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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 869 में से

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पृष्ठ 76

६० श्रीमद् एकनाथी भागवत

समय भीष्म की स्त्री के स्तनों में दूध उतर आया और उस दूध से मस्त होकर उसने दिगम्बर के मकान को
ध्वस्त कर दिया अथवा चक्की में हवा डालकर उसे महीन पीसा जाए, घोड़े के सींग से आकाश चीर दिया जाए,
नपुंसक के नाती-पोते सूर्योदय के बाद अँधेरे में छिपने के लिये आयें अथवा गुंजा के तेज से मारुति के विवाह में
दीपक जलाये जाएँ और इस विवाह समारोह के लिए किसी उजाड़ गाँव में जाकर कोई अपनी छाया बेच दे
अथवा आकाशपुष्प गन्धयुक्त हैं या गन्धहीन हैं आदि बातों का विचार जो विद्वान कर सकते हों, वे हीं चाहें तो
माया का विवेचन बेझिझक करें। कुल मिलाकर, माया के सम्बन्ध में कुछ बोलने से बोलने वाला लज्जित हो
जाता है। यह एक तरह से किसी अजन्मे का श्राद्ध करने की तरह है। मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है, इसीलिए
वह खुद को 'माया' कहती है और इसीलिए शास्त्र उसे 'अविद्या' कहकर पुकारते हैं। 'भ्रम' ही इस माया का
मूल है। भ्रान्ति उसका उज्ज्वल फूल है और विषयरूपी रस में निरन्तर डूबी हुई 'भूल' यही उसका ताजा फल
है। जो अस्तित्व में ही नहीं है, उस रूप से वह अस्तित्व में आयी है, सत्यासत्य से वह गर्भवती हुई है और
असत्य के अनेक पिल्लों को उसने जन्म दिया है। वासने के विषय रूपी डोर से बँधी हुई वेणी धारण कर यह
मटकती रहती है, और 'मैंपन' के यौवन से यह मदनमोहिनी चमकती रहती है। मृगजल के मोतियों की जाली
गूँथकर यह अपने मस्तक पर धारण करती है। आकाश की चम्पाकली धारण कर अत्यन्त सौन्दर्य से यह
लावण्यमयी फड़कती रहती है। वह रज्जुसर्प के मस्तक से मणि निकालकर तथा उसके अलंकार बनवा कर
अपने शरीर पर धारण करती है और सीप पर भासित होने वाली चाँदी की पैंजनिया पहन कर छम-छम की
आवाज करती हुई चलती रहती है। खरगोश के सींग के खड़ाऊ पहनकर वह चलती रहती है। उसका ज्येष्ठ
और सुन्दर पुत्र 'अहंकार' है जिस पर वह अपने प्राणों से भी अधिक प्रेम करती है। अपना वंश बढ़े इसलिए वह
ममतारूपी कन्या कई जगह प्रसूत हुई और देह में मोह उत्पन्न कर उसे घरजमाई बनाकर रख लिया। उस
अहंमोहममता के संयोग से संसार का अपने आप विस्तार हुआ। ममता सबल प्रयोगों से अपने अंग बढ़ाती रहती
है। संकल्प विकल्प के कंगन पहनकर मन ममता के पास गिरवी रखती है। त्रिगुण के आधार बनाकर माया दिन
पर दिन मोटी हो रही है। हे राजा ! ऐसी है यह मूलमाया जो मिथ्या होते हुए भी मोटी दिखाई देती है। वह किस
प्रकार नियन्त्रण में आएगी यह कहना कठिन है। उसे यदि 'सत्' कहा जाए तो वह 'ज्ञान' प्राप्ति के बाद नष्ट हो
जाती है, यदि 'असत' अर्थात् मिथ्या कहा जाए तो दिखाई देती है। यदि यह कहें कि पहले रहती है और बाद में
नष्ट हो जाती है, तो ऐसी भी बात नहीं है। वह ऐसी है जिस प्रकार मृगजल का ज्ञान ! मृगजल दिखाई देता है
किन्तु वह पूर्णतयः मिथ्या रहता है, उसी प्रकार हे नृपनाथ ! संसार के अस्तित्व का जो आभास होता है, वही
माया है। वेदशास्त्रों से माया का पता पूछने पर वे मौन हो जाते हैं। माया का स्वरूप सच्चा है लेकिन ठीक तरह
से देखा जाए तो वैसा नहीं दिखाई देता। मृगजल की महानदी किस पर्वत से निकली यह कहना जिस प्रकार
कठिन है, उसी प्रकार माया का सच्चा लक्षण बतलाना भी वाणी के लिए असम्भव है। प्रतिबिम्ब क्या दर्पण में
रहता है? लेकिन जो उसमें देखता है उसे अपना प्रतिबिम्ब उसमें दिखाई देता है। उसी प्रकार हमारे संकल्प के
अनुरूप मिथ्या माया का आभास होने लगता है। डोरी का सर्प जिन्दा पकड़ा है, उसे देखने चलिए ऐसी बातें जो
करते हैं, वे माया के बड़प्पन की चाहे जितनी बातें करें, लेकिन कोई अपनी छाया हटाना चाहे तो उसके लिए
जैसे यह सम्भव नहीं है, उसी प्रकार हे राजा ! माया से पार पाना दुस्तर है। जैसे अग्नि उत्पन्न करना सूर्य का
संकल्प नहीं रहता उसी प्रकार सूर्यकांत में भी उसका अस्तित्व नहीं दिखाई देता लेकिन नीचे पकड़ी हुई रुई में
अग्नि प्रज्वलित होता है। उसी प्रकार शुद्ध ब्रह्म में संकल्प नहीं होता। उसी प्रकार वह केवल देह में भी नहीं