशुद्ध प्रेम रहता है, भक्तों से केवल स्नेह रहता है, अज्ञानियों पर कृपा
रहती है और जो भूतमात्र से विद्वेष करता है, उसकी वह निरन्तर उपेक्षा करता रहता है। हे राजा! मध्यम भक्तों की
भक्ति इस प्रकार की रहती है इसे ध्यान में रखो। अब तुम्हें 'प्राकृत' भक्तों की स्थिति के बारे में बताता हूँ।
अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते।
न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ४७ ॥
पाषाण की मूर्ति को ही वह देवता मानता है, उसी में उसकी सारी भक्ति रहती है। लेकिन भक्त अथवा
सन्त को देखकर केशमात्र भी देह को नहीं झुकाता। फिर साधारण लोगों को कौन पूछता है ? उन्हें स्वप्न में भी
कभी सम्मान प्राप्त नहीं होगा। प्राकृतों का भजन इस प्रकार का रहता है। जो भक्त ऐसी अज्ञान की स्थिति में
रहता है, वही प्रमुख 'प्राकृत' भक्त है। उसकी मूर्ति भंग होते ही वह समझता है कि देवता का भी अन्त हो गया।
इस प्रकार तीन प्रकार के भजन करने वालों के बारे में तुम्हें बताया। लेकिन उत्तम भक्तों के लक्षण अपूर्व होते हैं।
उसे बताने के लिए मेरा मन अत्यन्त उत्सुक हो उठा है।
गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान्यो न द्वेष्टि न हृष्यति।
विष्णोर्मायामिदं पश्यन् स वै भागवतोत्तमः ॥ ४८ ॥
द्वितीय अध्याय ५१
इन्द्रियाँ विषयों का सेवन करती रहती हैं, फिर भी जिसके चित्त में सुख-दुःख उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि वे
जानते हैं कि विषय मिथ्या हैं, वे ही सचमुच 'उत्तम भक्त' हैं। जो मृगजल में स्नान करता है वह स्नान करने पर
भी सूखा रहता है, उसी प्रकार भोग भोगने में भी जो अलिप्त अर्थात् 'अभोक्ता' रहते हैं, वे ही पूर्ण एवं उत्तम
भक्त हैं। उत्तम भक्त विषयसेवन करते हैं ऐसी साधारण लोगों की धारणा रहती है। लेकिन वे नहीं जानते कि
ऐसे भक्तों को विषय के प्रति स्फूर्ति ही नहीं रहती। उनका त्याग और भोग दोनों ही मिथ्या रहता है। स्वप्न में
खाया हुआ केला बहुत मीठा था इसलिए जगने पर भी वह केला माँगने लगे तो वह न हाथ लगता है न मुँह में
ही जाता है। उसी प्रकार विषय सेवन में हरिभक्त अलिप्त ही रहते हैं। विषयसेवन यदि इतना मिथ्या है, तो फिर
वे उसका सेवन ही क्यों करते हैं ? भाग्य अत्यन्त बलवान होता है और वही उन्हें विषयों का भोग करने के लिए
उद्यत करता है। लेकिन मैं एक विषयभोक्ता हूँ, यह बात उनके स्वप्न में भी नहीं आती। इसीलिए उत्तम
भागवतता उसी में प्रकट होती है, ऐसा समझना चाहिए। उत्तम भक्त विषयसेवन में इस प्रकार का व्यवहार करते
हैं। अब इससे भी अगाध एक स्थिति है, उसके बारे में भी तुम्हें सुनाता हूँ।
देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रैः ।
संसारधर्मैरविमुह्यमानः स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥ ४९ ॥
देह, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और प्राण यही पाँच बन्धनकारी स्थल हैं और उनमें सुधा, तृष्णा, भय, क्लेश,
जन्म, मरण आदि भरे हुए हैं। इन पाँच ही स्थानों पर अत्यन्त कष्ट होते हैं। उसी का नाम संसारधर्म है। किन्तु
श्रीआत्माराम अपने भक्तों पर हमेशा प्रसन्न रहते हैं इसलिए उन्हें स्वप्न में भी संसारभय की बाधा नहीं होती।
दारुण क्षुधा लगने पर दूसरों के प्राण अन्न के लिए व्याकुल हो जाते हैं किन्तु भक्त लोग हरिस्मरण में इतने
तल्लीन रहते हैं कि उन्हें क्षुधा का स्मरण भी नहीं होता। अंतःकरण से भगवद्भक्ति करने से भूख और प्यास की
याद भी नहीं आती। इतनी महान भक्ति जिन्हें हुई रहती है, वह सचमुच ही संसारभय से नहीं घबराते। संसार का
भय मन में रहता है किन्तु उनका मन तो हरिचरणों में मगन रहता है, फिर भय किसे होगा ? क्योंकि वहाँ मन का
कोई धर्म ही नहीं रह जाता। मन में द्वैत की भावना उत्पन्न होती है जिससे संसारभय दृढ़ होता जाता है। ऐसे उस
मन में जब भगवान का निवास होता है तो द्वैत के साथ भवभय की निवृत्ति सहज ही हो जाती है। देहबुद्धि में
अनेक प्रकार की वासनाएँ उठती हैं लेकिन वही बुद्धि जब निश्चय करके हरि का स्मरण करने लगती है तो वहीं
पूरी तरह स्थिर हो जाती है। फिर उस बुद्धि में जहाँ-जहाँ तृष्णा का स्फुरण होता है, उस-उस तृष्णा में सहज ही
नारायण प्रकट होता है। इससे तृष्णा वितृष्णा हो जाती है और पूर्णत्व में विलीन हो जाती है। इस प्रकार भगवद्
भक्त हरिस्मरण करने से तृणारहित हो जाते हैं। इससे वे इन्द्रियों के क्लेश से अलिप्त हो जाते हैं। राजा ! उसके
बारे में भी सुनो। कष्ट होने का बीज इन्द्रियों के कर्मों में रहता है। उन इन्द्रिय कर्मों में हरिभक्तों को हरिभजन के
द्वारा ब्रह्मस्फुरण होता रहता है। दृष्टि से देखने का प्रयास करो तो जो जो दिखाई पड़ता है उन सभी दृश्य पदार्थों
में नारायण ही प्रकट होता है। कान से 'शब्द' ग्रहण करते समय, उस शब्द की ध्वनि में तथा अर्थ में ब्रह्म ही
पूरी तरह विराजमान हो जाता है। नाक से अनेक प्रकार के 'गन्ध' अर्थात् वास लेते समय उन वासों के ज्ञान में
साक्षात परमेश्वर प्रकट होता है। उसी प्रकार जिह्वा जिन-जिन रसों का सेवन करती है उन-उन रसों में स्वादरूप
में ब्रह्मरस ही प्रकट होता है। देह में कुछ शीत-उष्ण अथवा मृदु-कठिन लगा तो उस 'स्पर्श' ज्ञान से उनमें मूल
का चित्स्वरूप पूर्णरूप से प्रकट होता है। अब हस्तपादादि कर्मेन्द्रिय प्रवृत्तियों में इस ब्रह्मा की ही स्फूर्ति होने के
५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कारण लेना-देना अथवा आना-जाना आदि इन्द्रियों का चलन आत्माराम ही करता रहता है, ऐसा उन्हें अनुभव
होता है। इस प्रकार जब इन्द्रियाँ कष्ट करने लगती हैं तो उस कष्ट में भी आत्मसुख ही प्रकट होता है। इससे
