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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 869 में से

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पृष्ठ 63

की समझ में नहीं आती। राजा, उसे भगवान के सिवाए अन्य कोई लोकाचार दिखायी ही नहीं देता। उसके निज
बोध की कथा सुनाता हूँ। सुनो।
खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन् ।
सरित्समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत्किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यः ॥ ४१ ॥
स्वानन्द के बोध से तथा ब्रह्मोन्माद के परमानन्द से वह जिधर भी कहीं देखता है, उधर उसे सारा चराचर
पूर्णानन्द से भरा हुआ और स्वानन्द से सराबोर दिखाई देता है। पृथ्वी, आप, तेज, वायु, आकाश ये सब उसे
हरिस्वरूप ही दिखाई देने लगते हैं। भूतों अथवा महाभूतों की प्रतिभा के अंकुर उसे अभिन्न, एकरूप ही दिखाई
देने लगते हैं। जिस प्रकार केले का पेड़ बिना खाद के ही फल और पत्तों के रूप में विकसित होता है, उसी
प्रकार हे राजा परीक्षित ! परब्रह्म भूत-भौतिकात्मक रूप में प्रकट होता है। अथवा स्फटिक गृह की दीवार पर
उकेरे गये हाथी, घोड़े आदि के चित्र भीतर के दीपक के कारण ही वैसे के वैसे दिखाई पड़ते हैं, उसी प्रकार
तेजःपुंज सूर्यचन्द्र आदि में चमकने वाला अग्नि तथा नक्षत्रों में दिखाई देने वाली चमक तथा प्राणियों की आँखों
में दिखाई देने वाला तेज यह सब आत्मज्योति के ही कारण तेजस्वी दिखाई देता है। आतिशबाजी का सामान,
जैसे गन्धक, कोयला आदि वस्तुओं को युक्ति से मिलाया जाए तो अग्नि फूलों की तरह दिखाई देता है। उसी
प्रकार परब्रह्म स्वलीला से सूर्यचन्द्राकार होकर विविध रूपों में परिभाषित होता है। पृथ्वी स्वयं गन्धरूप है,
लेकिन वह सुगन्ध कस्तूरी आदि पदार्थों में ही प्रकट होता है। उसी प्रकार भगवान की सत्ता सर्वत्र है लेकिन वह
सात्विक प्रवृत्ति के लोगों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसलिए सात्विक व्यक्ति में जो तत्त्व है, वह भगवत्तत्व
ही है, ऐसा समझ लो। सत्ववान लोगों को सत्व के ही कारण महत्त्व और हरिरूप से मान्यता प्राप्त होती है।
पृथ्वी के चारों ओर जल का आवरण है उसे 'चतुःसमुद्र' कहते हैं। उसी प्रकार दसों दिशाओं में होने वाला ईश्वर
का अंश ही 'दिशा' इस नाम से जाना जाता है। पूर्व-पश्चिम आदि जो प्रकार हैं वह दसदिशाओं के ही भाग हैं,
ईश्वर का ही अंग है। उस रूप में श्रीरंग ही मूर्तिमंत दिखाई देता है। घास, दूब, दर्भ, पेड़ आदि को देखकर वह
उन्हें श्रीहरि के केश ही कहता है। सबके शरीर में सम हरिरूप होते हुए भी, न पहचानने वाले के लिए वह सब
विषम ही दिखाई देता है। उँगलियाँ गिनने से वे अलग-अलग मालूम होती हैं लेकिन वे मूलतः हमारे शरीर के
एक ही अंग में चिपकी रहती हैं। इस प्रकार वन, बेलें, दर्भ, जंगल आदि को देखकर ये सब हरि का ही स्वरूप
है, ऐसा वह कहता है। यह सारा वह ऐक्य भाव से ही देखता है, उसमें उसे निराला अंश नहीं दिखाई देता। वह
कहता है, चाहे दूब हो, पेड़-पौधे हों या जंगल की लतर हों, यह अनन्त कोटि केशों की राशि श्रीहरि के ही
शरीर पर बढ़ी है, और उसे श्रीहरि के स्वरूप से शोभा आयी हुई है। वट की लटकने वाली जड़ें अलग-अलग
बढ़ती हैं, फिर भी वे वट के ही वृक्ष की होती हैं, वह अपने वटत्व से अलग नहीं हो जातीं। उसी प्रकार चैतन्य
से, नदियों के रूप में अनेक प्रवाह निकले हुए हैं, उसमें भी चैतन्य ही ओतप्रोत रहता है और वे चिद्रूप से ही
निरन्तर बहती रहती हैं। अथवा चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब का अमृत जिस प्रकार बिम्ब में बिम्बरूप होकर ही रहता है
उसी प्रकार भगवान में संसार का आभास होता है और वह भजन विश्वास से भगवद्रूप ही हो जाता है। उसी
प्रकार सृष्टि के अलग-अलग भाग देखते समय जिस प्रकार मन उल्लसित होता है, उसी प्रकार सारा संसार मानों
भगवान ही पूर्ण रूप से आभूषित हैं, ऐसा अनुभव उसे होने लगता है। इसलिए वह समस्त प्राणिमात्रों के हृदय में
इस प्रकार लीन हो जाता है मानो समुद्र के जल में नमक घुल-मिल गया है। उस अवस्था में वह चींटी को