श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय ५१
इन्द्रियाँ विषयों का सेवन करती रहती हैं, फिर भी जिसके चित्त में सुख-दुःख उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि वे
जानते हैं कि विषय मिथ्या हैं, वे ही सचमुच 'उत्तम भक्त' हैं। जो मृगजल में स्नान करता है वह स्नान करने पर
भी सूखा रहता है, उसी प्रकार भोग भोगने में भी जो अलिप्त अर्थात् 'अभोक्ता' रहते हैं, वे ही पूर्ण एवं उत्तम
भक्त हैं। उत्तम भक्त विषयसेवन करते हैं ऐसी साधारण लोगों की धारणा रहती है। लेकिन वे नहीं जानते कि
ऐसे भक्तों को विषय के प्रति स्फूर्ति ही नहीं रहती। उनका त्याग और भोग दोनों ही मिथ्या रहता है। स्वप्न में
खाया हुआ केला बहुत मीठा था इसलिए जगने पर भी वह केला माँगने लगे तो वह न हाथ लगता है न मुँह में
ही जाता है। उसी प्रकार विषय सेवन में हरिभक्त अलिप्त ही रहते हैं। विषयसेवन यदि इतना मिथ्या है, तो फिर
वे उसका सेवन ही क्यों करते हैं ? भाग्य अत्यन्त बलवान होता है और वही उन्हें विषयों का भोग करने के लिए
उद्यत करता है। लेकिन मैं एक विषयभोक्ता हूँ, यह बात उनके स्वप्न में भी नहीं आती। इसीलिए उत्तम
भागवतता उसी में प्रकट होती है, ऐसा समझना चाहिए। उत्तम भक्त विषयसेवन में इस प्रकार का व्यवहार करते
हैं। अब इससे भी अगाध एक स्थिति है, उसके बारे में भी तुम्हें सुनाता हूँ।
देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रैः ।
संसारधर्मैरविमुह्यमानः स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥ ४९ ॥
देह, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और प्राण यही पाँच बन्धनकारी स्थल हैं और उनमें सुधा, तृष्णा, भय, क्लेश,
जन्म, मरण आदि भरे हुए हैं। इन पाँच ही स्थानों पर अत्यन्त कष्ट होते हैं। उसी का नाम संसारधर्म है। किन्तु
श्रीआत्माराम अपने भक्तों पर हमेशा प्रसन्न रहते हैं इसलिए उन्हें स्वप्न में भी संसारभय की बाधा नहीं होती।
दारुण क्षुधा लगने पर दूसरों के प्राण अन्न के लिए व्याकुल हो जाते हैं किन्तु भक्त लोग हरिस्मरण में इतने
तल्लीन रहते हैं कि उन्हें क्षुधा का स्मरण भी नहीं होता। अंतःकरण से भगवद्भक्ति करने से भूख और प्यास की
याद भी नहीं आती। इतनी महान भक्ति जिन्हें हुई रहती है, वह सचमुच ही संसारभय से नहीं घबराते। संसार का
भय मन में रहता है किन्तु उनका मन तो हरिचरणों में मगन रहता है, फिर भय किसे होगा ? क्योंकि वहाँ मन का
कोई धर्म ही नहीं रह जाता। मन में द्वैत की भावना उत्पन्न होती है जिससे संसारभय दृढ़ होता जाता है। ऐसे उस
मन में जब भगवान का निवास होता है तो द्वैत के साथ भवभय की निवृत्ति सहज ही हो जाती है। देहबुद्धि में
अनेक प्रकार की वासनाएँ उठती हैं लेकिन वही बुद्धि जब निश्चय करके हरि का स्मरण करने लगती है तो वहीं
पूरी तरह स्थिर हो जाती है। फिर उस बुद्धि में जहाँ-जहाँ तृष्णा का स्फुरण होता है, उस-उस तृष्णा में सहज ही
नारायण प्रकट होता है। इससे तृष्णा वितृष्णा हो जाती है और पूर्णत्व में विलीन हो जाती है। इस प्रकार भगवद्
भक्त हरिस्मरण करने से तृणारहित हो जाते हैं। इससे वे इन्द्रियों के क्लेश से अलिप्त हो जाते हैं। राजा ! उसके
बारे में भी सुनो। कष्ट होने का बीज इन्द्रियों के कर्मों में रहता है। उन इन्द्रिय कर्मों में हरिभक्तों को हरिभजन के
द्वारा ब्रह्मस्फुरण होता रहता है। दृष्टि से देखने का प्रयास करो तो जो जो दिखाई पड़ता है उन सभी दृश्य पदार्थों
में नारायण ही प्रकट होता है। कान से 'शब्द' ग्रहण करते समय, उस शब्द की ध्वनि में तथा अर्थ में ब्रह्म ही
पूरी तरह विराजमान हो जाता है। नाक से अनेक प्रकार के 'गन्ध' अर्थात् वास लेते समय उन वासों के ज्ञान में
साक्षात परमेश्वर प्रकट होता है। उसी प्रकार जिह्वा जिन-जिन रसों का सेवन करती है उन-उन रसों में स्वादरूप
में ब्रह्मरस ही प्रकट होता है। देह में कुछ शीत-उष्ण अथवा मृदु-कठिन लगा तो उस 'स्पर्श' ज्ञान से उनमें मूल
का चित्स्वरूप पूर्णरूप से प्रकट होता है। अब हस्तपादादि कर्मेन्द्रिय प्रवृत्तियों में इस ब्रह्मा की ही स्फूर्ति होने के