इन्द्रियों को उत्तम प्रकार का विश्राम मिलता है। इस प्रकार हरिभक्तों के हिस्से में स्वानन्द की पेठ (बाजार) ही
आ जाती है। जिससे इन्द्रियों को कष्ट होता है, उससे ही उसे सुख भी प्राप्त होता है यह भगवद्भजन की युक्ति
है। इस प्रकार हरिभक्त हरि के स्मरण से नित्यमुक्ति भोगते रहते हैं। जन्म और मरण तो देह के साथ लिखा हुआ
है किन्तु भक्त देह में होते हुए भी विदेही होते हैं। हरि चरणों का ध्यान करते-करते वे हरिरूप हो जाते हैं।
इसलिए भगवद् भक्तों को देह का अहंकार कभी उत्पन्न नहीं होता। हे राजाधिराज! उस भक्त की पूर्णता का वर्णन
करता हूँ, सुनो। देह को यदि बाघ पकड़ ले तो भी भक्त का मन विचलित नहीं होता। क्योंकि वह जानता है कि
देह का मरण बाँझ स्त्री के बच्चे को सूली पर चढ़ाने की तरह है। जिस प्रकार कोई यह नहीं चाहता कि उसकी
छाया पालकी में बैठे उसी प्रकार देह को कोई बड़ी मान्यता या सम्मान मिले यह इच्छा भक्त के मन में
स्वाभाविक रूप से ही नहीं आती। अथवा शरीर पर कितनी ही आपदाएँ क्यों न आएँ लेकिन भक्तों के मन में
कभी भी उसके प्रति खेद नहीं उत्पन्न होता। यदि आकाश पर तलवार से घाव किया जाए तो वह करुणा का
प्रदर्शन नहीं करता, वैसी ही बात है। देह माँ के गर्भ से उत्पन्न होता है लेकिन 'मैंने जन्म लिया' यह बात भक्त
नहीं करता। जलकुण्ड में सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है तो सूर्य यह नहीं कहता कि मैं जलकुण्ड बन गया हूँ।
सुबह से शाम तक सूर्य प्रकाश देता है, उस प्रकाश से बादलों में गन्धर्वनगर का आभास होता है (सूर्य यह नहीं
कहता कि गन्धर्व नगर मैंने उत्पन्न किया है) उसी प्रकार जो अदृष्ट है वही शरीर की सुरक्षा करता है। वहाँ मैं
कर रहा हूँ यह बात उसके मन में नहीं आती। भक्त की देह को मरण आता है, लेकिन उसे हेतुरहित हरि का
स्मरण रहता है। इसलिए देह भले ही मर जाए लेकिन वह बिना मरे पूर्णत्व के कारण पूर्णत्व में ही शेष रहता है।
जलाशय का पानी सूख जाने पर सूर्य यह नहीं कहता कि मैं अदृश्य हो गया हूँ। उसी प्रकार देह नष्ट होने पर भी
भक्त हरिस्मरण के कारण अपने सद्रूप से विश्व में छाया रहता है। रस्सी पर भासित होने वाले सर्प को क्या पहले
मार कर फिर रस्सी को रस्सी बनाया जाता है ? अपने मूल स्वरूप को बदले बिना डोरी डोर के ही रूप में
अखण्ड रहती है। उसी प्रकार हरिभक्त को देह का अभाव रहता है। फिर काल प्रहार किस पर करेगा ? अब हम
तो खुद ही ब्रह्मरूप हैं और उस ब्रह्मत्व के कारण हमारा अहंभाव (मैं देह ही हूँ यह अभिमान) व्यर्थ हो गया।
इस प्रकार संसार के देहधर्म और कर्माकर्म जिसे स्पर्श भी नहीं करते, जिसे मोह के कारण संसारभ्रम नहीं होता,
वही भक्तों में उत्तम है। राजा तुम्हें एक और भी लक्षण बताता हूँ। जिसका काम भी नारायण हो जाता है, ऐसा
भक्तलक्षण बताता हूँ।
न कामकर्मबीजानां यस्य चेतसि सम्भवः ।
वासुदेवैकनिलयः स वै भागवतोत्तमः ॥ ५०॥
अंतःकरण में आत्माराम का चिन्तन करते-करते हृदय का काम आत्मरूप हो जाता है। देवाधिदेव पुरुषोत्तम
उससे सन्तुष्ट होकर सारे कर्मों में प्रकट होता है। इसलिए हृदय में जो भी वासनाएँ रहती हैं वे सब हरिसुख के
वश हो जाती है। इस प्रकार जब सारी वासनाएँ हरि के ही वश हो जाती हैं तो उन्हें हरि ही दृढ़ आश्रय हो जाता
है। उस समय भक्त का जो भी विषयाभिलाष होता है वह आत्माराम ही हो जाता है। उसकी वासना का
निजसंभ्रम स्वयं पुरुषोत्तम हो जाता है। संसार में हरि की भक्ति सर्वोत्तम है। वह भक्त को काम से ही निष्काम
द्वितीय अध्याय ५३
करती है। एक के बाद एक प्रारम्भ होने वाली वासनाओं को देखने से उसका निर्वासना रूप ब्रह्म अपने आप
प्रकाशित होता है। (एक वृत्ति नष्ट हुई और दूसरी अभी शुरु नहीं हुई है, तब तक उसका सन्धिकाल में
निर्विकल्प चैतन्य का स्पष्ट आभास होने लगता है।) हर ग्रास पर राम का स्मरण करने से वह अन्न ही पूर्णब्रह्म
हो जाता है। हे राजा जनक! इसी रीति से भक्त विषयों में भी मुक्तस्थिति का अनुभव करता है। ऐसा जो
निष्कामनिष्ठ पुरुष होता है, वही भागवतों में श्रेष्ठ है। उसे ही प्रधानत्व का मान देना उचित है। राजा! उत्तम
भक्त किस प्रकार का व्यवहार करते हैं इसका वर्णन तुम्हें तीन श्लोकों में बताया। इसके बाद, उत्तम भक्त किन
गुणों के कारण भगवान को प्रिय हो जाते हैं, वे लक्षण बताने के लिए हरि अत्यन्त उल्लास से बोलने लगा।
न यस्य जन्मकर्मभ्यां न वर्णाश्रमजातिभिः।
सज्जतेऽस्मिन्नहंभावो देहे वै स हरेः प्रियः ॥५१॥
साधारण लोगों में देहात्मभाव होता है। वह जब गुरुकृपा पाकर भजन करता है तो उसके अभिमान का
स्वरूप 'मैं स्वयं नारायणस्वरूप हूँ' इस भावना में बदल जाता है। 'मैं देह हूँ' यह भावना मूलतः ही मिथ्या है,
वास्तव में 'मैं नारायण हूँ' यही सच है। इस भावना की आदत हो जाने से इसी भावना में अभिमान का विलय
हो जाता है। देहाभिमान हरिचरणों में लीन होने के बाद भक्त निरभिमान होता है। वही निरहंता का लक्षण हरि
पूरी तरह बता रहे हैं। निरहंकारी का यह लक्षण है कि वह जन्म लेकर भी मैंने जन्म लिया है ऐसा नहीं कहता।
सोने का कुत्ता बनाने पर भी वह कुत्ता नहीं बन सकता। उसी प्रकार जन्मादिक का अहंभाव उत्तम भक्त को नहीं
जमता वह 'कर्म' करता है पर स्वयं को 'कर्ता' नहीं मानता। सूर्य जिस प्रकार आकाश में रहकर भी पृथ्वी पर
सूर्यकांता से अग्नि को उत्पन्न करता है, उसी प्रकार उत्तम भक्त सारे कर्म करने पर भी आत्मदृष्टि से अकर्ता ही
बना रहता है। सूर्य के कारण सूर्यकांता से अग्नि उत्पन्न होता है, फिर उस अग्नि से यज्ञ हो या दावाग्नि भड़के,
