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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 869 में से

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पृष्ठ 75

तृतीय अध्याय ५९
अध्याय में है। उसमें पहला माया का प्रश्न राजा ने स्वयं ही पूछा। उसका स्पष्टीकरण करने के लिए वह माया
का लक्षण बताते हुए बोला कि जिसका ब्रह्मदेव, शंकर आदि वन्दन करते हैं, वे विष्णु सभी देवताओं में श्रेष्ठ है।
मायिकों को भी भुलावे में डालने वाली उस विष्णु की माया कैसी होती है ? ब्रह्मदेव और शंकर भी मन ही मन
यह समझते हैं कि हम माया के बड़े नियंता हैं किन्तु यह माया उन पर भी अपनी मोहिनी का प्रभाव डालती है।
शंकर के विवाह में ब्रह्मदेव को भी मोह उत्पन्न हुआ था और पार्वती को देखकर उनका वीर्य स्खलित हुआ था।
महादेव तो बड़े ज्ञानी थे किन्तु मोहिनी को देखकर उनका भी वीर्य द्रवित हुआ था। ज्ञानियों को भी जो बड़ी
सहजता से छलती है, श्रुति जिसे 'अजया' अर्थात् अजेय कहती है, उस श्रीहरि की कठिन माया के सम्बन्ध में
मुझे विवेचन करके बताएँ। "माया की पीड़ा अत्यन्त दुःखसह है किन्तु वह अनन्य भक्तों को बाधक नहीं होती।
तुम भी भगवान का भजन करते जाओ। व्यर्थ ही माया की बात क्यों करते हो ?" शायद आप ऐसी बात करें।
इसी अर्थ का निरूपण राजा कर रहा है। मुनियों के मुख से गुह्य ज्ञान जानने के लिए ही अनेक राजा अत्यन्त
उत्कंठा से यह सुन्दर प्रश्न पूछ रहे हैं।
नानुसृप्ये जुषन्युष्मद्वचो हरिकथामृतम्।
संसारतापनितप्तो मर्त्यस्तत्तापभेषजम्॥ २॥
श्लोक २-राजा कहता है-आपका अमृततुल्य मधुर भाषण सुनते समय मेरा चित्त कभी 'तृप्त' नहीं
होता। शब्दार्थों का रसास्वादन करते समय 'कान' कुछ अधिक ही क्षुधार्थ हो गये हैं। वह भाषण अत्यन्त रसाल
और अद्भुत होने के कारण कानों को उसे सुनने की हवस हो गयी है। 'जिह्वा' कहती है कि यह रस अत्यन्त
मधुर है और 'आँखों' को तो यह अपूर्व स्वरूप देखकर उल्हास हो रहा है। 'नाक' कहती है कि यही सच्ची
सुगन्ध है। इसके ही कारण सुमन में सुगन्ध होती है। 'वाचा' कहती है कि यह शब्द मानों परमानन्द का अनुवाद
कर रहा है। इस निरूपण का प्रवाह विचित्र है। उसे आलिंगन देने के लिए बाहुओं में स्फुरण हो आता है। जीव
सद्भाव से आत्मा के गले मिलता है। सचमुच, आपकी कथाएँ तो दिव्योषधि की तरह हैं, वे भवरोग को नष्ट
करती हैं। जड़-मूढ़ प्राकृत लोग यदि भक्ति भाव से उनका श्रवण करें तो उनकी त्रिविध तापों से निवृत्ति होती
है। राजा को परमार्थ की विशेष चाह है यह जान कर तथा उसका ध्यान कथा की ओर लगा हुआ है यह देखकर,
बोलने में कुशल 'अन्तरिक्ष' नाम का योगी जो हरि से छोटा था, उसने बोलना प्रारम्भ किया।
अन्तरिक्ष उवाच
एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज।
ससर्जाच्चावचान्याद्यः स्वमात्रात्मप्रसिद्धये॥ ३॥
श्लोक ३-अन्तरिक्ष ने कहा, "हे राजा! तुमने हरि की माया के बारे में पूछा है, लेकिन तुम्हारा वह
प्रश्न ही व्यर्थ चला गया क्योंकि माया के सम्बन्ध में बात करना बड़े-बड़े वक्ताओं के सामर्थ्य के बाहर है।
कहते हैं किसी राजा ने एक बाँझ के पुत्र का जन्मकाल तुरन्त मँगवाया। उससे यदि उस पुत्र की राशि, नक्षत्र,
जाति, कुल आदि के बारे में कोई बताने लगे तो वाचा वेद ही हो जाएगी। जैसे कोई गन्धर्व नगर में मृगजल का
पौसरा खोले या कोई हवा की बातियाँ सूत की तरह बना कर उसे जुगनू के तेज से जलाये अथवा कोई अपनी
छाया के मस्तक पर प्रहार करे, आकाश का छिलका उतार दे, सीप से रगड़ कर अँधेरा नष्ट कर दे अथवा अपने
शस्त्र से हौआ का शिरच्छेद कर उसकी स्त्रियों को विधवा कर दे। जब बाँझ की बहू को बच्चा पैदा हुआ, उस