सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 62

४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत

एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः ।
हसत्यथो रोदिति रौति गायत्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ ४० ॥
हरिनाम का तथा गुण-कीर्तनों का वर्णन जागृति में तो उत्तम है ही, लेकिन जब स्वप्न में भी वही स्थिति
होती है तो यह समझना चाहिए कि हरिभक्ति मन में अच्छी तरह रच-बस गयी है। इस रीति से भक्तियुक्त
होकर, जिसका व्रत धीरे-धीरे दृढ़तर होता जाता है, वैसे-वैसे उसका चित्त अधिकाधिक द्रवित होकर हरिनाम
कीर्त्ति की प्रीति विचित्र ढंग से बढ़ने लगती है। परमप्रिय जो आत्मा है वही हरि है। उसकी नामकीर्तिका हर्ष
अपार, नित्य नयी चाह उभरे, इस योग से अंतर्बाह्य हरि ही प्रकट होता है। किसी संकट में माँ से बेटा बिछड़
जाता है और काफी अन्तराल के बाद दोनों की भेंट होती है उस समय लड़का फुक्का फाड़कर रोने लगता है
और माँ से लिपट जाता है। उसी प्रकार भक्ति मार्ग पर जब जीव की शिव से भेंट होती है और दोनों में
आत्मसाक्षात्कार का आलिंगन होता है उस समय अनिवार्य रूपसे रुदन शुरू हो जाता है। परमात्मा को आलिंगन
होता है, इसलिए जोर की सिसकियाँ आने लगती हैं और प्रेम से परिपूर्ण होने के कारण वह रोमांचित होकर
जोर-जोर से सिसकियाँ लेकर रोने लगता है। फिर दूसरे ही क्षण जोर-जोर से हँसने लगता है और कहता है,
अरे ! मैं तो मुझमें ही हूँ। गलती हो गयी, भेंट हुई यह कहना मेरा ही पागलपन था, यह सोच कर वह हँसने
लगता है। मैं तो स्वयं अखण्ड रूप से सर्वत्र व्याप्त हूँ, पूर्ण अभेद के कारण मैं अनादि जैसा था, वैसा ही हूँ।
उसी प्रकार मैं अव्यय होकर जनमा और मर गया इसका स्मरण होते ही वह गर्दन हिलाकर हँसने लगता है।
रस्सी को साँप समझ कर, घबरा कर भागते हुए लड़खड़ा कर गिर पड़ता है, तभी उस रस्सी को पहचान कर
अपने आप ही हँसने लगता है। उसी प्रकार संसार मिथ्या है तथा देहभाव पूरी तरह झूठा है, ऐसा होते हुए मैं
व्यर्थ की ममता और अहंभाव में था। धन्य है वह गुरुवचन जो मेरे लिए तारक बना। देह में होते हुए मैं विदेही
बना। मेरे चारों देह मिथ्या क्यों हो गये ? ऐसे अनुभवोद्गारों की गर्जना करने लगता है। वह कहता है, "धन्य है
वह भगवद्भक्ति। उसने चारों मुक्तियों को भी मिथ्या सिद्ध कर दिया। परमात्मा तो मैं ही हूँ यह निश्चित है।"
ऐसे उल्लासपूर्ण गर्जन से त्रिभुवन को निनादित कर देता है। धन्य है भगवान का नाम। उस नाम ने मुझे नित्य
निष्काम कर दिया। संसार भ्रम पूर्णतया मिथ्या सिद्ध हुआ। इस प्रकार जोर-जोर से गर्जना कर पुकारता है। अब
त्रिभुवन में अन्य कुछ भी नहीं है, जो कुछ भी दिखायी देता है, वह मैं ही हूँ, कहकर जोर की आवाज लगाता
है। जिसके कारण दुर्धर भवबन्ध नष्ट हो गया, उस सद्गुरु की स्तुति में ही, अपनी अलौकिक वाणी में गरजता
है। 'अरे ! यह संसार मिथ्या हो गया, जन्म-मरण का अभाव हो गया, कलिकाल का अस्तित्व ही समाप्त हो
गया' की रट लगाता है। इस प्रकार एक के बाद एक रट लगाने लगता है। उसी क्षण आत्म सुख का गीत गाता
है और स्वानन्द से डोलता रहता है। अपने प्रिय की मधुर कथा जब सुनाने लगता है तो उसका समाधान ही नहीं
होता, उसी प्रकार आत्मानुभव से जब हरिकथा गाने लगता है तो उसे संतोष ही नहीं होता। उसका गायन सुनते
समय ज्ञानी श्रोता सुस्वरूप होता है, मुमुक्षु को उसका गाना सुनकर प्रेम उमड़ आता है। इस प्रकार वह जब गाने
लगता है उस समय उसमें निजसुख का ज्वार उमड़ आता है और जब हर्ष पेट में नहीं समा पाता तो वह
अलौकिक भाव से नाचने लगता है। दूजेपन का काम छोड़कर लौकिक की लाज छोड़कर वह अहंभाव त्याग
कर सहज आनन्द से बड़े मजे से नाचता है। जो खरीद कर शराब पीता है, वह भी दारू की बेहोशी में गाता है
और नाचता है, फिर जिसने ब्रह्मानन्द रस का सेवन किया हो, वह होश में कैसे रह पायेगा ? इसलिए ब्रह्मानन्द
के उन्माद में लौकिक छोड़कर वह स्वयं नाचता-गाता रहता है। लोग उसे पागल कहते हैं। यह बात पण्डितों