लेकिन उससे सूर्य के शरीर पर आँच नहीं आयेगी। उसी प्रकार यह भक्त सब कुछ करने पर भी शुद्ध अकर्ता
बना रहता है। न हिलने-डुलने वाला जड़-अचेतन लोहा, लौहचुम्बक के कारण हिलने लगता है लेकिन इससे
लौहचुम्बक को कोई बाधा नहीं होती। वह क्रियाशील नहीं होता। उसी प्रकार यह सारे कर्म करने पर भी
निरहंकार के बल पर अकर्ता बना रहता है। शरीर के कर्म भाग्य से होते रहते हैं। उसका 'कर्ता' मैं हूँ यह कहने
से वह बाधक हो जाते हैं, लेकिन भजनों के कारण परमात्मप्रतीति के कारण भक्त सभी कर्मों में निरहंकार ही
रहता है। उसी प्रकार देह के कर्म चलते समय पूर्ण प्रतीति के कारण अथवा पूर्णत्व के अनुभव के कारण भक्त
अकर्ता ही रहता है। अपनी स्वाभाविक निरहंकृति के कारण वह कर्माकर्म का बोझ अपने सर पर नहीं लेता।
उत्तम वर्ण में जन्म लेने पर भी वह 'मैं ब्राह्मण हूँ' यह नहीं कहता। कुंकुम में रखा हुआ लाल स्फटिक 'मैं लाल
हूँ' यह कभी नहीं कहता। जिसे देह का अभिमान नहीं रहता वह देह के वर्ण की जिस प्रकार चिन्ता नहीं करता
उसी प्रकार ज्ञानसम्पन्न भक्त कभी आश्रम का भी अभिमान नहीं करता। देह से संन्यासाश्रमी होने पर भी वह यह
नहीं कहता कि 'मैं परमहंस' अर्थात् संन्यासी हूँ। नाटक में अभिनेता राजा की पोशाक पहनकर 'मैं राजा बन
गया हूँ' यह नहीं मानता उसी प्रकार भक्त आश्रम आदि अवस्थाओं का अभिमान नहीं करता। उसी प्रकार उत्तम
भक्त जाति-पाँति का बोझ भी अपने माथे पर नहीं रखता। ऊँच-नीच आदि अनेक जातियाँ हैं लेकिन उनमें से
किसी जाति विशेष को वह अपनी जाति नहीं कहता। गंगा के किनारे अनेक गाँव रहते हैं लेकिन उनमें से किसी
एक गाँव को गंगा अपना गाँव नहीं कहती। उसी प्रकार जो पूर्णभक्त होते हैं वे जन्म, कर्म, वर्णाश्रम तथा जाति
आदि का अभिमान नहीं करते। वे स्थूल, सूक्ष्म, कारण तथा महाकारण आदि चारों देहों का अभिमान स्वप्न में
भी नहीं करते। (आशंका) तो क्या भक्त वर्णाश्रम-जाति आदि का पूरी तरह त्याग कर देते हैं? (उत्तर) नहीं,
ऐसी बात नहीं है। वे उसमें रह कर भी उसका अहंकार नहीं करते। प्राणी जब जन्म लेता है उस समय वर्णाश्रम
जाति आदि उसके साथ नहीं आते लेकिन जन्माभिमान के कारण वह ये सारी बातें अपने मत्थे ले लेता है। इस
व्यर्थ के अभिमान में ब्रह्मदेव आदि देवता भी फँस जाते हैं। वर्णाश्रमधर्म और जातियाँ बढ़ा कर बड़े-बड़े विद्वान
भी अपने-अपने अभिमान में फँसे रहते हैं। अहंता की यह अत्यन्त दुर्धर गति है। ब्रह्मा आदि देवतागण भी इससे
नहीं बच पाते। कल्पांत में भी वह उन्हें नहीं छोड़ती। बड़े-बड़े ज्ञानसम्पन्न भी स्वाभिमान के भुलावे में फँस जाते
हैं। इधर भक्तों की भाविक स्थिति में भगवद्भक्ति के कारण अभिमान नष्ट हो जाता है। हे राजा! इस प्रकार
भक्तों की निरभिमान स्थिति तुम्हें बता दी। जिसका देहाभिमान पूरी तरह झड़ जाता है वही देहधारी भगवान का
प्रिय बनता है। ऐसे भक्त ही भगवान के लाडले हो जाते हैं इसे ध्यान में रखो। वे दुलार से जो कुछ भी माँगते हैं,
वह सब भगवान स्वयं हो जाता है। उनके परम संतोष से भगवान भी सुखी, सन्तुष्ट और पुष्ट होता है। भक्त
जहाँ कहीं भी जाता है, वहाँ भगवान स्वयं खड़ा रहता है। भक्त जिस वस्तु की इच्छा करता है या जिन पदार्थों
को देखता है, वे सब पदार्थ भगवान स्वयं हो जाता है। कहीं किसी की उसे नजर न लग जाए इसलिए भगवान
उसके आगे-पीछे तथा चारों ओर रहता है। भक्तों के आगे भगवान पंगु हो जाता है और उनकी भक्ति में उनके
साथ चलता रहता है। जिस प्रकार नन्हे बच्चे के प्रेम के कारण माँ मन प्राण से उसकी सेवा करती है, उसी प्रकार
भक्त के निरभिमान के कारण भगवान स्वयं उसका सब कुछ करता है। इस प्रकार अपने भक्त की रक्षा करते
समय उसके मन में एक ही भय लगा रहता है कि यदि यह मेरे साथ ऐक्य प्राप्त कर लेगा तो फिर मैं प्रेम किस
के साथ करूँगा? कृपादृष्टि से किसकी ओर देखूँगा? मन की बातें किसे सुनाऊँगा? चारों हाथों से किसके गले
लगूँगा? उसे प्रेम की विलक्षण आसक्ति रहती है। ऐसी विवशता से श्रीअनन्त ऐक्यभाव से उसे अपना भक्त
बनाकर रखता है। फिर भगवान और भक्त इन दोनों में भगवान ही स्वानंद में नाचता रहता है। इस प्रकार वह
अनन्य प्रेम से स्वयं अपनी ही भक्ति करता रहता है। इसी का वेदान्त में निरूपण किया गया है और इसी का नाम
'अद्वैत भक्ति' है। वैसे भक्त को चारों हाथों से आलिंगन देते समय भगवान को तृप्ति नहीं होती। फिर वह उसके
भीतर घुसकर परमार्थतः आलिंगन, देता है। (यही सच्चा अंतर्बाह्य 'सर्वांगालिंगन है') इस प्रकार आलिंगन के
बहाने वह भक्त को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है और फिर उसके भीतर और बाहर अत्यन्त प्रेम से स्वयं ही
व्याप्त हो जाता है। भगवान को अच्छा लगने वाला स्वरूप बड़ा विलक्षण है। भक्त पर काल का प्रवाह न हो
इसलिए देवाधिदेव अपने भक्त की देह भी स्वयं हो जाता है। इस प्रकार जो भगवान को अत्यन्त प्रिय हुआ है,
वही भागवतों में 'उत्तमोत्तम' है। इस प्रकार का भागवत धर्म पुरुषोत्तम को वश में कर लेता है। ऐसे उत्तम भक्त
को भेद की बात भी नहीं मालूम होती। हे राजा! उस भक्त की अभेदभाव की कथा, तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
न यस्य स्वः पर इति वित्तेष्वात्मनि वा भिदा।
सर्वभूतसमः शान्तः स वै भागवतोत्तमः ॥ ५२ ॥
अद्वैत भजन के योग से 'मैं' और 'मेरा' अथवा 'तुम' और 'तुम्हारा' यह भाव जिसमें शेष नहीं रहता वही
'उत्तम भक्त' माना जाता है। इस प्रकार जिसके चित्त में भेद जरा भी शेष नहीं रह जाता वहाँ 'मेरा' और तुम्हारा
जैसी कोई बात नहीं रह जाती। वह अपने ही स्थान पर नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार अग्नि में जो भी आकर
द्वितीय अध्याय ५५
