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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 869 में से

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पृष्ठ 65

डालकर अपने भजनरूपी महायोग से भगवत्स्वरूप का खजाना अपना कर लेते हैं। ऐक्य भाव से निजभक्ति
करने से सर्वोत्तम पूर्ण शान्ति प्राप्त होती है, जिसके योग से असत् वस्तुओं की निवृत्ति हो कर भक्तों को
ब्रह्मानन्दरूपी भगवान की पूर्ण प्राप्ति होती है। इसलिए भगवद्भक्त धन्य हैं। वे इन्द्रियों से व्यवहार करते हुए भी
विषयों के प्रति विरक्त होते हैं, वे देहधारी होते हुए विदेही होते हैं और हरिभजन के योग से नित्यमुक्त होकर
रहते हैं। एकनिष्ठ होकर भक्ति करते समय वे मुक्ति की भी इच्छा नहीं करते, फिर भी चारों मुक्तियाँ सदा उनके
पास दासियों की तरह खड़ी रहती हैं। भगवद्भक्तों की यह महिमा अनुपम है। निष्ठा के साथ पुरुषोत्तम का
भजन कर वे श्रेष्ठ परम पद को प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार की भगवान की श्रेष्ठ भक्ति और भक्तों को होने
वाली भगवत्प्राप्ति के सम्बन्ध में सुनकर चक्रवर्ती राजा जनक को बड़ा आश्चर्य हुआ। 'धन्य धन्य भगवद्जन'
कहकर वह प्रसन्नता के मारे कवि को दण्डवत करने लगा उस समय उसका कण्ठ भर आया और उसकी
सिसकियाँ रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। शरीर पर रोमांच उभर आये और आँखें भर आयीं। आनन्द से उसे
पसीना चुहचुहा आया, शरीर थरथर काँपने लगा और क्षणभर के लिए वह स्तब्ध रह गया। लेकिन शीघ्र ही वह
होश में आ गया। क्योंकि उसे लगा कि कहीं ये महर्षि मुझसे बिना पूछे चले न जाएँ। राजा ने ऐसी व्याकुल
अवस्था में आँखें खोलीं वहाँ ऋषिमण्डली को बैठे देख उसे बड़ा आनन्द हुआ। उस आनन्द में वह डोलने लगा
और बोला कि जिन्हें पूर्ण प्राप्ति हुई रहती है ऐसे भगवद्भक्त संसार में कैसा-कैसा व्यवहार करते हैं, वे सारे
लक्षण इनसे पूछूँ।
राजोवाच
अथ भागवतं ब्रूत यद्धर्मो यादृशो नृणाम्।
यथा चरति यद्ब्रूते यैर्लिङ्गैर्भगवत्प्रियः ॥ ४४ ॥
भक्त को 'पूर्णप्राप्ति' होना सुगम है यह सुनकर राजा को अत्यन्त समाधान हुआ। इसलिए वह भक्तों के
लक्षणों का अनुक्रम और समूल मर्म पूछने लगा। राजा जनक ने कहा, "महाराज ! मुनिवर ! जो भगवद्भक्त 'पूर्ण
प्राप्ति' कर लेते हैं वे संसार में कैसा व्यवहार करते हैं? उनके वे सारे लक्षण मुझे बता कर मेरे कानों को
अलंकृत कीजिए। भक्तों के लक्षण एक प्रकार के अलंकार ही हैं, उन्हें पहना कर मेरा श्रवण भूषणयुक्त कीजिए।
उनके सारे लक्षणों का यदि ध्यानपूर्वक श्रवण किया जाए तो हम भी भगवान के प्रिय बनेंगे। उनका धर्म क्या है?
उनका कर्म कैसा होता है? अन्तःकरण में पुरुषोत्तम को रखकर वे कैसा व्यवहार करते हैं? उनकी बोलने की
शैली कैसी है? किन स्थितियों में और किस रीति से हरि के भक्त हरि के प्रिय बनते हैं? स्वामी! ऐसे लक्षणों
की जितनी भी मालिकायें हों, वे सब मुझे बतलाइये।" राजा जनक के इस प्रश्न से सभी मुनीश्वरों को बड़ा
सन्तोष हुआ और कवि से छोटा हरिनाम का भाई उस प्रश्न का उत्तर देने के लिए आगे बढ़ा।
हरिरुवाच
सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ ४५ ॥
हरि ने राजा से कहा, "हे राजा! भक्तों के लक्षणों के अनेक प्रकार हैं। कुछ दिगम्बर अर्थात् नग्न अवस्था
में रहते हैं और कुछ अपने आश्रम धर्म का पालन कर अपने ही आचार से व्यवहार करते हैं। कुछ हमेशा लेटे ही