श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय ५७
शुद्धि होने पर हरि सचमुच ही वहाँ से बाहर नहीं निकलता। हरिनाम के प्रेम से हरि जो एक बार हृदय में प्रवेश
करता है वह भक्त प्रेम के कारण बाहर निकलना ही भूल जाता है। भक्त ने जब प्रेमरज्जु से हरिचरणों को हृदय
के साथ कस कर बाँध लिया है तो हरि वहाँ से कैसे निकल सकता है ? किन्तु भगवान अत्यन्त बलशाली होते
हुए शक्तिशाली दैत्यों का भी संहार करता है, उस महाबलिष्ट हरि को हृदय कमल में बन्द कर दिया इस बात
को क्या कोई मिथ्या कह सकता है। लेकिन जो भँवरा सूखी लकड़ी को भी खोदता है, वही भँवरा कोमल कमल
में प्रेमवश फँसा रहता है। उसमें जो केशर है उसे भी वह नष्ट नहीं होने देता। उसी प्रकार भक्त के अखण्ड प्रेम
के कारण हरि हृदय में स्वयं को बन्द कर लेता है। वहाँ उसका सारा सामर्थ्य और पराक्रम व्यर्थ हो जाता है।
भावार्थ के आगे बल सामर्थ्य का कुछ नहीं चलता। बच्चा बाप की धोती पकड़ कर उसे जाने से रोकता है तो
क्या बाप बल में उससे कम हो गया ? नहीं। प्रेम के भुलावे में वह आगे नहीं बढ़ पाता बस इतनी सी बात है।
उसी प्रकार लाडले निजभक्त का प्रेम, नितांत मधुर होता है इसलिए वहाँ से निकलने की बात भूलकर श्रीहरि
उसके हृदय में ही आनन्दपूर्वक रहता है। ऐसा जिसका अंतःकरण रहता है, उसे श्रीहरि कभी स्वयमेव नहीं
छोड़ते, उसी प्रकार वह भी पूर्णप्रेम के कारण हरिचरणों को छोड़ना नहीं चाहता। हरि के प्रति भक्त की जैसी
प्रीति रहती है, वैसी ही प्रीति हरि की भी भक्त के प्रति रहती है। जो हरि के प्रति निरन्तर अनन्य भाव से रहते हैं
उनके प्रति हरि भी निरन्तर अनन्य ही रहते हैं। उसी प्रकार जो भक्त हरि के प्रति अनन्य भक्ति रखते हैं वे भक्तों
में प्रमुख हैं। हे राजा! वैष्णवों में अग्रगण्य वही हैं और भागवतों में भी उत्तम भागवत वे ही हैं, इसे ध्यान में
रखो। इस प्रकार चारों मुक्तियों को गौण बनाकर संसार में जो भगवद्भक्ति का आश्रय करता है। उस उत्तम भक्त
की स्थिति तुम्हें संक्षेप में बतायी। भक्ति का सम्पूर्ण निरूपण करते समय वेद भी मौन हो जाते हैं, सहस्रमुखी
शेष की जिह्वा भी भक्ति की महिमा का वर्णन करते समय थक. जाती है। हे राजा! मैंने तुम्हें अब तक जो कथा
सुनायी वह इस भक्ति का अंशमात्र ही है ऐसा समझो। हस्त्रिऋषि सदृश रसाल वक्ता से उत्तम भक्त की कथा
सुनते समय सब लोग स्तब्ध रह गये थे। राजा की बात क्या की जाय ? उसका सारा शरीर रोमांच से भर आया
था और प्रत्येक रोम के मूल से पसीना चू रहा था। श्रवणसुख से लुब्ध होकर वह आत्मानन्द से डोलने लगा। मन
में अत्यन्त सन्तुष्ट होकर राजा ने कहा, मुनिवर्य! आपने बहुत अच्छा किया। आपका निरूपण सुनकर बड़ा
समाधान हुआ लेकिन केवल उतने से श्रवण की तृप्ति नहीं होती। हरिमुनि का भाषण सुनकर राजा ने मन ही मन
कहा, ये सभी मुनि आत्मानुभव ज्ञान से परिपूर्ण हैं। इतना ही नहीं, बल्कि वे उत्तम वक्ता भी हैं। इसलिए इनसे
विभिन्न प्रश्न पूछकर सभी का भाषण क्यों न श्रवण किया जाए ? ऐसी पूर्णश्रद्धा से वह राजा अनुपम प्रश्न करने
वाला है। राजा को कथा अत्यन्त प्रिय होने के कारण वह बहुत अच्छे प्रश्न पूछेगा। उसे सुनते ही इच्छा तृप्त
होकर श्रोताओं को बड़ा संतोष होगा। उन प्रश्नों का गूढ़ ज्ञान मैं भी सबको सुनाऊँगा। सम्पूर्ण अर्थ के साथ
यथातथ्य रीति से श्रीजनार्दन ही मेरे मुख से बोलने वाले हैं। मुरली में से अनेक प्रकार की ध्वनियाँ निकलती हैं
लेकिन उसका कौशल बजाने वाले में होता है। उसी के अनुसार जनार्दन की कृपा से 'एका' कवि और ग्रन्थकर्ता
के रूप में आगे आ रहा है। श्रीकृष्णार्पणमस्तु!
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशे स्कंधे निमिजायंत
संवादे एकाकार टीकायाम। द्वितीयोध्यायः ॥ २ ॥