मिलता है वह सब अग्नि ही बन जाता है, उसी प्रकार अभेदरूप हुआ भक्त जो कुछ भी देखता है वह सब
स्वाभाविक रूप से आत्मस्वरूप ही हो जाता है। अपना धन दूसरे को देते समय उसके मन में शंका नहीं आती।
दूजेपन की वार्ता भी उसे सुनाई नहीं देती और कोई विकल्प की बात करता है तो वह उसके गले नहीं उतरती।
बायें हाथ की वस्तु दाहिने हाथ में दी जाये तो देनेवाला कौन और लेने वाला कौन ? उसी प्रकार समस्त प्राणिमात्र
के प्रति उसकी एकात्मता ही हो जाती है। भक्तों को स्वयं अपने शरीर में भगवान के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं
दिखाई देता इसलिए उनके मन में शान्ति बनी रहती है। अपनी उस समदृष्टिरूप शान्ति में भगवद्भक्त क्रीड़ा
करते रहते हैं इसीलिए उन्हें सचमुच ही उत्तमत्त्व की प्राप्ति होती है। हे राजा ! अब हरिभक्तों की 'निरपेक्षता'
बताता हूँ, सुनो। उत्तम भक्तों की कथा सुनाते समय हरि के मन को अत्यन्त उल्लास हो रहा था। (उसने कहा)
जो निरपेक्ष है वही 'मुख्य भक्त' है। निरपेक्ष ही वास्तव में 'विरक्त' और निरपेक्ष ही 'नित्यमुक्त' है। क्योंकि
भगवान सचमुच ही निरपेक्ष है।
त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठस्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात्।
न चलति भगवत्पदारविन्दाल्लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्रयः ॥ ५३ ॥
अपना सच्चा स्वार्थ साधने की अवस्था में सप्रेम भक्ति करते समय भक्त अपनी सारी वृत्ति हरि के चरणों
पर केन्द्रित करता है। उस समय त्रैलोक्य की सारी सम्पत्ति हाथ जोड़कर यदि उसका वरण करने आये तो भी वह
अपनी चित्तवृत्ति एक क्षण के लिए भी हरिचरणों से दूर करने के लिये तैयार नहीं रहता। परमार्थ के प्रति वह
इतना अधिक आसक्त रहता है। यदि क्षणभर के लिए भी वह अपनी चित्तवृत्ति वहाँ से हटा ले तो त्रैलोक्य की
सम्पत्ति उसके हाथ लगे। तो फिर इतना स्वार्थ त्याग करने में हरिभक्त का क्या लाभ है ? तो उसका कारण यह है
कि हरिचरणों में लीन होने में जो साक्षात्कार होता है, उस क्षणार्ध में लाभ के सामने भक्तों को त्रैलोक्य का वैभव
अथवा सम्पत्ति तुच्छ मालूम होती है। सारे संसार को उत्पन्न करने वाला ब्रह्मदेव पितामह जिसके आँगन में
त्रैलोक्य की सम्पत्ति ऐसी ही पड़ी रहती है, उस सम्पत्ति के सामने उसका ब्रह्मपद भी काफी श्रेष्ठ है लेकिन वह
ब्रह्मदेव भी अपने सुखस्वार्थ के लिए-हरिचरणों को खोजता रहता है।
ब्रह्मलोक की सम्पत्ति और वैभव को ठुकराकर ब्रह्मदेव एकान्त में बैठकर दिन-रात हरिचरणों का ध्यान
करते रहते हैं। फिर भी उन्हें एकाएक उसकी प्राप्ति नहीं होती। यह बात ध्यान में रखो कि ब्रह्मदेव को हरिचरण
प्राप्त न होने के कारण ही वह घमण्डी हो गया था और गोकुल के गोपाल तथा बछड़ों को चुराकर ले गया था।
उस समय स्वयं बिना कोई कष्ट किये और अपना कृष्णपना भी न तोड़ते हुए वह पूर्णत्व से गोपाल और उनके
बछड़े स्वयं बन कर रहा। हरि की यह अद्भुत लीला देखकर ब्रह्मदेव बौरा गया और अपने ब्रह्मपद का अभिमान
त्याग कर अनन्यभाव से हरि की शरण में आया। ब्रह्मदेव भी जिसके चरण पकड़ता है वह कैलाशपति शंकर भी
अपने कैलाश का राज्य त्याग कर महाश्मशान में बैठकर हरिचरणों का ध्यान करता रहता है। कमर में कौपीन
बाँधकर, पूरे शरीर में भभूत रचाकर, मस्तक पर जटा धारण कर तथा मस्तक पर हरिचरणों का तीर्थ (गंगा)
रखकर अपने हृदय में निरन्तर हरिचरणों का चिन्तन करता रहता है। इस प्रकार जहाँ ब्रह्मदेव और शंकर इन दोनों
को ही हरिचरणों का पता नहीं रहता वहाँ त्रैलोक्य के वैभव को जो श्रेष्ठ मानता है, वह पापी नितान्त भाग्यहीन
होना चाहिए। हरिचरणों की एक क्षण की प्राप्ति के आगे भक्त लोग त्रैलोक्य के वैभव को न्योछावर कर देते हैं,
इसे ध्यान में रखो। हरिचरणसारामृत की मधुरता का स्वाद यदि क्षणभर के लिए भी मिल जाए तो उस पर
५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
निजभक्त त्रैलोक्य वैभव को न्योछावर कर सकता है। सारांश यह कि इस लोक में हरिचरण की तरह कोई भी
सारामृत नहीं है। इसलिए वे तन-मन-धन से उसी चरणों से चिपके रहते हैं। हे राजा ! पलक झपकने तक अथवा
चुटकी बजाने तक के अन्तराल के लिए भी जो भक्त हरिचरणों को नहीं छोड़ते वे ही वैष्णवों में अग्रगण्य तथा
उत्तम भक्त हैं, इसे ध्यान में रखो। जो त्रैलोक्य वैभव का सुख भोगते हैं उन्हें भी अनुताप होता ही रहता है।
उनके ताप की निवृत्ति के लिए हरिचरण प्राप्ति यही एक साधन है। उसके बारे में बताता हूँ, सुनो।
भगवत उरुविक्रमाङ्घ्रिशाखानखमणिचन्द्रिकया निरस्ततापे।
हृदि कथमुपसीदतां पुनः स प्रभवति चन्द्र इवोदितेऽर्कतापः ॥ ५४ ॥
हरिचरणों का प्रताप महान है। उस श्रीहरि ने त्रैलोक्य में पराक्रम किया। वह चरणवृक्ष अपने अद्भुत
पराक्रम से ब्रह्माण्ड को भी भेद कर उस पार चला गया। उस पादवृक्ष की दस शाखाएँ उसके दोनों पैरों की दस
उँगलियाँ हैं। जिस प्रकार शाखाओं के अग्रभाग पर फल सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार उँगलियों के अग्रभाग पर
नखमणि चन्द्रिका शोभा देती है। उस नखरूप चन्द्रिका के चन्द्रकान्तमणि चरणरूप चन्द्रामृत के कारण नित्य झरते
रहते हैं और भक्तरूप चकोर उस अमृत का सेवन कर सदासर्वदा स्वानन्द से तृप्त रहते हैं। जिस प्रकार सूर्य की
प्रखरदीप्ति चन्द्रबिम्ब में कभी प्रवेश नहीं करती, उसी प्रकार उन्हें कामादिक त्रिविध ताप की बाधा इसके बाद
कभी भी नहीं हो सकती। वे हरिचरण रूप चन्द्र के चकोर होते हैं, उनके सामने कभी स्वप्न में भी संसारताप
नहीं आता। इस प्रकार चरणों की अपार महिमा 'हरि' नामक मुनि (नवयोगियों में से द्वितीय बन्धु) अत्यन्त
