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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 869 में से

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पृष्ठ 72

५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
निजभक्त त्रैलोक्य वैभव को न्योछावर कर सकता है। सारांश यह कि इस लोक में हरिचरण की तरह कोई भी
सारामृत नहीं है। इसलिए वे तन-मन-धन से उसी चरणों से चिपके रहते हैं। हे राजा ! पलक झपकने तक अथवा
चुटकी बजाने तक के अन्तराल के लिए भी जो भक्त हरिचरणों को नहीं छोड़ते वे ही वैष्णवों में अग्रगण्य तथा
उत्तम भक्त हैं, इसे ध्यान में रखो। जो त्रैलोक्य वैभव का सुख भोगते हैं उन्हें भी अनुताप होता ही रहता है।
उनके ताप की निवृत्ति के लिए हरिचरण प्राप्ति यही एक साधन है। उसके बारे में बताता हूँ, सुनो।
भगवत उरुविक्रमाङ्घ्रिशाखानखमणिचन्द्रिकया निरस्ततापे।
हृदि कथमुपसीदतां पुनः स प्रभवति चन्द्र इवोदितेऽर्कतापः ॥ ५४ ॥
हरिचरणों का प्रताप महान है। उस श्रीहरि ने त्रैलोक्य में पराक्रम किया। वह चरणवृक्ष अपने अद्भुत
पराक्रम से ब्रह्माण्ड को भी भेद कर उस पार चला गया। उस पादवृक्ष की दस शाखाएँ उसके दोनों पैरों की दस
उँगलियाँ हैं। जिस प्रकार शाखाओं के अग्रभाग पर फल सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार उँगलियों के अग्रभाग पर
नखमणि चन्द्रिका शोभा देती है। उस नखरूप चन्द्रिका के चन्द्रकान्तमणि चरणरूप चन्द्रामृत के कारण नित्य झरते
रहते हैं और भक्तरूप चकोर उस अमृत का सेवन कर सदासर्वदा स्वानन्द से तृप्त रहते हैं। जिस प्रकार सूर्य की
प्रखरदीप्ति चन्द्रबिम्ब में कभी प्रवेश नहीं करती, उसी प्रकार उन्हें कामादिक त्रिविध ताप की बाधा इसके बाद
कभी भी नहीं हो सकती। वे हरिचरण रूप चन्द्र के चकोर होते हैं, उनके सामने कभी स्वप्न में भी संसारताप
नहीं आता। इस प्रकार चरणों की अपार महिमा 'हरि' नामक मुनि (नवयोगियों में से द्वितीय बन्धु) अत्यन्त
आनन्द से वर्णन करने लगते हैं। हे राजा जनक ! 'देहे वै स हरेः प्रियः' इस श्लोक के द्वारा भक्तों के लक्षण और
उनकी क्रिया के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से बताया। उसी प्रकार 'न यस्य स्वः पर इति' इस श्लोक में उनकी
धर्मस्थिति का यथातथ्य वर्णन तुम्हें सुनाया। 'यादृश' अर्थात् वे कैसे होते हैं, कैसा व्यवहार करते हैं इन प्रश्नों का
उत्तर दिया। भगवद्भजन और आत्मानन्द से उनकी तृप्ति होती है और इस प्रकार वे हरिभक्त विविध तापों का
निवारण कर किस प्रकार शान्ति से रहते हैं यह सब बतलाया। अब उनकी बोलने की पद्धति और निरन्तर चलने
वाली उनके नाम की गर्जना कैसी होती है, उसके सम्बन्ध में, अन्त में हरिऋषि संक्षेप में बता रहे हैं। प्यारे भक्तों
का असीम प्रेम यही उनका प्रमुख लक्षण है। श्रीपति भी उसका उल्लंघन नहीं कर सकते। उसका वर्णन अब
अगले उपसंहारात्मक श्लोक में हरि सुना रहे हैं।
विसृजति हृदयं न यस्य साक्षाद्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः ।
प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः ॥ ५५ ॥
मुँह से यदि गलती से भी हरि का नाम निकल गया तो वह सभी पापों का विनाश करता है। उस हरिनाम
की भक्तजन निरन्तर गर्जना करते रहते हैं। इस प्रकार जिसकी जिह्वा पर नाम निरन्तर नाचता रहता है, जो
स्वानन्द से हरिनाम का घोष करते रहते हैं वे अत्यन्त धन्य पुरुष हैं। पूर्ण प्रेम से तथा सद्भाव से नित्य नामस्मरण
करने से वृत्तियाँ अपने आप बदल जाती हैं। उसका भी लक्षण बताता हूँ, सुनो। नाम के साथ हृदय में भी हरि
प्रवेश होने लगता है। उससे अंतःकरण में पूरी तरह हृदय शुद्धि होने लगती है। तब 'वासना' सांसारिक प्रपंच को
छोड़कर जनार्दन से ही चिपकती है और अहंकार 'अहं' भाव को छोड़कर 'सोहं' (परब्रह्म मैं हूँ) इस भावना में
प्रवेश करता है। 'चित्त' चित्त को भूलकर भगवान से चिपक जाता है, 'मन' का मनपन त्याग कर वह
संकल्पविकल्प करना भूल जाता है। 'बुद्धि' निश्चयपूर्वक 'समाधि' रूप होकर ही रहती है। हृदय की इस प्रकार