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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 869 में से

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५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
रहते हैं तो कोई उन्माद जैसी स्थिति में रहते हैं। कोई हमेशा नाचते-गाते रहते हैं तो कोई मौन ही रहते हैं। कोई
हरिनाम का घोष करते रहते हैं तो कोई अपने कर्मों का ही त्याग करते हैं। कोई प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव
रखकर रहते हैं तो कोई नियमपूर्वक भजन करते रहते हैं। ऐसे भक्तों के अनेक लक्षण हैं। उन सबको बताना
सम्भव नहीं है। इसलिए हे राजा! उनमें से जो प्रमुख है, उनके ही सम्बन्ध में तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ। सभी
भूतों में भगवान व्याप्त हैं इस दृष्टि से देखना ही पूर्ण प्राप्ति का मुख्य स्वरूप एवं साधन है। यही पूर्ण भक्ति का
गौरव है। यही अभिप्राय हरि बताते हैं। मैं ही भगवद् स्वरूप हूँ और सर्वभूतों में मैं ही व्याप्त हूँ, समस्त भूत
मुझमें ही वास करते हैं और सभी भूतों में भूतात्मा मैं ही हूँ तथा परमात्मा मैं ही हूँ। यह तो पूर्णत्व का 'मैंपन' है,
उससे ही आत्माभिमान बढ़ता है और वह सहज ही सच्चा निरभिमानी होता है। राजा, वह शुद्ध लक्षण बताता हूँ,
सुनो। शुद्ध भक्तों का प्रमुख लक्षण यह है कि चैतन्य आत्मा का जो 'मैंपन' है उसे भी वे गौण मानते हैं और
उनकी भावना पूर्णतयः ऐसी हो जाती है कि सभी प्राणियों में भगवान हैं तथा सभी प्राणी भगवान में हैं। प्राणीमात्र
में वास करने वाला परमात्मा मैं हूँ यह कहने से 'मैं पन' आड़े नहीं आता। समस्त प्राणियों में भगवान हैं और
भगवान में समस्त प्राणिमात्र हैं यह जो मानता है और यह सब अपने ही देह में देखता है, वह स्वस्वरूप बन कर
रहता है। यह भक्तों में अत्यन्त श्रेष्ठ, वही भागवतों में भी वरिष्ठ, उसे ही उत्तमता का सम्मान देकर श्रेष्ठ अवतार
समझा जाता है। योगियों में वही अग्रगण्य है, ज्ञानियों का शिरोमणि वही है और सिद्धों का मुकुटमणि भी वही है
वह स्वयं श्रीकृष्ण का वचन है। घी का रवा जिस प्रकार घी से अलग नहीं रहता उसी प्रकार पंचमहाभूत और
भौतिक पदार्थ—यें सब सर्वव्यापी परमात्मा से कभी भिन्न नहीं होते। हे राजा! 'उत्तम' भक्तों की भावना इस
प्रकार की रहती है निश्चित जान लो। अब 'मध्यम' भक्तों की भजनपद्धति सुनो।
ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च।
प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥
ईश्वर उत्तमोत्तम है, उसके भक्त मध्यम हैं, अज्ञानी अधम हैं, और द्वेष करने वाले अत्यन्त पापी हैं ऐसा वह
मानता है। हाँ, ईश्वर के प्रति उसके मन में विशुद्ध प्रेम रहता है, भक्तों से केवल स्नेह रहता है, अज्ञानियों पर कृपा
रहती है और जो भूतमात्र से विद्वेष करता है, उसकी वह निरन्तर उपेक्षा करता रहता है। हे राजा! मध्यम भक्तों की
भक्ति इस प्रकार की रहती है इसे ध्यान में रखो। अब तुम्हें 'प्राकृत' भक्तों की स्थिति के बारे में बताता हूँ।
अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते।
न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ४७ ॥
पाषाण की मूर्ति को ही वह देवता मानता है, उसी में उसकी सारी भक्ति रहती है। लेकिन भक्त अथवा
सन्त को देखकर केशमात्र भी देह को नहीं झुकाता। फिर साधारण लोगों को कौन पूछता है ? उन्हें स्वप्न में भी
कभी सम्मान प्राप्त नहीं होगा। प्राकृतों का भजन इस प्रकार का रहता है। जो भक्त ऐसी अज्ञान की स्थिति में
रहता है, वही प्रमुख 'प्राकृत' भक्त है। उसकी मूर्ति भंग होते ही वह समझता है कि देवता का भी अन्त हो गया।
इस प्रकार तीन प्रकार के भजन करने वालों के बारे में तुम्हें बताया। लेकिन उत्तम भक्तों के लक्षण अपूर्व होते हैं।
उसे बताने के लिए मेरा मन अत्यन्त उत्सुक हो उठा है।
गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान्यो न द्वेष्टि न हृष्यति।
विष्णोर्मायामिदं पश्यन् स वै भागवतोत्तमः ॥ ४८ ॥