आनन्द से वर्णन करने लगते हैं। हे राजा जनक ! 'देहे वै स हरेः प्रियः' इस श्लोक के द्वारा भक्तों के लक्षण और
उनकी क्रिया के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से बताया। उसी प्रकार 'न यस्य स्वः पर इति' इस श्लोक में उनकी
धर्मस्थिति का यथातथ्य वर्णन तुम्हें सुनाया। 'यादृश' अर्थात् वे कैसे होते हैं, कैसा व्यवहार करते हैं इन प्रश्नों का
उत्तर दिया। भगवद्भजन और आत्मानन्द से उनकी तृप्ति होती है और इस प्रकार वे हरिभक्त विविध तापों का
निवारण कर किस प्रकार शान्ति से रहते हैं यह सब बतलाया। अब उनकी बोलने की पद्धति और निरन्तर चलने
वाली उनके नाम की गर्जना कैसी होती है, उसके सम्बन्ध में, अन्त में हरिऋषि संक्षेप में बता रहे हैं। प्यारे भक्तों
का असीम प्रेम यही उनका प्रमुख लक्षण है। श्रीपति भी उसका उल्लंघन नहीं कर सकते। उसका वर्णन अब
अगले उपसंहारात्मक श्लोक में हरि सुना रहे हैं।
विसृजति हृदयं न यस्य साक्षाद्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः ।
प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः ॥ ५५ ॥
मुँह से यदि गलती से भी हरि का नाम निकल गया तो वह सभी पापों का विनाश करता है। उस हरिनाम
की भक्तजन निरन्तर गर्जना करते रहते हैं। इस प्रकार जिसकी जिह्वा पर नाम निरन्तर नाचता रहता है, जो
स्वानन्द से हरिनाम का घोष करते रहते हैं वे अत्यन्त धन्य पुरुष हैं। पूर्ण प्रेम से तथा सद्भाव से नित्य नामस्मरण
करने से वृत्तियाँ अपने आप बदल जाती हैं। उसका भी लक्षण बताता हूँ, सुनो। नाम के साथ हृदय में भी हरि
प्रवेश होने लगता है। उससे अंतःकरण में पूरी तरह हृदय शुद्धि होने लगती है। तब 'वासना' सांसारिक प्रपंच को
छोड़कर जनार्दन से ही चिपकती है और अहंकार 'अहं' भाव को छोड़कर 'सोहं' (परब्रह्म मैं हूँ) इस भावना में
प्रवेश करता है। 'चित्त' चित्त को भूलकर भगवान से चिपक जाता है, 'मन' का मनपन त्याग कर वह
संकल्पविकल्प करना भूल जाता है। 'बुद्धि' निश्चयपूर्वक 'समाधि' रूप होकर ही रहती है। हृदय की इस प्रकार
द्वितीय अध्याय ५७
शुद्धि होने पर हरि सचमुच ही वहाँ से बाहर नहीं निकलता। हरिनाम के प्रेम से हरि जो एक बार हृदय में प्रवेश
करता है वह भक्त प्रेम के कारण बाहर निकलना ही भूल जाता है। भक्त ने जब प्रेमरज्जु से हरिचरणों को हृदय
के साथ कस कर बाँध लिया है तो हरि वहाँ से कैसे निकल सकता है ? किन्तु भगवान अत्यन्त बलशाली होते
हुए शक्तिशाली दैत्यों का भी संहार करता है, उस महाबलिष्ट हरि को हृदय कमल में बन्द कर दिया इस बात
को क्या कोई मिथ्या कह सकता है। लेकिन जो भँवरा सूखी लकड़ी को भी खोदता है, वही भँवरा कोमल कमल
में प्रेमवश फँसा रहता है। उसमें जो केशर है उसे भी वह नष्ट नहीं होने देता। उसी प्रकार भक्त के अखण्ड प्रेम
के कारण हरि हृदय में स्वयं को बन्द कर लेता है। वहाँ उसका सारा सामर्थ्य और पराक्रम व्यर्थ हो जाता है।
भावार्थ के आगे बल सामर्थ्य का कुछ नहीं चलता। बच्चा बाप की धोती पकड़ कर उसे जाने से रोकता है तो
क्या बाप बल में उससे कम हो गया ? नहीं। प्रेम के भुलावे में वह आगे नहीं बढ़ पाता बस इतनी सी बात है।
उसी प्रकार लाडले निजभक्त का प्रेम, नितांत मधुर होता है इसलिए वहाँ से निकलने की बात भूलकर श्रीहरि
उसके हृदय में ही आनन्दपूर्वक रहता है। ऐसा जिसका अंतःकरण रहता है, उसे श्रीहरि कभी स्वयमेव नहीं
छोड़ते, उसी प्रकार वह भी पूर्णप्रेम के कारण हरिचरणों को छोड़ना नहीं चाहता। हरि के प्रति भक्त की जैसी
प्रीति रहती है, वैसी ही प्रीति हरि की भी भक्त के प्रति रहती है। जो हरि के प्रति निरन्तर अनन्य भाव से रहते हैं
उनके प्रति हरि भी निरन्तर अनन्य ही रहते हैं। उसी प्रकार जो भक्त हरि के प्रति अनन्य भक्ति रखते हैं वे भक्तों
में प्रमुख हैं। हे राजा! वैष्णवों में अग्रगण्य वही हैं और भागवतों में भी उत्तम भागवत वे ही हैं, इसे ध्यान में
रखो। इस प्रकार चारों मुक्तियों को गौण बनाकर संसार में जो भगवद्भक्ति का आश्रय करता है। उस उत्तम भक्त
की स्थिति तुम्हें संक्षेप में बतायी। भक्ति का सम्पूर्ण निरूपण करते समय वेद भी मौन हो जाते हैं, सहस्रमुखी
शेष की जिह्वा भी भक्ति की महिमा का वर्णन करते समय थक. जाती है। हे राजा! मैंने तुम्हें अब तक जो कथा
सुनायी वह इस भक्ति का अंशमात्र ही है ऐसा समझो। हस्त्रिऋषि सदृश रसाल वक्ता से उत्तम भक्त की कथा
सुनते समय सब लोग स्तब्ध रह गये थे। राजा की बात क्या की जाय ? उसका सारा शरीर रोमांच से भर आया
था और प्रत्येक रोम के मूल से पसीना चू रहा था। श्रवणसुख से लुब्ध होकर वह आत्मानन्द से डोलने लगा। मन
में अत्यन्त सन्तुष्ट होकर राजा ने कहा, मुनिवर्य! आपने बहुत अच्छा किया। आपका निरूपण सुनकर बड़ा
समाधान हुआ लेकिन केवल उतने से श्रवण की तृप्ति नहीं होती। हरिमुनि का भाषण सुनकर राजा ने मन ही मन
कहा, ये सभी मुनि आत्मानुभव ज्ञान से परिपूर्ण हैं। इतना ही नहीं, बल्कि वे उत्तम वक्ता भी हैं। इसलिए इनसे
विभिन्न प्रश्न पूछकर सभी का भाषण क्यों न श्रवण किया जाए ? ऐसी पूर्णश्रद्धा से वह राजा अनुपम प्रश्न करने
वाला है। राजा को कथा अत्यन्त प्रिय होने के कारण वह बहुत अच्छे प्रश्न पूछेगा। उसे सुनते ही इच्छा तृप्त
होकर श्रोताओं को बड़ा संतोष होगा। उन प्रश्नों का गूढ़ ज्ञान मैं भी सबको सुनाऊँगा। सम्पूर्ण अर्थ के साथ
यथातथ्य रीति से श्रीजनार्दन ही मेरे मुख से बोलने वाले हैं। मुरली में से अनेक प्रकार की ध्वनियाँ निकलती हैं
लेकिन उसका कौशल बजाने वाले में होता है। उसी के अनुसार जनार्दन की कृपा से 'एका' कवि और ग्रन्थकर्ता
के रूप में आगे आ रहा है। श्रीकृष्णार्पणमस्तु!
