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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 869 में से

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४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत

देखकर भी उसे हरिस्वरूप समझ कर प्रणाम करता है। यह तो कुछ भी नहीं, लेकिन किसी मक्खी को भी
भगवान का स्वरूप समझकर अनन्यभाव से शरणागत होकर दण्डवत करता है। गाय हो या गधा हो, चाण्डाल हो
या श्वान हो, लोक जिन्हें अत्यन्त निंद्य और कनिष्ट समझते हैं, उन्हें भी पूर्ण भगवद्रूप मानकर अनन्य भाव से
दण्डवत करता है। पाषाण को भी हरिरूप समझता है। तृण को भी भगवत्स्वरूप समझकर उसका वन्दन करता
है। स्थावरजंगमादिकों को भी चिदैक्य भाव से दण्डवत करता है। हरिनाम स्मरण की महिमा से इतना लाभ कैसे
होता है यह पूछोगे तो, ऐ राजा ! उसका मर्म सुनो। विधिपूर्वक पूजा, अथवा श्रवण, स्मरण, कीर्तन करते हुए
जिसकी सर्वकाल 'चिदैक्य भावना' रहती है, उसे ही 'पूर्णप्राप्ति' साध्य होती है।
भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र चैष त्रिक एककालः।
प्रपद्यमानस्य यथाश्नतः स्युस्तुष्टिः पुष्टिः क्षुदपायोऽनुघासम् ॥ ४२ ॥
हे चक्रवर्ती राजा जनक, सुनो ! जहाँ ऐसी भगवद्भक्ति रहती है, वहाँ गोवत्स न्याय के अनुसार विषय-
विरक्ति भी दौड़ कर आती है। जिस प्रकार जुड़वाँ फल एक दूसरे को नहीं छोड़ सकते उसी प्रकार भक्ति और
विरक्ति साथ-साथ ही उत्पन्न होती हैं और उनके सामर्थ्य से भक्त भी समर्थ हो जाते हैं। जहाँ भक्ति और विरक्ति
सहज स्थिति में एक साथ रह सकती हैं, वहीं पूर्ण-प्राप्ति भी सदा सर्वकाल दासी की तरह सेवा करती है। इस
प्रकार भगवद्भक्ति त्रिभुवन में अत्यन्त समर्थ है और भक्ति-विरक्ति की एकता के कारण भक्तों के घर प्राप्ति भी
रहने लगती है। अब भक्ति, विरक्ति और अनुभव प्राप्ति ये तीनों एक ही समय कैसे उत्पन्न होती हैं, वह स्थिति
भी तुम्हें विस्तार से बताता हूँ। जैसे-जैसे भगवद्भक्ति की जाती है, वैसे-वैसे विषयों के प्रति विरक्ति उत्पन्न होती
जाती है और उसी के अनुसार अनुभव स्थिति भी भक्तों को उसी समय प्राप्त होती है। भूखे व्यक्ति के सामने
षड्रसयुक्त भोजन की थाली रखने से उसे प्रत्येक ग्रास में पुष्टि, तुष्टि तथा क्षुधानाश का अनुभव होता है। जितना
ग्रास खाया जाए उतना ही क्षुधा का नाश होता है और जितना अधिक पेट भरता है उसी के अनुसार सुख और
समाधान भी उतना ही बढ़ता जाता है। पुष्टि, तुष्टि तथा क्षुधानाश ये तीनों चीजें जिस प्रकार भोजन करने वाले
को एक साथ प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार भगवद्भजन में भक्ति का त्रिकूट अर्थात् भक्ति, विरक्ति और अनुभव
प्राप्ति ये तीनों एक साथ उत्पन्न होती है। हे राजा ! सद्भाव से भगवद्भक्ति करने से भक्ति, विरक्ति तथा अनुभव
प्राप्ति ये तीनों एक साथ उत्पन्न होते हैं। हे राजा ! सद्भाव से भगवद्भक्ति करने से भक्ति, विरक्ति और
भगवत्प्राप्ति ये तीनों उपर्युक्त न्याय से एक ही समय प्राप्त होती है। भक्ति का अर्थ है समस्त प्राणियों के प्रति
सप्रेम भावना और प्राप्ति का अर्थ है अपरोक्ष साक्षात्कार, अर्थात् भगवद्रूप की तीव्र स्फूर्ति अब विरक्ति ऐसी जैसे
मेरी स्त्री, मेरा पुत्र, मेरी देह आदि जो ममत्व और अहंकार होता है, वह जहाँ समूल मिथ्या हो जाता है उसी का
नाम राजा विरक्ति है। इस प्रकार भजन से भक्ति, विरक्ति और भगवत्प्राप्ति ये तीनों ऐक्यभाव से सद्‌भक्त में भजन
दृष्टि के कारण एक ही समय उत्पन्न होती है। इसलिए राजा ! स्वहित के लिए हरि की भक्ति अवश्य करनी
चाहिए। वहाँ निश्चय ही भगवत्प्राप्ति होती है।
इत्यच्युताङ्घ्रिं भजतोऽनुवृत्त्या भक्तिर्विरक्तिर्भगवत्प्रबोधः।
भवन्ति वै भागवतस्य राजंस्ततः परां शान्तिमुपैति साक्षात् ॥ ४३ ॥
इस प्रकार जो सदा समस्त भूतों के प्रति अनन्य भक्ति करते हैं, वे भक्ति, विरक्ति और भगवत्प्राप्ति
अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं। हे राजा ! हरिभक्ति यह एक उत्तम अंजन है। सद्‌भक्त अपने नेत्रों में यह अंजन