श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिखाई देता। लेकिन वासना की ठाँव में देहाभिमान से संसार का भास होता है। जब तक जागृत देह का
विस्मरण हो रहा है, तब तक दूसरा स्वप्नदेह प्राप्त होता है। जिससे मिथ्या स्वप्नप्रपंच बढ़ता है। स्वप्नावस्था में
स्वप्न कभी मिथ्या नहीं मालूम होता। सुषुप्ती में देह असम्भव है, इसलिए वहाँ संसार का अस्तित्व नहीं है। वहाँ
जन्म-मरण भी मिथ्या है। संसार की अर्थात् जन्म-मरण की सम्भावना देहाभिमान के कारण ही होती है। इस
प्रकार आत्मत्व का विस्मरण होने से 'मैं ही देह हूँ' का अहंकार उत्पन्न होता है और उस अहंकार से दुस्तर संसार
की वृद्धि होती है। जिस प्रकार मृगजल में मछली मिथ्या है, उसी प्रकार ब्रह्म में प्रपंच तो होता ही नहीं है।
इसलिए उसे नष्ट करने के साधन का उपयोग करने का पागलपन तो पागल ही जाने। 'माया' इस दो अक्षर के
शब्द का अर्थ बतलाने गया तो हे राजा! श्लोक का अर्थ तो रहा एक तरफ लेकिन ग्रन्थ का विस्तार व्यर्थ ही बढ़
गया। ज्ञानी लोग भी माया का अर्थ जानने जाते हैं और पागल बन कर रह जाते हैं। नामरूप के भरोसे कल्पना के
वश में माया बढ़ती है। हे राजा! तुम्हें माया के रूप की प्रमुख पहचान बताता हूँ। सच तो यह है कि हमारी
कल्पना की उड़ान ही माया है। हे राजा! हमारे हृदय में जो आशा है वही प्रमुख माया है। जो नित्य सभी दृष्टियों
से निराश रहता है, वही ईश्वर को पूज्य होता है। अब जब तुमने प्रश्न किया ही है तो तुम्हें उस माया के कुछ
उदाहरण बताता हूँ। उत्पत्ति, स्थिति और अन्त करने वाली वह माया त्रिविध गुणों में भासित होती है। जिस
प्रकार सूर्य का अग्निविषयक कोई संकल्प नहीं होता, फिर भी जब वह अपने किरणों के योग से सूर्यकांता से
अग्नि उत्पन्न करता है, तब वह उसमें स्वयं की तरह दिखाई देता है। उसी प्रकार शुद्ध स्वरूप में कोई भी संकल्प
नहीं होता। न होते हुए भी जो दिखाई देती है, वही हे राजा जनक! 'मूलमाया' है। स्वरूप पूर्ण निर्विकल्प है।
वहाँ 'मैं' कहने वाला कौन है? ऐसे स्थान पर भी जहाँ 'मैंपन' की स्फूर्ति होती है, वही मुख्य रूप से 'मूल
माया' है। उस 'मैंपन' में वह 'मैं मुझे ही इस दृष्टि से देखूँ', 'मैं अपने से ही बातें करूँ', बड़े आदर से मेरी
मुझसे ही भेंट हो ऐसा कहता है। 'मेरी मुझसे ही अत्यन्त प्रीति है', 'मैं स्वयं में ही रममाण होऊँ', 'मैं अपनी ही
युक्तियों से, मेरे ही बोध से, मुझे मेरी प्राप्ति हो', 'मैं ही मुझ को आलिंगन दूँ', 'मैं स्वयं मेरा उपयोग करूँ', 'मैं
ही मुझसे मिलूँ', 'स्वामीसेवक के नाते से सर्वकाल मैं ही मुझ पर नियन्त्रण करूँ' ऐसा हे आजानुबाहो नृपश्रेष्ठ!
भगवान ने विचार किया और उस विचार से ही पंचभूत एवं भौतिकों का निर्माण हुआ। चार वर्ण, चार खान, चार
युग, चार वाणी, चारों पुरुषार्थ और चारों लक्षणों से चारों मुक्ति की रचना भी उसी स्फुरण से हुई। उस स्फुरण ने
ही तीनों गुण उत्पन्न कर त्रैलोक्य की रचना की। उसने ही ज्ञान, ज्ञाता तथा ज्ञेय इस त्रिपुटी के कार्यों की संरचना
कर सारा कर्म भी तीन प्रकार का किया। इस प्रकार एक स्फूर्ति ने ही एकता में अनेकता का रूप उत्पन्न किया।
लेकिन उस अनेकता में जो एकता है, वह पूर्णरूप से अखण्ड है। वह कभी भी नहीं टूटती। कुम्हार जिन मटकों
की रचना करता है, उनमें आकाश स्वयमेव रहता है। उसी प्रकार पंचमहाभूत तथा भौतिक शरीरों में श्रीहरि
अंतर्बाह्य भरे ही रहते हैं। इसीलिए हे राजा! 'एकाकी न रमते' इस श्रुति के अनुसार भगवान में द्वैत की स्फूर्ति
हुई ऐसा उपनिषद में कहा गया है। अथवा हे राजाधिराज यह बात ध्यान में रखो कि ऐक्यरूप से जिन महाभूतों
ने आकार लिया है, वही यहाँ 'माया' है। किन्तु भूतभौतिकादि में जो स्फूर्ति आती है उसे माया अपनी शक्ति से
प्रकाशित नहीं कर सकती। तो माया का प्रकाशक चिन्मूर्ति परमात्मा ही समस्त भूताकृतियों में प्रविष्ट हुआ रहता
है। वही माया का प्रमुख लक्षण प्रकाशित करता है और वही भूतात्मा भूतों में वास्तव में प्रवेश न होते हुए भी
प्रवेश दिखलाता है।