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशे स्कंधे निमिजायंत
संवादे एकाकार टीकायाम। द्वितीयोध्यायः ॥ २ ॥
तृतीय अध्याय
'हे चित्स्वरूप सद्गुरु राया ! आपको प्रणाम करता हूँ,' कहकर आपके चरण छूता हूँ, मेरे 'मैं' पन के साथ
तुम्हारा 'तू' पन भी नष्ट हो गया। आपके पैरों की कठोरता कितनी अपूर्व है जो लिंगदेह कभीं वज्र से भी नहीं
टूटता उसे आपने सहज स्पर्श से चूर्ण कर दिया। राजा बलि ने आपके चरण छुए ही थे कि आपने उसे तत्काल
पाताल भेज दिया। लवणासुर सरीखे महाबली का भी आपने इसी प्रकार पैर से कुचल कर विनाश कर दिया।
सचमुच ही आपके पैर बहुत कठोर हैं। कालियानाग से उनका स्पर्श होते ही उन्होंने उसका सारा गरल खींच
लिया और उसे विषविहीन कर दिया। आपके पैर ऐसे कठोर हैं कि शकटासुर से उनका स्पर्श होते ही उसके
पाशबन्ध टूट गये और उसका चलना-फिरना बन्द हो गया। बड़े-बड़े बलवान भी आपके पैरों से भयाक्रान्त रहते
हैं। अहिल्या शिला बन कर पड़ी हुई थी, उसका उद्धार आपके पैरों ने ही किया। दानवीर राजा नृग ब्राह्मण के
शाप से गिरगिटाँग बन कर पड़ा हुआ था—उसे तुम्हारे कृष्णावतारी चरणों का दर्शन होते ही, वह मिथ्या संसार
से अर्थात् जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त हो गया। जो दास स्वेच्छा से आपके चरणों का चिन्तन करते हैं उनका
मनुष्यधर्म ही नष्ट हो जाता है। उन पैरों से यमलोक उजाड़ हो गया और उन्हीं पैरों ने प्राणी का 'जीव' पन नष्ट
कर दिया। आपके चरणों का तीर्थ शंकर ने मस्तक पर धारण किया तो वह जगत के प्राण ही लेने लग गया और
उसकी राख बड़े भक्ति भाव से शरीर में पोत कर, अन्त में नग्न होकर श्मशान में घूमने लगा। ऐसी इन चरणों की
महिमा है। वह शिव का शिवपन नहीं रहने देता, फिर जीवों का 'जीव' पन कैसे रहने देगा? इस प्रकार वे
जीव-शिव भाव तथा उसे मानना ये दोनों ही बातें शेष नहीं रहने देते। यही भाव मन में लाकर एका ने
(एकनाथ) एकत्व से आपके चरणों में अपना स्थान बनाया। लेकिन यहाँ भी आपके चरणों ने बड़ा चमत्कार
किया है। वह यह कि वन्दन करते ही उसका 'एक' पन ही व्यर्थ कर दिया। इसलिए अब कौन किसका वर्णन
अथवा स्तुति करेगा? कौन किसको मनाये? कौन किसे कुछ दे या ले ? क्योंकि अब 'मैं' और 'तू' का तो जीवन
ही समाप्त हो गया। तो अब 'भगवान' और भक्त तो अब तुम ही हो गये न ? तो अब 'मैं पन' कौन किसके
सामने प्रकट करे ? ऐसे पद पर मुझे बिठाकर तुम मुझसे यह ग्रन्थ निरूपण करवा रहे हो? इसलिए हे सद्गुरु
राया ! इस ग्रन्थ का कवि, कर्ता वास्तव में तुम ही हो। मेरा नाम और रूप सब कुछ एक ही है और वह भी
जनार्दन ही हो गया है। इस प्रकार श्रीजनार्दन को एका का बड़ा कौतुक है। उसी कौतुक के कारण वह मेरे नाम
से कवि-कर्ता बनकर यथार्थ आत्मबोध से युक्त होकर इस ग्रन्थ की रचना स्वयं कर रहा है। दूसरे अध्याय के
अन्त में बताया था कि किस प्रकार उत्तम भक्तों ने भजनस्थिति से कठिन माया को समाप्त कर भगवत्प्राप्ति कर
ली। इसलिए हरि की माया कठिन क्यों है, यह पूछने की उत्कंठा राजा में लगी रही। इसलिए बड़े आदर के साथ
उसने कहा, हे मुनिश्रेष्ठों ! सुनिए—
राजोवाच
परस्य विष्णोरीशस्य मायिनामपि मोहिनीम्।
मायां वेदितुमिच्छामो भगवन्तो ब्रुवन्तु नः ॥ १॥
राजा पूछेगा, 'कैसी माया ? कैसा तरण' ब्रह्म क्या है ? और कर्म कैसा होता है ? इनका निरूपण इस तीसरे
तृतीय अध्याय ५९
अध्याय में है। उसमें पहला माया का प्रश्न राजा ने स्वयं ही पूछा। उसका स्पष्टीकरण करने के लिए वह माया
का लक्षण बताते हुए बोला कि जिसका ब्रह्मदेव, शंकर आदि वन्दन करते हैं, वे विष्णु सभी देवताओं में श्रेष्ठ है।
मायिकों को भी भुलावे में डालने वाली उस विष्णु की माया कैसी होती है ? ब्रह्मदेव और शंकर भी मन ही मन
यह समझते हैं कि हम माया के बड़े नियंता हैं किन्तु यह माया उन पर भी अपनी मोहिनी का प्रभाव डालती है।
शंकर के विवाह में ब्रह्मदेव को भी मोह उत्पन्न हुआ था और पार्वती को देखकर उनका वीर्य स्खलित हुआ था।
महादेव तो बड़े ज्ञानी थे किन्तु मोहिनी को देखकर उनका भी वीर्य द्रवित हुआ था। ज्ञानियों को भी जो बड़ी
सहजता से छलती है, श्रुति जिसे 'अजया' अर्थात् अजेय कहती है, उस श्रीहरि की कठिन माया के सम्बन्ध में
मुझे विवेचन करके बताएँ। "माया की पीड़ा अत्यन्त दुःखसह है किन्तु वह अनन्य भक्तों को बाधक नहीं होती।
तुम भी भगवान का भजन करते जाओ। व्यर्थ ही माया की बात क्यों करते हो ?" शायद आप ऐसी बात करें।
इसी अर्थ का निरूपण राजा कर रहा है। मुनियों के मुख से गुह्य ज्ञान जानने के लिए ही अनेक राजा अत्यन्त
उत्कंठा से यह सुन्दर प्रश्न पूछ रहे हैं।
नानुसृप्ये जुषन्युष्मद्वचो हरिकथामृतम्।
संसारतापनितप्तो मर्त्यस्तत्तापभेषजम्॥ २॥
श्लोक २-राजा कहता है-आपका अमृततुल्य मधुर भाषण सुनते समय मेरा चित्त कभी 'तृप्त' नहीं
होता। शब्दार्थों का रसास्वादन करते समय 'कान' कुछ अधिक ही क्षुधार्थ हो गये हैं। वह भाषण अत्यन्त रसाल
