श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 61, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय ४५
परमामृत का दूध अर्थात् मोक्ष प्रदान करती है। उसी प्रकार जो श्रवण किया जाए वह मनन से ही परमपावन होता
है। अगर श्रवण की उपेक्षा की जाए तो वह निष्फल होता है। हरि का नाम कान में पड़ते ही कितने ही लोगों के
मुख से वह बाहर निकलता है तो कितनों के इस कान से दूसरे कान में से निकल पड़ता है। परन्तु हरि का नाम
कान में पड़ते ही, जिसके अन्तःकरण में प्रवेश करता है उसका सारा पाप धुल जाता है और वह हरि के चरणों में
लिपट जाता है। इस प्रकार हमेशा श्रवण के प्रति मननयुक्त श्रद्धा रखने से, विकल्प की कभी भी बाधा नहीं
उत्पन्न होती और चित्तवृत्ति अपने आप शुद्ध हो जाती है। इस प्रकार मननयुक्त श्रवण करने से पूर्णानन्द उफनने
लगता है और आनन्द के उस आवेग में वह हरिकीर्तन करने लगता है। तानमुद्रा-पदबंधयुक्त हरि का अगाध
चरित्र कीर्तन के माध्यम से गाकर जब वे उनका विवेचन करने लगते हैं तो परमानन्द मानों बहने लगता है।
जिसका जन्म नहीं है उसके जन्मों का वर्णन करते हैं, जिसका कोई कर्म नहीं है उसके कर्म अर्थात् लीलाओं को
गाते हैं और जिसका कोई नाम नहीं है उसके नाम का संकीर्तन कर प्रेम से गर्दन हिलाते हैं। अपना हित साधने
के लिए लौकिक की लज्जा छोड़ प्रसन्नता से नाचते रहते हैं। कीर्तन के योग से दोषों का निर्दलन होता है, जप,
तप निराश हो जाते हैं, यमलोक उजाड़ हो जाता है और तीर्थों की आशा निष्फल हो जाती है, यम नियमों का
उपवास हो जाता है, योगाभ्यास की मरने जैसी अवस्था हो जाती है, कीर्तन का गजर शुरु होते ही, परमात्मा
श्रीकृष्ण नाममात्र से ही सारे दोष नष्ट कर देता है। कीर्तन की घड़घड़ाहट शुरु होते ही चारों ओर आनन्द छा
जाता है। श्रीविष्णु आनन्द से गर्दन हिलाने लगते हैं और आनन्द के उस आवेग में शंकर तो ताण्डव नृत्य करने
लगते हैं। इस प्रकार हरिकीर्तन मन को अत्यन्त आनन्द प्रदान करता है। यह भक्ति का राजमार्ग है। इस मार्ग में
स्वयं चक्रपाणि सुरक्षा करता रहता है। वह चक्र लेकर उससे कहता है, "भक्त के स्थान पर तुम्हारी क्या
आवश्यकता है ? संसार में मेरा तो कोई शत्रु नहीं है लेकिन जो भक्तों से द्वेष करता है, उसका मैं अपने शस्त्र से
विनाश करता हूँ।" चक्र से अहंकार की लुगदी बना देता हूँ। गदा तो मोहमाया का विनाश करती है, शंख से
आत्मबोध को जागृत करता हूँ, और कमल से हमेशा अपने भक्तों की पूजा करता हूँ। जहाँ चक्रपाणी ही सुरक्षा
कर रहे हैं, वहाँ संसारभय की कथावार्ता भी नहीं सुनाई पड़ती। श्रीहरि स्वयं कीर्ति गाने वाले की सुरक्षा करते
रहते हैं। जो कथा श्रवण नहीं कर सकते हों, उन्हें 'राम, कृष्ण, गोविन्द' का नामस्मरण करना चाहिए। 'अच्युत'
नाम की महिमा ही कुछ ऐसी है कि उसकी गर्जना करने से कल्पांत में भी 'च्युति' अर्थात् अधोगति नहीं हो
सकती। इस नाम का जो नित्य स्मरण करते हैं वे सचमुच अच्युत के ही अवतार हैं। जिनकी वाणी रामकृष्णादि
नामों का अखण्ड जप करती है, गर्जना करती है, उनके चरणों को साक्षात तीर्थ दण्डवत करते हैं और बड़े-बड़े
देवतागण भी उनके चरण छूते हैं। नाम का तेज ही विलक्षण है। उसे लेने वाले की चरण रज यमराज भी अपने
मस्तक पर धारण करते हैं। नाम के पास चतुर्भुज श्रीकृष्ण सदासर्वदा खड़े रहते हैं। नाम के प्रभाव के सामने
संसारभय नगण्य है। नाम का सामना करने का साहस कलिकाल में भी नहीं है। नाम में जितनी शक्ति है उतना
पाप पूरे त्रैलोक्य में नहीं है। हे जनकराजा! चारों भक्तियाँ नाम के पास ही रहती हैं, यह ध्यान में रखो। नाम से
सुगम अन्य कोई साधन नहीं है। श्रीधर के नाम का, उसके जन्मों का तथा कर्मों का श्रवण करने से पापी का भी
उद्धार होता है। इसलिए शास्त्रों के पण्डित हरि की लीला कल्याणकारी है इस प्रकार वर्णन करते हैं। ऐसा
भक्तियोग जिनके अंतःकरण में रहता है, उनमें ज्ञान का अहंकार नहीं रहने पाता। अहंकार की ममता छोड़ वे
निःसंग होकर हरिकीर्तन करते रहते हैं। हरिकीर्ति का श्रवण और हरिनाम का स्मरण करने से सप्रेम भक्ति की
वृद्धि होती है और भक्त को देह का भान ही नहीं रहता। राजा! उस स्थिति का भी वर्णन करता हूँ।