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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 869 में से

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पृष्ठ 58

और दुःख का भण्डार है। वह जब ब्रह्मदेव और शंकर जैसों का भी पीछा नहीं छोड़ती तो फिर अन्य की क्या
बिसात है ? उस महामाया की निवृत्ति करने के लिए केवल भगवद्भक्ति ही समर्थ है। गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने
अर्जुन से यही बात कही है। भगवद्गीता का वह वचन—"मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते" (माया
भगवान की शक्ति है, उसकी निवृत्ति करने के लिए भगवद्भजन ही चाहिए, वहाँ अन्य उपाय नही चलेंगे। जो
भगवान के भक्त होते हैं वही हरि की माया सुख से तर जाते हैं। अपने अन्तर की यही गुप्त बात श्रीकृष्ण ने
अर्जुन के सामने प्रकट की। माया का यह सबसे बड़ा गुण है कि वह प्राणि की दृष्टि को स्वस्वरूप से विन्मुख
करती है और द्वैतभाव से बलवान होकर हमेशा भ्रम के त्रिगुट (दृश्य, दर्शन, द्रष्टा यह भावना) को बढ़ाती रहती
है। द्वैत का भान ही भय का जनक तथा माया द्वैत की जननी है, यह जान लो। ऐसी उस माया का निवर्तक
ब्रह्मज्ञान है, ऐसा ज्ञान सम्पन्न साधु संत बताते हैं। लेकिन यह श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञान, भक्ति का ही पोष्यपुत्र है यह जान
लो। यदि भगवद्भजन नहीं किया तो ब्रह्मज्ञान कभी प्राप्त नहीं होगा। भले ही वेदशास्त्र सम्पन्न हों लेकिन यदि
उन्होंने भगवद्भजन नहीं किया तो माया को परावृत्त करने वाला ब्रह्मज्ञान उन्हें भी कभी प्राप्त नहीं होगा।
शब्दज्ञान की व्युत्पत्ति लौकिक ज्ञान बढ़ाने में भले ही समर्थ हो लेकिन माया की निवृत्ति करनेवाला ज्ञान
हरिभक्ति के सिवाए कभी प्राप्त नहीं होगा। हरिगुण की रसाल कथा ही ब्रह्मज्ञान की जननी है। हरिनाम का गजर
सुनते ही माया प्राण बचाकर वहाँ से भागती है लेकिन वह भाग नहीं सकती क्योंकि हरिनाम के भय से वह
अपने ही स्थान पर घुल जाती है। इसलिए हरि की माया हरिभक्तों के लिए बाधक नहीं होती। हरिनाम की शक्ति
विचित्र है, उसके आगे माया की कुछ नहीं चलती इसलिए हरिभक्त सुख से माया को तर जाते हैं ऐसा स्वयं
श्रीपतिजी ने कहा है। सलोकता, समीपता, सरूपता तथा सायुज्यता इन चारों मुक्तियों को भगवद्भक्ति अपनी गोद
में खिलाती है। इस प्रकार यदि अनन्यभाव से भक्ति नहीं की गयी तो शास्त्रज्ञ लोगों को कभी भी मुक्ति नहीं मिल
सकेगी। जो हरिभजन से विमुख होते हैं उनके सामने द्वैत सर्वदा खड़ा रहता है। उनका महाभयंकर तथा
दुःखदायी प्रपंच बढ़ता ही जाता है। जिस प्रकार अचानक दिशा भूलने वाला व्यक्ति पश्चिम को ही पूर्व .कहता है
उसी प्रकार परब्रह्म से विमुख होने पर मिथ्या अद्वैत का बोलबाला हो जाता है। द्वैत के भेदरूपी कुएँ में से
संकल्प-विकल्प के सोते फूटते हैं और जन्म-मरण की बाढ़ में सारा ब्रह्माण्ड डूब जाता है। जन्म मरण के
आकर्षण से अनेक प्रकार के दुःखों की राशि और संकटों का सामना अभक्त लोगों को ही करना होता है क्योंकि
हरिभक्तों को स्वप्न में भी जन्म-मरण का आकर्षण नहीं होता। भक्ति की महिमा अगाध है, उसमें संसार बन्धन
प्रवेश नहीं करता। ऐसे भगवद्भजन को साधने के लिए सद्गुरु के चरणों की सेवा करनी पड़ती है। अपने शिष्य
की मृत्यु की चिन्ता का जो निवारण करता है, वही सच्चा सद्गुरु है। इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार के गुरु केवल
मंत्र-तंत्र उपदेश तक ही सीमित समझने चाहिए। मंत्र-तंत्र का उपदेश करने वाले गुरु घर-घर में दिखाई देते हैं
लेकिन जो शिष्य को सद्‌वस्तु दिलाते हैं उसी को श्रीकृष्ण सद्गुरु मानते हैं। गुरु ही देव है, गुरु ही माता-पिता है,
गुरु ही आत्मा है और गुरु ही ईश्वर है। गुरु सभी दृष्टियों से परमात्मा ही है। तात्विक दृष्टि से देखा जाए तो गुरु
परब्रह्म ही है। गुरु की उपमा देने लायक संसार में अन्य कुछ मिलने वाला नहीं है। गुरु की महिमा अगाध है।
भाग्य के बिना उसकी भेंट नहीं हो सकती। निष्काम पुण्यराशि तथा असीम वैराग्य का साथ हो, तथा नित्यानित्य
विवेक की चाह हो तभी सद्गुरु कृपा प्राप्त होती है। सद्गुरु कृपा प्राप्त हो जाए तो भक्ति के भण्डार खुल जाते
हैं, फिर उसके सामने जहाँ कलिकाल भी भागने लगता है तो वहाँ संसारभय क्या कर लेगा ? गुरु को माता-पिता
भी नहीं कह सकते क्योंकि उनका साथ तो केवल एक ही जन्म का होता है लेकिन गुरु तो हर जन्म में माँ-बाप