और अद्भुत होने के कारण कानों को उसे सुनने की हवस हो गयी है। 'जिह्वा' कहती है कि यह रस अत्यन्त
मधुर है और 'आँखों' को तो यह अपूर्व स्वरूप देखकर उल्हास हो रहा है। 'नाक' कहती है कि यही सच्ची
सुगन्ध है। इसके ही कारण सुमन में सुगन्ध होती है। 'वाचा' कहती है कि यह शब्द मानों परमानन्द का अनुवाद
कर रहा है। इस निरूपण का प्रवाह विचित्र है। उसे आलिंगन देने के लिए बाहुओं में स्फुरण हो आता है। जीव
सद्भाव से आत्मा के गले मिलता है। सचमुच, आपकी कथाएँ तो दिव्योषधि की तरह हैं, वे भवरोग को नष्ट
करती हैं। जड़-मूढ़ प्राकृत लोग यदि भक्ति भाव से उनका श्रवण करें तो उनकी त्रिविध तापों से निवृत्ति होती
है। राजा को परमार्थ की विशेष चाह है यह जान कर तथा उसका ध्यान कथा की ओर लगा हुआ है यह देखकर,
बोलने में कुशल 'अन्तरिक्ष' नाम का योगी जो हरि से छोटा था, उसने बोलना प्रारम्भ किया।
अन्तरिक्ष उवाच
एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज।
ससर्जाच्चावचान्याद्यः स्वमात्रात्मप्रसिद्धये॥ ३॥
श्लोक ३-अन्तरिक्ष ने कहा, "हे राजा! तुमने हरि की माया के बारे में पूछा है, लेकिन तुम्हारा वह
प्रश्न ही व्यर्थ चला गया क्योंकि माया के सम्बन्ध में बात करना बड़े-बड़े वक्ताओं के सामर्थ्य के बाहर है।
कहते हैं किसी राजा ने एक बाँझ के पुत्र का जन्मकाल तुरन्त मँगवाया। उससे यदि उस पुत्र की राशि, नक्षत्र,
जाति, कुल आदि के बारे में कोई बताने लगे तो वाचा वेद ही हो जाएगी। जैसे कोई गन्धर्व नगर में मृगजल का
पौसरा खोले या कोई हवा की बातियाँ सूत की तरह बना कर उसे जुगनू के तेज से जलाये अथवा कोई अपनी
छाया के मस्तक पर प्रहार करे, आकाश का छिलका उतार दे, सीप से रगड़ कर अँधेरा नष्ट कर दे अथवा अपने
शस्त्र से हौआ का शिरच्छेद कर उसकी स्त्रियों को विधवा कर दे। जब बाँझ की बहू को बच्चा पैदा हुआ, उस
६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
समय भीष्म की स्त्री के स्तनों में दूध उतर आया और उस दूध से मस्त होकर उसने दिगम्बर के मकान को
ध्वस्त कर दिया अथवा चक्की में हवा डालकर उसे महीन पीसा जाए, घोड़े के सींग से आकाश चीर दिया जाए,
नपुंसक के नाती-पोते सूर्योदय के बाद अँधेरे में छिपने के लिये आयें अथवा गुंजा के तेज से मारुति के विवाह में
दीपक जलाये जाएँ और इस विवाह समारोह के लिए किसी उजाड़ गाँव में जाकर कोई अपनी छाया बेच दे
अथवा आकाशपुष्प गन्धयुक्त हैं या गन्धहीन हैं आदि बातों का विचार जो विद्वान कर सकते हों, वे हीं चाहें तो
माया का विवेचन बेझिझक करें। कुल मिलाकर, माया के सम्बन्ध में कुछ बोलने से बोलने वाला लज्जित हो
जाता है। यह एक तरह से किसी अजन्मे का श्राद्ध करने की तरह है। मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है, इसीलिए
वह खुद को 'माया' कहती है और इसीलिए शास्त्र उसे 'अविद्या' कहकर पुकारते हैं। 'भ्रम' ही इस माया का
मूल है। भ्रान्ति उसका उज्ज्वल फूल है और विषयरूपी रस में निरन्तर डूबी हुई 'भूल' यही उसका ताजा फल
है। जो अस्तित्व में ही नहीं है, उस रूप से वह अस्तित्व में आयी है, सत्यासत्य से वह गर्भवती हुई है और
असत्य के अनेक पिल्लों को उसने जन्म दिया है। वासने के विषय रूपी डोर से बँधी हुई वेणी धारण कर यह
मटकती रहती है, और 'मैंपन' के यौवन से यह मदनमोहिनी चमकती रहती है। मृगजल के मोतियों की जाली
गूँथकर यह अपने मस्तक पर धारण करती है। आकाश की चम्पाकली धारण कर अत्यन्त सौन्दर्य से यह
लावण्यमयी फड़कती रहती है। वह रज्जुसर्प के मस्तक से मणि निकालकर तथा उसके अलंकार बनवा कर
अपने शरीर पर धारण करती है और सीप पर भासित होने वाली चाँदी की पैंजनिया पहन कर छम-छम की
आवाज करती हुई चलती रहती है। खरगोश के सींग के खड़ाऊ पहनकर वह चलती रहती है। उसका ज्येष्ठ
और सुन्दर पुत्र 'अहंकार' है जिस पर वह अपने प्राणों से भी अधिक प्रेम करती है। अपना वंश बढ़े इसलिए वह
ममतारूपी कन्या कई जगह प्रसूत हुई और देह में मोह उत्पन्न कर उसे घरजमाई बनाकर रख लिया। उस
अहंमोहममता के संयोग से संसार का अपने आप विस्तार हुआ। ममता सबल प्रयोगों से अपने अंग बढ़ाती रहती
है। संकल्प विकल्प के कंगन पहनकर मन ममता के पास गिरवी रखती है। त्रिगुण के आधार बनाकर माया दिन
पर दिन मोटी हो रही है। हे राजा ! ऐसी है यह मूलमाया जो मिथ्या होते हुए भी मोटी दिखाई देती है। वह किस
प्रकार नियन्त्रण में आएगी यह कहना कठिन है। उसे यदि 'सत्' कहा जाए तो वह 'ज्ञान' प्राप्ति के बाद नष्ट हो
जाती है, यदि 'असत' अर्थात् मिथ्या कहा जाए तो दिखाई देती है। यदि यह कहें कि पहले रहती है और बाद में
नष्ट हो जाती है, तो ऐसी भी बात नहीं है। वह ऐसी है जिस प्रकार मृगजल का ज्ञान ! मृगजल दिखाई देता है
किन्तु वह पूर्णतयः मिथ्या रहता है, उसी प्रकार हे नृपनाथ ! संसार के अस्तित्व का जो आभास होता है, वही
माया है। वेदशास्त्रों से माया का पता पूछने पर वे मौन हो जाते हैं। माया का स्वरूप सच्चा है लेकिन ठीक तरह
