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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 869 में से

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पृष्ठ 59

द्वितीय अध्याय ४३
की तरह होता है। अधोद्वार से जन्म देने वाले लौकिक दृष्टि से माता-पिता होते हैं किन्तु अधोद्वार का स्पर्श न
होने देने वाले जो गुरु हैं वही सच्चे अर्थ में माता-पिता हैं। गुरु को कुलदेवता कहा जाय तो उसकी पूजनीयता
केवल कुलधर्म के कर्मों में ही होती है, लेकिन गुरु सभी कर्मों में अकर्ता होने के कारण सदासर्वदा और सभी
दृष्टियों से पूजनीय है। गुरु को देवतातुल्य कहा जाय तो देवता को देवत्व भी उसी के कारण आता है, इसलिए
देवता की भी तुलना सद्गुरु के साथ नहीं हो सकती। इसे ध्यान में रखो। गुरु और ब्रह्म को यदि समान कहा
जाए तो वह उपमा भी कुछ कम ही होगी क्योंकि ब्रह्म को ब्रह्मत्व गुरुवाक्य से ही आता है। अद्वय रूप में वह
अवश्य सद्गुरु के समान होगा। इसलिए गुरु की महत्ता अगाध है। वह अनुपम है। ब्रह्मा के सम्बन्ध में ब्रह्मत्व-
प्रमाण-प्रमा-प्रमेय आदि वाक्य-महिमा सद्गुरु की है। ब्रह्म सबका प्रकाशक है लेकिन सद्गुरु उसका भी
प्रकाशक है। इसलिए गुरु से पूज्य और कुछ भी नहीं है। इसलिए हे राजा! सद्गुरु को कभी भी मनुष्य भावना से
नहीं देखना चाहिए। ऐसी भावार्थ बुद्धि से रहने से अच्छे शिष्य की सहज ही चित्तशुद्धि होती है। जिसकी गुरु
चरणों पर असीम भक्ति रहती है, उसके मनोरथ भगवान पूरे करते हैं क्योंकि सद्गुरु की आज्ञा का पालन भगवान
भी करते हैं। गुरु के कहने से वह जड़, मूढों का भी उद्धार करता है। ब्रह्म भावना से जो गुरु की सेवा करते हैं,
उनकी आज्ञा का पालन भगवान भी करते हैं। उन्हें वह सदा सर्वदा निज स्वरूप का सुख प्रदान करता है। इस
गुरु मर्यादा का भगवान कभी उल्लंघन नहीं करता। गुरु की आज्ञा का पालन भगवान स्वयं करते हैं और गुरु भी
भगवान को महानता प्रदान करता है। इसलिए वे दोनों ही अभिन्न भाव से भावार्थी लोगों के तारनहार होते हैं।
अन्तःकरण में सद्भाव न होते हुए भी जो भक्ति का ढोंग करते हैं वे अपनी भावना के अनुसार संसार सागर में
अनेक प्रकार से डूबते-उतराते रहते हैं। वे मानवता से हाथ धोते हैं, आत्मत्व को खो देते हैं और ब्रह्मप्राप्ति में भी
ठगे जाते हैं। हरिभक्ति कभी भी दंभ से नहीं उत्पन्न होती। यहाँ शुद्ध भाव के बिना परमार्थ कभी हाथ नहीं आता।
यह बात तुम ध्यान में रखो कि समस्त साधनों में सद्भाव ही एक श्रेष्ठ साधन है। सूखे खम्भे के पास सद्भाव
रखते ही वहाँ देवाधिदेव प्रकट हो गया, फिर सद्गुरु तो स्वयं साक्षात परब्रह्म हैं। इसलिए गुरुभजन जैसा भजने
के लिए सरल मार्ग नहीं है। सचमुच जिसे ज्ञान-भक्ति कहते हैं वह वास्तव में गुरुभक्ति ही है। गुरु की अपेक्षा
ब्रह्म श्रेष्ठ है, यदि ऐसा कहें तो गुरुत्व की महिमा कम होती है। ऐसा विषम भाव रखने से शिष्य के मन में
ब्रह्मसाम्य का उद्गम नहीं होगा। हमारे लिए सद्गुरु ही परब्रह्म है, ऐसी सप्रेम भावना रखना ही उत्तम गुरुसेवा
है। ऐसी सेवा से अर्थात् ऐसे निजभाव से शिष्य स्वयं परब्रह्म हो जाता है। ऐसी ही गुरुसेवा से प्रह्लाद द्वंद्वातीत हो
गया और नारद परब्रह्म से ऐक्य प्राप्त कर निजानन्द से नाचते-गाते देवदानवों के बीच विचरण करता रहता है।
ऐसी ही गुरु सेवा करने से अम्बरीष की गर्भव्यथा समाप्त हो गयी। उस गर्भव्यथा को भगवान ने सहन किया।
अपने भक्त को उसने संसार की व्यथा नहीं होने दी। ऐसी अभिन्न भावना से जो सुबुद्धिमंत गुरुचरणों का भजन
करते हैं वे जनार्दन के प्रिय बन जाते हैं। वे उन्हें संसार भावना का स्पर्श नहीं होने देते। गुरु और ब्रह्म ये दोनों
एक हैं, उसी प्रकार शिष्य भी तत्स्वरूप ही है। जो कोई भेद भावना से भिन्नता मानते हैं वे माया के कारण ऐसा
करते हैं, ऐसा कवि का कहना है।
अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयोर्ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथौ यथा।
तत् कर्मसङ्कल्पविकल्पकं मनो बुधो निरुन्ध्यादभयं ततः स्यात्॥ ३८॥
जिस प्रकार कोई व्यक्ति सोते समय स्वप्न में संसार की कल्पना करता है, उसी प्रकार पुरुष को जो प्रपंच
दिखाई देता है वह वास्तव में न होते हुए मिथ्या भासित होता है। मनुष्य जब नींद में रहता है, उस समय उसे