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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 869 में से

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पृष्ठ 69

द्वितीय अध्याय ५३
करती है। एक के बाद एक प्रारम्भ होने वाली वासनाओं को देखने से उसका निर्वासना रूप ब्रह्म अपने आप
प्रकाशित होता है। (एक वृत्ति नष्ट हुई और दूसरी अभी शुरु नहीं हुई है, तब तक उसका सन्धिकाल में
निर्विकल्प चैतन्य का स्पष्ट आभास होने लगता है।) हर ग्रास पर राम का स्मरण करने से वह अन्न ही पूर्णब्रह्म
हो जाता है। हे राजा जनक! इसी रीति से भक्त विषयों में भी मुक्तस्थिति का अनुभव करता है। ऐसा जो
निष्कामनिष्ठ पुरुष होता है, वही भागवतों में श्रेष्ठ है। उसे ही प्रधानत्व का मान देना उचित है। राजा! उत्तम
भक्त किस प्रकार का व्यवहार करते हैं इसका वर्णन तुम्हें तीन श्लोकों में बताया। इसके बाद, उत्तम भक्त किन
गुणों के कारण भगवान को प्रिय हो जाते हैं, वे लक्षण बताने के लिए हरि अत्यन्त उल्लास से बोलने लगा।
न यस्य जन्मकर्मभ्यां न वर्णाश्रमजातिभिः।
सज्जतेऽस्मिन्नहंभावो देहे वै स हरेः प्रियः ॥५१॥
साधारण लोगों में देहात्मभाव होता है। वह जब गुरुकृपा पाकर भजन करता है तो उसके अभिमान का
स्वरूप 'मैं स्वयं नारायणस्वरूप हूँ' इस भावना में बदल जाता है। 'मैं देह हूँ' यह भावना मूलतः ही मिथ्या है,
वास्तव में 'मैं नारायण हूँ' यही सच है। इस भावना की आदत हो जाने से इसी भावना में अभिमान का विलय
हो जाता है। देहाभिमान हरिचरणों में लीन होने के बाद भक्त निरभिमान होता है। वही निरहंता का लक्षण हरि
पूरी तरह बता रहे हैं। निरहंकारी का यह लक्षण है कि वह जन्म लेकर भी मैंने जन्म लिया है ऐसा नहीं कहता।
सोने का कुत्ता बनाने पर भी वह कुत्ता नहीं बन सकता। उसी प्रकार जन्मादिक का अहंभाव उत्तम भक्त को नहीं
जमता वह 'कर्म' करता है पर स्वयं को 'कर्ता' नहीं मानता। सूर्य जिस प्रकार आकाश में रहकर भी पृथ्वी पर
सूर्यकांता से अग्नि को उत्पन्न करता है, उसी प्रकार उत्तम भक्त सारे कर्म करने पर भी आत्मदृष्टि से अकर्ता ही
बना रहता है। सूर्य के कारण सूर्यकांता से अग्नि उत्पन्न होता है, फिर उस अग्नि से यज्ञ हो या दावाग्नि भड़के,
लेकिन उससे सूर्य के शरीर पर आँच नहीं आयेगी। उसी प्रकार यह भक्त सब कुछ करने पर भी शुद्ध अकर्ता
बना रहता है। न हिलने-डुलने वाला जड़-अचेतन लोहा, लौहचुम्बक के कारण हिलने लगता है लेकिन इससे
लौहचुम्बक को कोई बाधा नहीं होती। वह क्रियाशील नहीं होता। उसी प्रकार यह सारे कर्म करने पर भी
निरहंकार के बल पर अकर्ता बना रहता है। शरीर के कर्म भाग्य से होते रहते हैं। उसका 'कर्ता' मैं हूँ यह कहने
से वह बाधक हो जाते हैं, लेकिन भजनों के कारण परमात्मप्रतीति के कारण भक्त सभी कर्मों में निरहंकार ही
रहता है। उसी प्रकार देह के कर्म चलते समय पूर्ण प्रतीति के कारण अथवा पूर्णत्व के अनुभव के कारण भक्त
अकर्ता ही रहता है। अपनी स्वाभाविक निरहंकृति के कारण वह कर्माकर्म का बोझ अपने सर पर नहीं लेता।
उत्तम वर्ण में जन्म लेने पर भी वह 'मैं ब्राह्मण हूँ' यह नहीं कहता। कुंकुम में रखा हुआ लाल स्फटिक 'मैं लाल
हूँ' यह कभी नहीं कहता। जिसे देह का अभिमान नहीं रहता वह देह के वर्ण की जिस प्रकार चिन्ता नहीं करता
उसी प्रकार ज्ञानसम्पन्न भक्त कभी आश्रम का भी अभिमान नहीं करता। देह से संन्यासाश्रमी होने पर भी वह यह
नहीं कहता कि 'मैं परमहंस' अर्थात् संन्यासी हूँ। नाटक में अभिनेता राजा की पोशाक पहनकर 'मैं राजा बन
गया हूँ' यह नहीं मानता उसी प्रकार भक्त आश्रम आदि अवस्थाओं का अभिमान नहीं करता। उसी प्रकार उत्तम
भक्त जाति-पाँति का बोझ भी अपने माथे पर नहीं रखता। ऊँच-नीच आदि अनेक जातियाँ हैं लेकिन उनमें से
किसी जाति विशेष को वह अपनी जाति नहीं कहता। गंगा के किनारे अनेक गाँव रहते हैं लेकिन उनमें से किसी
एक गाँव को गंगा अपना गाँव नहीं कहती। उसी प्रकार जो पूर्णभक्त होते हैं वे जन्म, कर्म, वर्णाश्रम तथा जाति