से देखा जाए तो वैसा नहीं दिखाई देता। मृगजल की महानदी किस पर्वत से निकली यह कहना जिस प्रकार
कठिन है, उसी प्रकार माया का सच्चा लक्षण बतलाना भी वाणी के लिए असम्भव है। प्रतिबिम्ब क्या दर्पण में
रहता है? लेकिन जो उसमें देखता है उसे अपना प्रतिबिम्ब उसमें दिखाई देता है। उसी प्रकार हमारे संकल्प के
अनुरूप मिथ्या माया का आभास होने लगता है। डोरी का सर्प जिन्दा पकड़ा है, उसे देखने चलिए ऐसी बातें जो
करते हैं, वे माया के बड़प्पन की चाहे जितनी बातें करें, लेकिन कोई अपनी छाया हटाना चाहे तो उसके लिए
जैसे यह सम्भव नहीं है, उसी प्रकार हे राजा ! माया से पार पाना दुस्तर है। जैसे अग्नि उत्पन्न करना सूर्य का
संकल्प नहीं रहता उसी प्रकार सूर्यकांत में भी उसका अस्तित्व नहीं दिखाई देता लेकिन नीचे पकड़ी हुई रुई में
अग्नि प्रज्वलित होता है। उसी प्रकार शुद्ध ब्रह्म में संकल्प नहीं होता। उसी प्रकार वह केवल देह में भी नहीं
दिखाई देता। लेकिन वासना की ठाँव में देहाभिमान से संसार का भास होता है। जब तक जागृत देह का
विस्मरण हो रहा है, तब तक दूसरा स्वप्नदेह प्राप्त होता है। जिससे मिथ्या स्वप्नप्रपंच बढ़ता है। स्वप्नावस्था में
स्वप्न कभी मिथ्या नहीं मालूम होता। सुषुप्ती में देह असम्भव है, इसलिए वहाँ संसार का अस्तित्व नहीं है। वहाँ
जन्म-मरण भी मिथ्या है। संसार की अर्थात् जन्म-मरण की सम्भावना देहाभिमान के कारण ही होती है। इस
प्रकार आत्मत्व का विस्मरण होने से 'मैं ही देह हूँ' का अहंकार उत्पन्न होता है और उस अहंकार से दुस्तर संसार
की वृद्धि होती है। जिस प्रकार मृगजल में मछली मिथ्या है, उसी प्रकार ब्रह्म में प्रपंच तो होता ही नहीं है।
इसलिए उसे नष्ट करने के साधन का उपयोग करने का पागलपन तो पागल ही जाने। 'माया' इस दो अक्षर के
शब्द का अर्थ बतलाने गया तो हे राजा! श्लोक का अर्थ तो रहा एक तरफ लेकिन ग्रन्थ का विस्तार व्यर्थ ही बढ़
गया। ज्ञानी लोग भी माया का अर्थ जानने जाते हैं और पागल बन कर रह जाते हैं। नामरूप के भरोसे कल्पना के
वश में माया बढ़ती है। हे राजा! तुम्हें माया के रूप की प्रमुख पहचान बताता हूँ। सच तो यह है कि हमारी
कल्पना की उड़ान ही माया है। हे राजा! हमारे हृदय में जो आशा है वही प्रमुख माया है। जो नित्य सभी दृष्टियों
से निराश रहता है, वही ईश्वर को पूज्य होता है। अब जब तुमने प्रश्न किया ही है तो तुम्हें उस माया के कुछ
उदाहरण बताता हूँ। उत्पत्ति, स्थिति और अन्त करने वाली वह माया त्रिविध गुणों में भासित होती है। जिस
प्रकार सूर्य का अग्निविषयक कोई संकल्प नहीं होता, फिर भी जब वह अपने किरणों के योग से सूर्यकांता से
अग्नि उत्पन्न करता है, तब वह उसमें स्वयं की तरह दिखाई देता है। उसी प्रकार शुद्ध स्वरूप में कोई भी संकल्प
नहीं होता। न होते हुए भी जो दिखाई देती है, वही हे राजा जनक! 'मूलमाया' है। स्वरूप पूर्ण निर्विकल्प है।
वहाँ 'मैं' कहने वाला कौन है? ऐसे स्थान पर भी जहाँ 'मैंपन' की स्फूर्ति होती है, वही मुख्य रूप से 'मूल
माया' है। उस 'मैंपन' में वह 'मैं मुझे ही इस दृष्टि से देखूँ', 'मैं अपने से ही बातें करूँ', बड़े आदर से मेरी
मुझसे ही भेंट हो ऐसा कहता है। 'मेरी मुझसे ही अत्यन्त प्रीति है', 'मैं स्वयं में ही रममाण होऊँ', 'मैं अपनी ही
युक्तियों से, मेरे ही बोध से, मुझे मेरी प्राप्ति हो', 'मैं ही मुझ को आलिंगन दूँ', 'मैं स्वयं मेरा उपयोग करूँ', 'मैं
ही मुझसे मिलूँ', 'स्वामीसेवक के नाते से सर्वकाल मैं ही मुझ पर नियन्त्रण करूँ' ऐसा हे आजानुबाहो नृपश्रेष्ठ!
भगवान ने विचार किया और उस विचार से ही पंचभूत एवं भौतिकों का निर्माण हुआ। चार वर्ण, चार खान, चार
युग, चार वाणी, चारों पुरुषार्थ और चारों लक्षणों से चारों मुक्ति की रचना भी उसी स्फुरण से हुई। उस स्फुरण ने
ही तीनों गुण उत्पन्न कर त्रैलोक्य की रचना की। उसने ही ज्ञान, ज्ञाता तथा ज्ञेय इस त्रिपुटी के कार्यों की संरचना
कर सारा कर्म भी तीन प्रकार का किया। इस प्रकार एक स्फूर्ति ने ही एकता में अनेकता का रूप उत्पन्न किया।
लेकिन उस अनेकता में जो एकता है, वह पूर्णरूप से अखण्ड है। वह कभी भी नहीं टूटती। कुम्हार जिन मटकों
की रचना करता है, उनमें आकाश स्वयमेव रहता है। उसी प्रकार पंचमहाभूत तथा भौतिक शरीरों में श्रीहरि
अंतर्बाह्य भरे ही रहते हैं। इसीलिए हे राजा! 'एकाकी न रमते' इस श्रुति के अनुसार भगवान में द्वैत की स्फूर्ति
हुई ऐसा उपनिषद में कहा गया है। अथवा हे राजाधिराज यह बात ध्यान में रखो कि ऐक्यरूप से जिन महाभूतों
ने आकार लिया है, वही यहाँ 'माया' है। किन्तु भूतभौतिकादि में जो स्फूर्ति आती है उसे माया अपनी शक्ति से
प्रकाशित नहीं कर सकती। तो माया का प्रकाशक चिन्मूर्ति परमात्मा ही समस्त भूताकृतियों में प्रविष्ट हुआ रहता
है। वही माया का प्रमुख लक्षण प्रकाशित करता है और वही भूतात्मा भूतों में वास्तव में प्रवेश न होते हुए भी
प्रवेश दिखलाता है।