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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 869 में से

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पृष्ठ 74

तृतीय अध्याय
'हे चित्स्वरूप सद्गुरु राया ! आपको प्रणाम करता हूँ,' कहकर आपके चरण छूता हूँ, मेरे 'मैं' पन के साथ
तुम्हारा 'तू' पन भी नष्ट हो गया। आपके पैरों की कठोरता कितनी अपूर्व है जो लिंगदेह कभीं वज्र से भी नहीं
टूटता उसे आपने सहज स्पर्श से चूर्ण कर दिया। राजा बलि ने आपके चरण छुए ही थे कि आपने उसे तत्काल
पाताल भेज दिया। लवणासुर सरीखे महाबली का भी आपने इसी प्रकार पैर से कुचल कर विनाश कर दिया।
सचमुच ही आपके पैर बहुत कठोर हैं। कालियानाग से उनका स्पर्श होते ही उन्होंने उसका सारा गरल खींच
लिया और उसे विषविहीन कर दिया। आपके पैर ऐसे कठोर हैं कि शकटासुर से उनका स्पर्श होते ही उसके
पाशबन्ध टूट गये और उसका चलना-फिरना बन्द हो गया। बड़े-बड़े बलवान भी आपके पैरों से भयाक्रान्त रहते
हैं। अहिल्या शिला बन कर पड़ी हुई थी, उसका उद्धार आपके पैरों ने ही किया। दानवीर राजा नृग ब्राह्मण के
शाप से गिरगिटाँग बन कर पड़ा हुआ था—उसे तुम्हारे कृष्णावतारी चरणों का दर्शन होते ही, वह मिथ्या संसार
से अर्थात् जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त हो गया। जो दास स्वेच्छा से आपके चरणों का चिन्तन करते हैं उनका
मनुष्यधर्म ही नष्ट हो जाता है। उन पैरों से यमलोक उजाड़ हो गया और उन्हीं पैरों ने प्राणी का 'जीव' पन नष्ट
कर दिया। आपके चरणों का तीर्थ शंकर ने मस्तक पर धारण किया तो वह जगत के प्राण ही लेने लग गया और
उसकी राख बड़े भक्ति भाव से शरीर में पोत कर, अन्त में नग्न होकर श्मशान में घूमने लगा। ऐसी इन चरणों की
महिमा है। वह शिव का शिवपन नहीं रहने देता, फिर जीवों का 'जीव' पन कैसे रहने देगा? इस प्रकार वे
जीव-शिव भाव तथा उसे मानना ये दोनों ही बातें शेष नहीं रहने देते। यही भाव मन में लाकर एका ने
(एकनाथ) एकत्व से आपके चरणों में अपना स्थान बनाया। लेकिन यहाँ भी आपके चरणों ने बड़ा चमत्कार
किया है। वह यह कि वन्दन करते ही उसका 'एक' पन ही व्यर्थ कर दिया। इसलिए अब कौन किसका वर्णन
अथवा स्तुति करेगा? कौन किसको मनाये? कौन किसे कुछ दे या ले ? क्योंकि अब 'मैं' और 'तू' का तो जीवन
ही समाप्त हो गया। तो अब 'भगवान' और भक्त तो अब तुम ही हो गये न ? तो अब 'मैं पन' कौन किसके
सामने प्रकट करे ? ऐसे पद पर मुझे बिठाकर तुम मुझसे यह ग्रन्थ निरूपण करवा रहे हो? इसलिए हे सद्गुरु
राया ! इस ग्रन्थ का कवि, कर्ता वास्तव में तुम ही हो। मेरा नाम और रूप सब कुछ एक ही है और वह भी
जनार्दन ही हो गया है। इस प्रकार श्रीजनार्दन को एका का बड़ा कौतुक है। उसी कौतुक के कारण वह मेरे नाम
से कवि-कर्ता बनकर यथार्थ आत्मबोध से युक्त होकर इस ग्रन्थ की रचना स्वयं कर रहा है। दूसरे अध्याय के
अन्त में बताया था कि किस प्रकार उत्तम भक्तों ने भजनस्थिति से कठिन माया को समाप्त कर भगवत्प्राप्ति कर
ली। इसलिए हरि की माया कठिन क्यों है, यह पूछने की उत्कंठा राजा में लगी रही। इसलिए बड़े आदर के साथ
उसने कहा, हे मुनिश्रेष्ठों ! सुनिए—
राजोवाच
परस्य विष्णोरीशस्य मायिनामपि मोहिनीम्।
मायां वेदितुमिच्छामो भगवन्तो ब्रुवन्तु नः ॥ १॥
राजा पूछेगा, 'कैसी माया ? कैसा तरण' ब्रह्म क्या है ? और कर्म कैसा होता है ? इनका निरूपण इस तीसरे