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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 869 में से

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पृष्ठ 70

आदि का अभिमान नहीं करते। वे स्थूल, सूक्ष्म, कारण तथा महाकारण आदि चारों देहों का अभिमान स्वप्न में
भी नहीं करते। (आशंका) तो क्या भक्त वर्णाश्रम-जाति आदि का पूरी तरह त्याग कर देते हैं? (उत्तर) नहीं,
ऐसी बात नहीं है। वे उसमें रह कर भी उसका अहंकार नहीं करते। प्राणी जब जन्म लेता है उस समय वर्णाश्रम
जाति आदि उसके साथ नहीं आते लेकिन जन्माभिमान के कारण वह ये सारी बातें अपने मत्थे ले लेता है। इस
व्यर्थ के अभिमान में ब्रह्मदेव आदि देवता भी फँस जाते हैं। वर्णाश्रमधर्म और जातियाँ बढ़ा कर बड़े-बड़े विद्वान
भी अपने-अपने अभिमान में फँसे रहते हैं। अहंता की यह अत्यन्त दुर्धर गति है। ब्रह्मा आदि देवतागण भी इससे
नहीं बच पाते। कल्पांत में भी वह उन्हें नहीं छोड़ती। बड़े-बड़े ज्ञानसम्पन्न भी स्वाभिमान के भुलावे में फँस जाते
हैं। इधर भक्तों की भाविक स्थिति में भगवद्भक्ति के कारण अभिमान नष्ट हो जाता है। हे राजा! इस प्रकार
भक्तों की निरभिमान स्थिति तुम्हें बता दी। जिसका देहाभिमान पूरी तरह झड़ जाता है वही देहधारी भगवान का
प्रिय बनता है। ऐसे भक्त ही भगवान के लाडले हो जाते हैं इसे ध्यान में रखो। वे दुलार से जो कुछ भी माँगते हैं,
वह सब भगवान स्वयं हो जाता है। उनके परम संतोष से भगवान भी सुखी, सन्तुष्ट और पुष्ट होता है। भक्त
जहाँ कहीं भी जाता है, वहाँ भगवान स्वयं खड़ा रहता है। भक्त जिस वस्तु की इच्छा करता है या जिन पदार्थों
को देखता है, वे सब पदार्थ भगवान स्वयं हो जाता है। कहीं किसी की उसे नजर न लग जाए इसलिए भगवान
उसके आगे-पीछे तथा चारों ओर रहता है। भक्तों के आगे भगवान पंगु हो जाता है और उनकी भक्ति में उनके
साथ चलता रहता है। जिस प्रकार नन्हे बच्चे के प्रेम के कारण माँ मन प्राण से उसकी सेवा करती है, उसी प्रकार
भक्त के निरभिमान के कारण भगवान स्वयं उसका सब कुछ करता है। इस प्रकार अपने भक्त की रक्षा करते
समय उसके मन में एक ही भय लगा रहता है कि यदि यह मेरे साथ ऐक्य प्राप्त कर लेगा तो फिर मैं प्रेम किस
के साथ करूँगा? कृपादृष्टि से किसकी ओर देखूँगा? मन की बातें किसे सुनाऊँगा? चारों हाथों से किसके गले
लगूँगा? उसे प्रेम की विलक्षण आसक्ति रहती है। ऐसी विवशता से श्रीअनन्त ऐक्यभाव से उसे अपना भक्त
बनाकर रखता है। फिर भगवान और भक्त इन दोनों में भगवान ही स्वानंद में नाचता रहता है। इस प्रकार वह
अनन्य प्रेम से स्वयं अपनी ही भक्ति करता रहता है। इसी का वेदान्त में निरूपण किया गया है और इसी का नाम
'अद्वैत भक्ति' है। वैसे भक्त को चारों हाथों से आलिंगन देते समय भगवान को तृप्ति नहीं होती। फिर वह उसके
भीतर घुसकर परमार्थतः आलिंगन, देता है। (यही सच्चा अंतर्बाह्य 'सर्वांगालिंगन है') इस प्रकार आलिंगन के
बहाने वह भक्त को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है और फिर उसके भीतर और बाहर अत्यन्त प्रेम से स्वयं ही
व्याप्त हो जाता है। भगवान को अच्छा लगने वाला स्वरूप बड़ा विलक्षण है। भक्त पर काल का प्रवाह न हो
इसलिए देवाधिदेव अपने भक्त की देह भी स्वयं हो जाता है। इस प्रकार जो भगवान को अत्यन्त प्रिय हुआ है,
वही भागवतों में 'उत्तमोत्तम' है। इस प्रकार का भागवत धर्म पुरुषोत्तम को वश में कर लेता है। ऐसे उत्तम भक्त
को भेद की बात भी नहीं मालूम होती। हे राजा! उस भक्त की अभेदभाव की कथा, तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
न यस्य स्वः पर इति वित्तेष्वात्मनि वा भिदा।
सर्वभूतसमः शान्तः स वै भागवतोत्तमः ॥ ५२ ॥
अद्वैत भजन के योग से 'मैं' और 'मेरा' अथवा 'तुम' और 'तुम्हारा' यह भाव जिसमें शेष नहीं रहता वही
'उत्तम भक्त' माना जाता है। इस प्रकार जिसके चित्त में भेद जरा भी शेष नहीं रह जाता वहाँ 'मेरा' और तुम्हारा
जैसी कोई बात नहीं रह जाती। वह अपने ही स्थान पर नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार अग्नि में जो भी आकर