श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वप्न दिखाई देता है, वही जब जागृत हो जाता है तो मनोरथ का चिन्तन करने लगता है, और उसे अवास्तव जन
वन दिखाई देने लगता है। अथवा जो आसन लगाकर मूर्ति का चिन्तन करता है उसे ध्येय, ध्याता, ध्यान, उपचार
आदि का व्यर्थ का आभास होने लगता है। जिस प्रकार धन के लोभी का धन गायब होने पर भी उसकी वासना
धन धान्य को नहीं छोड़ पाती उसी प्रकार उसका मन धन का स्मरण करने से द्रव्य लोभ से पागल हो जाता है।
मन स्वयं भले ही धन न हो लेकिन वह धन के खजाने का स्मरण करता है और स्मृति लोप होकर धन लोभ से
पूरी तरह पागल हो जाता है। उसी प्रकार मोह द्वारा पूरी तरह ग्रस्त होने पर मिथ्या देहादि के द्वैत का आभास होने
लगता है, उसे अहंभाव से सच मान लेने पर संसार का भय शरीर पर अचूक प्रहार करता है। यह बात ध्यान में
रखो कि भवभय का प्रमुख कारण हमारे मन की कल्पना ही है। उस मन का निरोध करने के लिए सद्गुरु के
वचन तथा उनके प्रति दृढ़ निष्ठा रखनी चाहिए। यह जानकर जो सच्छिष्य ज्ञाता होते हैं, वे गुरु की बात पर
विश्वास रखकर विवेक और वैराग्य के बल से अपने मन को सँभाल कर रखते हैं। राजा ! उस नियंत्रण की क्या
युक्ति है, उसे मैं संक्षेप में तुम्हें बताता हूँ। सद्गुरुवचन आत्मबोध से मन को सावधान करता रहता है। सद्गुरु पर
तथा उसके वचन पर दृढ़ निष्ठा रखने से चंचलता से विषयचिन्तन करते हुए मन जो देखता है वह सब ब्रह्मार्पण
होता जाता है। गुरुकृपा का ऐसा सामर्थ्य है कि विषय का जो भी स्वार्थ मन में रखो वह सब परमार्थ रूप ही हो
जाता है। भूमि भय से जो भागता है उसे सब जगह भूमि ही दिखाई देती है। ऐसा होने से आना-जाना अपने
आप ही बन्द हो जाता है और वह एक ही स्थान पर ठहर जाता है। इस प्रकार मन को एक मर्म दिखला देना
चाहिए और वह यह है कि वह जिसे भी देखता है वह सब ब्रह्म ही है। ऐसा करने से वह जो भी कर्म करने
लगेगा, वहाँ पुरुषोत्तम सहज प्रकट हो जाएगा। इस प्रकार गुरुपदेश के अनुभव के प्रभाव से इन्द्रियों की वृत्तियों
पर नियन्त्रण हो जाता है और ब्रह्मरूप अधिष्ठान से ऐक्य मिलाकर बाह्य प्रवृत्तियों पर लगाम कस जाती है। इस
प्रकार बाह्य कर्मों पर नियन्त्रण होकर मन का द्वैतभाव टूटता है और बाहर भी परब्रह्मरूप चिदाकाश चारों ओर भर
जाता है। इस प्रकार के भजन से मन पर नियन्त्रण करने से, उन भक्तों को कल्पांत काल में भी भय नहीं रहता।
वे निर्भय होकर विचरण करते रहते हैं। लेकिन यह अगाध निष्ठा भोले भाले लोगों से नहीं सध पाती, इसलिए
एक और सरल साधन बताता हूँ।
शृण्वन् सुभद्राणि रथाङ्गपाणेर्जन्मानि कर्माणि च यानि लोके।
गीतानि नामानि तदर्थकानि गायन्विलज्जो विचरेदसङ्गः ॥ ३९॥
भोले-भाले लोगों के लिए तरने का प्रमुख साधन चित्तशुद्धि ही है। हरि के जन्म, कर्म और गुण के सम्बन्ध
में अत्यन्त आदर से श्रवण करना चाहिए। खोये हुए पुत्र के मिलने की वार्त्ता माँ जितनी उत्कंठा से सुनती है,
उतनी ही उत्कंठा से जीवन को सार्थक करने वाली हरिकथा सुननी चाहिए। हरि के जन्म-कर्म तथा गुण अनन्त
हैं, वह सब कहाँ सुनने को मिलेगा? तो इसका उपाय यह है कि जो भी प्रसिद्ध पुराण हो, उसे पूरी श्रद्धा से
सुनना चाहिए। पुराणों में अनेक देवताओं का उल्लेख है वे सब भी जिसका चरणस्पर्श करते हैं, वेदों और पुराणों
ने भी जिसका वन्दन किया है वह चक्रपाणि श्रीकृष्ण ही एक समर्थ अर्थात् श्रेष्ठ है। उसके अत्यन्त अद्भुत जन्म
तथा परमार्थ युक्त जो भी कर्म भगवान ने स्वमुख से सुनाये हैं, उन सबका ज्ञानप्राप्ति के लिए श्रवण करना
चाहिए। लेकिन जिस किसी पुराण का भी वह श्रवण करे यदि वह उसका मनन नहीं करता तो सब व्यर्थ है।
इसलिए श्रवण की हुई बात का अच्छी तरह मनन करते रहना चाहिए। पैसा देकर गाय खरीदी जाए और उसके
दूध का सेवन स्वयं किया जाए तो वह विषयभोग होता है लेकिन यदि उसी गाय को दान में दिया जाए तो वह